जय श्री ठाकुर जी की !
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श्री धन्नावंशी स्वामी समाज की हर महत्वपूर्ण जानकारी, इतिहास, साहित्य, ताज़ा समाचार, इवेंट्स, जनगणना, डायरेक्टरी, संस्थाएं, छात्रावास और बहुत कुछ-अब एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर।
(श्री धन्नावंशी स्वामी समाज महासभा द्वारा संचालित)
धरनीधर व्यापक सबै, धरनि ब्यौम पाताल।
धनौ कहै धनि साध ते, बिसरे नहीं कहुं काल।।
आगामी कार्यक्रम
वैष्णव संप्रदाय का इतिहास
वैष्णव संप्रदाय का अर्थ है-"वह मार्ग जो भगवान विष्णु और उनके अवतारों (जैसे श्री रामऔर श्री कृष्ण) को परम सत्य मानकर उनकी भक्ति करता है।
और जानेंहमारा इातहास
एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक और वैष्णव संप्रदाय के रूप में विख्यात धन्नावंशी स्वामी समाज को स्वामी, साध, बैरागी, संत या पुजारी के नाम से भी जाना जाता है। इस गौरवशाली समाज का इतिहास 16वीं शताब्दी के महान भक्ति आंदोलन और संत श्री धन्ना भगत जी महाराज से जुड़ा हुआ है। स्वामी रामानंद जी के परम शिष्य धन्ना जी महाराज ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए समाज में वैष्णव धर्म और भक्ति की अलख जगाई। उन्हीं के नाम और आदर्शों के कारण यह समाज 'धन्नावंशी स्वामी' के नाम से प्रतिष्ठित हुआ। वर्तमान में हमारा समाज मुख्य रूप से राजस्थान (विशेषकर मारवाड़, नागौर, जोधपुर, चुरू, सीकर, झुंझुनू, हनुमानगढ़, गंगानगर, जयपुर और बीकानेर), पंजाब और हरियाणा में ससम्मान निवास करता है।
और जानेंपंथ प्रवर्तक श्री धन्नाजी महाराज
धन्नावंशी संप्रदाय के पंथ प्रवर्तक परमहंस श्री धन्नाजी महाराज राजस्थान की भक्ति-चेतना के एक अद्वितीय पर्याय रहे हैं। उनका जन्म विक्रम संवत 1472 (सन 1415 ई.) में राजस्थान के टोंक जिले के धुँआ कलां (धुँआ कल्ला) ग्राम में हुआ था। बाल्यकाल से ही वे भक्ति भाव में रमे रहे और उनका समस्त आचरण वैष्णव मर्यादाओं से परिपूर्ण रहा। उनके दिव्य व्यक्तित्व एवं सहज आध्यात्मिक तेज से मध्ययुगीन संत परंपरा के अग्रणी महात्मा श्री रामानंद जी महाराज (रामानंदाचार्य जी) भी अत्यंत प्रभावित हुए। श्री रामानंदाचार्य जी के द्वादश (12) प्रमुख शिष्यों—अनंतानंद, भावानंद, सुरसुरानंद, पीपा, सेन, धन्ना, नरहर्यानंद, सुखानंद, कबीर, रैदास, सुरसरी एवं पद्मावती—में श्री धन्नाजी का स्थान अत्यंत विशिष्ट रहा। अपने गुरु के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण ही आगे चलकर धन्नावंशी संप्रदाय का मुख्य आधार बना।
और जानेंभक्त धन्नाजी महाराज के भक्ति पद
संत परंपरा के महान और आदरणीय संत भक्त शिरोमणि धन्ना जी, अपने निष्कपट और अनन्य प्रभु-प्रेम के लिए जाने जाते हैं। एक साधारण किसान होने के बावजूद, उन्होंने अपनी सच्ची और अटूट भक्ति के बल पर भगवान को साक्षात दर्शन देने के लिए विवश कर दिया था। उनके द्वारा रचित भक्ति-पद हमें यही सिखाते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए बाहरी दिखावे की नहीं, बल्कि साफ दिल और सच्चे प्रेम की जरूरत होती है। प्रस्तुत है भक्त धन्ना जी महाराज का वह सुंदर भक्ति-पद:
और जानेंधन्नावंशी छात्रावास
समाज के विद्यार्थियों हेतु विभिन्न शहरों में संचालित छात्रावासों की जानकारी।
संस्थाएं
धन्नावंशी स्वामी समाज द्वारा संचालित प्रमुख संस्थाएं व भवन।
धन्नावंशी स्वामी समाज की महंत गद्दियाँ।
धन्नावंशी समाज में पूर्वकाल में ३५ महंतद्वार सक्रिय हुआ करते थे, जो समाज की सामाजिक, धार्मिक एवं संगठनात्मक व्यवस्था का संचालन करते थे। समाज से संबंधित प्रमुख निर्णय इन्हीं महंतद्वारों के माध्यम से लिए जाते थे। इन महंतद्वारों में से कुछ के नाम निम्नलिखित हैं —
और जानेंजनगणना
आप यहाँ धन्नावंशी जनसंख्या क्षेत्र वाइज एवं नख/गोत्र वाइज के साथ-साथ धन्नावंशी स्वामी समाज की डायरेक्टरी भी देख सकते हैं। यदि आपके गाँव/शहर का डेटा नहीं है तो आप डाल सकते हैं। डेटा डालने से पहले ध्यान रखें कंही पहले से डेटा उपलब्ध है या नहीं। यदि डाला हुआ है तो जांच कर की सही है या इसमें सुधार की जरूरत है। जितने जाती नख/गोत्र है उतनी बार अलग अलग एंट्री करें।
फ़ोन 9350308314
Downloads
श्री धन्नावंशी स्वामी से सम्बंधित पुस्तकें, पुस्तिकाएं और साहित्य संग्रह की सचित्र जानकारी।
और जानेंगांव परिचय
इस वेबसाइट के माध्यम से धन्नावंशी समाज के गाँवों का विस्तृत डाटा तैयार किया जा रहा है । अभी तक कुछ गाँवों का डेटा हमारे पास आया है। आप गांव पर क्लिक करके विस्तृत जानकारी पढ़ सकते हैं। आपसे अनुरोध है की यदि आपकी गांव की जानकरी भी इस तरह से इस वेबसाइट पर देना चाहते है तो हमें भेजिए।
और जानेंधनां धन नहीं राचिये, न राचिये संसार।
पग बेड़ी गळ रासपड़ी, यूं ही गये असार।।
धनां धनि ते मानवी, धरणीधर सूं प्रीति।
राति दिवस बिसरै नहीं, रसनां उर मन चीति।।
धनो कहै ते धिग नरा, धन देख्यां गरबाहि।
धंन तरवर का पानड़ा, लागे अरु उड़ जाहि।।
