धनाजी की साखियां
भक्त शिरोमणि श्री धनाजी महाराज (भगत धन्ना जी) द्वारा रचित ये साखियां परम सत्य, वैराग्य, परोपकार और ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का अद्भुत निचोड़ हैं।
इन साखियों का सरल और भावपूर्ण अर्थ नीचे दिया गया है:
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ज्ञान और कर्म की साखी
धनां कहै हरि धरम बिन, पंडित रहै अजांण।
अण बाह्यो ही नीपजै, बूझौ जाइ किसांण।।1।।
सरल अर्थ: धनाजी महाराज कहते हैं कि ईश्वर की भक्ति और सच्चे धर्म के बिना बड़े से बड़ा विद्वान (पंडित) भी अज्ञानी ही रहता है। वे एक किसान का सुंदर उदाहरण देते हुए कहते हैं कि क्या बिना हल चलाए या बिना खेत जोते कभी फसल पैदा हो सकती है? जाकर किसी किसान से पूछो।
भावार्थ : किताबी ज्ञान बेकार है जब तक उसे जीवन में न उतारा जाए। जैसे बिना मेहनत के फसल नहीं उगती, वैसे ही बिना सच्ची भक्ति और कर्म के ईश्वर रूपी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।
संसार की नश्वरता
धनां धन नहीं राचिये, न राचिये संसार।
पग बेड़ी गळ रासड़ी, यूं ही गये असार।।2।।
सरल अर्थ: धनाजी कहते हैं कि इस नश्वर धन-दौलत और मायावी संसार में मत डूबो। यह धन पैरों की बेड़ी (जंजीर) और यह संसार गले की रस्सी (फांसी) के समान है। लोग इसके जाल में फंसकर अपने जीवन के असली सार (परमात्मा) को भूल जाते हैं और अंत में खाली हाथ चले जाते हैं।
भावार्थ: भौतिक संपदा केवल एक बंधन है जो मनुष्य को आध्यात्मिक मार्ग से भटकाती है।
धन का अहंकार
धनो कहै ते धिग नरा, धन देख्यां गरबाहि।
धंन तरवर का पांनड़ा, लागे अरु उडि जाहि।।3।।
सरल अर्थ: धनाजी महाराज कहते हैं कि उन मनुष्यों को धिक्कार है जो थोड़ी सी धन-दौलत देखकर अहंकार (घमंड) करने लगते हैं। यह धन तो पेड़ के पत्तों की तरह है, जो आज शाखा पर लगे हैं और कल हवा का झोंका आते ही टूटकर उड़ जाते हैं।
भावार्थ: धन कभी स्थायी नहीं रहता, इसलिए लक्ष्मी का अहंकार करना सर्वथा व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण है।
परोपकार और दान का महत्व
धनौ कहे धन बांटियै, ज्यूं कूवा का नीर।
खाटी सापुरिसां तणी, सब काहू का सीर ।।4।।
सरल अर्थ: धनाजी उपदेश देते हैं कि धन को हमेशा परोपकार में बांटना (दान करना) चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे कुएं का पानी जितना निकाला जाए, उतना ही साफ और नया पानी आता रहता है। सत्पुरुषों की कमाई (खाटी) पर केवल उनका अधिकार नहीं होता, बल्कि उसमें हर जरूरतमंद का हिस्सा (सीर) होता है।
भावार्थ: संचय करने से धन सड़ जाता है, लेकिन परोपकार में लगाने से वह कुएं के जल की तरह हमेशा पवित्र बना रहता है।
संतों की महानता
धनां धनि ते संत जन, जे पेठै परभीड़।
संधि कटावै आपनी, रत्ती न आवै पीड़।।5।।
सरल अर्थ: धनाजी कहते हैं कि वे संत महापुरुष धन्य हैं, जो दूसरों के दुःख और विपत्ति (परभीड़) को दूर करने के लिए खुद संकट में कूद पड़ते हैं। वे दूसरों के बंधनों को काटने के लिए अपनी देह तक को कष्ट में डाल देते हैं, फिर भी उनके चेहरे पर शिकन या मन में रत्ती भर भी पीड़ा नहीं होती।
भावार्थ: सच्चा संत वही है जो परोपकार के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे और बदले में किसी सुख की इच्छा न रखे।
अनन्य भक्ति
धनां धंनि ते मानवी, धरणीधर सूं प्रीति।
राति दिवस बिसरै नहीं, रसनां उर मन चीति।।6।।
सरल अर्थ: वे मनुष्य वास्तव में धन्य हैं, जिनका प्रेम साक्षात 'धरणीधर' (पृथ्वी को धारण करने वाले भगवान नारायण) से हो गया है। जिन्हें रात-दिन, उठते-बैठते एक पल के लिए भी प्रभु नहीं भूलते और जिनकी जीभ (रसना), हृदय (उर) और चित्त में केवल भगवान का ही वास रहता है।
भावार्थ: २४ घंटे ईश्वर के सिमरन में लीन रहना ही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है।
सर्वव्यापक ईश्वर
धरनीधर व्यापक सबै, धरनि ब्यौम पाताल।
धनौ कहै धनि साध ते, बिसरे नहीं कहुं काल।।7।।
सरल अर्थ: वह परमेश्वर (धरनीधर) इस धरती, आकाश और पाताल—सृष्टि के कण-कण में व्यापक है। धनाजी कहते हैं कि वे साधु (भक्त) धन्य हैं, जो किसी भी काल या परिस्थिति में उस सर्वव्यापी परमात्मा को कभी नहीं भूलते।
भावार्थ: ईश्वर हर जगह मौजूद है, और जो भक्त इस सत्य को पहचान लेता है, वह हर समय प्रभु की उपस्थिति का आनंद लेता है।
भक्त धन्नाजी महाराज के भक्ति पद
भक्त धन्ना जी, संत परंपरा के एक प्रमुख भक्त, अपने निष्कपट एवं अनन्य प्रेम के लिए विख्यात हैं। साधारण कृषक होते हुए भी, उन्होंने अपनी अटूट भक्ति द्वारा भगवान को प्रत्यक्ष दर्शन देने के लिए बाध्य कर दिया। उनके भक्ति पद यह प्रतिपादित करते हैं कि ईश्वर-प्राप्ति के लिए बाह्य आडंबर नहीं, अपितु निर्मल हृदय और सत्यनिष्ठ प्रेम ही पर्याप्त है। प्रस्तुत है भक्त धन्ना जी का भक्ति पद।
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1
रे चित ! च्यंतसि दीनदयालहि, हरि बिन और न कोई।
जेहि ध्यावे ब्रह्मण्ड खण्ड लो, करता करे सो होई ।।
जिन्हि जननी के उदर उदक थे, पिण्ड कीयो दस द्वारा।
दियो आधार अगिनि मुख राखे, ऐसा खसम हमारा ।।
कूर्मी अण्ड धरे जल अंतरि, खीर पंक तहं नाहीं।
पूरन परमानंद पयोधर, चित चिंतित तिहि ठांई ।।
पाहन कीट गोपि सबहिन थें, मारग कत हूं नाहीं।
कहे धनौ ताका हरि पूरिक, तूं कांई जीव डराहीं ।।
(गुरु ग्रंथ साहब में यह पद थोड़े फर्क से है।)
2
आरती गोपाल तेरा आरता।
जो जन तेरी भगति करता, जिनके काज संवारता।
दाल सीधा मांगो घीव, हमारा खुशी करो नित जीव।
पनही छाजन छीका मांगु, नाज मांगू सत सीका।
गऊ भैंस मांगो लहरी, इक ताजनि तुरी चंगेरी।
घर की गृही नारि चंगी, अन धना इव मांगी।
अवगति बेहद तेरी आरती, हृदय में प्रगट्या न जाई ।।
(गुरु ग्रंथ साहब में यह पद थोड़े फर्क से है।)
3
जे उधरे जिनि राम कहे, तिनके दुख दारन आप कहे।
जे उधरे ऊधौ, नारद नांमा, अंबरीक, प्रहलाद सुदांमा ।।
उधरे सिब सनकादिक, सनक, सनंदन चरन परापति।
दास धनां हरि के गुण गावे, गुर परसादि परम पद पावै ।।
(ग्रंथांक 496 के अनुसार)
4
ना जानौं राम कैसा जोगी, अनंत गुफा मधुसूदन भोगी ।।
खीर, खांड घ्रित अंमृत भोजन, साधनि न्यूंत जिमाऊं ।
यह कुटि छांडौ और निवासो, बहुरि न या कुटि आऊं ।।
आवत जात बहुत से कीयै इहां ई रह्या न होइ ।
भगत धना जाट सेवग तेरा, हंस चाल्या कुटि रोई ।।
(ग्रंथांक 561 के अनुसार)
5
हरि हरि नित सुमरि ऊबरिसी हरि हूं, कांई रे जीहां
हरि न कहे।वाऊवा मरण सराणै बैठी, वासै खुरे त्रोड़तो वहै ।।
निस दिन नाम जपै नारायण, झाले साच पड़े मम झूठि।
दोखी अंत आतम न देखै, पान्ही चढहि जरा तौ पूठि ।।
प्राणियां नांम सुमिर, पुरषोतम, अंनि विषय परहरे आल।
पग सों पग त्रोड़तो न पेखे, क्रम क्रम जाल नाखतो काल ।।
प्रिसण मरण हरि समरथ पालिस्यै, मेल्हे मा चित सूध मना।
धरि हरि चेत समरि धरणीधर, धरणीधरि ऊबरिसी धना ।।
(प्राचीन राजस्थानी गीत)
6
हरि गुण गाइ रे हरि गुण गाड़, औरे छांडि सबै चतुराई ।। टेक ॥
चरण गंग गहि नीर न्हवाऊं, पीतांबर क्यूं सोभै तास ।
चंदणि किसै करूं हरि लेपण, जाके अंग अनूपम बास ।।
अगर चंदन घसि धूप खिड़ाण, कौण बास मनि राम रली।
पत्री पहप किसै बनि आण, जाके भार अठारह रोमावली ।।
पूजा भगति किसी भूल माणै, जाके सनक सनंदन भगत सुकादि ।
सेस सहंस मुख नांव अराधै, पवन पूज जाकै ब्रह्मादि।।
जाके नारद निरति नटारंभ संकर, आप अपछरा तोड़ै ताल।
अगणित महिमा राम तुम्हारी, मैं गुण का जाणूं गोपाल ।।
अविगत अगम विषम कठिनाई, कहि कहि कहूंक लीयौ जाइ।
कहै धनौ अरथ परमारथ, जिनि पायौ तिनि सहज सुभाइ ।।
(ग्रंथांक 496 के अनुसार)
7
भ्रमत फिरत बहु जनम भुलाने, तनु मनु धनु नहीं धीरे।
लाल विखु काम लुबध राता, मनि बिसरे प्रभ हीरे ।।
बिखु फल मीठ लगे मन बउरे, चार विचार न जानिआ ।
गुन ते प्रीति बढी अन भांति, जनम मरन फिरि तनिआ ।। 1 ।।
जुगति जानि नहिं रिदै निवासी, जलत जाल जम फंद परे।
बिखु फल संचि भरे मन ऐसे, परम पुरख प्रभ मन बिसरे ।। 2 ।।
गिआन प्रवेसु गुरहि धनु दीआ, धिआनु मानु मन एक मए ।
प्रेम भगति मानी सुखी जानिआ, त्रिपति अघाने मुकति भए ।।३।।
जोति समाइ समानी जाकै, अछली प्रभु पहिचानिआ।
धनै धनु पाइआ धरणीधरू, मिलि जन संत समानिआ ।। 4।।
(मूलपाठ-गुरुग्रंथ साहब)
8
गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मनु लीणा।
आढ दाम को छीपरो, होइओ लाखीणा ।। रहाउ ।।
बुनना तनना तिआगि कै, प्रीति चरन कबीरा।
नीचा कुला जोलाहरा, भइओ गुनीय गहीरा ।। 1 ।।
रविदास ढुवंता ढोर नीति, तिन्हि तिआगी माइआ।
परगटु होआ साथ संगी, हरि दरसनु पाइआ ।। 211
सैनु नाई बुतकारीआ, ओहु घरि घरि सुनिआ।
हिरदै वसिआ पारब्रह्यु, भगता महि गनिआ ।। 3 ।।
इहि विधि सुनि कै जाटरो, उठि भगती लागा।
मिले प्रतखि गुसाईआ, धंना बड़भागा ।। 4।।
(मूलपाठ- गुरुग्रंथ साहब)
9
हर हर हर हर हर हर हरे हर सुमिरत जन बहु निस्तरे ।।
हरि के नाम कबीर उजागर, जन्म जन्म के काटे कागर।।
जन रामदास राम संग राता, गुरु प्रसाद नरक नहिं जाता ।।
गोबिंद गोबिंद संग नामदेव मन लीला, आठ दाम को छीपरो होयो लाखीना ।।
बुनना तनना तग के प्रीती चरण कबीरा, नीच कुल जोलाहरा भयो गुणी गहीरा ।।
सैन नाई बुतकरिया ओ घर घर सुनिया, हिरदे वस्या पारब्रह्म भक्तन में गिनिया ।।
रामदास अधमते वाल्मीकि तिन त्यागी माया, परघट होय साध संग हरि दर्शन पाया ।।
यह विधि सुन के जाट रो उठ भक्ति लागा, मिले प्रतक्ष गुसाइयां धन्ना बड भागा ।।
(राग रत्नाकर, खेमराज श्रीकृष्णदास, पृष्ठ 152)
