गारबदेसर — बैराग्य मंडल और महंत परंपरा
गाँव गारबदेसर के महंत साधुओं की गद्दी अत्यंत प्राचीन और श्रद्धेय मानी जाती है। धन्नावंशी वैरागियों के विस्तृत क्षेत्र में यह गद्दी विशेष सम्मान की दृष्टि से देखी जाती है। यहाँ के महंत न केवल धन्नावंशी वैरागियों में अग्रणी माने गए, बल्कि उनकी गणना ज्ञान-संपन्न, पारंगत साधुओं में भी होती रही है।
इतिहास
गारबदेसर — बैराग्य मंडल और महंत परंपरा
गाँव गारबदेसर के महंत साधुओं की गद्दी अत्यंत प्राचीन और श्रद्धेय मानी जाती है। धन्नावंशी वैरागियों के विस्तृत क्षेत्र में यह गद्दी विशेष सम्मान की दृष्टि से देखी जाती है। यहाँ के महंत न केवल धन्नावंशी वैरागियों में अग्रणी माने गए, बल्कि उनकी गणना ज्ञान-संपन्न, पारंगत साधुओं में भी होती रही है।
सांप्रदायिक पृष्ठभूमि
इस गद्दी की जड़ें स्वामी रामानुजाचार्य जी के श्री सम्प्रदाय से जुड़ी हैं, जो विष्णु-नारायण की उपासना पर आधारित है। इस परंपरा में समय के साथ अनेक शाखाएँ विकसित हुईं और कई श्रेष्ठ संतों ने भक्ति मार्ग के प्रसार में योगदान दिया। विक्रम संवत की 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में काशी के आचार्य राघवानंद जी इस सम्प्रदाय के प्रमुख थे। उनके शिष्य परंपरा में प्रसिद्ध संत रामानंद जी हुए, जिन्होंने उपासना में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं माना और राम-स्वरूप को जन-कल्याण के लिए विशेष महत्व देते हुए एक सशक्त सम्प्रदाय — रामावत सम्प्रदाय — की स्थापना की। गारबदेसर के महंतों की गद्दी इसी परंपरा से जुड़ी है, और 18वीं शताब्दी में इसका उल्लेख समृद्ध अवस्था में मिलता है।
स्वामी हरिदास का काल
19वीं शताब्दी में स्वामी मानदास के शिष्य हरिदास को बीकानेर राज्य तक विशेष सम्मान प्राप्त था। जन-कल्याण की भावना से उन्होंने गाँव में दो कुएँ और एक तालाब बनवाए। उनकी भूमि पर ही गारबदेसर का पश्चिमी बास (आधूना) बसा है, और कुआ करमाणों तथा नैडकी तलाई भी उन्हीं की भूमि में स्थित हैं। इसी क्षेत्र में चार बुर्जों वाला एक विशाल मंदिर तथा रहने के लिए कई स्थान बने थे, जिनके भग्नावशेष आज भी दिखाई देते हैं।
महाराजा सूरत सिंह जी के ताम्रपत्र (सं. 1852) के अनुसार, महंत की भूमि पर बसने वाले परिवार (राजपूत और ब्राह्मण) गाँव की परंपरा अनुसार कर चुकाते थे। उस समय महंत के पास कुल 2025 बीघा भूमि थी, जिसका उपयोग आज भी उनके शिष्य मंदिर की सेवा हेतु करते हैं। स्वामी हरिदास के देहावसान स्थल पर आज एक स्मारक भवन और चरण पादुकाएँ स्थापित हैं। वैरागियों में उन्हें आदर से "दादा" कहा जाता था, और आज भी बालकों का झडूला संस्कार तथा विवाह-प्रसंगों पर श्रद्धालु वहाँ दर्शनार्थ जाते हैं।
तिरपाल की घटना
एक प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार, कालू गाँव के गोदारा जाटों ने एक धार्मिक मेले के आयोजन हेतु गारबदेसर के महंत से एक बड़ा तिरपाल उधार माँगा। दुर्भाग्यवश वह तिरपाल कालू में ही जल गया। भयभीत जाटों ने महंत से क्षमा माँगी, जिसे महंत ने सहर्ष स्वीकार किया। फिर भी, कृतज्ञतावश कालू के जाटों ने तिरपाल के बदले 750 बीघा भूमि (खेत संख्या 5) महंत को अर्पित की, जिसका विवरण ताम्रपत्र (सं. 1852) में सुरक्षित है।
आगे की शिष्य परंपरा
हरिदास के पश्चात शिष्य परंपरा इस प्रकार चली — अमरदास, फिर बद्रीदास। बद्रीदास को भूमि संबंधी लगान का ताम्रपत्र बीकानेर के महाराजा रतनसिंह और सरदारसिंह ने मोहता लीलाधर के माध्यम से (सं. 1900) प्रदान किया। बद्रीदास के शिष्य सेवादास ने विक्रम संवत 1974 में कालू गाँव में अपना बास बसाया और वहाँ मंदिर व कुआँ स्थापित किया।
सेवादास के दो शिष्य हुए — मेघदास और मालूराम। मालूराम का देहांत अल्पायु में हो गया, जबकि मेघदास जी ने अपने ठाकुर द्वारे की उत्तम व्यवस्था बनाए रखी। वे दूर-दूर के गाँवों में विशेष अवसरों पर जाकर गुरुमंत्र प्रदान करते, रात्रि जागरण करवाते और नाड़ी परीक्षण द्वारा औषधि भी देते थे। उनकी यात्राओं में अनेक अनुयायी साथ चलते थे, और राजसी ठाट के साथ उनका स्वागत होता था।
जब गारबदेसर के महंत कालू आकर बसे, तो लगभग बीस वैरागी परिवार भी उनके साथ वहाँ आ बसे। कालू के मंदिर के सामने डफ, डांडिया और रास-रमत जैसे लोक-उत्सव वर्षों तक चलते रहे।
विष्णुदास महंत और आधुनिक युग
मेघदास जी के शिष्य विष्णुदास जी महंत सेवा-पूजा के साथ-साथ रामायण पाठी और आदर्श भजनीक के रूप में प्रसिद्ध हुए। खेती और अन्य आय के साधनों से जो कुछ संचित होता, उसका अधिकांश भाग दान-पुण्य में व्यय कर दिया जाता। मेघदास जी के देहावसान के बाद भक्तों ने उनके पार्थिव शरीर को गारबदेसर लाकर अंतिम संस्कार किया।
महंत विष्णुदास जी ने वर्ष 1975 में अपनी भूमि तथा भवन-सामग्री से कालू में बालिका विद्यालय के निर्माण में पूर्ण सहयोग दिया, और मंदिर के बर्तन बिरादरी पंचायत को समर्पित कर दिए। आज भी गारबदेसर में मंदिर की विधिवत पूजा-अर्चना होती है, और गाँववासी ठाकुर जी के दर्शन कर श्रद्धा-लाभ प्राप्त करते हैं।
