भक्त श्री धनाजी एवं धनावंश
नमामि धनेशः पादपंकजम् वदामि धनेशः नाम निर्मलम्।
स्मरामि धनेशः दिव्यविग्रहम् करोमि धनेशः दास दास्यताम् ।।
अर्थ- मैं भक्त श्रेष्ठ धनाजी महाराज के चरण कमलों में नमन करता हूं। उनके दिव्य नाम का उच्चारण तथा उनके मंगल विग्रह का ध्यान करता हूं और धनाजी के दासों की दासता करता हूं।
धर्म की व्यापकता के दृष्टिकोण से संप्रदायों की संस्थापना और अनुयायीजनों की वृद्धि के फलस्वरूप पंद्रहवीं शताब्दी का समय भक्तिकाल कहलाया। इस काल के कुछ संप्रदायों ने जातिगत रूप भी धारण किया। धनाजी महाराज ने अपने धनावंश संप्रदाय के अनुयायियों को अपना जातीय रूप कायम रखने की छूट दी। धनावंश की ही भांति बाद के संप्रदायों में बिश्नोई, जसनाथी, निरंजनी जैसे अनेक संप्रदायों में भी जातिगत रूप मौजूद रहा। धनाजी महाराज ने अपने वैरागीजनों को भक्ति-मार्ग के 21 सूत्र प्रदान किए थे। यह परंपरा बाद में अन्य संप्रदायों ने भी ग्रहण की।धनावंश संप्रदाय की स्थापना के लिए धनाजी को उनके गुरु महाराज श्री रामानंदजी ने आग्रहपूर्वक आज्ञा प्रदान की।स्वामी रामानंदजी चाहते थे कि धनाजी अपनी जाति में वैष्णवता का संप्रसार करे।
धनाजी ने अपने गुरुदेव की आज्ञा को शिरोधार्य किया और धनावंश की स्थापना के निमित्त उत्तरी राजस्थान के नागौर क्षेत्र के उन गांवों का चयन किया जहां तत्कालीन उदार शासक मोहिलों (चौहान राजपूत) का राज्य था। संवत 1532 के चैत्र मास की रामनवमी के दिन उन्होंने स्वजातीय कालेरा नख के एक परिवार को शालग्राम शिला प्रदान कर धनावंश की स्थापना की। उनके हाथों प्रदान किया, वह पवित्र शालग्राम आज भी फिरवांसी के प्राचीन शालग्रामजी मंदिर में ठाकुर विग्रह के रूप में सुपूजित है। पांच शताब्दी से निष्ठापूर्वक वह परिवार आज भी उन शालग्रामजी की पूजा करता आ रहा है।धार्मिक संप्रदाय एवं जातियों के इतिहास ग्रंथ बहुतायत से प्राप्त होते हैं।
धनावंश का इतिहास ग्रंथ न होने से समाज में पांथिक दृष्टि से किसी प्रकार की विसंगतियां उत्पन्न न हो, यहविचार कर, उपलब्ध स्रोत एवं साक्ष्य के आधार पर यह लघु ग्रंथ तैयार किया गया है। समाज में जड़ता, निराशा तथा धार्मिक-आध्यात्मिक संस्कारहीनता न व्यापे, इसलिए भी इस ग्रंथ की आवश्यकता महसूस की गई। हमें अपने गुरुदेव भक्त धनाजी महाराज से दृष्टिबोध प्राप्त होता रहे तथा हम अपनी धार्मिक परंपराओं का परिपालन और अधिक उत्साहपूर्वक करते रहें, इस अभीष्ट के साथ यह ग्रंथ धनावंशी सधाज को समर्पित है।
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अध्याय: प्रथम: वैष्णव धर्म का अभ्युदय एवं विकास
अध्याय प्रथम :-वैष्णव धर्म का अभ्युदय एवं विकास
धनावंशीय वैरागी समाज विशुद्ध रूप से वैष्णव संप्रदाय में परिगणित है। इसकी धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से अवगत होने के लिए वैष्णव धर्म के संक्षिप्त एवं क्रमिक इतिवृत्त को जानना महत्त्वपूर्ण होगा। 'वैष्णव धर्म रत्नाकर' में उल्लेख है- विना श्री वैष्णवीं दीक्षां प्रसादं सद्गुरोर्विना । विना श्री वैष्णवं धर्मे कथं भागवतो भवेत ।। धर्मार्थ काम मोक्षाणामालयः सांप्रदायकः । संप्रदायविहीना ये मंत्रास्ते निष्फला मताः ।।' सद्गुरु से वैष्णवी दीक्षा प्राप्त किए बिना, वह वैष्णव ही कैसा? वैष्णव धर्म अपनाए बिना कैसा स्वामी, कैसा धनावंशी ? संप्रदाय का अर्थ है- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रदान करने वाले चार पुरुषार्थों का घर। संप्रदाय मान्यता अथवा संप्रदाय में दीक्षित हुए बिना सभी प्रकार के मंत्र निष्फल माने जाते हैं। इसलिए हमारी श्रद्धा हमारे धर्मपंथ में होनी चाहिए। हमारी पवित्र भारतभूमि धर्म से विलग कभी नहीं रही है, इसमें अनेक प्राचीन भावधाराएं प्रचलित और प्रवाहित होती रही हैं। शैव, शाक्त, सौर, गाणपत्य तथा वैष्णव आदि विभिन्न संप्रदायों का धार्मिक मत के रूप में प्रचलन रहा है। विवेच्य वैष्णव संप्रदाय का उदय वैदिक काल में ही हो गया था। वेदों में वैष्णव भक्ति के कतिपय ऐसे प्रमाण प्राप्त होते हैं, जिनके आधार पर हम कह सकते हैं कि वैदिक काल से ही वैष्णव भक्ति का उदय हो चुका था। वेदों और उसके पश्चात तैत्तरीय संहिता, बाजसनेयी संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि प्राचीन धर्मग्रंथों में विष्णु के संबंध में पर्याप्त चर्चा की गई है। प्राचीन धर्मग्रंथों में उन्हीं के कारण वैष्णव धर्म को प्राचीन धर्म ठहराया जाता है। कहा जाता है कि वैष्णव धर्म उतना ही प्राचीन है, जितना ऋग्वेद। ऋग्वेद में विष्णु की स्तुति की गई है और ऋग्वेद के विष्णु अद्वितीय गुणों से संपन्न हैं। वे अत्यंत पराक्रमी, अलौकिक गुणों से युक्त, अवतारी, विश्व को धारण करने वाले नियंता, जगतबंध हैं। भले ही विष्णु ऋग्वेद के प्रमुख देवों में नहीं हैं, किंतु बाद में रचित वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रंथों में विष्णु को प्रधान देव के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हई हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि अग्नि उत्तम देवता है, विष्णु परम देवता है तथा अन्य देवता इनके बीच में आते हैं।2 पूर्व में वैष्णव संप्रदाय को सात्वत, भागवत तथा पांचरात्र संप्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त हई। वेदों के स्तुत्य देवों में विष्णु, रुद्र, वरुण, सूर्य, इंद्र, अग्नि आदि देव रहे हैं। इनके प्रति उस काल में आत्यंतिक श्रद्धा भी वेदों में दिखाई देती है। माना जाता है कि यही श्रद्धा आगे जाकर धीरे-धीरे भक्ति के रूप में परिणत हो गई। ऋग्वेद में उपरोक्त देवों की उपासना के बहुत संदर्भ प्राप्त होते हैं। श्रद्धावान व्यक्ति, अपनी श्रद्धा भक्ति को धीरे-धीरे एकत्व रूप एक ही देव में स्थापित करने लगता है। वैदिक काल में भी यही हुआ। जो भिन्न-भिन्न देव थे, उनमें एक को अधिक मान दिया जाने लगा। एक देव में भिन्न-भिन्न देवों को देखे जाने का कारण श्रद्धा ही थी। ऋग्वेद का उल्लेख देखें- त्वमग्ने वरुणो जायसे यत्त्वं मित्रो भवसि यत्समिद्धः । त्वे विश्वे सहसस्पुत्र देवा स्तवमिन्द्रो दाशुषे मत्र्याय ।।त्वमर्यमा भवसि यत्कनीनां नाम स्वधावन्गुह्यमं विभर्षि।अञ्जन्ति मित्रं सुधितं न गोभिर्यद्यम्पती समनसा कृणोषि ।। (5.3.1-2) अग्निदेव को संबोधित करते हुए कहा गया है कि- हे अग्निदेव ! तुम ही वरुण हो, तुम ही मित्र हो, तुम ही इंद्र हो और तुम ही अर्यमा रूप में सदा हमारे स्वामी होकर कार्य कर रहे हो। इस प्रकार श्रद्धामूलक भक्ति का उदय हुआ। ऋग्वेद में प्रायः सभी देवों का उल्लेख है, किंतु विष्णु का स्थान काफी महत्त्वपूर्ण है। कहीं-कहीं विष्णु, सूर्य के स्वरूप को प्रतिभासित करते भी नजर आते हैं। यास्क अपने निरूक्त में व्याख्या करते हुए कहते हैं कि रश्मियों से समूचे संसार को आवृत्त करने के कारण ही सूर्य, विष्णु के नाम से अभिहित होते हैं। जगत को अपनी रश्मियों से प्रकाशित करने के कारण सूर्यदेव को सूर्यनारायण भी कहा जाता है। नारायण शब्द विष्णु के साथ ही जुड़ता है। वैदिक ऋचाओं में विष्णुलोक का भी उल्लेख है। वेदों में विष्णु को त्रिविक्रम कहकर उनकी अपरिमित शक्तियों की ओर संकेत किया गया है। त्रिविक्रम विष्णु अपने तीन पैरों से समस्त ब्रह्मांड को नाप लेते हैं। इसलिए उन्हें उरुगायः यानी तेज गति वाले तथा उरुक्रमः यानी विस्तृत पैर वाले भी कहा गया है। इस ब्रह्मांड को मापने के लिए उन्हें तीन पैरों की आवश्यकता नहीं होती है। उनके दो ही पैर इस पूरे ब्रह्मांड को मापने के लिए पर्याप्त हैं। तीसरा पैर तो दृष्टिगम्य ही नहीं है। इसलिए विष्णु को वैष्णव धर्म में महान पद प्राप्त है। वे अपरिमित शक्ति के प्रतीक हैं तथा संसार का कल्याण करने वाले हैं। उनका विष्णुलोक ही सर्वोत्तम गोलोक है। वैष्णव ग्रंथों में उस विष्णुलोक का बहुत मनोहारी वर्णन किया गया है। यहां भगवान श्री विष्णु अंतर्यामी रूप में विराजित रहते हैं और संपूर्ण सृष्टि को अपना आधार प्रदान करते रहते हैं। ऋग्वेद में विष्णु को इंद्र के सहायक के रूप में तथा अनेक जगह उन्हें इंद्र से अधिक शक्तियों वाला स्वीकार किया गया है। वे संरक्षक तथा प्राणियों के पोषक रूप में हैं, इस प्रकार की प्रार्थनाएं भी ऋग्वेद में प्राप्त होती हैं। भगवान विष्णु की अलौकिकता की परिकल्पना, ब्राह्मण ग्रंथों में भी पर्याप्त रूप से मिलती है। ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ में विष्णु को अग्नि से श्रेष्ठ देव के रूप में माना गया है। इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में भी विष्णु को तेजस्वी तथा ऐश्वर्य संपन्न देव की संज्ञा दी गई है। ब्राह्मण ग्रंथों में विष्णु को देवों का प्रहरी देव कहा गया है। जीवन और जगत के रहस्यों का उद्घाटन करने वाले उपनिषदों में भी विष्णु का उल्लेख है। वस्तुतः उपनिषद्, वैदिक साहित्य के चार अंगों में चतुर्थ अंग कहलाते हैं। वेदों के मंत्र एवं संहिता के पश्चात ब्राह्मण और आरण्यक ग्रंथ आते हैं तथा अंतिम भाग उपनिषद् हैं, जिसमें परमात्मा की चरम परिणति का व्याख्यान हुआ है। उपनिषद् को वेदांत भी कहते हैं, क्योंकि वेदों का जो अंतिम लक्ष्य है- ब्रह्म का निरूपण। वह इस उपनिषद् साहित्य से भली प्रकार सधता है। बारह प्रमुख उपनिषद् माने जाते हैं, जो ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, वृद्धआरण्यक, कौषीतकि तथा श्वेताश्वेतर हैं। वेदांत में प्रस्थानत्रयी के रूप में उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र तथा श्रीमद्भगवद्गीता को माना जाता है। ब्रह्म निरूपण करने के लिए प्रारंभ में आचार्य शंकर ने इन उपनिषदों पर भाष्य की रचना की। उनके बाद के अनेक संप्रदायों के आचार्यों के लिए उपनिषदों पर भाष्य तैयार करना एक चुनौती और प्रतिष्ठा का कार्य बन गया। इन संप्रदायों के आचार्यों ने अपने मतानुसार भाष्यों की रचना की जो आगे चलकर रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य तथा वल्लभाचार्य जैसे संप्रदाय प्रवर्तकों की दार्शनिक भूमिका बन गई। स्वयं शकराचार्य ने संप्रदाय का अनुगमन प्रत्येक धार्मिक के लिए यथेष्ट बताया। उन्होंने लिखा- असम्प्रदायवित् सर्वशास्त्रविदपि मूर्खवदुपेक्षणीयः । अर्थात सब शास्त्रों का ज्ञाता पंडित भी अगर संप्रदाय को नहीं जानता है, तो वह उपेक्षणीय है। शंकराचार्य ने ईश्वर विषयक ज्ञान का सर्वश्रेष्ठ साधन श्रुति अर्थात उपनिषदों को बताया। उपनिषदों से जिज्ञासु को ईश्वर की तर्कसंगत ज्ञाप्ति होती है। उन्होंने अपने मत से ब्रह्म के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों को एक ही वस्तु के दो रूप बताए, अर्थात स्वरूप की दृष्टि से परमात्मा निर्गुण हैं और जगत के संबंध से वे सगुण हैं। उपनिषदों में विष्णु अवतार के संकेत किस प्रकार से प्राप्त होते हैं, इस पर भी हमें विचार करना चाहिए। वस्तुतः तो वैष्णव धर्म की मूल अध्ययन सामग्री इन उपनिषदों में यत्र-तत्र बिखरी हुई प्राप्त होती है। इनमें कुछ उपनिषद् तो ऐसे भी हैं, जो भगवान विष्णु और उनके अवतारों के रहस्य को पूर्णतया प्रतिपादित करते हैं। ऐसे वैष्णव उपनिषदों की संख्या चौदह हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- अव्यक्तोपनिषद्, कलिसंतरणोपनिषद्, गरुड़ोपनिषद्, गोपाल तापिनी उपनिषद्, तारसारोपनिषद्, त्रिपाद विभूति महानारायणोपनिषद्, दत्तात्रेयोपनिषद्, नारायणोपनिषद्, नरसिंहतापिनी उपनिषद्, रामतापिनी उपनिषद्, रामरहस्योपनिषद्, वासुदेवोपनिषद् तथा हयग्रीवोपनिषद् । उपरोक्त सभी उपनिषद् वैष्णवता को प्रतिपादित करते हैं। भगवान का षोडश मंत्र, जिसे तारक मंत्र कहा जाता है, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, यह मंत्र कलिसंतरणोपनिषद् में है। जीव जिन सोलह कलाओं में बंधा हुआ रहता है, उससे मुक्त करने में यह सोलह नाम वाला मंत्र अत्यधिक समर्थ बताया गया है। वैष्णव उपनिषदों के अनुशीलन से हमें यह स्पष्ट पता चलता है कि जो नाना प्रकार के वैष्णव संप्रदाय हैं, उनकी उपासना विधि का मूल ज्ञान, हमें इन वैष्णव उपनिषदों में प्राप्त होता है। महाकाव्य एवं पौराणिक काल में विष्णु को परमात्मा की संज्ञा प्रदान कर दी गई थी। हमारे सभी पुराणों में ईश्वर को अविनाशी एवं सर्वेश्वर के रूप में मान्यता प्राप्त है। पुराणों के अध्ययनकर्ता जे गोंडा ने अपनी पुस्तक' आस्पेक्ट ऑफ अर्ली विष्णुइज्म' में उल्लेख किया है कि अपने विभिन्न अवतारों के माध्यम से विष्णु सर्वहितकारक रूप में स्वीकार कर लिया गया है। वे सूर्य के समान व्यापक, इंद्र के समान रक्षक, यज्ञ के समान कल्याणकारक और जलवत सर्वाधार माने गए हैं। सर आर.जी. भंडाकर ने अपनी पुस्तक 'वैष्णविज्म शैविज्म एंड माइनर रिलीजियस सिस्टम्स ऑफ इंडिया' में महाभारतकाल के वैष्णव संप्रदाय के संबंध में पर्याप्त सूचनाएँ प्रदान की हैं। उनके अनुसार महाभारत के शांति पर्व में नारायण के अंश का पता चलता है। महाभारत के नारायणीय पर्व में भी वैष्णव धर्म का उल्लेख सात्वत धर्म और पांचरात्र के रूप में प्राप्त होता है। वस्तुतः वृष्णिवंश को ही सात्वत रूप में कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इसी lLवृष्णिवंश में उत्पन्न हुए थे। कृष्ण उपासना इस वंश में लोकप्रिय हुई। यही सात्वत वर्ग बन गई और उन उपासकों के इस समूह को सात्वत नाम दिया गया। भगवान श्री वासुदेव के उपासकों को ही भागवत कहा गया। वस्तुतः भागवत, एक उपाधि थी, जो कालांतर में वैष्णव उपासना करने वालों के लिए प्रयुक्त होने लगी। कुछ विद्वान इसमें मतभेद भी मानते हैं। उनके अनुसार भगवान और उनकी भक्ति की कल्पना सर्व प्रथम नारायण के उपासकों के मध्य हुई और उन्हें ही भागवत के नाम से जाना गया। डॉ. राजबली पांडेय के मतानुसार "वैदिक भक्ति की पयस्विनी महाभारत काल तक आते-आते विस्तृत होने लगी। वैष्णव भक्ति की भागवत धारा का विकास इसी काल में हुआ। यादवों की सात्वत शाखा में प्रवृत्ति प्रधान भागवत धर्म का उत्कर्ष हुआ। सात्वतों ने मथुरा, वृंदावन से लेकर मध्य भारत, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक होते हुए तमिल प्रदेश तक प्रवृत्तिमूलक रागात्मक भागवत धर्म का प्रचार किया। महाभारत काल में वैष्णव भागवत धर्म को एक ऐतिहासिक उपास्य का आधार श्रीकृष्ण वासुदेव के व्यक्तित्व में मिल गया। कृष्ण, विष्णु के अवतार माने गए और धीरे-धीरे ब्रह्म से उनका तादात्म्य हो गया। इस प्रकार, नरदेहधारी विष्णु की भक्ति जन साधारण के लिए सुलभ हो गई। भागवत धर्म के इस रूप के उदय का काल लगभग 1400 ईस्वी पूर्व माना जाता है, तथा तब से लेकर लगभग छठी, सातवीं शताब्दी तक यह अविच्छिन्न रूप से चलता रहा।"4 वैष्णव भक्ति को व्याख्यायित करने वाले अनेक धर्मग्रंथ प्राप्त होते हैं, किंतु वैष्णव भक्ति का मुख्य रूप देखना है तो हमें श्रीमद्भागवद् महापुराण का पारायण करना होगा। वैष्णव धर्मग्रंथों में महाभारत का शांति पर्व, पांच रात्र संहिता, सात्वत संहिता, नारदीय भक्तिसूत्र, नारदीय पांच रात्र, हरिवंश पुराणा, पद्म संहिता, विष्णु तत्त्व संहिता आदि ग्रंथ हैं, इनके अलावा परवर्ती सभी वैष्णव संप्रदायों के आचार्यों के सभी ग्रंथों में वैष्णव भक्ति के सूत्र प्राप्त होते हैं। महाभारत के नारायणीय पर्व में एक प्रसंग प्राप्त होता है, जिसमें बताया गया है कि भागवत धर्म को सर्वप्रथम स्वयं भगवान ने अर्जुन को बताया था और फिर नारायण ने इसका उपदेश नारद को भी किया था। नारद, नारायण के दर्शन करने के लिए श्वेतदीप में गए, जहां यह नियम था कि भगवान के आत्यांतिक भक्त हुए बिना कोई भी उनके दर्शन नहीं कर सकता था। नारद भागवत थे, इसलिए भगवान के दर्शन प्राप्त हुए। इस तरह भगवान की एकनिष्ठ भक्ति करने वाला ही भागवत है। उधर नारद पुराण में उल्लेख है कि, "भगवान विष्णु केवल भक्ति से संतुष्ट होते हैं, दूसरे किसी उपाय से नहीं। उनके नाम का बिना श्रद्धा के भी कीर्तन अथवा श्रवण कर लेने पर, मनुष्य सब पापों से मुक्त हो, अविनाशी वैकुंठ धाम को प्राप्त कर लेता है।" मोक्ष के इस आकर्षण ने भी साधकों को वैष्णव भक्ति की ओर उन्मुख किया। नारद पुराण के एक और उल्लेख को देखिए-" आदिदेव भगवान नारायण श्रेष्ठ वरणीय, वरदाता तथा पुराण पुरुष हैं, उन्होंने अपने प्रभाव से संपूर्ण लोकों को व्याप्त कर रखा है।" वे भक्तजनों के मनोवांछित पदार्थों को देने वाले हैं। उनका स्मरण करके मनुष्य मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है। वैष्णव भक्तों के लिए उपरोक्त कथन स्पृहणीय है। नारद पुराण के प्रारंभ में ही नारदजी द्वारा की हुई स्तुति में विष्णु का उल्लेख है। नारदजी को नैष्ठिक ब्रह्मचारी और अपने भ्राता सनक, सनंदन, सनत्कुमार और सनातन ब्रह्माजी की सभा में जाते हुए मेरु शिखर पर मिले। उन्होंने सनकादिक मुनियों से कहा कि आप सर्वज्ञ हैं, सदा ही भगवान के भजन में तत्पर रहते हैं। मुझे भगवान के लक्षण बताइए तथा यह भी बताइए कि भगवान कैसे जाने जाते हैं? आदिदेव भगवान विष्णु ने पूर्व काल में ब्रह्माजी की किस प्रकार सृष्टि की, यह भी मुझे बताइए। इस पर सनकजी ने कहा कि भगवान नारायण अविनाशी, अनंत, सर्वव्यापी और निरंजन हैं। उन्होंने ही इस संपूर्ण चराचर जगत को व्याप्त कर रखा है। स्वयंप्रकाश जगन्मय महा विष्णु ने सृष्टि के आदि समय भिन्न-भिन्न गुणों का आश्रय लेकर, अपनी तीन मूर्तियों को प्रकट किया। पहले भगवान ने अपने दाहिने अंग से जगत की सृष्टि के लिए प्रजापति ब्रह्माजी को प्रकट किया, फिर अपने मध्य अंग से जगत का संहार करने वाले रुद्र नामधारी शिव को उत्पन्न किया। साथ ही इस जगत का पालन करने के लिए उन्होंने अपने बाएं अंग से अविनाशी भगवान विष्णु को अभिव्यक्त किया। जरा-मृत्यु से रहित उन आदिदेव परमात्मा को कुछ लोग शिव नाम से पुकारते हैं। कोई सदा सत्य रूप विष्णु कहते हैं और कुछ लोग उन्हें ब्रह्मा बताते हैं। भगवान विष्णु की जो पराशक्ति है, वही जगत रूपी कार्य का संपादन करने वाली है। भाव और अभाव दोनों उसी के स्वरूप हैं। सब रूपों में एकमात्र भगवान महा विष्णु ही हैं, ऐसी भावना बुद्धि में होनी चाहिए।" सनकादिक भाइयों में से सनक ऋषि ने बहुत विस्तार से भगवान विष्णु के स्वरूप, उनकी भक्ति और आराधना का व्याख्यान किया है, जो कि नारद पुराण में उल्लेखित है। इससे नारदजी पर वैष्णवी भक्ति का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा और उन्होंने नारद भक्तिसूत्र का प्रणयन किया। वैष्णव भक्ति में अवतार संज्ञा का अत्यधिक महत्त्व है। सभी वैष्णव पुराणों में और गीता में भी, इस बात पर बल दिया गया है कि जब-जब सृष्टि पर अनाचार फैलता है तब सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु अवतार ग्रहण कर धर्म की हानि को मिटाने का कार्य करते हैं। अर्थात संसार का उद्धार करते हैं। सभी अठारह पुराणों में विष्णु अवतारों की कथाएं वर्णित हैं। पुराणों में भगवान विष्णु की महत्ता और उनके विराट स्वरूप को उद्घाटित किया गया है। गीता में भी विराट स्वरूप दिखलाया गया है। पुराणों में भगवान के अवतारवाद का संपूर्ण विकास देखा जा सकता है। इस सृष्टि पर जब-जब भी धर्म की हानि होती है, दुराचार बढ़ता है, तब कुमार्गी आसुरी शक्तियों के विनाश हेतु भगवान विष्णु ही अवतार ग्रहण कर इस जगत को त्राण दिलाने का कार्य करते हैं। चाहे 'विष्णु पुराण' हो या 'ब्रह्मांड पुराण' अथवा 'भागवत महापुराण', इन सभी में अवतारों का भिन्न-भिन्न स्थल पर उल्लेख हुआ है। वैष्णव धर्म का प्रथम निर्देश वेदों से प्राप्त होता है, वैदिक युग के बाद पुराण युग में विष्णु को परमात्मा रूप में स्वीकारा जाता है और उन्हें इस संसार का नियंता माना जाता है। पर यह वैष्णव धर्म कालांतर में अनेक सोपानों को पार करता हुआ, आधुनिक युग तक पहुंच चुका है। वैष्णव धर्म के प्रचार से भक्ति और अहिंसा जैसे तत्त्वों को बहुत बल प्राप्त हुआ। वैष्णव धर्म के वैशिष्ट्य में ईश्वरीय प्रेम की अभिव्यक्ति ही भक्ति के रूप में फलित हुई और जीवदया की भावना ही अहिंसा का आधार बनी। वैष्णव धर्म ने अध्यात्म, कला, संस्कृति को भी पर्याप्त प्रश्रय प्रदान किया। वैष्णव धर्म में भक्ति की अथाह प्रतिष्ठा के संबंध में डॉ. विजेन्द्र स्नातक का कथन है कि "वैष्णव धर्म के आचार्यों तथा रसिक कवियों ने 'भक्ति रस' की स्थापना में सर्वाधिक योग दिया है। यदि वैष्णव भक्ति का उदय न हुआ होता तो भक्ति को 'रस' के रूप में स्वीकृति मिलना असंभव था।" वैष्णव धर्म की मान्यता से अनुप्राणित श्रेष्ठ कवियों ने भारतीय वांग्मय को एक श्रेष्ठ धरोहर प्रदान की। ईसा से पांच सौ वर्ष पूर्व से लेकर ईसा की पांचवीं शताब्दी यानी लगभग एक हजार वर्षों के कालखंड में पौराणिक साहित्य तथा रामायण, महाभारत ने वैष्णवता को प्रसरित होने में अपना योगदान प्रदान किया, किंतु उससे आगे बौद्धकाल में वैष्णव धर्म की प्रगति को ठेस पहुंची, वैसे भी बौद्ध धर्म ने वैष्णव मान्यताओं की कुछ बातों को अंगीकार कर रखा था, पर धीरे-धीरे यह धर्म कतिपय महायान, व्रजयान जैसी परंपराओं को प्राप्त कर कमजोर होता गया। परमात्मा को तत्त्व से जानने के लिए बौद्धों ने जिस दर्शन को विकसित किया था, उस शून्यवाद से आगे बढ़कर नवीं शताब्दी में शंकर ने उपनिषदों के अद्वैत तत्त्व दर्शन का भली प्रकार प्रवर्तन किया। अद्वैतवादी, एकत्ववाद और द्वैतवाद से भिन्न परम सत्ता को किसी संज्ञा या रूप में न बांधकर अगम, अगोचर, अचिंत्य, अनिर्वचनीय समझते हैं। शंकराचार्य के काल में ही दक्षिण भारत में भागवत धर्म को आगे बढ़ाने वाली एक नई परंपरा का उदय हो रहा था। नवम् शताब्दी में दक्षिण भारत में वैष्णव उपासक आलवारों की भक्ति शीर्ष पर थी। छठी-सातवीं सदी से प्रारंभ यह भक्ति आंदोलन, हिंदी के चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी के भक्तिकाल से आठ-नौ सौ वर्ष पूर्व अस्तित्व में आ चुका था। वे विष्णु के अवतारों राम तथा कृष्ण का अपने गीतों के माध्यम से रससिक्त गुणगान कर रहे थे। नवीं दसवीं शताब्दी में तो इस भक्ति आंदोलन को आचार्यों का संग-साथ मिलना प्रारंभ हो गया। आचार्यों में सर्वप्रथम नाथ मुनि हुए। नाथ मुनि का मूल नाम तो रंगनाथ था, पर वे प्रसिद्ध इस नाम से ही हुए। नाथ मुनि का काल सन 824 से 924 तक माना जाता है। उन्होंने तमिल वेद का उद्धार किया। 'भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लाए रामानंद' भक्ति के क्षेत्र में यह उक्ति बहुत प्रसिद्ध रही है। यानी भक्ति का प्रादुर्भाव द्रविड़ क्षेत्र में हुआ। वैष्णव भक्ति के संबंध में कुछ भी कहने से पूर्व हमें द्रविड़ देश में उत्पन्न और प्रवाहित भक्ति के संक्षिप्त इतिहास को जानना होगा। जिस द्रविड़ देश को इंगित किया गया है- वह हमारे आज के भारत का 'तमिलनाडु' प्रांत है। यहां ईसा की चौथी शताब्दी से नौवीं दसवीं शताब्दी के मध्य आलवार वैष्णव भक्त हुए। इन आलवारों ने वैष्णव भक्ति को खूब प्रचारित किया। आलावार भक्तों ने जिन भक्ति पदों की रचना की वे तमिल साहित्य में अत्यधिक प्रसिद्ध हैं तथा इन पदों के संग्रह का नाम 'नालायिर दिव्य प्रबंधम्' है। इस 'प्रबंधम्' में लगभग पांच शताब्दी के आलवार भक्तों के गेय पदों का संग्रह है। 'आलवार' का अर्थ होता है- 'वैष्णव', यानी भगवप्रेम में डूबे रहने वाले भक्त। आलवारों की भक्ति रचनाएं तमिल साहित्य की सर्वोत्कृष्ट रचनाएं हैं। "वस्तुतः ये आलावार भक्त भावुक, कोमल, रससिक्त एवं भक्ति भावना से आप्लावित रहने वाले कविगण थे। वैष्णव भक्त आलवारों के गीतों में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की चर्चा है। फिर भी विष्णु के दो प्रमुख अवतारों- रामावतार एवं कृष्णावतार ने उन्हें विशेष रूप से आकर्षित किया। इन दोनों अवतारों में भी कृष्णावतार में उनका मन जितना रमा उतना रामावतार में नहीं। श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का उन्होंने ऐसा सजीव वर्णन प्रस्तुत किया, मानो उन्होंने उन लीलाओं का प्रत्यक्ष अवलोकन किया है।"9 वैष्णव भक्ति में आलवारों के योगदान को शीर्षस्थ स्थान पर रखा गया है। "आलवार संतों ने 'नाम संकीर्तन-भक्तिधारा' से दक्षिण को रससिक्त कर भक्ति की मधुर हिलोर उत्तर की ओर बहायी।' इनके भक्ति पद सरस भक्तिभावों से अनुप्राणित हैं, सामान्यजन को सहज ही भक्ति की ओर आकृष्ट करने वाले हैं। आलवार भक्तों के संबंध में कुछ बातें और जान लेनी चाहिए। आलवार भक्तों की दो शताब्दियों यानी चौथी से छठी शताब्दी के प्रारंभ तक भारत में गुप्तवंश का राज्य था। इस काल में भागवद् धर्म का अत्यधिक प्रसार हुआ। 'प्रबंधम्' का संकलन आलवार भक्त 'नाथ मुनि' ने किया। आलवारों ने भक्ति में 'प्रपत्ति' को अधिक महत्त्व दिया। आलवार काव्य, प्रबंध और स्फुट दोनों रूपों में मिलता है। उनकी ये रचनाएं सामान्य जन में भक्तिभावों का उद्रेक करने वाली हैं। ये सभी रचनाएं सामान्य जन के अत्यधिक निकट हैं, क्योंकि इनमें लोकगीतों की गेयता मौजूद है। वैष्णव भक्त-दक्षिण देश से भक्ति का प्रसार करने वाले इन आलवारों के ऋणी हैं, क्योंकि इन्होंने भगवद् प्रपत्ति की एक व्यवस्थित सरणि प्रस्तुत की, जिस पर आगे चलकर वैष्णव भक्ति का बड़ा प्रसाद खड़ा हुआ। डॉ. आर. एम. श्रीनिवासन के कथनानुसार, "आलवार भक्तों की रचनाओं में कहीं भी पुनरूक्ति नहीं दिखाई पड़ती। आलवार साहित्य भक्तिपूर्ण अनुभवों, भावनाओं, कल्पनाओं तथा विचारों का साहित्य है। आलवारों के साहित्य की प्राकृतिक सुषमा का वैविध्य अन्यत्र दुर्लभ है। आलवार भक्तों के साहित्य में दक्षिण भारत के संगीत को उसके पूर्ण वैभव के साथ इस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है कि हमारा हृदय श्रद्धाभाव से उमड़ पड़ता है।" आलवार संतों की संख्या यूं तो सौ से अधिक है, किंतु उनमें बारह अधिक प्रसिद्ध हुए। दक्षिण भारत के इन आलवार वैष्णव संतों ने अपने जीवन को भगवद्द्मय बनाकर सामान्य जन को भक्ति करने तथा भक्ति को जानने का सुगम पथ तैयार किया। आलवारों के बाद भी यह भक्तिपथ अनवरत चलता रहा है। आलवारों ने भगवद् भाव में प्रपत्ति और भगवद् अनुग्रह पर विशेष बल प्रदान किया। इसे बाद के संतों ने भी अपनाया। आलवार भक्तों ने भक्ति के साधन पक्ष पर अधिक बल दिया। इसलिए उनकी रचनाओं में दास्य, वात्सल्य और माधये भाव की अधिक प्रधानता है। लगभग छह शताब्दी के भक्तिमार्ग ने आगे वैष्णव भक्ति का सुदृढ़ मार्ग प्रशस्त किया। दक्षिण भारत में दूसरे वैष्णव आचार्य यामुनाचार्य हुए। वैष्णव पंथ के सुदृढ़ीकरण में इनका बड़ा योगदान रहा। यामुनाचार्य ने ही वैष्णवाचार्य रामानुजाचार्य से ब्रह्मसूत्र पर टीका लिखवाने का महती कार्य किया। रामानुजाचार्य ने वैष्णव भक्ति को मजबूत आधार प्रदान करने का स्तुत्य कार्य किया। उनके द्वारा प्रणीत विशिष्टाद्वैत दर्शन को प्रसिद्धि तथा प्रशंसा दोनों मिलीं। रामानुजाचार्य का जन्म दक्षिण के पैरम्बदुर नामक स्थान में वि. सं. 1074 को हुआ। धर्म एवं आध्यात्मिक दर्शन, दोनों ही क्षेत्र में आपने सुधार के कार्य किए। ये श्रुति प्रमाणवादी होने से श्रोत्रिय कहलाए। रामानुजाचार्य के धर्म तथा अध्यात्म के सुकृत्य गृहस्थी तथा वैरागी दोनों के लिए उपादेय थे। साधुओं के लिए इन्होंने वैरागी संप्रदाय की स्थापना की, वहीं सामान्यजन को वैष्णव भक्ति की ओर उन्मुख किया। वैरागी संप्रदाय के साधुओं के लिए उन्होंने कतिपय आचार तय किए, जिनका परिपालन परमावश्यक था। साधुओं के लिए गेरुआ परिधान, यज्ञोपवीत, मस्तिष्क पर ऊर्ध्वपुंडू तिलक और हाथ में तुलसी की माला आवश्यक थी। उन्होंने जो विशिष्टाद्वैत नामक दर्शन का प्रणयन किया उसके अनुसार परमात्मा चिद्, अचिद् और विशिष्ट रूप में हैं। वे ब्रह्म-सत् चित्त् आनंद स्वरूप हैं। ब्रह्म सर्वज्ञ हैं तथा अपने आप में पूर्ण हैं। उसी पूर्ण ब्रह्म ने करुणावशात् इस जगत की रचना की और त्रिगुणात्मक जगत के संचालनार्थ नियमों का विधान किया। रामानुजाचार्य ने चिद् का अर्थ भोक्ता जीव किया और अचिद्- भोग्य जगत है तथा परमात्मा विशिष्ट हैं। ईश्वर, प्रकृति और कर्म के अधीन नहीं है। वह प्राण शरीर भी नहीं है तथा उसे सुख-दुख की अनुभूति भी नहीं होती। उस ब्रह्म का कोई रूप-आकार भी नहीं है तथा वह चिद् और अचिद् के व्यथा-विकार से प्रभावित भी नहीं होता। ब्रह्म जगत का कर्ता, पालक और संहारकर्ता है। रामानुजाचार्य के अनुसार वह परमात्मा 'विष्णु' नाम से पुकारा जा सकता है। शिव और ब्रह्मा भी उसी के अंतर्भुक्त हैं। ईश्वर, लीला के निमित्त संसार का सृजन करता है। रामानुजाचार्य ने वैष्णव मतावलंबियों के लिए तीन आवश्यक सूत्र दिए-(1) सदाचरण प्रियता(2) प्रपत्ति(3) विधिपूर्वक नित्य उपासना। परवर्ती सभी संत संप्रदायों ने प्रपत्ति अर्थात भक्ति और सदाचरण को प्रमुखता प्रदान की। हां, नित्य उपासना को लेकर विभिन्न मतभेद अवश्य रहे। रामानुजाचार्य ने माना कि ईश्वर और जीव दो भिन्न सत्ताएं हैं। फिर भी उनमें परस्पर शरीर-आत्मा अर्थात् विशेष्य-विशेषण संबंध है। ईश्वर का निवास सब की आत्मा में है। वह ब्रह्म विशेषणों से युक्त है। ब्रह्म की इस विशिष्टता के कारण ही इस मत का नाम विशिष्टाद्वैत पड़ा। रामानुजाचार्य का कथन है ब्रह्म पांच रूपों में प्रकट होता है- (1) अर्चा रूप में - अर्थात मूर्ति रूप में। (2) विभव रूप में अर्थात मत्स्यादि अवतार रूप में। (3) व्यूह रूप में- अर्थात केशवादि, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युमन, अनिरुद्ध आदि रूप में। (4) अंतर्यामी रूप में- अर्थात अंतःकरण का प्रेरक रूप। (5) पर रूप में - अर्थात नारायण रूप में। नारायण वैकुंठ निवासी हैं और वे शेष शय्या पर शयन करते हैं-लक्ष्मीजी ब्रह्म की क्रिया शक्ति हैं। ब्रह्म छह प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त हैं- (1) ज्ञान(2) बल(3) ऐश्वर्य(4) वीर्य(5) शक्ति(6) और तेज। ब्रह्म मुख्यावतार और गौण अवतार, दो प्रकार से अवतरित होते हैं। मुख्यावतार में विष्णु ही अवतार ग्रहण करते हैं। रामानुज संप्रदाय के उपास्य श्री लक्ष्मीनारायण हैं। रामनुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन के अंतर्गत ब्रह्म, जीव, आत्मा, प्रकृति, काल, सृष्टि, साधन, मोक्ष आदि तात्त्विकविषयों पर विवेचन प्रस्तुत किया है। जीव : जीव के संबंध में रामानुजाचार्य कहते हैं कि वह सत् स्वरूप, अचिंत्य, नित्य, ज्ञानाश्रय, निरवयव, निर्विकार, अव्यक्त और अणु है। यह शरीर, इंद्रिय, मन, प्राण एवं बुद्धि से विलक्षण है परंतु कर्मों को लेकर कर्ता, भोक्ता और ज्ञाता है। यह मानव शरीर प्राप्त कर पांच प्राण, पांच इंद्रियों, पांच कर्मेंद्रियों से तथा मन, बुद्धि और चित्त से संबद्ध है। जीव की तीन कोटियां हैं- बद्ध, मुक्त और नित्य। इस जीव का प्रकृति से गहन नाता होने के कारण मुक्ति प्राप्त होने से पहले तक यह प्रकृति से बंधा हुआ रहता है। शरीर बंधन के कारण परमात्मा से संबंध नहीं जुड़ता। प्रारब्धवश जीव पुनः पुनः विभिन्न कोटि के जीवों के रूप में जन्म धारण करता है और मृत्यु को प्राप्त होता रहता है। जीव के जन्मने-मरने और पुनः जन्म लेने के उपरांत भी आत्मा अपरिवर्तित रहती है। जीव के पूर्वकृत कर्मों का नाश किसी भी अवस्था में नहीं होता। सृष्टि विनाश के बाद सर्ग के प्रारंभ में पुनः उसके शेष प्रारब्ध क्रियाशील हो जाते हैं। जीव वर्तमान को ही जान सकता है। रामानुजाचार्य स्वामी ने अपने विशिष्ट द्वैत दर्शन के अंतर्गत जीव को नित्य, मुक्त और बद्ध नामक तीन श्रेणियों में बांटा है। यह भेद ईश्वर कृत नहीं है। कर्माधारित है। नित्य जीव वैकुंठ वास करते हैं, मुक्त जीव अपने विवेक से मुक्ति का वरण कर लेते हैं, जबकि तृतीय कोटि के बद्ध जीव बार-बार अज्ञानतावश कर्मों में फंसकर इस संसार की ओर मुख करता है। बहुत विस्तृत ढंग से रामानुज, प्रकृति-अचित् सृष्टिक्रम, काल, साधन मार्ग तथा मोक्ष जैसे विषयों पर अपने विचार प्रकट करते हैं। रामानुज ने लोकहितार्थ अनेक दिव्य ग्रंथों की रचना की। अपने मत विशिष्टाद्वैत की पुष्टि के निमित्त अपने 'श्रीभाष्यम्' में महर्षि व्यासजी द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र की व्याख्या की है। व्यासजी के विचारों को युक्तियुक्त ढंग से विवेचित करने के कारण ही इसकी अत्यधिक प्रसिद्धि हुई। 'वेदांत दीपम्' ग्रंथ श्रीभाष्य का संक्षिप्त रूप है। श्रीमद्भगवद्गीता पर आपने गीता भाष्यम् की रचना की। उनका यह भाष्य इस बात पर अधिक बल प्रदान करता है कि ईश्वर के संबंध में जानने से पहले उनके प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास मन में रहना चाहिए। वैष्णव भक्तों के नैमितिक अनुष्ठान के लिए आपने 'नित्य ग्रंथम्' की भी रचना की। इसे हम भगवद् आराधना ग्रंथ भी कह सकते हैं। "उनका उपदेश है कि 'श्री वैष्णव' को प्रतिदिन, वेदों, स्मृतियों और पुराणों में निर्धारित धार्मिक कार्यों को नियमित रूप से करना चाहिए।'"'"' रामानुजाचार्य ने अनेक ग्रंथों की रचना की। वे श्री शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धांत का खंडन विशिष्टाद्वैत के माध्यम से करते हैं। वैष्णव जन के लिए करणीय एवं मननीय बहत्तर सूत्र प्रदान किए। रामानुजाचार्य इस धरा धाम पर 120 वर्षों तक रहे। वे संवत 1194 को महाप्रस्थान कर गए। रामानुज मत के अनुसार परमात्मा का स्वरूप निर्गुण निराकार की बजाय सदा और सर्वत्र साकार है। एक हजार वर्ष पूर्व रामानुज क्रांतिकारी संत हुए। वैष्णव धर्म को उन्होंने तात्त्विक उच्चता प्रदान की। श्रीरंगम जैसे वैष्णव मठ की स्थापना की। 104 दिव्य मंदिरों में सुधरी हुई आराधना पद्धति लागू की। वह एकरूपता आज भी देखने को प्राप्त होती है। मध्यकाल में प्रवर्तित चार प्रमुख वैष्णव संप्रदायों को चतुर्संप्रदाय नाम दिया गया है। रामनुजाचार्य ने 'श्री संप्रदाय' को प्रचलित किया। उसी प्रकार ईस्वी सन 1162 के लगभग निम्बार्काचार्य द्वारा प्रवर्तित 'सनकादिक संप्रदाय', सन 1197 के पश्चात मध्वाचार्य द्वारा प्रवर्तित 'ब्रह्म संप्रदाय' अस्तित्व में आया जिसे द्वैतवादी संप्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। इसके बाद वल्लभाचार्य का 'शुद्धाद्वैतवादी संप्रदाय' भी इस चतुर्संप्रदाय का एक अंग है। निम्बार्क संप्रदाय : निम्बार्काचार्य के वैष्णववादी दर्शन को 'द्वैताद्वैतवाद' नाम दिया गया। इसे ही भेदाभेदवाद भी कहा गया। निम्बार्काचार्य भी दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश में हुए। बाद में वे भगवान श्रीकृष्ण एवं राधा की उपासना के निमित्त व्रज में आ गए। निम्बार्क, रामानुजाचार्य से ही प्रभावित थे। निम्बार्कीय आराधना में कृष्ण एवं राधा की आराधना पर विशेष बल दिया गया है। द्वैताद्वैत मत के अनुसार द्वैत भी सत्य है और अद्वैत भी सत्य है। इसे सनकादि संप्रदाय इसलिए कहा जाता है, क्योंकि सनकादिक चारों ऋषिगण भी इसी मत को मानते थे। इस मत के आचार्यों ने दूसरे मतों का खंडन नहीं किया है। निम्बार्क संप्रदाय की प्राचीन गद्दी मथुरा में है, वहीं राजस्थान के सलेमाबाद में बड़ी निम्बार्क पीठ है। युगल उपासना वाले सभी संप्रदायों का राधा-कृष्ण की भावना रखने वाले सभी संप्रदायों में आसानी से समन्वय हो जाता है। निम्बार्काचार्य ने 'वेदांत पारिजात सौरभ' नाम से वेदांत सूत्र पर एक लघु भाष्य भी रचा। इस संप्रदाय के दर्शन को द्वैताद्वैत अथवा भेदाभेद इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह दर्शन इस बात को स्वीकारता है कि अवस्था भेद से जीव, ब्रह्म के साथ भिन्न भी है तथा अभिन्न भी है। जीव ब्रह्म का अंश है, वह अल्प है। भक्ति से परम पद की प्राप्ति अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। ब्रज क्षेत्र में इस संप्रदाय की विपुल प्रसिद्धि हुई। ब्रह्म संप्रदाय : मध्वाचार्य ने ब्रह्म संप्रदाय की स्थापना की। इस संप्रदाय का नाम ब्रह्म संप्रदाय इसलिए पड़ा, क्योंकि इसके मूल प्रवर्तक ब्रह्म ही माने जाते हैं। मध्वाचार्य भी दक्षिण ही में रामानुजाचार्य की मृत्यु के सौ वर्ष के अनंतर हुए। मध्वाचार्य मानते थे कि ईश्वर और जीव में भेद का होना स्वाभाविक है। उनका मानना था कि जीव और ब्रह्म में भेद है, इसी प्रकार जीव और प्रकृति में भेद है तथा जगत और जीव में भी भेद है। और तो और, जीव और जीव में भी भेद की स्थिति है। "माध्व मत में परमात्मा के गुण असीम, नित्य एवं अपरिमित हैं। सृष्टि, स्थिति, संहार, नियमन, आवरण, बोधन (ज्ञान), बंधन और मोक्ष आदि आठ कारणों में परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी चेतन का अधिकार नहीं है... परमात्मा में अनेक रूप धारण करने की शक्ति है। लक्ष्मी परमात्मा से भिन्न तथा उसी के अधीन है। वे नित्य तथा सर्वगुण पूर्ण हैं। परमात्मा के इंगित पर सृष्टि आदि कार्यों को करती है। श्री, भू, सीता, रुक्मिणी उन्हीं के रूप हैं।" 12 आपका मत रहा है कि परमात्मा के अनुग्रह से मोक्ष संभव है, तब उनका प्रेम और कृपा क्यों न प्राप्त की जाए। मध्वाचार्य का द्वैतवादी सिद्धांत श्रीमद् भागवत महापुराण पर आधृत है। अवश्य इनका धार्मिक सिद्धांत रामनुजाचार्य से मिलता हुआ सा है, पर दर्शन में अंतर है। वे निस्संकोच ईश्वर और जीव में अंतर करते हुए अपना द्वैतवादी मत रखते हैं। इस प्रकार वे वेदांत की कुछ मान्यताओं से विलग खड़े हो जाते हैं। वे भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति करने का मंतव्य रखते हैं। यह संप्रदाय विष्णु के सभी अवतारों का आदर करता है। आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु भी इसी संप्रदाय में दीक्षित हुए। वल्लभ संप्रदाय : वैष्णव मत वल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य सन 1479-1531 के मध्य हुए। आपका जन्म काशी के एक तैलंग ब्राह्मण के घर हुआ। वल्लभाचार्य भ्रमणशील रहते थे। विद्वानों के मध्य चर्चा किया करते थे। विष्णु स्वामी संप्रदाय से भी आपका जुड़ाव रहा। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से प्रभावित होकर अपने मत का प्रसार प्रारंभ किया। इनका दार्शनिक संप्रदाय शुद्धाद्वैत के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वे भक्तिमार्गी थे। भक्ति को आपने ज्ञान से श्रेष्ठ ठहराया। उन्होंने कहा-सच्चा भक्त मुक्त नहीं होना चाहता, वह तो ठाकुरजी की लीला का अंग बनना चाहता है। ईश्वर की कृपा को उन्होंने 'पुष्टि' शब्द प्रदान किया। इस कारण इस संप्रदाय का एक नाम पुष्टि मार्ग भी पड़ गया। भगवद् अनुग्रह ही पोषण यानी पुष्टि है। उन्होंने इस सिद्धांत को उपनिषदों से लिया। भगवकृपा से जो भक्ति प्राप्त होती है, वह पुष्टि भक्ति कहलाती है। भगवदानुग्रह प्राप्त करने को उद्यत भक्त परमात्मा की प्राप्ति के अलावा अन्य कोई कामना नहीं करता। भक्त आत्मसमर्पण के साथ भक्ति करता है। इस संप्रदाय के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण परब्रह्म परमात्म के रूप में सच्चिदानंद स्वरूप हैं। समस्त जीव जगत उन्हीं से उद्भूत है। ब्रह्म माया से अलिप्त है, इसलिए वह शुद्ध है। इस शुद्ध ब्रह्म के विचार को आप ने शुद्धाद्वैत नाम दिया। "शुद्धाद्वैत दर्शन के अनुसार भगवान को जब रमण करने की इच्छा होती है, तब वे अपने आनंद आदि गुणों के अंशों को तिरोहित कर स्वयं जीव रूप ग्रहण करते हैं। इस व्यापार में केवल भगवान की इच्छा ही कारण है, माया का इससे किसी प्रकार का संबंध नहीं है।" 13 वल्लभाचार्य ने अपने पुष्टि मत में दो प्रकार की भक्ति का विधान किया। एक मर्यादा भक्ति और दूसरी पुष्टि भक्ति। केवल भगवान के अनुग्रह पर टिकी हुई भक्ति पुष्टि भक्ति तथा साधन-सापेक्ष भक्ति को मर्यादा भक्ति नाम दिया, पर उसे निम्न कोटि भक्ति बताया। पुष्टिमार्गी मंदिरों में अष्टयाम यानी आठ बार सेवा-पूजा होती है। श्रीकृष्णः सखा मम्' यह इस मार्ग का मंत्र है। वल्लभाचार्य के सुपुत्र विठ्ठलनाथ ने इस पंथ को आगे बढ़ाया, वे अपने पिता की भांति ही विद्वान तथा तेजस्वी थे। ब्रज क्षेत्र में इनका तत्कालीन समय में प्रभुत्व रहा तथा वैष्णव धर्म की प्रगति में आपका योगदान रहा। पुष्टि मार्ग में दीक्षित अष्टछाप के भक्तकवि भी प्रसिद्ध रहे हैं। वैष्णव धर्म के इस विकासक्रम में हम पाते हैं कि भगवान श्री विष्णु के विभिन्न प्राकट्य रूपों को ही उपास्य रूप में स्वीकार करते हुए भगवान के नाम, गुण, रूप, लीलाओं का चित्रण किया गया। भगवान की भक्ति को बाद में भले ही सगुण निर्गुण रूपों में विभक्त देखा गया हो, पर इससे वैष्णवी आधार कहीं लुप्त नहीं हुआ। वैष्णव मत में इस बात पर बल दिया गया है कि जीव का अणु भाव प्राकृतिक है और सदा ही वह परमात्मा से परिछिन्न है। इसलिए जीव को यहां 'अंशी' रूप में परिभाषित किया गया है। अंशी रूप में यह परमात्मा के अधीन है। भागवत संप्रदाय नामक ग्रंथ में वैष्णव दर्शन की विशिष्टता समझाते हुए कहा गया है कि, "भागवत मत का यही मौलिक सिद्धांत है कि भगवान स्वामी, विभु तथा अंशी हैं तथा जीव सदा ही दास, अणु तथा अंश है। जीव का अणुत्व किसी भी दशा में निवृत्त नहीं होता है। संसारी दशा में तो वह अशुद्ध मन, प्राण, देह आदि के बंधनों से बद्ध रहता ही है, मुक्त दशा में वह इन बंधनों से मुक्त अवश्य हो जाता है, तथापि उसके अणुत्व की निवृत्ति उस समय में भी नहीं होती।" 14 यानी जीव को भगवान के अधीन रहना ही पड़ता है, यही उसका दायित्व है। वैष्णव मतों में साम्य और वैषम्य दोनों ही रहे हैं, परंतु एक वैष्णव की श्रद्धा में कोई वैषम्य नहीं होता। वैष्णव मत यह दृढ़ विश्वास प्रदान करता है कि भगवद्माप्ति का मूलाधार भक्ति ही है। रामानंदाचार्य और उनके शिष्य धनावंश की स्थापना में मूल आग्रह रामानंद भगवान का ही रहा। उन्होंने अपने शिष्य धनाजी को भी संप्रदाय स्थापना के महत्त्व से अवगत कराया। ऐसे रामानंदजी के संबंध में अगस्त्य संहिता का कथन है. "रामानन्दः स्वयं रामः प्रादर्भतो महीतले।" इस उदघोष का यही अर्थ है कि रामानंद इस आतप्त भारत भू के लिए भगवद् सम ही साबित हुए। उत्तर भारत में वैष्णव भक्ति का अभूतपूर्व प्रसार करने वाले रामानंदाचार्य का जन्म प्रयाग के कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ। रामानंदजी के पिता पुण्य सदन कान्य कुब्ज ब्राह्मण थे। मां का नाम सुशीला देवी था। श्री संप्रदाय की वैष्णवी दीक्षा में जातीय आधार बहुत बड़ा महत्त्व रखता था। ब्राह्मणों में कान्य कुब्ज श्रेष्ठ जाति मानी जाती थी। रामानंदजी की जन्मतिथि को लेकर मत भिन्नता रही है। विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत जन्म वर्ष में लगभग सौ वर्ष से अधिक का अंतर रहा है। हिंदी साहित्य के इतिहास लेखक रामचन्द्र शुक्ल इनका जन्म पंद्रहवीं सदी के द्वितीय चरण में, अंग्रेज विद्वान फर्कहर सन 1400 से 1470 के मध्य तथा कुछ विद्वान सन् 1299 को इनका जन्म मानते हैं। आचार्य किशोर कुणाल, रामानंद के जन्म का निर्धारण उनके शिष्यवर्ग की समकालीनता से करते हुए 1356 को तथा निधन सन 1470 ई. को स्वीकारने का कहते हैं। डॉ. आर.एस. प्रजापति 15 स्वामीजी की जन्मतिथि निर्धारित करने के लिए भविष्य पुराण में सिकंदर लोदी के उल्लेख को आधार बनाते हैं। सिकंदर लोदी सन 1489 में दिल्ली का शासक बना था। इसलिए इस समय तक रामानंदजी जीवित थे। इसके अनुसार संवत 1545-46 तक रामानंदजी जीवित थे। न केवल रामानंदजी बल्कि भक्तिकाल के अनेक संतों की जन्मतिथियां विवादास्पद रही हैं। रामानंदजी के बारह शिष्यों की जन्मतिथियों को देखते हुए उनका समय निश्चित ही संवत 1545 तक रहा होगा। रामानंदजी के जन्म के संबंध में प्राचीन ग्रंथ के रूप में 'अगस्त्य संहिता' के 'भविष्योत्तर खंड' को प्रमाण मानकर उसमें उल्लेखित तिथि माघ कृष्णा सप्तमी वि. संवत 1356 को सही ठहराया गया, किंतु कबीर एवं उनके काल के साहित्य का गहन अनुसंधान करने वाले डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल अगस्त्य संहिता में भविष्योत्तर खंड को एक क्षेपक मानते हैं। वे कहते हैं, "भविष्योत्तर खंड को बिना विचारे प्रामाणिक मान लेने वाले काश वास्तविक अगस्त्य संहिता देखते। तब यह रोचक तथ्य उनकी निगाह में आता कि 1145 और 1260 (बहत करके 1200 के पहले ही) के बीच रचित ग्रंथ के आधार पर रामानंद का जन्म सन 1299 बताया जा रहा है, और तब वे हमें बता पाते हैं कि अगस्त्य संहिता रचने वाले ऋषि कितने सक्षम भविष्यद्रष्टा कहिए कि भारत के नॉस्ट्रडेमस थे। यह तथ्य उन्हें मालूम पड़ता कि अगस्त्य संहिता में रामानंद या उनके किसी शिष्य का नामोल्लेख तक नहीं है। होता कैसे ? इतनी प्रगतिशील इतिहास दृष्टि 'अगस्त्य संहिता' के रचयिता के पास थी ही नहीं कि दो सौ साल बाद होने वाले रामानंद और उनके शिष्यों का विवरण लिख सकें। अगस्त्य संहिता, मुनि अगस्त्य ओर सुतीक्ष्ण के संवादों का ग्रंथ है, जिसमें रामोपासना के रूप में वैष्णव धर्म परंपरा का उल्लेख है। रामानंदजी की जन्मतिथि और उनकी जीवनावधि के संबंध में अधिकतर जो दो स्रोत बने वे 'भविष्योत्तर खंड' और रूपकलाजी द्वारा 'भक्तिसुधा स्वाद तिलक' नाम से की गई भक्तमाल की टीका थी। सभी स्रोतों में रामनंदजी के शिष्य वर्ग के समय को अवहेलित किया गया। अनेक भक्तों की परचियां रचने वाले अनंतदास रामानंद की पांचवीं पीढी में थे। अनंतदास ने धनाजी पर भी परची की रचना की थी। अनंतदास और उनकी परचियों पर अनुसंधानात्मक कार्य करने वाले डेविड एन. लोरेंजन ने लिखा है, "असल में रामानंद के समय को जानने का उचित तरीका यह है कि हम कबीर, अनंतदास और नाभादास की सुपरिचित तिथियों से पीछे गिनना शुरू करें। यदि हम अनंतदास के समय को 1600 मानें (नामदेव परचई के रचनाकाल 1588 ई. के आधार पर) तो रामानंद का समय 1475 ई. के आस-पास ठहरता है। इसी तरह यदि नाभादास के समय को 1600 ई. मानते हैं तब रामानंद का समय पीछे खिसककर 1450 ई. के करीब आ जाएगा।" डेविड लोरेंजन की यह खोज धनाजी की जन्मतिथि संवत 1472 को सही साबित करती है तथा रामानंदजी से प्रेरित होकर संवत 1532 में उनके द्वारा धनावंश संप्रदाय की स्थापना करना भी उचित प्रतीत होता है। नाभादासजी ने भक्तमाल में रामानंदजी के दीर्घायुष्य को भी 'बहुत काल वपु धारिकै' के माध्यम से कहा है। अगर रामानंदजी का जन्म सन् 1299 को मान लिया जाए तो उनके शिष्य कबीर, रैदास, धना तथा पीपा का काल गड़बड़ा जाएगा और ये गुरुभाई समकालीन भी नहीं ठहरेंगे। रामानंदजी की मृत्युतिथि अगर संवत 1467 मान लेंगे तो इस समय धना का तो जन्म ही नहीं हुआ था। धनाजी का जन्म संवत 1472 में हुआ था। वे अपने युवाकाल में रामानंदजी का शिष्यत्व ग्रहण करने के लिए काशी गए थे। काशी में श्री धनाजी को श्री रामानंदजी के प्रथम शिष्य अनंताचार्यजी के सान्निध्य में श्रीमठ में रखा गया। रामानंद का काल यानी चौदहवीं पंद्रहवीं शताब्दी राजनीतिक दृष्टि से भारत में उथल-पुथल की सदी थी। अनेक मुस्लिम वंशों का केंद्रीय सत्ता पर काबिज होना और समूचे भारतवर्ष में अपनी सत्ता के प्रसार का प्रयत्न करना, गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैयद तथा लोदी वंश का मुख्य ध्येय रहा। इनमें इस्लामिक कट्टरता भी बेहद थी। इस राजनीतिक संक्रांति काल में सामाजिक एवं धार्मिक स्थितियां भी अच्छी नहीं कही जा सकतीं। सर्वत्र अराजकता के वातावरण में सर्वाधिक हानि धर्म की हो रही थी। रामानुज संप्रदाय में दीक्षित रामानंद को उत्तर भारत के धार्मिक पतन ने भीतर से आंदोलित किया। घोर नैराश्य के इस दौर में धार्मिक अवलंब की आवश्यकता को रामानंद ने बहुत गहराई से महसूस किया। धर्म के नाम पर अंधविश्वास, रूढ़ियों में जकड़ चुके समाज को एक स्वस्थ धार्मिक वातावरण देना आवश्यक हो गया था। उदयप्रताप सिंह के अनुसार, "संस्कृतियों की इस संक्रांति वेला में राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी शक्ति की आवश्यकता महसूस की जा रही थी, जो धर्म के वास्तविक स्वरूप की रक्षा करते हुए बाह्याडंबरों के बंधन को शिथिल कर सके, आचारों एवं विचारों में प्रेम और समानता के आधार पर हिंदू-मुसलमान, ऊंच-नीच, स्त्री-पुरुष को एक सूत्र में निबद्ध कर सके। भक्ति मार्ग इस दिशा में उदार था, पर इस समय भक्ति के आचार्य स्वयं को जाति-पांति, उच्च-निम्न भाव से मुक्त नहीं कर सके थे। अतीत की घटनाओं से ज्ञात होता है कि आचार्य रामानंद ऐसे महात्मा थे, जिन्होंने भक्ति और भक्त के लिए वेदशास्त्र, संस्कृत भाषा, जाति-पांति, बाहरी धार्मिक आचार आदि के बंधन को अनिवार्य नहीं माना। ' 18 न केवल रामानंद संप्रदाय और वैष्णव पंथ, बल्कि धर्म-अध्यात्म से नाता रखने वाली हर जाति और समुदाय रामानंदजी का ऋणी रहेगा। चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तर भारत को रामानंद ने राजनीतिक अस्थिरता के मध्य धर्म-अध्यात्म की शक्ति से संवलित किया। वैष्णव धर्म की ऊर्जा को अपने शिष्यों के माध्यम से संपूर्ण भारत में फैलाया। सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में विसंगतियों की भरमार थी। ब्राह्मणीय वर्णाश्रम व्यवस्था ने धर्म पर एक जाति विशेष का आधिपत्य लाद रखा था। रामानंद ने ऐसे विकट समय में 'जात-पात बूझै नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई' का नार देकर भक्ति पर हर वर्ग का अधिकार साबित किया। भक्ति मार्ग ऐसा सुगम पथ है, जिस पर हर जाति, धर्म, वय, लिंग का व्यक्ति चल सकता है। स्त्रियों एवं शूद्रों के लिए भी यह मार्ग प्रतिबंधित नहीं है, इस पर किसी का विशेष अधिकार नहीं है। रामानंद दीक्षित तो रामानुज संप्रदाय में हुए थे। रामानुज संप्रदाय भगवान श्री लक्ष्मीनारायण को अपना इष्ट मानता है, किंतु उक्त संप्रदाय के घनघोर ब्राह्मणीय वैष्णवाचार के कारण वह केवल कान्य कुब्ज ब्राह्मण वर्ग तक ही सीमित होने लगा था, रामानंद को उड़ने के लिए विस्तृत धर्माकाश की आवश्यकता थी, उन्होंने अपने गुरु राघवानंदजी से आज्ञा प्राप्त कर स्वतंत्र संप्रदाय के रूप में रामावत संप्रदाय की स्थापना की। वे धर्म के माध्यम से सामाजिक समरसता स्थापित करने का ध्येय रखते थे। नाभादास भक्तमाल में रामानंद की तुलना राम से करते हैं- ' श्री रामानंद रघुनाथ ज्यों, दुतिय सेतु जग तरन कियो।' यानी रामानंद भगवान श्रीराम के ही दूसरे रूप हैं। उन्होंने जगत के उद्धार के लिए धर्म का सेतु तैयार किया। उनके सभी शिष्य भी जगत का कल्याण करने वाले थे। स्वयं रामानंद इस कलिकाल में श्रीराम से कम नहीं है। श्रीराम ने वानर सेना को पार करने के लिए समुद्र पर सेतु का निर्माण करवाया था, द्वितीय सेतु रामानंद ने संसारी जीवों को भवसागर से पार करने के लिए सुगम भक्ति पथ रूप में निर्मित किया। भक्तमाल के अनुसार रामानंद के प्रमुख 12 शिष्य श्री अनंतानंद, श्री कबीरदास, श्री सुखानंद, श्रीसुरसुरानंद, श्री पद्मावती, श्री नरहरियानंद, श्री पीपा, श्री भावानंद, श्री रैदास, श्री धनाजी, श्री सेन तथा श्री सुरसुरानंद की पत्नी थे। भक्तमाल की टीका में स्वामीजी के परमधाम गमन के संबंध में कथन किया गया है कि "परम धाम गमन के पूर्व श्री स्वामीजी ने अपनी शिष्य मंडली को संबोधित करके कहा कि सब शास्त्रों का सार भगवत्स्मरण है, जो सच्चे संतों का जीवनाधार है। कल श्रीराम नवमी है। मैं अयोध्याजी जाऊंगा, परंतु मैं अकेला जाऊंगा। सब लोग यहीं रहकर उत्सव मनाएं। कदाचित् मैं लौट न सकूं, आप लोग मेरी त्रुटियों एवं अविनय आदि को क्षमा कीजिएगा। यह सुनकर सबके नेत्र सजल हो गए। दूसरे दिन स्वामीजी संवत 1515 में अपनी कुटी में अंतर्धान हो गए। " रामावत संप्रदाय की स्थापना कर रामानंदजी ने राम उपासना को व्यापक आधार प्रदान किया। परमेश्वर, राम की उपासना के लिए 'रामार्चन पद्धति' नामक उत्तम कोटि के ग्रंथ की रचना की, वहीं 'वैष्णव मताब्ज भास्कर' के माध्यम से अपने धर्म-दर्शन को प्रकट किया। उन्होंने कर्मकांड को प्रश्रय नहीं दिया। ईश्वर की शरणागति में कुल, बल, काल, अवस्था की कोई अपेक्षा नहीं रखी। उनके बारह शिष्य भिन्न जाति और कुल के हैं, जिनमें रैदास जाति से चमार, पीपा क्षत्रिय, धना जाट, सेन नाई, कबीर जुलाहा जैसी जातियों से थे। 20 रामानंद के इन बारह शिष्यों को बारह आदित्य कहा गया है। इन शिष्यों की भक्तिधारा में भी सगुण-निर्गुण जैसा स्वातंत्र्य था। आलोचक शिवकुमार मिश्र ने ठीक ही कहा है कि, "रामानंद निस्संदेह उत्तर भारत के सांस्कृतिक नवजागरण के अग्रदूत थे।" रामानंद का जन्म तो प्रयाग में हुआ किंतु युवाकाल में वे काशी आ गए। आज भी उनके द्वारा संस्थापित 'श्रीमठ' रामानंद संप्रदाय की प्रमुख पीठ के रूप में विद्यमान है। प्रयागराज में जहां रामानंद का जन्म हुआ था, वह स्थल 'हरीत माधव मंदिर' के रूप में आज भी दर्शनीय है। रामानंद ने भले ही अपने स्वतंत्र 'रामावत संप्रदाय' की स्थापना कर ली किंतु दर्शन के रूप में उन्हें रामानुजप्रणीत विशिष्टाद्वैत ही स्वीकार्य था। रामोपासना की भक्तिधारा सहज गम्य हो सकती है, इसलिए रामावत संप्रदाय की स्थापना की, बाद में यह संप्रदाय खूब फूला फला। रामानंद के बाद उनकी शिष्य-प्रशिष्य परंपरा में गलता गद्दी रामावत संप्रदाय की एक प्रमुख पीठ के रूप में अत्यधिक ख्यातिनाम हुई। कृष्णदासजी पयहारी के शिष्य अग्रदास ने रामानंद संप्रदाय का एक द्वारा रैवासा में स्थापित किया। उन्हीं अग्रदास के शिष्य भक्तमाल के रचयिता नाभादास थे। रामानुजाचार्य ने वर्णाश्रम धर्म में भगवद् आराधना में अनुष्ठान को प्रधानता दी, जबकि रामानंदाचार्य ने लोकमंगल के व्यापक दृष्टिकोण को रखकर अनुष्ठान की जगह संस्कार, आचार, आराधन में एक समन्वयकारी भक्ति पद्धति को प्रमुखता प्रदान की। भक्ति का सहज-सरल मार्ग प्रशस्त किया। भक्ति मार्ग के अनेक कठोर बंधनों को तोड़ने का कार्य भी उन्होंने किया। आचार्य होने के नाते प्रस्थानत्रयी पर उपनिषद् भाष्य, आनंद भाष्य तथा गीता भाष्य की रचना की। पंथानुयायियों के लिए 'वैष्णव मताब्ज भास्कर' में आपने स्पष्ट लिखा कि हर व्यक्ति भगवद् प्रपत्ति (भक्ति) का अधिकारी है। इसके लिए केवल आत्मसमर्पण की अपेक्षा रहती है। पद्मावती और सुरसुरी नामक दो स्त्रियों को शिष्या बनाकर उन्होंने स्त्रियों के लिए भी भक्ति का मार्ग खोल दिया। उनके इसी उदार दृष्टिकोण के कारण उत्तर भारत में भक्ति का व्यापक प्रसार हुआ। रामानंद संप्रदाय पर गहन अध्ययन करने वाले डॉ. बदरीनारायण श्रीवास्तव ने रामानंद के सभी ग्रंथों की संख्या 17 बताई है, जिसमें कुछ ग्रंथ हिंदी व कुछ संस्कृत भाषा में हैं। उनके प्रमुख ग्रंथों में श्रीवैष्णव मताब्ज भास्कर, श्री रामार्चन पद्धति, गीता भाष्य, उपनिषद् भाष्य, आनंद भाष्य, सिद्धांत पटल, रामरक्षा स्तोत्र, राममंत्र जोग, योग चिंतामणि, राम अष्टक आदि हैं। 21 वैष्णव मताब्ज भास्कर, पंथ उपदेशार्थ है, वहीं 'रामार्चन पद्धति' की रचना स्वामीजी ने अपने प्रथम दो शिष्य अनंतानंदजी तथा सुरसुरानंद को उपदेश देने के निमित्त की थी। बाद में सभी शिष्य वर्ग में इसका अत्यधिक प्रचार हुआ। 'आनंद भाष्य' पर अप्रामाणिकता का आरोप भी लगा है। 'सिद्धांत पटल' भी तपसी शाखा का प्रमुख ग्रंथ है। तपसी- रामानंद संप्रदाय की एक अलग शाखा है। रामानंदजी द्वारा रचित हनुमत आरती - 'आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की' तो बहुत प्रसिद्ध रही है। रामानंदजी द्वारा रचित कुछ फुटकर पद भी चर्चित रहे हैं। रामानंदजी का जन्मनाम रामदत्त था। उनके गुरु राघवानंद रामानुजाचार्य की शिष्य परंपरा में 14वें आचार्य माने जाते हैं। रामानंद ने गुरु आज्ञा से नव संप्रदाय की स्थापना की। रामानंद ने संपूर्ण भारत का धर्म प्रचारार्थ तीर्थाटन किया, जिसे रामानंद दिग्विजय नाम दिया गया। वे अपने शिष्यों के यहां भी गए। पीपाजी के निमंत्रण पर गागरौन गढ़ भी गए। कहते हैं, उनके साथ कबीर और रैदास भी थे। किंवदंती तो यह भी प्रसिद्ध है कि वे धनावंश के पंथ प्रवर्तक धनाजी के पास भी पहुंचे थे और उन्हें पंथ निर्माण की आज्ञा अपनी दूसरी भेंट के दौरान प्रदान की थी। धनाजी ने प्रथम भेंट युवाकाल में स्वयं काशी जाकर की थी तथा उन्हें अपना गुरु बनाया था। रामानंद ने वैष्णव धर्म के प्रचारार्थ जनभाषा को काम में लिया। उनके अधिकांश शिष्यों ने जनभाषा में ही भक्ति रचनाएं तैयार कीं। रामानंद के नवीन संप्रदाय को वैरागी संप्रदाय कहा गया। रामावत संप्रदाय के साधु वैरागी कहे गए। संवत 1505 को रामानंदजी की मृत्युतिथि माना जाता है। डॉ. बदरीनारायण श्रीवास्तव के अनुसार, "स्वामीजी ने मृत्युकाल समीप जानकर अनंतानंद को काशी रहकर और सुरसुरानंद को पंजाब, भावानंद को दक्षिण, नरहरियानंद को उत्कल, गालवानंद को कश्मीर, पीपा तथा योगानंद को गुर्जर देश, धना, कबीर, रैदास और सेन को काशी रहकर धर्म एवं भक्ति के प्रचार का आदेश दिया।" 22 अपने गुरु द्वारा उत्तरकाल में दी गई आज्ञा का सभी संत शिष्यों ने पालन किया। रामानंद के जीवन चरित्र को लेकर प्रसंग 'पारिजात' 'रामानंदायन' तथा भगवद्दास रचित 'रामानंद दिग्विजय' नामक ग्रंथ प्राप्त होते हैं। स्वामीजी के 12 प्रमुख शिष्यों में प्रथम शिष्य अनंतानंदजी थे। वे पुष्कर क्षेत्र के ब्राह्मण थे। वे ब्रह्मा के अवतार थे। भक्तमाल में अनंतानंद का जन्म अयोध्या के समीप महेशपुर नामक ग्राम में बताया गया है। द्वितीय शिष्य कबीर हुए। कबीर का जन्म काशी में हुआ। वे काशी के लहरतारा तालाब में नीरु एंव नीमा नामक जुलाहा दंपती को मिले। बड़े होकर रामानंद के शिष्य बने किंतु सगुण की जगह आपने निर्गुण भक्तिधारा को प्रश्रय प्रदान किया। सुरसुरानंद का जन्म लखनऊ के निकट परखम नामक गांव में हुआ। सुरसुरानंद को देवर्षि नारद का अवतार बताया गया। काशी आकर रामानंदाचार्य के शिष्य हो गए। सुरसुरानंद के गांव की सुरसुरी नाम की ब्राह्मण कन्या ने सुरसुरानंद को पति रूप में मान रखा था, इसलिए वह भी स्वामीजी के चरणों में रहकर लोककल्याण के निमित्त भजन भाव में निमग्न रहने लगी और स्वामीजी की शिष्या हो गई। नरहरियानंद रामानंदजी के शिष्य थे। आपका जन्म वृंदावन के निकट एक गांव में हुआ। अति अल्पवय में माता की मृत्यु होने पर नरहरियानंद को रामानंदजी के यहां काशी में भिजवा दिया गया था। आप ही जगत विख्यात संत तुलसीदासजी के गुरुजी थे। रामानंदजी के शिष्य रैदास भगवान के बहुत बड़े भक्त थे। जाति से चमार होने के कारण जूते गांठकर अपना जीवनयापन करते लेकिन उनकी उत्कृष्ट भक्ति ने उन्हें अपार प्रसिद्धि दिलवाई। रैदासजी की वाणी श्रुति, शास्त्र और सदाचार संपन्न थी। भक्त धनाजी की भी अपने गुरुभाई रैदास में बड़ी प्रीति थी। वे अपने एक पद में रैदास के संबंध में कहते हैं कि मरे ढोर के चर्म का व्यवसाय करने के बावजूद वे माया का परित्याग करने वाले हैं। पीपा गागरौन गढ़ के खीची राजा थे। वे देवी उपासक थे। मुक्ति की चाह रखने पर देवी ने उन्हें रामानंद का शिष्यत्व ग्रहण करने की आज्ञा प्रदान की थी। रामानंदजी का शिष्यत्व ग्रहण कर पीपा ने अपने राजपाट और रानियों का परित्याग कर दिया। रामानंदजी का शिष्य बनने के कुछ काल बाद रामानंदजी अपनी बड़ी शिष्य मंडली के साथ गागरौन गढ़ आए। पीपाजी ने सभी संतों की सेवा की। पीपा का समस्त जीवन संत सेवा में व्यतीत हुआ। पीपा कबीर के समकालीन थे। रामानंदजी के शिष्य सेन जाति से नाई थे। भगवान के प्रिय भक्त थे, इसलिए अपने भक्त की लाज रखने के लिए भगवान ने नाई का रूप धर लिया था। सेन बांधवगढ़ राजा के नाई थे। वे सदा संतों की सेवा में लगे रहते थे। रामानंदजी के प्रमुख बारह शिष्यों में परिगणित सुखानंद अनूठे प्रभुभक्त थे। उन्हें रामानंदजी का शिष्य बनने का दिव्य आदेश प्राप्त हुआ। वे अपने गुरु के दर्शन करने के लिए व्याकुल हो गए। सुखानंद भगवान के भाव में इस तरह से निमग्न रहते, उनके नेत्रों से लगातार प्रभु विरह में नेत्र किसी झरने की तरह झरते रहते। पद्मावती भी रामानंदजी के द्वादश शिष्यों में एक थीं। वे लक्ष्मीजी का अवतार थीं। आपके पिता प्रभाकरजी भगवती लक्ष्मी के उपासक थे। स्वयं लक्ष्मीजी ही पुत्री रूप में प्राप्त हुईं। वे अपने पिता को लेकर काशी में रामानंदाचार्य के दर्शनार्थ उपस्थित हुईं और शिष्या रूप में दीक्षित हुईं। काशी में रहकर उन्होंने महिलाओं में रामभक्ति के जागरण का कार्य किया। रामानंदजी के शिष्य भावानंद को महाराज जनकजी का अवतार माना जाता है। वे मिथिला निवासी थे। इनका जन्म नाम विठ्ठलपंत था। दीक्षा के उपरांत रामानंदजी ने आपको भावानंद नाम दिया। ये गृहस्थ संत थे। इनके पुत्र निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव और सोपानदेव महान संत हुए। पुत्री मुक्ताबाई भी श्रेष्ठ भक्तों में परिगणित है। रामानंदजी के सबसे छोटे शिष्यों में धनाजी ही थे। धनाजी भगवान के अद्वितीय भक्त हुए। भक्त शब्द उनके नाम के आगे जुड़ गया। स्वयं भगवान ने ही प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन देकर रामानंदजी का शिष्यत्व ग्रहण करने का आदेश प्रदान किया था। वे काशी आए और रामानंदजी से दीक्षा प्राप्त की। परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार वे कबीर, नामदेव, रैदास और सेन से छोटे थे। 23 परशुराम चतुर्वेदी भले ही धना के रामानंद का शिष्य होने में थोड़ा संशय इसलिए प्रकट करते हैं कि उनके पदों में गुरु रामानंद का उल्लेख नहीं है। जबकि नाभादासजी की भक्तमाल से बड़ा दूसरा साक्ष्य क्या हो सकता है, जिसमें वे उन्हें रामानंद के बारह शिष्यों में उल्लेखित करते हैं। प्रामाणिक-अप्रामाणिकता की बात को दरकिनार करते हुए देखें तो अगस्त्य संहिता में भी धना को रामानंद का शिष्य बताया गया है। अग्रदासजी के ग्रंथ 'रहस्यत्रय' में भी उन्हें रामानंदजी का शिष्य ही बताया गया है। रामानंद संप्रदाय के अन्यान्य सभी ग्रंथों में भी ऐसी ही पुष्टि की गई है। मैकालिफ ने 'द सिख रिलीजन' में धनाजी के अनेक उल्लेख दिए हैं। रीवां नरेश रघुराजसिंह भी धना के संबंध में अनेक कथन करते हैं। 'अगस्त्य संहिता' में रामानंदजी के सभी बारह शिष्यों को महाभागवतों का अवतार माना गया है। जो इस प्रकार हैं-(1) अनंतानंदजी-ब्रह्मा के अवतार, (2) सुरसुरानंदजी - नारद के अवतार, (3) सुखानंदजी-शंभु के अवतार (4) नरहरियानंदजी - सनत्कुमार के अवतार, (5) योगानंदजी-महर्षि कपिल के अवतार, (6) पीपाजी- मनु के अवतार, (7) कबीरजी- प्रह्लाद के अवतार, (9) सेनजी- भीष्म के अवतार, (10) गालवानंदजी -शुकदेव के अवतार, (11) रैदासजी- यमराज के अवतार, (12) धनाजी-बलि के अवतार तथा पद्मावतीजी- लक्ष्मीजी की अवतार। यहां सुरसरि को विस्मृत कर गए तथा दो नए शिष्यों के रूप गालवानंदजी तथा योगानंदजी के नाम जुड़ गए हैं। रामानंद परंपरा के कतिपय अन्य ग्रंथों में शिष्यों के नामों में थोड़ा अंतर है किंतु भक्तमाल में उल्लेखित शिष्यों को ही अधिक प्रामाणिक माना गया है। रामानंदजी के शिष्य धनाजी के जीवन, आचार एवं भक्ति के संबंध में हम विस्तारपूर्वक विचार आगे के पृष्ठों में करेंगे। धनाजी पर रामानंदजी की सहज प्रीति थी। धनाजी की भगवनिष्ठा ने रामानंदजी को अत्यधिक प्रभावित किया था। भक्ति की जहां चर्चा चलती, रामानंदजी भक्त श्रेष्ठ धनाजी की निस्पृह भक्ति का अवश्य उल्लेख किया करते।
अध्याय : द्वितीय: - भक्तमालों में धना चरित्र
अध्याय : द्वितीय - भक्तमालों में धना चरित्र भक्तिकाल और उससे पूर्व के भक्तों का पद्यमय चरित्रगान हमें नाभादास कृत 'भक्तमाल' के छप्पय छंदों में प्राप्त होता है। भक्तों के चरित्र गान से हृदय शुद्ध और निर्मल होता है। भगवान और उनके भक्तों के चरित्र की महिमा अद्वितीय है। भक्तों की पावन कथाएं कहने-सुनने से अंतःकरण पवित्र होता है तथा भगवान के प्रति अनुराग जाग्रत होकर भक्ति दृढ़ होती है। नाभादासजी भक्तमाल में भक्तों की कीर्ति को कल्याणकारी बताते हैं, उन्होंने एक दोहे में कहा है- जग कीरति मंगल उदै तीनौं ताप नसायं।हरिजन को गुन बरनते हरि हृदि अटल बसायं ।।' अर्थात - भक्तों के यशगान से संसार में यश और कीर्ति का संप्रसार होता ही है, तीनों तापों से मुक्ति प्राप्त होती है, मंगल का उदय होता है और अटल रूप से हरि हृदय में वास करने लगते हैं। उपरोक्त दोहा तो 'भक्तमाल' के अंतिम पद में है, जबकि भक्तमाल के प्रारंभिक मंगलाचरण के प्रथम दोहे में ही नाभादासजी कह देते हैं- भक्त, भक्ति भगवंत गुरु चतुर नाम वपु एक।इनके पद वंदन किएं नासत विघ्न अनेक ।। 1 ।। नाभादासजी कहते हैं- दिखने में भले ही, भक्त, भक्ति, भगवान तथा गुरु चार संज्ञाएं दिखाई दे, पर तत्त्व और स्वरूप से ये एक ही हैं। इनके चरण वंदन से सारे विघ्नों का नाश हो जाता है।नाभादासजी ने अपने गुरु अग्रदासजी की आज्ञा शिरोधार्य कर इस अनुपम ग्रंथ भक्तमाल का लेखन किया। भक्तमाल के प्रारंभ में वे इस गुरु आज्ञा का वर्णन भी करते हैं। (श्रीगुरु) अग्रदेव आग्या दई भक्तन को जस गाउ।भवसागर के तरन को नाहिन और उपाउ ।। 4।। भक्तों के यशोगान की आज्ञा को धारण करने वाले नाभादास ने 214 दोहों एवं छप्पय छंदों में इस सुंदर भक्त चरित्र ग्रंथ का प्रणयन किया। पद्म में रचित इस गेय ग्रंथ को वैष्णव समाज के अनुपम ग्रंथ का विरुद प्राप्त हुआ है। ' भक्तमाल की कथा करने वाले संत आचार्य अपने को 'भक्तमाली' कहने में बड़ा गौरव अनुभव करते हैं। जिस प्रकार श्रीमद्भागवत आदि का सत्संग होता है, वैसे ही भक्तमाल की कथाएं भी बड़े समारोहपूर्वक गाई एवं सुनी जाती हैं। नाभादासजी ने भक्तमाल में इसके रचनाकाल का कोई उल्लेख नहीं किया। अनुमानतः इसका रचनाकाल संवत 1642 से संवत 1680 के मध्य माना जाता है।' सुविदित है कि प्रज्ञाचक्षु नारायणदास (नाभादास) के गुरु रामानंद संप्रदाय के रैवासा पीठाधीश्वर अग्रदेवाचार्य थे। अग्रदेवाचार्य का जन्म फागुन शुक्ला द्वितीया वि. संवत 1553 को राजस्थान के दाधीच ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अठारह वर्ष की अवस्था में अग्रदेव ने गलता में कृष्णदासजी पयहारी से शिष्यत्व ग्रहण कर लिया था। इन्हीं अग्रदेवाचार्य को नाभादास बाल्यकाल में जंगल में अनाथ रूप में मिले थे। निरंतर प्रेमाभक्ति में डूबे रहने वाले अग्रदेवाचार्य एक सिद्ध संत थे। रामकृपालदास चित्रकूटी के कथनानुसार- "दीन-हीन-अंधे बालक के रूप में श्री नाभाजी मिले। उन्हें नेत्र ज्योति, पंच संस्कार से संपन्न कर नारायणदास यह नाम दिया और संत सेवा में नियुक्त किया। पुनः समर्थ देखकर भक्तमाल रचना की आज्ञा दी।" चतुः संप्रदाय के 52 द्वारों में 14 द्वारे अग्रदेवाचार्य की परंपरा से है। रामभक्ति में रसिक मधुरोपासना में आप अग्रगण्य रहे। रामानंदजी के बारह शिष्यों में अनंतानंद प्रधान शिष्य थे। उनके शिष्य थे कृष्णदास पयहारी। रसिक प्रकाश भक्तमाल में विवरण प्राप्त होता है कि पयहारी ने पुष्कर में बारह वर्ष तक षडाक्षर राममंत्र का जप किया। अनुष्ठान के दौरान ही मां सीता ने उन्हें साक्षात् दर्शन प्रदान किए। आमेर के राजा पृथ्वीसिंह के अत्यधिक आग्रह पर वे पुष्कर से गलता चले गए। गलता में उस समय तारानाथ नाम के एक नाथपंथी संत का दबदबा था, पर वह शीघ्र ही तपस्वी पयहारीजी की आध्यात्मिक शक्ति के आगे नतशिर हो गया और वहां से अन्यत्र कहीं चला गया। महाराज पृथ्वीसिंह को उस आचरणहीन तारानाथ से मुक्ति प्राप्त हुई और उन्होंने कृष्णदासजी को अपना गुरु बना लिया। वैष्णव रामभक्ति का गलता तब एक प्रमुख केंद्र बन गया। कृष्णदासजी पयहारी के दो शिष्य थे-कीलदास और अग्रदेव। अग्रदेव को अग्रदास भी कहते थे। आयु में बड़े होने के कारण, कृष्णदासजी पयहारी के गोलोक गमन करने के पश्चात गलता आश्रम की गद्दी का दायित्व कीलदास को प्राप्त हुआ। अग्रदेव तब गलता से चलकर रैवासा आ गए। यों तो कृष्णदासजी पयहारी के बाइस शिष्य थे। उनके नाम नाभादासजी अपनी भक्तमाल के एक छप्पय में इस प्रकार बताते हैं- कीलदेव, अग्रदेव, केवलदास, चरणदास, हठीनारायण, सूरजदास, पुरुषोत्तमदास, पृथुदास, त्रिपुरदास, पदमनाथ, गोपालदास, टेकराम, टीला (टीलदास), गदाधारी, देवपंडा, हेमदास, कल्याणदास, गंगाबाई, विष्णुदास, कान्हड़दास, रंगाराम, चांदण तथा सबीरी। राम रसिक उपासना दक्षिण के आलवार संतों से लेकर अग्रदेवाचार्य तक काफी पल्लवित हो चुकी थी, पर उसे एक दार्शनिक बाने के साथ व्यवस्थित रूप देने का कार्य अग्रदेवाचार्य ने किया। उनकी पद्य कृति 'ध्यान मंजरी' में रसिक उपासना के अलौकिक रूप को प्रस्तुत किया गया है। 'ध्यान मंजरी' के इन सिद्धांतों का रसिक संतों में सर्वाधिक प्रचार एवं सम्मान हुआ। एक प्रकार से परवर्ती श्रृंगारी साधना की वह गीता हो गई और उसके प्रणेता रसिक संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य मान लिए गए।' भक्तमाल के रचयिता नाभादासजी ने भी अपने गुरु अग्रदेवजी के संबंध में कहा है- श्री अग्रदेव गुरु कृपा ते बाढी नवरस बेलि।चढ़ी लड़ैती लाल छवि फूली नवल सुकेलि ।। जब गलता से अग्रदेव रैवासा में आ गए तो उनके प्रिय शिष्य नाभादास भी उनकी सेवार्थ रैवासा में आ पहुंचे। डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह मानते हैं कि भक्तमाल की रचना संवत 1642 (1558 ई. सन) में की गई। भक्तमाल के अलावा भी इनकी दो रचनाएं रामचंद्रजी का 'अष्टयाम' ब्रज भाषा के गद्य-पद्य दोनों स्वरूप में प्राप्त होती हैं। किंतु प्रसिद्ध रचना 'भक्तमाल' ही हुई। 'भक्तमाल' की रचना नाभादास किसी पांडित्य प्रदर्शन के भाव से नहीं करते हैं, वरन वे विनयपूर्वक कहते हैं कि चारों युगों के जितने भक्त हुए हैं और जो आगे होंगे, उनके चरणों की पावन धूलि हमारे मस्तक पर सदा विराजमान रहे। क्योंकि भक्त ही मेरे सर्वस्व हैं। नाभादास का दृढ विश्वास है कि भक्त गुणगान से वे इस भवसागर से तर जाएंगे। भक्तमाल की रचना के लिए नाभादास को अपने गुरु के आशीर्वाद से दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। भक्तमाल की रचना उन्होंने गुरु आज्ञा के पालनार्थ की। नाभादासजी द्वारा भक्तमाल रचना के उपरांत इसकी अनेक टीकाएं तथा अनेक नवीन भक्तमाल रचे गए, किंतु इस भक्तमाल जैसी प्रतिष्ठा अन्य की नहीं हुई। मात्र 214 पदों में रचित नाभादास के भक्तमाल की गद्य-पद्य रूप में बड़ी-बड़ी टीकाएं की गईं। संवत 1769 में की गई श्री प्रियादास की 'भक्तिरस बोधिनी' टीका सर्वाधिक प्रसिद्ध हुई। इस टीका में उन्होंने 634 कवित्तों की रचना की। यानी नाभादासजी के भक्तमाल से तीन गुना वृद्धि इस टीका में हो गई। हमारे आलोच्य भक्त श्री धनाजी महाराज के भक्तिमय जीवनवृत्त का निर्देश भक्तमाल के पद संख्या 62 में एक पूरे छप्पय के रूप में प्राप्त होता है। वह इस प्रकार है- घर आए हरिदास तिनहि गोधूम खवाए।तात मात डर खेत थोथ लांगल हिं चलाए ।।आस पास कृषिकार खेत की करत बड़ाई ।भक्त भजे की रीति प्रगट परतीति जु पाई ।।अचरज मानत जगत मैं कहुं निपज्यौ कहुंवै बयो।धन्य धना के भजन कों बिनहिं बीज अंकुर भयो ।।62 ।। अर्थात - परम भागवत धना के घर पर साधुओं की जमात आई। उन्होंने खेत में बीजने के लिए रखे गेहूं भी आए हुए साधुओं को खिला दिए। माता-पिता के डर से अपने खेत में बिना बीज के ही हल चला दिए। हल चलाकर वह अपने घर आ गए लेकिन थोड़े दिनों बाद निकट पड़ौस के खेतीहर उसके खेत में धारोधार ऊगे गेहूं की बड़ाई करने लगे तो धना को बड़ा आश्चर्य हुआ किंतु धना जान गए कि भगवान के भक्तों की सेवा निष्फल नहीं जाती। संसार के लोगों को भी जब इस बात का पता चला तो उन्होंने आश्चर्य मिश्रित हर्ष से कहा कि भगवान की लीला विचित्र है, बोया कहीं और निपजा कहीं। नाभादासजी कहते हैं, ऐसे भगवद्भक्त धनाजी के भक्तिभाव की वे प्रशंसा करते हैं, जिनके खेत में बिना बीज के ही अंकुर (गेहूं) उग आए। प्रियादास ने अपनी 'भक्ति रस बोधिनी' टीका में तीन कवित्तों के माध्यम से भक्त धनाजी के चरित्र का इस प्रकार विस्तार किया- खेत की तो बात कही प्रगट कवित्त मांझ और एक सुनौ भई प्रथम जू रीति है। आयौ साधु विप्रधाम सेवा अभिराम करै ढस्यौ ढिंग आप कही मोहूं दीजे प्रीति है। पाथर लै दियो, अति सावधान कियौ छाती महं लाय जियो, सेवै जैसी नेह नीति है। रोटी धरि आगै आंखि मूंदि लियौ परदा कै छियौ नहिं टूक देखी भई बड़ी भीति है ।।(कवित्त पद-306) बार-बार पांव परै अरै भूख प्यास तजी धेरै हिये सांचौ भाव पाई प्रभु प्यारियै। छाक नित आवै नीकै भोग को लगावै जोई छोड़ै सोई पावैं प्रीति रीति कछु न्यारियै। जाको कोऊ खाय ताकी टहल बनाय करै ल्यावत चरावत गाय हरि उर धारियै। आयौ फिरि विप्र नेह खोजहूं न पायौ कहूं सरसायौ बातें लै दिखायौ स्याम ज्यारियै ।।(कवित्त पद-307) द्विज लखि गायनि में चायनि समात नाहिं भायनि की चोट दूग लागी नीर झरी है।जायकै भवन सीता रंवन प्रसन्न करें बड़े भाग मानि प्रीति देखी जैसी करी है।धना कौ दयाल व्है कै आज्ञा प्रभु दई ढरौ करौ गुरु रामानंद भक्ति मति हरी है।भए शिष्य जाय आप छाती सों लगाय लिये किए गृह काम सबै सुनी जैसी धरी है।।(कवित्त पद-308) नाभादासजी ने धना की भक्ति के प्रभाव का वह प्रसंग लिया, जिसमें वह संतों की सेवावश खेत का बीज भी साधुओं को खिला देता है और भक्ति के प्रताप से बिन बाहे, गेहूं पैदा हो जाते हैं। जबकि प्रियादास भक्तिरस बोधिनी के तीन कवित्तों में धना के बाल्यकाल का एक अन्य प्रसंग चित्रित करते हैं। उपरोक्त तीनों कवित्त में वर्णित कथाप्रसंग इस प्रकार है- प्रियदास कहते हैं। खेत की बात तो पूर्व में नाभादासजी ने अपने कवित्त में कह दी, पर मैं धनाजी के बाल्यकाल का दूसरा प्रसंग सुनाता हूं। एक दिन घर आए एक द्विज द्वारा ठाकुरजी की रीतिपूर्वक बहुत सुंदर ढंग से सेवा करते देखकर उस घर के बालक धना को बड़ा आनंद आया। उसने ब्राह्मण के निकट आकर कहा- मैं भी ठाकुरजी की सेवा करना चाहता हूं। मेरे मन में भी उनके प्रति बहुत प्रेम है। ब्राह्मण के पास एक शालग्राम पत्थर था, उसने वह पत्थर धना को पकड़ा कर कहा कि तुम बड़ी सावधानी अर्थात बड़े ध्यान से इस ठाकुर की सेवा करना। धना बड़ा प्रसन्न हुआ और उस शालग्राम रूपी ठाकुर को अपने हृदय से लगा लिया। ब्राह्मण तो चला गया। धना ने अगले दिन भगवान के आगे प्रसाद रखा, पंडित की तरह परदा किया, आंखें बंद कर सामने बैठ गया। थोड़ी देर बाद सोचने लगा कि अब तो भगवान ने प्रसाद प्राप्त कर लिया होगा तब उसने आंखें खोली और देखा, प्रसाद तो ज्यों का त्यों पड़ा था, भगवान ने उस में से एक कौर तक नहीं खाया था। भगवान की उदासीनता से धना बड़ा भयभीत हो गया। वह सोचने लगा, उसकी सेवा में जरूर कोई कमी रह गई है, इसलिए उसे भगवान से क्षमा मांगनी चाहिए। वह सच्चे मन से प्रभु के पैरों में (शालग्राम के) गिरकर क्षमा मांगने तथा विनती करने लगा, पर उसकी विनय का जब भगवान पर कोई असर नहीं हुआ तो वह इस बात पर अड़ गया कि ठाकुरजी आप जब तक प्रसाद नहीं ग्रहण करेंगे, तब तक मैं भी भूखा-प्यासा ही रहूंगा। बालक धना का ऐसा हठ और हृदय की सच्ची भक्ति देखकर भगवान पसीज गए। अब जो भी छाक घर से आती, वह पहले ठाकुर को समर्पित करता। भगवान को धना का प्रसाद बहुत स्वादिष्ट लगता। भगवान प्रसाद में से जो हिस्सा छोड़ते, उसे धना बड़ी रुचि से प्राप्त करता। प्रियादासजी कहते हैं, प्रीत की रीत कुछ विलग ही होती है। एक दिन भगवान ने धना के समक्ष एक प्रस्ताव रखा कि मैं रोजाना तुम्हारा प्रसाद खाता हूं। जो जिसका अन्न खाता है, उसको उसकी कुछ सेवा टहल भी करनी चाहिए, इसलिए तुम आज से बैठे रहा करो, मैं तुम्हारी गाएं चराकर ले आया करूंगा। धना ने ऐसा करने के लिए मना किया, पर ठाकुर कब मानने वाले थे, वे प्रतिदिन धना की गाएं चराने लगे। कुछ दिनों उपरांत वह ब्राह्मण त्रिलोचन पुनः धना के घर आया, पर उसने धना को वहां पूजा करते नहीं देखा तो कहा कि तुम ठाकुर की पूजा क्यों नहीं करते हो। इस पर धना ने प्रसन्न होते हुए कहा कि वह अपने खेत में ठाकुर को रोज प्रसाद चढ़ाता है और बदले में वे नित्यप्रति हमारी गाएं चराते हैं। पंडित को धना की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। पंडित ने कौतुहल से पूछा कि वे भगवान अब कहां हैं? धना ने भोलेपन से उत्तर दिया-बताया तो है, वे हमारी गाएं चराने के लिए गए हैं। पंडित इस बात पर कैसे विश्वास करे। पूजा तो ठाकुरजी की वह वर्षों से कर रहा है, पर उसके समक्ष तो भगवान कभी प्रकट नहीं हुए। पंडित ने बहुत आग्रह किया तो धनाजी उसे अपने खेत में ले गए जहां श्यामसुंदर गाएं चरा रहे थे। ठाकुर को गाएं चराते देख द्विज के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसका हृदय धना की निश्छल भक्ति देखकर गद्गद हो गया ओर आंखों से प्रेम की अश्रुधार फूट पड़ी। फिर भगवान ने धना को गुरु करने की आज्ञा प्रदान की और कहा कि अभी भारतभूमि में रामरूप संत रामानंद हैं, उन्हें अपना गुरु बनाओ तथा विधिपूर्वक मंत्र दीक्षा ग्रहण करो। भगवद् आज्ञा का पालन करते हुए धना ने रामानंदजी को अपना गुरु बना लिया। प्रियादास कहते हैं कि रामानंद को गुरु बनाने पर भगवान बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया। धना अपने गृहस्थ के सारे कार्य करते हुए भक्ति भावना में निमग्न रहने लगे। प्रियादास कहते हैं- मैंने जैसा सुना है, वैसा लिख दिया है। नाभादासजी की भक्तमाल और प्रियादासजी पद्यमय टीका जिस तरह से भक्त चरित्रांकन के रूप में विख्यात रही है, इसी प्रकार दादूपंथी राघवदासजी की 'भक्तमाल' तथा चतुरदासजी की पद्य टीका भी अत्यंत चर्चित रही है। राघवदास ने भी धना के चरित्र को दो छप्पय छंद के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। राघवदासजी ने भक्तमाल की रचना क्यों की, इसके संबंध में वर्णन प्राप्त होता है कि दादूदयालजी के पौत्र शिष्य प्रह्लाददासजी ने यह विचार किया कि नाभाजी ने अपनी भक्तमाल में सगुण भक्तों की कथाएं तो लिखीं, पर निर्गुण भक्तों की कथाएं नहीं लिखीं, जबकि भक्तमाल में निर्गुण सगुण दोनों प्रकार के भक्तों की कथाएं होनी चाहिए। इसकी पूर्ति के लिए प्रह्लाददास ने अपने पौत्र शिष्य राघवदास को निर्गुण-सगुण भक्तों की कथाओं से युक्त सुंदर भक्तमाल लिखने की आज्ञा प्रदान की। राघवदास ने गुरु आज्ञा धारण कर इस भक्तमाल की रचना की। संवत सत्रह-सै सत्रहोतरा, शुकल पक्ष शनिवार ।तिथि तृतीया आषाढ़ की, राघव कियो विचार ।। 779 ।। यानी विक्रम संवत 1717 की आषाढ़ शुक्ला तृतीया, शनिवार को विचारपूर्वक भक्तमाल ग्रंथ को पूर्ण किया। इस भक्तमाल में कुल 781 पद हैं। दादूपंथी चतुरदासजी ने इसकी पद्य टीका वि. संवत 1857, भादवा बदी चवदस, मंगलवार को पूर्ण की। दादूपंथी नारायणदास ने इसकी गद्य टीका, जिसे उन्होंने 'भक्तचरित्र प्रकाशिका' नाम दिया, विक्रम संवत 2026 में पूर्ण की। राघवदास की भक्तमाल में भक्त शिरोमणि धनाजी का चरित्र वर्णन -छप्पयसंतन के मुख नाखि के, धनैं खेत गेहूं लुणे।बीज बांहणै लाग्यो, साधु भूखे चलि आये।मगन भयो मन मांहि, सबै गेहूं बरताये।मात पिता तैं डरत रिकत ऊंमरा कढाये।भक्त भाव सौं भजे और तें बधे सवाये।राघो अति अचिरज भयो, बिन बाहें निपजै सुणै।संतन के मुख बाहि कै, धनै खेत गहूं लुणे ।। 37 ।।
मनहर छंदगाडौ भस्यौ बीज बीचि संतन कौं बांटि दयौ, असै रह्यौ ध्यान तिहुँ लोक धनां जाट कौ। पारौसी के खेत कौ करार कीन्हौ हारिन सूं, हाथ मारि लयो जन कौल कीयौ काठ कौ। गेहूं लगे ठौर कछु वोरन कौं नांहिं और, ऊंमरा कढाये डर मांन्यौ राज हाट कौ। राघो कहै खेत हरि हेत अति निपज्यौ जु, दिन दिन बढत प्रभाव पुण्य ठाठ कौ ।। 3811 नाभादासजी के प्रसंग को ही राघवदासजी ने थोड़े अंतर के साथ पुनः रचा है। धना गाड़ा भरकर बीज को खेत में बोने के लिए ले जा रहा था, किंतु रास्ते में भूखे साधु मिल गए। साधुओं के प्रति सदैव ही धना का अनुरागमय भाव था, उसने वे सभी गेहूं साधुओं को भोजन कराने में खर्च कर दिए। पर साथ ही उसे जब माता-पिता के उल्हाने का ध्यान आया तो बीज बीजे बिना उसने खाली ऊमरे (हल की लकीरें) निकाल दिए। नित्यप्रति भगवद् भक्ति में लीन रहने वाले धना ने भले ही बिना बीज खेती की, पर उसके खेत की फसल औरों से सवाई रही। राघवदास कहते हैं, यह बड़े आश्चर्य की बात है कि धना के खेत में बिना बीजे अन्न उत्पन्न हुआ। धना ने अपना अन्न तो संतों की क्षुधापूर्ति के काम लिया, पर वे सारे गेहूं खेत में उग आए। आगे, दूसरे पद में राघवदास कहते हैं कि धना ने गाड़े में भरा सारा बीज साधुओं को बांट दिया, क्योंकि धना का मन संत सेवा में इतना ही उदार था। उसके इस परमार्थ भाव के कारण ही सर्वत्र उसका सुयश फैलने लगा। धनाजी अपने साथ खेत में हाली भी रखा करते थे। साधुओं को बीज बांटने पर उस हाली ने आपत्ति की। धना ने कहा, तुम उसकी चिंता न करो, पड़ौसियों के खेत में जिस हिसाब से गेहूं पैदा होगा, उसी के अंदाज को परख कर तुम्हें तुम्हारे हिस्से का गेहूं दे दिया जाएगा। धना ने हाथ पर ताली पटककर उसे विश्वास दिलाया। उधर खेत बिना जोते रहने पर राज भी खेत दूसरे को दे सकता था तथा वह बनिया जिसने बीज के निमित्त गेहूं दिया था, वह भी नाराज न हो, यह सोचकर खेत में बिना बीज के खाली ऊमरे निकाल दिए। राघवदास कहते हैं, इस सबके उपरांत धना के खेत में अधिक उपज हुई और उसकी भक्ति का प्रभाव दिनोदिन बढ़ने लगा। चतुरदास कृत पद्य टीका इंदव छंदखेत कथा कहि दी सब राघव, फेरि सुनो इक पैल भई है।वैष्णव ब्राह्मण सेव करी घर, देखि ठस्यो मन मांगि लई है।गोल सु अश्म उठाय दियो वह, लेत भयो अति बुद्धि दई है।भोग लगावत आड करावत, ग्रास न खावत चिन्त नई है।। 164 ।। चतुरदासजी कहते हैं कि धना के खेत में घटित कथा तो राघवदासजी ने कह दी है। अब मैं धना के बाल्यकाल की कथा कहता हूं। धना के घर पर एक वैष्णव ब्राह्मणका सुआगमन हुआ। उसने बड़ा मन लगाकर भगवान की सेवा की। धना ने मनोयोग से सेवा करते उस ब्राह्मण को देखा तो वह बड़ा प्रभावित हुआ। ब्राह्मण ने अपने झोले से शालग्राम को निकाल कर स्थापित किया, पूजा की और भोग लगाया। धना बड़े ध्यान से यह सब क्रियाएं देख रहा था। उसने ब्राह्मण से कहा कि उसे भी भगवान की यह मूर्ति दे दी जाए। बालक का मन देखकर एक गोल-सा दूसरा शालग्राम झोले से निकालकर पंडित ने धना को पकड़ा दिया और कहा- ये भगवान हैं, इनकी रोज पूजा किया करना तथा इन्हें भोग प्रसाद चढ़ाना, इनके भोग लगाए बिना स्वयं भोजन न करना। अब धना उस शालग्राम मूर्ति की पूजा करने लगा और भोग लगाता, परदा करता, किंतु भगवान को प्रसाद ग्रहण करते न देखकर चिंतातुर हो गया। वह सोचने लगा-इस तरह प्रसाद ग्रहण नहीं करेंगे तब भगवान तो दुबले हो जाएंगे। पांय परै विनती हु करै तज, भूख मरै अड़ि के जु पुवायो।रोटिन ल्यावत, नित्य जिमावत, जो रहित पावत यूं मन लायो। कोउ सुवावत काहि रिझावत, गाय चरावत यूं प्रभु भायो।आय फिरौं द्विज देखत नै कछु, बात कही सब राम दिखायो ।। 165 11 धना भगवान को अतिशय अनुनय विनय करता, पैरों में गिरता, पर जब भगवान ने प्रसाद नहीं पाया तो उसने भी अन्न ग्रहण करना त्याग दिया। धना भूखा रहने के कारण दुबला होने लगा, पर उसने अपनी प्रतिज्ञा को नहीं छोड़ा। तय कर लिया, भगवान जीमेंगे तो वह जीमेगा। अंततः भगवान को अपने बालभक्त की बात माननी पड़ी। प्रकट होकर वे धना की लाई भोजन प्रसादी को पाने लगे। भगवान कुछ भोजन सामग्री धना के लिए शेष छोड़ देते, उसे रुचिपूर्वक धना प्राप्त कर लेता। धना भगवान में मगन रहने लगा। एक दिन भगवान ने धना के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि इस संसार में जो जिसका अन्न खाता है, वह उसका कार्य कर उसे प्रसन्न रखता है। मैं भी तुम्हारा अन्न खाता हूं, इसलिए तुम्हारी गायें चरा लाया करूंगा। अब ठाकुर रोज धना की गायें चराने लगे। एक दिन वह ब्राह्मण जिसने धना को शालग्राम शिला प्रदान की थी, वह धना के घर आया और धना से कहने लगा कि तुम ठाकुर की पूजा भलीभांति करते हो न, और प्रसाद भी चढ़ाते होंगे ? धना ने कहा- तुम्हारे ठाकुर कुछ दिन तो रूठे रूठे रहे, प्रसाद ग्रहण नहीं किया, किंतु अब ऐसा नहीं है, समय पर प्रसाद ग्रहण कर लेते हैं और गायें चराते रहते हैं। धना की बातें सुनकर ब्राह्मण चकित हो गया। गायें चराने वाले भगवान के दर्शनों के लिए वह अत्यधिक आतुर हो गया। उसने धना को भगवान के दर्शन कराने को कहा। धना उस पंडित को अपने खेत में वहां ले गया, जहां भगवान गौचारण किया करते थे। पर ब्राह्मण को भगवान दिखाई नहीं दिए। भगवान ने युक्ति दी कि हे धना, तुम ब्राह्मण की गोदी में बैठ जाओ, इसे मेरे दर्शन हो जाएंगे। धना ने वैसा ही किया, वह ज्यों ही ब्राह्मण की गोद में बैठा, उसे भी भगवान के दर्शन हो गए। गाय चरावत देख खुशी द्विज, भाव भयो जल नैन ढरे है।धांम सिधारि सु रांम रिझावत, आपहु वा जिमि रीति करै है।रीझी कहा हरि जाहु धना गुरु, राम हि नंद करो सु सिरे है।जाय भये शिष कंठ लगावत, काम करै घर ध्यान धेरै है ।। 166 ।। भगवान को अबोध भक्त की गायें चराते देखकर विप्रवर बहुत आश्चर्य मिश्रित खुशी में डूब गए। उनके नयनों से खुशी के आसूं झरने लगे। अपने घर आकर वह ब्राह्मण परमात्मा की भक्ति में निमग्न हो गया। ईश्वर को प्राप्त करने का जो मार्ग है, उसे अपना लिया। कुछ काल उपरांत स्वयं ठाकुर ने धना को स्वामी रामानंदजी को गुरु बनाने की आज्ञा प्रदान की। भगवान की आज्ञा को धनाजी कैसे टाल सकते थे ? काशी में जाकर वे रामानंद के शिष्य बन गए और गृहस्थ के तमाम कार्य करते हुए भी भगवद् भक्ति से कभी विमुख नहीं हुए। नाभाजी और राघवदास की भक्तमाल रचना में 65 वर्ष का अंतराल है। राघवदासजी की भक्तमाल विस्तारित है, वह 781 पदों में रचित है, इसलिए उसमें काफी अतिरिक्त सामग्री समाहित है, पर धनाजी के प्रसंग में यही कहा जा सकता है कि भक्तिपरक घटनाएं वे ही हैं, जबकि कथन भंगिमा अलग है। नाभादासजी द्वारा रचित भक्तमाल की अनेक टीकाएं प्रसिद्ध रही हैं। इनमें रामशरण भगवान प्रसाद रूपकला द्वारा 'भक्ति सुधा स्वाद तिलक' नाम की गद्य टीका का अपना एक स्थान रहा है।" यहां हम उनके वार्तिक तिलक की वे बातें जो पूर्व टीकाओं में वर्णित नहीं हुई उनका उल्लेख कर रहे हैं।नाभाजी के धनाजी विषयक छप्पय संख्या 62 के अंत में धनाजी का मान बढ़ाते हुए रूपकलाजी लिखते हैं कि, "बिन बीज बोए ही जिनका खेत उपजा, ऐसे श्री 108 धनाजी का भजन धन्य धन्य है।" प्रियादासजी की टीका के वार्तिक में कुछ मनोहारी संवादों को काम में लिया गया है। धनाजी से पूछा कि, "पूजा करते हो कि नहीं ?" तब धनाजी सब वृत्तांत कह गए कि, "स्वामीजी कई दिनों तक तो इन्होंने प्रसाद नहीं पाया इससे मैंने भी नहीं खाया। अब तो आपकी मूर्ति में ही प्रगट होकर रोटी भी खाते हैं और गैया भी चरा लाते हैं।" यह सुन ब्राह्मणजी अति चकित हुए। रूपकलाजी के सामने भक्तमाल के भक्ति प्रसंग तो वही हैं, किंतु उन्होंने अपनी वार्तिक कला से उन्हें रोचक बना दिए हैं। हमने सभी प्रसिद्ध भक्तमालों तथा उनकी टीकाओं का गहन अध्ययन किया। गणेशदास भक्तमाली, गोवर्धन 12 ने भक्तमाल की टीका को चार बड़े खंडों में प्रस्तुत किया है। उनके द्वितीय खंड में धना का प्रसंग आता है। उन्होंने नाभाजी रचित प्रत्येक शब्द का शब्दार्थ प्रस्तुत किया है। टीका में अनेक संबंधित तथ्यों को लाने का प्रयास किया है। जैसे वे व्याख्या में कहते हैं- श्री धनाजी महाभागवत श्रीबलिजी के अवतार हैं। यथा-वन्दौं बलि जिन कलि तन धारयौ। धना रूप हरि प्रेम प्रचारयौ (श्री रामानंदाचार्य चरितामृत) संतों को भोजन कराने के प्रसंग को भी सविस्तार रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। इन्होंने धना के पिता का नाम पन्ना तथा माता का नाम रेखा लिखा है (पता नहीं किस प्रमाण से)। एक प्रसंग है-धना भोजन कराने के लिए सब संतों को अपने खेत में ले जाते हैं। आगे के प्रसंग में भगवान को धना के खेत की रक्षा की फिक्र लगी। भगवान ने सोचा, रक्षा नहीं की जाएगी तो संत सेवा कैसे होगी? भगवान कंधे पर लाठी रखे हुए, नौकरी की तलाश में धना के पास आ गए। यहां नौकरी के प्रसंग को भक्तमालीजी ने बहुत रोचक बनाने का प्रयास किया है, बहुत सारे संवाद धना और पहरेदार बनकर आए भगवान के मध्य होते हैं। अंततः एक तिहाई भाग का अन्न लेने के करार पर भगवान धना के खेत की रखवाली करने को तैयार हो जाते हैं। भगवान ने कहा- हम खेत पर ही रहेंगे, घर पर नहीं आएंगे, आपको वहीं खाना-पीना पहुंचाना पड़ेगा। धना ने यह स्वीकार लिया। अब भगवान बड़ी तत्परता से श्री धनाजी का खेत रुखालने लगे। इस प्रसंग में भगवान और धना के बीच नाटकीय और चुटीले संवाद काम लिए गए हैं और प्रसंग को रोचक बनाया गया है। प्रियदासजी की टीका के प्रसंग को भी भक्तमाली गणेशदास अत्यंत रुचिकर ढंग से प्रस्तुत करते हैं। धना के द्वारा ब्राह्मण से ठाकुरजी की मूर्ति लेने के प्रसंग को कल्पनाओं के रंग से सजाया गया है। धना को भगवान की सेवा का चाव चढ़ा है, उन्हें रात्रि में ठीक से नींद भी नहीं आती है। आखिरकार वे भगवान को उपस्थित होकर भोजन पाने के लिए राजी कर लेते हैं। 'प्रीत की रीत कछु न्यारियै।' प्रेम के विवश भगवान धना का प्रसाद पाते हैं और बदले में उनकी गाएं भी चराते हैं तथा वापस आने पर पंडित को भी भगवान के दर्शन कराए। अंतिम प्रसंग बहुत ही रोचक है, उसे यहां शब्दशः दे रहे हैं-" श्री धनाजी की भक्ति पर रीझकर भगवान उन्हें साक्षात् दर्शन देते, वार्तालाप करते, संग-संग रहते, गाय चराते। इस प्रकार परम सुख प्रदान करते। श्री धनाजी की इच्छा होती कि प्रभु जैसे यह सब सुख दे रहे हैं, वैसे ही मुझे हृदय से लगाकर आलिंगन का सुख भी प्रदान करते तो मैं परम धन्य हो जाता, परंतु श्रीप्रभु धनाजी को कभी हृदय से नहीं लगाते। कभी-कभी धनाजी इस आशा से समीप भी गए, तो प्रभु ने बातों में ही बहला दिया, आलिंगन नहीं किया। तब एक दिन श्री धनाजी साहस बटोरकर हाथ जोड़कर श्रीप्रभु से अपना मनोरथ प्रकट किया और आज तक इस परम लाभ से वंचित रहने का कारण पूछा। तब श्रीप्रभु ने कृपा करके बताया कि वैसे तो आपकी स्वाभाविकी भक्ति से मैं परम संतुष्ट हूं, परंतु आपकी उपासना में अभी इतनी त्रुटि है कि आपने अभी गुरु नहीं किया है। बिना गुरु द्वारा विधिपूर्वक मंत्रोपदेश लिए भक्ति, ज्ञान, वैराग्य परिपक्व नहीं होते हैं। (नामदेवजी का प्रसंग भी ऐसा ही है) श्री धनाजी ने कहा- प्रभो, आप मिल ही गए, तब अब गुरु करने की क्या आवश्यकता रही ? भगवान ने कहा- धना, यह एक मेरी ही स्थापित की हुई मर्यादा है, इसका पालन करना चाहिए। तब धनाजी ने पूछा-तो प्रभो, आप ही बताइए, किसकी शरण में जाऊं? तब श्री भगवान ने कहा-आप श्री स्वामी रामानंदाचार्यजी की शरण ग्रहण करो, वे हमारे ही स्वरूप हैं। फिर मैं बेखटके आपको हृदय से लगा लूंगा। इधर श्री धनाजी से इस प्रकार कहकर भगवान ने उधर श्री स्वामीजी से भी कहा कि धनाजी आपके शिष्य बनने आ रहे हैं, स्वीकार कर लीजिएगा, अधिकारी भक्त हैं। श्रीप्रभु के श्रीमुख से श्री धनाजी की भक्ति की प्रशंसा सुनकर श्री स्वामीजी को बड़ा हर्ष हुआ और बड़े प्रेम से इनको शिष्य बनाकर उपासना के रहस्य समझाए। गुरुपदिष्ट होकर श्री धनाजी जब घर गए तो प्रभु ने ललक कर इनको हृदय से लगा लिया।" चूंकि भक्तमालों में सभी प्रभुभक्तों के चरित्र का वर्णन करना होता है, इसलिए उसमें विस्तृत चरित्र की गुंजायश कम रहती है। चरित्र विस्तार के दृष्टिकोण से ही टीकाएं की गईं ताकि चरित्र के विवरण में थोड़ी वृद्धि तथा लालित्य का समावेश हो। भक्तमाली रामकृपालदास, वृंदावन की 'भक्त तोषिणी' टीका में दो पद प्रसंगवश अलग दिए गए हैं। 'धनि-धनि संत प्रभाव जग यह कछु अचरज नाहिं। संत वदन बोयो धना जाम्यो खेतन मांहि।' दूसरी इस कहावत का उल्लेख किया गया है-'धन्य धना का हरि सौं हेत, बिनही बीज उपजायो खेत।' बाकी इस टीका में धनाजी से संबंधित कोई नई बात नहीं कही गई है। नाभादासजी की भक्तमाल के पश्चात भक्ति साहित्य में एक ओर तो इनकी भक्तमाल की गद्य तथा पद्य रूप में टीका प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति रही, वहीं अनेक संप्रदायों के भक्त कवियों ने अपने नजरिए से भी बहुत भक्तमालों की रचना कीं। उन भक्तमालों में अपने-अपने संप्रदाय का दार्शनिक मत भी प्रमुख रहा। रामस्नेही पंथ की खेड़ापा शाखा के संस्थापक आचार्य रामदासजी के शिष्य दयालुदासजी महाराज ने विपुल परिमाण में वाणी साहित्य की रचना की, वहीं संवत 1861 में उन्होंने 566 पदों में 'द्याल बाल भक्तमाल' की रचना की। धनाजी के संबंध में उनका मात्र एक ही छप्पय है, जो इस प्रकार है- बालपणो दिढ प्रीत, सेव भगवद अनुरागी।परसापरस सुप्रीत, दरस परसण बड़भागी।भाता खाय गउ चार, खेत बिन बीज निपायो ।गोंहूं तूंबां मांहि, पैहल हर जन मुख वाह्यो।रामानंद परसाद गुर, आतम परचै जन प्रगट।धना भगत आंकूर धिन, भाव साख निपजी अघट ।। 228 ।। भावार्थ- बाल्यकाल से धना की भगवान में अगाध प्रीति थी। भगवान की सेवा के प्रति गहन अनुराग के भाव धना में विद्यमान थे। प्रीत की सर्वोच्च स्थिति को 'परसापरस प्रीति' अर्थात एक-दूसरे को परस-स्पर्श की स्थिति कहा जाता है। वे बड़े भाग्यशाली भक्त थे, जिनका भगवान के साथ साक्षात्कार होता रहता था। भगवान धना का लाया भाता (छाक) खाकर उनकी गायें चराया करते। धना के बिन बीज बाहे खेत में उन्होंने गेहूं निपजाए। क्योंकि धना ने वे गेहूं, पहले साधुओं के मुख में बाह दिए थे, अर्थात उनकी क्षुधापूर्ति कर दी थी। द्याल बाल कहते हैं कि ऐसे भगवद् भक्त धना धन्य हैं, जिनको आत्मपरिचय कराने वाले रामानंद जैसे गुरु प्राप्त हुए। उन्हें गुरु की प्राप्ति भी परमात्मा की कृपा से हुई। उनके भक्तिरूपी खेत में भावरूपी फसल उत्पन्न हुई जो कभी भी समाप्त नहीं हुई अर्थात अघट रही। 'भक्तमाल' की तर्ज पर दादूपंथी नारायणदास ने 'संतमाल' की रचना की। उन्होंने अपनी संतमाल में एक चतुष्पदी धनाजी पर लिखी जो इस प्रकार है- रोटी धना की प्रेम से खाई चराई गाय थी।बिन बीज गेहूं खेत में बहु हुये ईश सहाय थी।प्रभु कहत काशी जाय, रामानंदजी को गुरु बना।गुरुमंत्र लेकर नारायण सु धन्य हो गया था धना ।। 270 ।। 15 नारायणदासजी ने अपनी संतमाल के पदों की स्वयं ही गद्य टीका की है। टीका में उन्होंने नाभादास कृत भक्तमाल के सभी प्रसंगों का पुनर्कथन किया है। श्री ब्रजवल्लभशरण वेदांताचार्य पंचतीर्थ ने भक्तमाल की 'भक्तिरस बोधिनी टीका' प्रस्तुत की है।" और तो इस टीका में अन्य टीकाओं से कुछ विलग नहीं है, टीका के अंत में धनाजी का एक पद दिया गया है, यह जरूर कुछ अलग बात है। दादूपंथी ब्रह्मदास ने अन्य भक्तमालों से हटकर नए स्वरूप में अपनी 'भगतमाळ' की रचना की।" वह राजस्थानी भाषा में रचित भक्तमाल है। इसका संपादन विद्वान चारण कवि उदयराज उज्ज्वल ने किया। इस 'भगतमाळ' में चार अलग-अलग जगहों पर धनाजी महाराज का यथाप्रसंग उल्लेख है। पृष्ठ सं. 10 पर पद्म है - मिळिया अनुकेत खुदावसु मारग, मांन महातम सेत मनौ।सह रोटी बीज समेत संतां नां, ढील न लायौ देत धनौ।खड़ आयो रेत विखै हळ खाली, खेत निपायौ हेत खरै।गहियां ब्रिद लाज उबारण गायक, काज इसा महाराज करै।जिय काज इसा महाराज करै ।। 10 ।। अर्थ-ईश्वर भक्त धना हल चलाने के लिए खेत जा रहा था। मार्ग में अनिकेत संत मिल गए, जिन्होंने धना से कहा कि वे भूखे हैं। धना, संतों को भूखे कैसे देख सकता था। अपने पास का सारा अन्न जो खेत में बाहने के लिए ले जा रहा था उन भूखे संतों को खिला दिया। माता-पिता के भय से खेत में बिना बीज के ही हल चला दिए और घर आ गया। पर परमात्मा को तो अपने भक्त वत्सल विरुद की लाज रखनी होती है। धना के खेत में खूब अन्न उपजाया। भगवान तो अपने भक्तों के हित ऐसे कार्य करते ही आए हैं। 21 नंबर पद में वे फिर धना के संबंध में लिखते हैं-
धनै धीरज धार मन में, कियौ हरि सूं काज।बिना वायां नीपजायौ, हुवौ बहतौ नाज। तौ सिरताज जी सिरताज, संतां सीस पर सिरताज ।। 21 ।। अर्थ-धना ने अपना सारा बीज (अन्न) साधुओं को खिला देने के बावजूद अपने भीतर के धैर्य का क्षरण नहीं होने दिया। ईश्वर सब समय सब ठीक करते हैं, इस विश्वास के कारण बिना बोये उसके अत्यधिक मात्रा में अन्न हुआ। धना के सिरताज आप सब के सर्वोपरि हैं। भगतमाळ के पृष्ठ 53 पर आपने फिर एक पंक्ति में उपरोक्त प्रसंग का उल्लेख किया है। ऐसे ही पृष्ठ-58 में 'नाज बिना वायौ निपजायौ' पंक्ति का प्रयोग करते हैं। गूदड़ परंपरा के रामस्नेही संत बालकरामजी ने संवत 1833 में नाभादासजी की भक्तमाल की 'श्रीमद् भक्तदाम गुण चित्रणी' टीका तैयार की। भक्तमालों के पद्यमय टीका के रूप में यह सबसे बड़ी टीका कही जा सकती है। इस टीका में 6633 पद हैं तथा छंदों की भी बहुलता है। टीका- भक्तदाम गुण चित्रणी 18चामर छंदअब सुनहु गाथा धना जन की जाति को सो जाट।जब बाल काल हि धना पितु घर लही हरि की बाट ।।इक बार कुलगुरु विप्र आयो धना पितु घर सोय।नित करै अरचा राम की अति प्रभु लडावै भोय ।। ।।।तिहिं पास ठाकुर धनै मांगा करन अरचा प्रीति।तब दियो द्विज पाषाण ताकूं सिखाई सब रीति ।।द्विज गयो पाछे करत पूजा धनौ अति रति ठानि।बन जात गाय चरायबे निज पास प्रभुहिं बसानि ।। 2।। निज छाक रोटी भोग लावत मंदि दृग पट तानि। नहिं पाइ तब कलपाइ जन पग लगत बड़ भय मानि ।। कहि क्यूं अहो क्षुद प्यास त्यागी भरत दृग जल एह। नहि लेऊं भोजन मैं ऊं तुम बिन जानि हरि अस नेह ।। 3 ।। तब कियो भोजन दियो जन सुख भक्त वत्सल राम। निज छाक आवै भोग लावै हरिहिं पावै साम ।। प्रभु सेष राखै धनौ चाखै प्रेम राखै थीर। नित आध पारस खात जन को विचारी रघुवीर ।। 4 ।। तब औसरे हरि गो चरावत धना कूं सुख दीन्ह। सो विप्र आयो बरस में घर हरिहिं देखि न चीन्ह ।। कहि धना सूं कत गए हरिजी धना तबहि कहाय। चलि तोहि हरि कूं दिखाऊं मम सो चरावत गाय ।। 5 ।। द्विज जाय देख्यो गाय चारत दूरि ते हरि आप। पुनि निकट गत नहिं सो दिखायो फिरि सिलामय प्राप ।। तब विप्र के मन प्रेम जागा झरन लागा नैन। असि भावना धरि मैं हूं प्रभु कूं करौ निज बस ऐन ।। 6 ।। तब विप्र निज घर जाय हरि कूं ध्याय लाय सु प्रेम। प्रभु तोष किन्हा पोष लीन्हा धना चीन्हा जेम ।। पुनि धना कूं हरि जानि भोला हुकम दीन्हा एहु। तुम ढरो कासी करो रामानंद गुरु सुख लेहु ।। 7 ।। पुनि धना कासी जाय निज गुरु कीन्ह रामानंद । तब भक्ति मेवा सन्त सेवा सिखेवा सुखकंद ।। गृह आय हरि हरिदास सेवा कीन्ह लीन्ह सु नेम। अब कहत परचौ खेत को बिन बीज निपज्यो जेम ।। 8 ।। बहु संत आवा एक दिन गृह भूख पीड़ित तेह । बीजार गोहूं संत जिमये धनै करि अति नेह ।। तब मात पितु तिस खिजनी लागे क्यूं खवायो बीज। कहि धना उहि तो कीट डाढ्यो हुतो मति करू खीज ।। 9 ।।
ताते हि भूखे संत जिमये और ल्याऊं नाज। मैं धरि राख्यो हौ बीज नीको खेत बाहन काज ।। अस करि पिता को समाधानहि हल बुलाए खेत। तब बीज बिन हल फेरि रीता भस्यो मन हरि हेत ।। 10।। हालीन सूं अस कहि बनाई देहै गोहूं वाह। बीजार अब के लाय ऊरहि खेत भल अवगाह ।। तब धनो बीजहिं पिता छाने हिरत गोधू खंच। यहु भेद हाली तिया जान्या दोउ विधि कर रंच ।।11।। झट प्रजूल ऊठी कर्कशा तन समावै न उसास। सा लरन लागी मति अभागी धना की तिय पास ।। कहि मुणस तेरे बीज मुड़ियन खवायो करि हेत। पितु-मातु कूं भोलापन रीता हल फिराया खेत ।।12।। अब बीज ढूंढत मिलत नाहीं खेत ढूंढत तेह। जो खेत खाली जाय अबके उड़ेगो घर खेह ।। अरु होहु किंवा तुमहि मुड़िया हमारो की हाल। तब तिय धना की कही खिजि के क्यूं बजावत गाल ।। 13 ।। हालीपना को धान्य तेरो देहिं लेखे डारि। क्यूं सोच तोकूं धनी पहली जाहु मूढ़ गमारि ।। मति देहु गारी संतजन कूं जेहिं हम सिरमौर । तूं लखत नहिं हरिभक्त महिमा करत झूठा झौर ।। 14।। तब गई रंडी वदत भंडी करत सब नर पास। यही बात प्रगटी खीरपुर सब सुनी जननी जास ।। सुनि पिता पुनि कहि धना सूं यहु खेत खाली जात। तब धना कहि नहिं जात खाली सांच मानहु बात ।। 15 ।। दिन पंच लगि यहि होत झगरा अरु धना मन सोच। निसि जपत रामहिं गुप्त कामहि क्षिति रहेगी पोच ।। नहिं मिलत बीजहि पिता खिजहि रखो रघुवर लाज। दिन सात में अति खेत मांहि बहुत ऊगो नाज ।। 16 ।।
जे हुत परोसी खेत के सब करत अति बखान। भल उज गोधू धना खेतहि और सम नहिं धान ।। तब देख नैनहिं धना आपहि भयो अति मन चैन । हरिभक्त सेवा करन की परतीति पाई ऐन ।। 17 ।। अस गैब सूं गोहूं उगाना भए पुर विख्यात । सब लोक अचरज करत जग में धना धन्य कहात ।। पुनि भई नेपै बहुत क्षेपै जास सनमुख राम। अब संक तजि नित संत सेवा धना तिय जुत धाम ।। 18।। पितु मात मृति गत तहां पीछे सुनो और उ बात। इक बार खेपा लटत आए संत बहु मग जात ।। कहि धना सूं हम भूख पीड़ित तब ही गोहू दीन्ह। भरि तुंबिका इक एक लीन्हा सबनि अधिक न लीन्ह ।। 19 ।। तब लरत हाली बुद्धि काली जिस कपालीहीन । कहि भक्ति हो बेचित्त तेरो करत है धन क्षीन ।। अब मैं न हाली रहौं तेरा पिता हूं सूं जानि। सो लेय अपनो नाज न्यारो भयो बड़ अभिमान ।। 20 ।। तिहि बरस बरसा भई सरसा धना के पग पीर। नहिं खेत श्रावण वाह कीन्हो जुक्ति कछु न ठीर ।। तब खेत सारे तुंबिका की बेलि गैबी छाई। आसोज कार्तिक मांहि तुंबा लगा अनगण भाई ।। 21 ।। सब लोक हांसी करै हाली उही चटकी देत। हम बिन धना को खेत देखहु तुंबिका उतपेत ।। अब भक्त हुवै है धनौ ले कर तुंबिका तिय जुक्त। यहु सुनि धना नहिं होत विमना हरि भरोसा भुक्त।। 22।। तब धनै हरिकृत खेत तुंबा उप्त नीका मानि। रखवाल खेतहि धस्यो इक नर संत कारज जानि ।। जब सर्व पाका तुंबका बहु मास खेत रहाय। पुनि पग धना को भयो ताजो फिरत इत उत धाय ।। 23 ।। इक दिवस साधू काज तुंबौ लाय इत मुख कीन्ह। गोधू भरे ता मांहि पूरण निरखि अद्भुत चीन्ह ।। तब सो धनै दरबार लखई गोहूं तुंबनि जात। जो हुकम व्है तो करूं खलहा सुनत कौतुक आत ।। 24 ।। दरबार तब इक देखि तुंबा गोहूं तुंबा मांहि। उन कहि तिहारा भाग का यहु हम जु लेवें नाहिं ।। तब धनै सबही तुंबका घर लाय गोधू लीन्ह। फिरि अति भरोसो राम को जन धना के मन कीन्ह ।। 25 ।। अस संत सेवा पाक मेवा धरेवा बहु भंत । जल काज तुंबा लेन कूं वा संत आय अनंत ।। अस धना सुमना संत रमना जास राम सहाय। जे मूढ हाली बुरा कहिता ते रहे मुख चाय ।। 26 ।। सोरठाधन्य धनो हरिदास सफल संत सेवा लही। जिसकी रति शुभ वास सकल जगति विस्तर रही ।। 27 ।। अपनी पद्यमयी टीका में संत बालकरामजी कहते हैं कि अब मैं आपको जाति से जाट भक्त धना की भक्तिमय गाथा सुनाता हूं- धना को अपने घर में बाल्यकाल में ही भक्ति का चाव लग गया। एक बार जब उनके घर में उनका कुल ब्राह्मण आया और वह कुछ दिन धना के पिता के आग्रह पर वहीं रुका। वह ब्राह्मण नित्य ही बड़े मनोयोग से ठाकुरजी का अर्चन-वंदन करता। उसकी पूजा विधि को बालक बड़े गौर से देखा करता। उसके लिए यह पूजा बड़े कुतुहल का विषय थी। धना ने बड़ी प्रीत से ब्राह्मण को कहा कि वह भी भगवान से प्रेम करना चाहता है तथा उनकी पूजा करने का भाव रखता है। कुल ब्राह्मण ने बालक के मन के भाव समझे और अपने पास से एक शालग्राम धना को देते हुए, उसे पूजा करने की सारी रीति समझाई। ब्राह्मण देवता के विदा होने पर धना ने पूजा करना तय किया। वन में गाय चराने जाते तब अपने शालग्राम को साथ ले जाते। ब्राह्मण की बताई रीति के अनुसार शालग्राम को सामने रखते। खुद के भोजन हेतु जो छाक साथ लाए, उसमें से चूरमें रोटी का भोग ठाकुर को लगाया और भोग लेने की प्रतीक्षा करने लगे। आंखें मुंदे, प्रभु का ध्यान लगाए, अचानक याद आया कि बालभोग कराते समय ब्राह्मण ने पट ताना था। धना ने भी ब्राह्मण का अनुसरण किया, अपने गमछे पर पट लगाया। थोड़ी देर बाद देखा तो प्रसाद ज्यों का त्यों पड़ा था, प्रभु ने तनिक नहीं पाया। धना को बड़ी निराशा हुई, वह दुखी हो गया, भगवान के आगे दंडवत पसर गया और किसी अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा मांगने लगा। बोला-भगवान, भूख-प्यास को क्यों त्याग दिया। आंखों से जलधार बहने लगी। जब भगवान को मनाने के सारे प्रयास बेकार चले गए तो हठ करने लगा। कहा- अगर तुम भोजन-पानी नहीं ग्रहण करते तो मैं भी नहीं करने वाला। ठाकुर प्रेम को पहचानते हैं। भक्त धना का अमित प्रेम देखकर भक्तवत्सल भगवान ने भोजन कर उसे सुख प्रदान किया। वे इसी रीति से अपने भक्तों को सुख प्रदान करते हैं। अब धना प्रफुल्लित होकर रोजाना छाक लेकर आवे, पहले प्रभु को भोजन करावे और शेष भोजन स्वयं प्राप्त करे। रोजाना आधा भोजन रघुवीर करें और यह विचार करें कि मुझे भी भक्त के निमित्त कुछ कार्य करना चाहिए। यह सोचकर वे धना की गायें चराकर उन्हें सुख देने लगे। वह ब्राह्मण देवता कुछ काल बाद धना के घर में पुनः उपस्थित हुए पर उन्होंने अपने दिए शालग्राम को जब घर में (पूजागृह) नहीं पाया तो कहा कि शालग्राम रूपी ठाकुरजी की वह प्रतिमा कहां है? तब धना ने कहा कि मेरे साथ खेत चलो, वहां दिखाऊं, वे वहां मेरी गायों को चरा रहे हैं। द्विज ने दूर से ही देखा-ठाकुर गाय चरा रहे थे, किंतु निकट जाने पर दिखाई नहीं दिए। निकट जाने पर तो वे शालग्राम रूप में ही दिखाई दिए। ब्राह्मण के मन में परमात्मा के प्रति सच्चा प्रेम जाग्रत हुआ, उसके नयनों से अश्रुपात होने लगा। उसने प्रण किया कि वह भी धना की तरह ठाकुर से निश्छल प्रेम करेगा और उन्हें प्राप्त करने का यत्न करेगा। घर आकर उसने प्रेम से ईश्वर आराधना प्रारंभ कर दी। थोड़े ही दिनों में ठाकुर ने धना की ही भांति ब्राह्मण को दर्शन देकर संतुष्टि प्रदान की। फिर ठाकुर ने धना का भोलापन जानकर उसे आज्ञा प्रदान की कि तुम काशी की तरफ जाओ और संत शिरोमणि रामानंद को गुरु रूप में प्राप्त करो। भगवद् आज्ञा को प्राप्त कर धना काशी गए और वहां रामानंदजी से शिष्यत्व प्राप्त किया और कंठी ग्रहण की। वे अब स्वामी हो गए। गुरु रामानंदजी ने उन्हें भक्ति और संतसेवा की अनेक सुखकारी बातों की शिक्षा प्रदान की। घर आकर धना ने हरिभक्ति और संतसेवा का कार्य प्रारंभ कर दिया। संतसेवा के इस नियम से उनकी प्रसिद्धि दूर तलक हो गई। एक दिन बहुत सारे संत उनके घर आए। लंबी यात्रा के कारण संतों को बड़ी भूख लगी हुई थी। धना के घर में उस समय बिजाई करने के लिए गेहूं पड़े थे। धना ने प्रेमपूर्वक उस अन्न की रोटी बनाकर संतों को खिला दी। माता-पिता खेत से आए, उन्होंने देखा कि धना ने जो गेहूं खेत में बाहने के लिए रखा था, उसी को साधुओं को खिला दिया है, इस पर वे धना पर बहुत खीजने लगे। धना ने माता-पिता को बहलाते हुए कहा कि उन गेहुंओं में तो कीट लग गया था, वे बीजने के काबिल नहीं थे। बीजने के लिए तो मैंने अच्छे गेहुंओं को रख रखा है और मैं हल बाहने के लिए शीघ्र ही खेत में जाता हूं। बीज तो था ही नहीं, धना के मन में तो हरि के प्रति प्रीति थी। धना ने बिना बीज के हल चला दिए। धना ने अपने हाली से कहा कि उसे यह बात उसके पिता से छुपाए रखनी है। उसके हिस्से के गेहूं वह अन्यत्र से लेकर दे देगा। हाली तो किसी तरह मान गया किंतु उसकी घरवाली को यह बात पता चली तो वह बिफर गई। पति से यह भेद जानकर वह प्रज्वलित अग्नि की भांति उठ खड़ी हुई। उस कर्कशा स्त्री को इतना क्रोध उत्पन्न हुआ, जिससे उसके शरीर में तेज-तेज सांसें उठने लगीं। वह तुरंत धना के घर पहुंची और धना की पत्नी से झगड़ा करने लगी। कहा-तेरे इस निखट्टू पति ने अपना सारा बीज मोड़ों को खिला दिया। माता-पिता को बहला कर, झूठ बोलकर इसने खेत में रीता हल फिराया है। अब ढूंढ़ने से भी बीज नहीं मिलना है और खेत में वर्षा का गीलापन भी जा रहा है। जो खेत इस बार खाली रह जाएंगे, वहां केवल रेत उड़ेगी। हमारे घर में भी रेत ही उड़ेगी, इस स्थिति में मोड़ी (स्वामिन) तुम बताओ, हमारा क्या हाल होगा ? तब धना की धैर्यवान स्त्री ने कहा कि तुम क्रोध में भरकर क्यूं फालतू अपने गाल बजा रही हो ? तुम्हारे हालीपन के हिस्से का जितना अनाज होता है, वह तुम्हें मिल जाएगा। हे मूढ़ स्त्री, तुम्हें इन सब बातों का सोच अपने पति से भी पहले क्यूं है? धना की स्त्री ने कहा कि तुम संतों को मोड़ा कहकर क्यूं गाली दे रही हो, संतजन तो हमारे सिरमौर यानी माथे के मोड़ हैं। तू व्यर्थ विवाद कर रही है, हरि के भक्तों की महिमा तू क्या जाने ? तब वह कुलटा नारी धना को बदनाम करते हुए गांव के अन्य लोगों के पास गई। अब तो खेरीपुर (खीरपुर) के एक-एक जन को यह बात पता लग गई। जब पिता को धना की करतूत का पता लगा तो उन्होंने पुत्र धना से कहा कि इस बार हमारा खेत तो खाली चला जाएगा। तब धना समझाने लगा कि हमारा खेत खाली नहीं जाएगा, इसे सच मानें। पांच दिनों तक परिवार में यही झगड़ा चलता रहा। धना मन में चिंतित होने लगा। वह रात-दिन भगवान राम का स्मरण करने लगा-हे भगवान, हमारा खेत पोचा रहेगा। पिता ने कहा- अब दुबारा हल चलाएं तो भी बीज नहीं मिल रहा है। धना स्मरण करने लगा- हे रघुवर, मेरी लाज रखना। सात दिनों बाद खेत में भारी फसल उग आई। खेत के पड़ौसी आ-आकर यह बात बताने लगे। वे कहने लगे - इस बार धना के खेत में जैसे गेहूं उगे हैं, वैसे तो किसी के खेत में नहीं है।यह बात जब धना ने स्वयं अपने नेत्रों से देखी तो उसके मन को चैन प्राप्त हुआ। संत बालकराम कहते हैं कि हरिभक्तों की सेवा करने की प्रतीति धना ने इस प्रकार प्राप्त की। इस प्रकार गुप्त रूप से गेहूं उगने की बात पूरे खेरीपुर गांव में फैल गई। सब लोग मन में आश्चर्य करते और साथ ही धना की भक्ति की प्रशंसा भी करते जाते। जिनके भीतर भगवद् प्रीति रहती है, उनके कार्य सदैव वर्धमान रहते हैं, किसी चीज की बाधा उपस्थित नहीं रहती। अब सब तरह के संशय का त्याग कर धनाजी और उनकी धर्मपरायण श्रीमती नित्य ही संतसेवा में जुट गए। उनके घर पर संतों की टोलियां आतीं और सत्संग करतीं। धना ने सत्संग का व्रत ही ग्रहण कर लिया। संत बालकराम वर्णन करते हैं कि धना के माता-पिता देवलोक होने के पश्चात की एक बात और सुनो- एक बार धना अपने खेत में खलिहान निकाल रहे थे, तभी बहुत सारे संत रास्ते-रास्ते चले आ रहे थे। उन्होंने धना से कहा कि हमें बहुत भूख लग रही है। धना ने सभी साधुओं की एक-एक तुंबिया गेहूं से भर दी। एक-एक तुंबी से अधिक उन्होंने नहीं लिया। धना द्वारा साधुओं को गेहूं बांटते देखकर धना का कुबुद्धि हाली लड़ाई करते हुए कहने लगा कि भक्ति ने तुम्हारी मति का हरण कर लिया है, परिश्रमपूर्वक पैदा किए हुए धन का कोई इस तरह नाश करता है क्या? मैं तुम्हारे पिता के समय से तुम्हारा हाली रहा हूं, पर अब नहीं रहूंगा। उसने अपना अनाज ले लिया और घमंडपूर्वक अलग हो गया। उसी वर्ष वर्षा हुई और धना के पैर में पीड़ा उत्पन्न हो गई। श्रावण मास में खेत ऐसे ही बिना हल जोते पड़ा रहा, कोई भी युक्ति काम नहीं आई। बिन बाहे खेत में तुंबों की अड़क बेलें उग आईं। आसोज और कार्तिक के महीने में उन बेलों के अनगिनत तुंबे लग गए। तुंबों भरे खेत को देखकर पड़ौसी खेतों के लोग हंसी उड़ाए और हाली भी चुटकियां बजाकर धना की खिल्ली उड़ाने लगा। वह कहने लगा-हमारे ही कारण से अन्न पैदा होता था, अब हम नहीं हैं तो खेत चौतरफ तुंबियों से भर गया। धना बड़ा भक्त हुआ फिरता है, अब वह और उसकी पत्नी इन तुंबों की कुछ युक्ति करे। भगवान में प्रगाढ़ भरोसा रखने वाला धना पड़ौसियों तथा हाली की बातों से तनिक भी विचलित नहीं हुआ। तब धना ने सोचा, भगवान का खेत है और भगवान के तुंबे हैं। सबकुछ अच्छा ही होगा। धना ने सोचा, इन तुंबों को साधु लोग हमेशा अपने साथ रखते हैं, ये पकने पर उनके काम आएंगे, इस सोच से अनुप्राणित होकर धना ने उन तुंबों की रखवाली के लिए एक आदमी छोड़ दिया। जब सारे तुंबे पक गए तो उन्हें खेत में एक जगह एकत्र करवा लिए। कुछ दिनों बाद धना के पैर की पीड़ा ठीक हो गई। अब वह इधर-उधर घूमने लायक हो गया। एक दिन एक साधु को तुंबा देने के लिए लाया गया। तुबे का मुंह काटा गया तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, उसमें गेहूं भरे हुए थे। तब धना ने इस बात की सूचना दरबार को दी और पूछा कि आपकी आज्ञा हो तो मैं तुंबों से गेहूं निकालने का कार्य करूं। इस कौतुक को दरबार ने भी आकर देखा कि सभी तुंबे गेहूं से ठसाठस भरे हुए थे। दरबार ने कहा कि धना, ये तो तुम्हारे भाग्य से पैदा हुए हैं, इन पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। तब धना उस सारे गेहूं को घर ले आया। धना के मन में अपने ठाकुर पर और भारी भरोसा हुआ। इस प्रकार धना संतों की सेवा कर भांति-भांति के मेवा प्राप्त करता। जल भरने के काम आने वाले उन तुंबों को लेने बहुत-से साधु धना के यहां आए। धना का मन इतना सुंदर था कि उसकी रुचि संतसेवा में ही रहती। इस प्रभाव से ठाकुरजी सदैव उसकी सहाय करते। मूर्ख हाली इस बात को जानता नहीं था इसलिए बुरा-भला कहता रहा। हरिभक्त धना धन्य-धन्य है, जिसने संत सेवा की सफलता प्राप्त की। उसकी रति-गति हमेशा परमात्मा में रही, इसलिए संसार में उसकी ख्याति का विस्तार हुआ। इस प्रकार हम देखते हैं कि सभी भक्तमालों में भक्तप्रवर धनाजी का भक्तिमय गुणगान हुआ है। साथ ही इन पद्य रचनाओं से उनके भक्तिमय, संतजन हितैषी स्वभाव की जानकारी सहज प्राप्त होती है। धनाजी का संपूर्ण जीवन भक्ति एवं संत सेवा से ओत-प्रोत था।
अध्याय : तृतीय: -अनंतदास और धना की परचई
अध्याय : तृतीय - अनंतदास और धना की परचईनाभादास के बाद धनाजी पर लिखने का कार्य अनंतदास ने किया। अनंतदास ने भक्तिकाल के अनेक संतों का चरित्र परचइयों के रूप में लिखा। अनंतदास की परंपरा रामानंद से जुड़ती है। अनंतदास ने भक्त पीपा की परचई में अपनी गुरु परंपरा का उल्लेख किया है- रामानंद के अनंता नंदू, सदा प्रगट पूनम ज्यूं चंदू। ताकै किसनदास इधकारी, सब कोई जाणै दूधाधारी ।। 27 ।।अग्रदास को इधको प्रेमू, लीण भयो सिंवरत हर नेमू। ताकै सिष विनोदी पाई, ताकै दास अनंत कहाई ।। 28।। यह शिष्य परंपरा इस प्रकार थी- रामानंद के 12 प्रमुख शिष्यों में प्रथम शिष्य अनंतानंद। अनंतानंद के शिष्य कृष्णदासजी पयहारी, कृष्णदासजी पयहारी के शिष्य अग्रदासजी। अग्रदासजी के नाभाजी, विनोदीजी तथा अन्य पंद्रह शिष्य। नाभाजी के गुरुभाई विनोदीजी ही अनंतदास के गुरु थे। "नाभादास - संप्रदाय वंशावली में अनंतदास के चाचा होते हैं।" अनंतदास ने संवत 1645 के लगभग कबीर, नामदेव, पीपा, त्रिलोचन, रैदास तथा धना की परचियों का लेखन किया। नामदेव की परचई में उन्होंने अपना समय संवत 1645 दिया है। अनंतदास द्वारा रचित धना भगत की परचई में उद्धृत निम्न पंक्तियां- धना भगत को चिरत सुनाऊं,आंख्यां देखी कह समझाऊं।हळ के गळ नाय न बांधी,धनै सांप्रत मूठी नहीं सांधी ।। उपरोक्त पंक्तियों में 'आंख्यां देखी कह समझाऊं' के आधार पर एक विद्वान ने धना को अनंतदास के समकालीन मान लिया, जबकि इन दोनों में तीन पीढ़ी का अंतर था। विद्वान ने लिखा है-" अनंतदास धना भगत के समकालीन थे, क्योंकि 'आंख्यां देखी' बात कहने वाला कोई समकालीन ही हो सकता है।" वस्तुत उपरोक्त पंक्तियां धनाजी की परचई में अभिव्यक्त घटनाक्रम के तहत धना का हाली कह रहा है, जिसे विद्वान सज्जन ने लेखक अनंतदास कहा मान लिया। अनंतदास के संबंध में अन्वेषकों का मत रहा है कि उन्होंने बहुत प्रामाणिकता के साथ परचई ग्रंथों की रचना की। रामानंद, कबीर, पीपा, धना की समकालीनता में भी अनंतदास की परचइयां खासा उपयोगी है। रामानंद-कबीर, पीपा, धना आदि के गुरु थे। इसका मतलब वे अपने शिष्यों के काल में मौजूद थे। भक्तमालों में सभी जगह प्रसंग आता है कि स्वयं भगवान ने धना से रामानंदजी को गुरु बनाने का आग्रह किया। यह भी उल्लेख आता है कि उन्होंने धना को शिष्योचित कतिपय आदेश दिए, उनमें पंथ स्थापना का भी एक आदेश था। रामानंद का समय सन 1475 तक ठहरने पर ही धना द्वारा रामानंद आदेशित पंथ स्थापन की बात उचित ठहरती है। क्योंकि धना ने इसी वर्ष (सन 1475) में धनावंश की स्थापना की। अनंतदास की परचियों पर गहन अध्ययन करने वाले डेविड एन. लॉरेंजन का मत उल्लेखनीय है। वे लिखते हैं, "असल में रामानंद के समय को जानने का उचित तरीका यह है कि हम कबीर, अनंतदास और नाभादास की सुपरिचित तिथियों से पीछे गिनना शुरू करें। यदि हम अनंतदास के समय को 1600 ई. मानें (नामदेव परचई के रचनाकाल 1588 ई. के आधार पर) तो रामानंद का समय 1475 ई. के आस-पास ठहरता है।"" अनंतदास रचित धना की परचई की अलग पांडुलिपियों में थोड़ा पाठ भेद अवश्य मिलता है। पर वह अंतर कोई बहुत अधिक नहीं है। यहां हम भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान की प्रति दे रहे हैं। ।। अथ धनैजी की परची लिख्यते ।। गुर गोमंद की आज्ञा पाऊं, दास धना की कथा सुनाऊं। हर की किरपा होय गुण गाऊं, जथा सक्त हूं वरण सुनाऊं ।। 1 ।। धिन धनौ जिन रांम रिझायौ, बाल अवस्था हरि गुण गायौ।विप्र ओक जजमांना जाई, सौ खेरापुर निकस्यौ आई ।। 2।। पिता धना कौ गिरसथ भारी, ब्राह्मण की कीनी मनुहारी।दिनां च्यार कीनौ विसरांमा, पायौ पोख बहुत आरांमा ।। 3।।
सौ तौ द्विज हरि का गुण गावै, रांम भगति सबके मन भावै।धनौ चरावै घर की गाई, भगति अंकर छिपै नहीं भाई || 4 || धनौ कहै सुण हौ द्विज देवा, मैं भी करूं रांम की सेवा। विप्र कहै तम बालक भाई, हरि की सेवा बहुत कठणाई ।।5।। बालक हठ बहुत ही कीनौ, तब ही विप्र सिला टुक दीनौ।सेवा कीजै प्रीत लगाई, बहुत भांति हरि का गुण गार्ड ll 6 11 ओ है रांम इन हि लिव लावौ, यां पहलां भोजन मत पावौ।इतनी कह विप्र उठ गड्यौ, धना के मन आनंद भड्यौ ।। 7।1 बालक वन में गऊ चरावै, आई रोटी भोग लगावै। नेतर बूंद रु ध्यान लगाई, जो देखै तो कछु नहीं पाई ।। 8 ।। तब ही धनौ मन में पछतावै, ना जानू यौ कबहू पावै। मैं विप्र पैं लीयौ छुडाई, या कूं तौ अब ओळू आई ।। 9।। दिना दोय लूं नाही पायौ, धनै आप ही अन्न छिटकायौ। दिना तीसरै भोग लगायौ, जो देखै तौ कछू न पायौ ।। 10।। तब तौ देख्यौ यो मर जासी, मैं भी खाय मरूंगौ पासी।धनै भगत जब भोजन छाड्यौ, मनसा वाचा मरणौ मांड्यौ ।। 11 ।। तब ही कृपा कर हरि आए, आधौ भाता प्रीत कर पायै। महा प्रसाद सीस धर लीनौ, बहुस्यूं भोजन धनै कीनौ ।। 12।। विश्राम-साखीअरध प्रसाद सूं रहण दै, आधौ जावै पाय। बारी आपो आपणी, ल्यावै गऊ चराय ।। 13 ।। चौपाईकेते इक दिन असैं गईया, धनौ रांम दोउं हिल मिल रहीया।एक समै विप्र फिर आयौ, देख रीत तब ही सुख पायौ ।।14।।
बहुस्यूं विप्र आप घर गईयौ, वाही कूं हरि दरसन दईयौ। प्रगट रांम यूं बोल्यां बांणी, साखी भगत धना नहीं जांणी ।15 ।। अब तुम बात हमारी मानौ, कासी कुं तक करौ पयानौ। जाय करौ गुरु रामानंदू, ताकै दरसण होय अनंदू ।।16 ।। राम धना कूं अग्या दीनी, रामानंद की दिछा लीनी। तब ही तिनके भयौ अनंदू, दिख्या लेत गए दुख दंदू ।।17 ।। दिछ्या लई परम सुख पायौ, अग्या लै खेरापुर आयौ ।रामानंद की दिख्या पाई, घर ही भगति करौ लिव लाई ।।18 ।।1 हरि गुण साध एक कर पूजौ, कबहु भाव धरौ मत दूजौ।सिंवरौ रांम साधपण सेवौ, अरु भूखां कूं भोजन देवौ ।।19 ।। और धना कै घर में नारी, सो है पति की आग्याकारी। आन देव की करै न आसा, निस दिन जग तैं रहत उदासा ।।20 ।। समदिस्टी द्विधा नहीं आनै, सब घट आतम राम पिछानै । घर में रहै उदासी असैं, जल कै निकट वटाऊ जैसें ।।21 ।। घर धरणी संपत विध सरबू, हरि कै हेत कियौ सब दरबू। गुर क्रिपा तैं राह बन आई, घर ही रहै रांम लिव लाई ।।22 ।। विश्राम-साखीदास धना की परचरी, सुण लीज्यौ प्रीत लगाय। दास अणंत कथा कहै, हरि की अग्या पाय ।। 23 ।। चौपाईधनै कै धीरज मन मांही, हरि सूं हेत और सूं नांही। रामनाम नित हिरदै राखै, मिथ्या मुख तैं कबू न भाखै ।।24 ।। सकल अंग सेवा कौ सूरौ, भगत वछल गोविंद गुण पूरौ।ओक दिना हरि असैं कीनै, आय वाट में दरसन दीने ।।25 ।।
सेवग नांम तमारौ भाई, सब संतन की टहल कराई। खीर खांड घृत आटा दीजै, मिनख जनम का लावा लीजै ।।26 ।। बोल्यौ धनौ सुणौ हो स्वामी, तम हौ मेरे अंतरजामी। मैं तो बीज खेत ले जांही, गैलां में सामग्री नांही ।।27।। अब तम रांम द्वारै जावौ, मनसा व्है सो भोजन पावौ। मेरे घरां सुलखणी नारी, बहु विध सेवा करै तमारी ।।28।। इतनै उठ वैरागी बोल्यौ, धना भगत को सत मत तोल्यौ।सेवग हुय उतर क्यूं दीजै, खोळ समेत पोट पुन दीजै ।।29 ।। सेवग के मन जैसी आई, जन कौ वचन न मेट्यौ जाई। धनै सुणत सो ढील न कीनी, खोळ समेत पोट पुन दीनी ।।30 ।।विश्राम-साखीगोहूं ले हरिजन गए, धनौ पहुंतौ खेत। तातैं दास अणंत कहै, सेवग सरबस लेत ।। 31 ।। चौपाईतब हाळी को मन विलखाणौ, स्वामी बीज और तम आणौ।धनौ कहै तम सुणरै भाई, तेरो वांट्यौ कहूं न जाई ।। 32 ।। पाड़ौसी कै निपजै जेतौ, तूं थारौ भर लीजै तेतौ । तब हाळी दोउं बळद उलाड्या, आथण सूधौ खेत जु फाड्या ।।33 ।। दिन आंथ्यौ हाळी घर आयौ, सो हाळण सूं चिरत सुणायौ।स्वामी मतौ ओक एक कीनौ, बीज सर्व भगतां कूं दीनौ ।।34 ।। सारे दिन खाली हळ फेरयौ, गोहूं चीणौ ओक नहीं गेस्यौ।इतनौ सुण हाळी की नारी, करै क्रोध अरु देवै गारी ।।35 ।। जायै बावरा तूं के खासी, ऊ तौ मोडो मांग र लासी। इतनौ सुन बोली हरि दासी, तब हाळण कुं खरी बिसासी ।।36 ।। भगतण कहै सुण हाळण बाई, थारी वांटौ कहूं न जाई। एक बळध अब ही दयूं खोई, जो तेरे विसवास न होई ।।37 ।। धनौ कहै कड़वा मत भाखौ, दिन दस वात गुपत कर राखौ।कीयौ कीयौ हरिजी को देखौ, पीछे तम कर लीज्यौ लेखौ ।। 38 ।। भया पंच दिन तब ही ऊगा, एक दिन हाळी जाइ पूगा। हाळी के मन भयौ अनंदा, भै तो कृपा करी गोविंदा ।।39 ।। हाळी जाय हथाई कहीयौ, स्वामी की गति कुणी न लहीयौ।इनकौ मतौ बहुत है भारी, ग्यान ध्यान धीरज मन धारी ।।40 ।। विश्राम-साखीधना कै धीरज घणी, साचौ हरि विसवास । दास अनंत विचार कहै, प्रभुजी पूरै आस ।।41 ।। चौपाईइतनी सुन बोलै सब कोई, स्वामी की गति कैसी होई। हाळी कहै सकळ सुण वातां, खेत गयौ इक समै प्रभाता ।। 42 ।। धना भगत को चिरत सुनाऊं, आंख्यां देखि कहि समझाऊं।हळ कै गळि नाई न बांधी, धनै समर्थ मूठी नहीं सांधी ।।43 ।। सारौ दिन ठालौ हळ फेस्यौ, गोहूं चिणौ ओक नहीं गेस्यौ।अब देखौ तो उगा घणा, बिन वाह्यां ई गोहूं चीणा ।।44 ।। अती सुणी अचंभो होई, गोबिंद की गति लखै न कोई। हाळी हाळण दोऊं डरीया, जाय धना कै पावां परीया ।।45 ।। चूक हमारी बकसौ स्वामी, तम दयाल हौ अंतरजामी। धनौ कहै चूक कछु नांही, सब घट मांहि एक है सांई ।। 46 ।। अब तक वात हमारी मानौ, जन सेवन की संक न आनौ। हरि भगतां कूं सरबस दीजै, जीवन जनम सफल कर लीजै ।।47 ।। तब हाळी कौ संसौ भागौ, साध संत की सेवा लागौ। हाळी बहुर खेत में आयौ, गोहूं देख बहुत सुख पायौ ।।48।। च्यारूंमेर ओकसा कृणा, पाड़ौसी सूं निपज्या दूणा। जो करै है सो आगै त्यारी, हरि कूं ए वृति लागै प्यारी ।। 49 ।। विश्राम-साखीसाचै मन सिमरण करै, रांम जनां सूं हेत। तातै दास अनंत कहै, हरि निपजायो खेत ।। 50 ।। चौपाईबहुस्यौ देख्या ओक अचंभा, मेर मेर ऊगा बहु तूंबा। स्वामी दोळी बाड़ कराई, ते सब ही बेलड़ियां छाई ।।51।। बहुर वायरा आछा वागा, तूंबा बहुत सुगठा लागा। धनै भगत भेळा कर लीना, संतां काज रामजी कीना ।। 52 ।। बहुयूं मंडळी जैसी आई, ता में संत बहुत सुखदाई। ते सब धना भगत के आए, स्वामी देख बहुत सुख पाए ।।53 ।। धनौ कहै धन्य भाग हमारे, आवो स्वामी भलां पधारे। कर डंडोत चरण जल लीनौ, दया करी तम दरसन दीनौ ।।54 ।। सब कूं आसण दीया बिछाई, ता पीछे हरिदासी आई।बैठ-बैठ कीनौ परनामा, आज हमारे पूरण कामा ।।55 ।। तातौ पांणी तब ही दीनौ, चरण खोळ चरणामृत लीनौ। सब संतां जैसी विधि देखी, यो तौ सेवग बडौ विमेखी ।।56 ।। जैसी ही है घर की नारी, अग्याकार रांम की प्यारी। धनौ कहै अब अग्या दीजै, करौ रसोई विलंब न कीजै ।।57 ।। साध कहै अग्या हरि केरी, लाव रसोई इछा तेरी। चोकौ दीनौ जळ भरवायौ, धनौ भगत सामग्री ल्यायौ ।।58।। आटो, घिरत, मिठाई लायौ, चावळ घणा दूध मंगवायौ। औ कछु तरकारी कीजै, धीणौ घणो दही पण लीजै ।।59 ।। विश्राम साखीतन मन धन अरपण करै, इण विधि सेवै संत। ताकूं राम निवाजसी, गावै दास अनंत ।।6011 चौपाईपाय प्रसाद रु कथा उचारी, दरसण कूं आवै नरनारी। कथा कीरतन बहु विध कीना, भये अनंद प्रेम रस भीना ।।61 ।। धनौ कहै अब कृपा कीजै, ओक ओक तौ तूंबा लीजै। धनै भगत तूंबा मंगवाया, देख डोळ सबके मन भाया ।। 62 ।। ले तूंबा सब कूं देखाई, इतनौ बोझ कहां है मांहि। आण करोती मुंहडा करीया, देखै तो गोहवां सूं भरिया ।। 63 ।। देख भयौ अचंभौ भारी, धन्य हो रामजी कला तमारी। कर कर मुंहडा धस्या उतारी, रास भई गोहवां की भारी ।।64 ।। गोहूं धना भगत कूं दीया, तूंबा तौ वैराग्यां लीया। जेता कण भगतन कूं दीना, तेता मण खेती में लीना ।।65 ।। औ अचरज मानौ मत कोई, करता, करतां कहा न होई। धना भगत को खेत निपजायौ, जन कबीर घर बाळद लायौ ।।66 11 नामदेव की छान छवाई। पीपै कूं द्वारका दिखाई । सब संतन के कारज सारे, केताई पतित पार उतारे ।।67 ।।
विश्राम-साखीदास अनंत जु कही कथा, धना कौ जस गाय। रामानंद के सिस की, महमां कही न जाय ।।68 ।।।। इतिश्री धनाजी की परचरी संपूर्ण ।।
परचरी (परचई) साहित्य की परंपरा परची का तात्पर्य होता है, किसी संत का जीवन परिचय। इस जीवन परिचय के अंतर्गत अधिकांश भक्तिपरक प्रेरणीय घटनाओं का काव्यमय वर्णन किया जाता है। परचियां अधिकतर संतों भक्तों के जीवन परिचय को लेकर रची गई। 'परची' शब्द को परचीकारों ने अनेक रूप में काम लिया है, यथा- परची, परचि, परचई, परचरी, प्रची, परिचई इत्यादि । सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर 18वीं शताब्दी तक परचियां लिखी गई। परचीकारों में अनंतदास, सुख सारण, जनगोपाल, हरिरामदास, दयालदास, परमानंद, मयाराम आदि प्रमुख नाम कहे जा सकते हैं। ऐसे परचीकारों में अनंतदास का नाम सर्वोपरि है। उन्होंने भक्त धनाजी के अलावा भी अंगद, कबीर, नामदेव, रांका बांका, रैदास, पीपा, सेऊ समन, त्रिलोचन तथा शेख फरीद के चरित्रों पर परची लेखन किया। सुख सारण धनावंशी जाति से थे, वे रामस्नेही संप्रदाय में दीक्षित हो गए थे। उन्होंने अधिकांश परचियां महिला भक्त चरितों पर तैयार की, यथा- भक्तमति मीरां बाई, मुक्ता बाई, किस्तूरां बाई, करमां बाई, करमैती बाई, रानां बाई, सिंवरी बाई, फूली बाई आदि। फूली तो स्वयं सुख सारण की बुआ ही थी। सुख सारण 19वीं शताब्दी में हुए। जनगोपाल दादूजी के प्रमुख शिष्य थे। इन्होंने 'दादू जन्मलीला परची' का लेखन किया, जो अत्यंत प्रसिद्ध हुई। जनगोपाल डीडवाना के महाजन थे। युवाकाल में ही दादूजी के शिष्य बन गए। जनगोपाल ने 'ध्रुव चरित्र' तथा 'प्रह्लाद चरित्र' जैसे अनेक दूसरे ग्रंथ भी रचे। धनाजी की परची लिखने वाले अनंतदास को विद्वान प्रामाणिक जीवनीकार मानते हैं। कबीर, पीपा और धना पर हुए शोधकार्यों में अनंतदास की उपरोक्त भक्तों के जीवन पर लिखी परिचयों को सर्वाधिक प्रामाणिक माना गया है। वस्तुतः अनंतदास एक सहिष्णु परचीकार हैं। वे भक्तों के चामत्कारिक व्यक्तित्व को तो अनेक आध्यात्मिक घटनाओं के माध्यम से प्रकट करते ही हैं, पर उन भक्तों पर आगामी शोध की गुंजायश भी बहुत छोड़ते हैं। कबीरदास पर अनुसंधान करने वाले विद्वान डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल का अभिमत है कि, "अनंतदास की परिचइयों में बाकायदा जीवनी लिखने की बजाय, बल संतों की साधना और लोक मान्यता का परिचय देने पर है।""
अनंतदास चौदहवीं सदी के भक्त नामदेव को वैष्णव भक्ति का उद्घाटक मानते हैं। अनंतदास कहते हैं-" कलियुग प्रथम नामदेव भडयो।" अर्थात कलियुग में वैष्णव भक्ति के प्रस्फूठन में नामदेव अग्रणी हैं। स्वयं धना की भी यही धारणा है. भक्ति के क्षेत्र में वे भी नामदेव को उच्च आसन विराजित करते हैं। निर्गुणी कबीर, रविदास, सेन को भी सम्मान प्रदान करते हैं। उपरोक्त भक्त धना के प्रेरणास्रोत हैं। अनंतदास कल्पनाओं में नहीं उलझाते। धनाजी की परचई में वे धना के पूर्व जन्म का उल्लेख नहीं करते। जबकि हमारे भक्तों के पूर्व जन्म का उल्लेख एक परिपाटी सी रही है। धनाजी को भी बलि का अवतार मानते हैं। रामानंदीय ग्रंथों में इसके उल्लेख मिलते हैं, किंतु अनंतदास पूर्वजन्म का उल्लेख नहीं करते। अनंत स्वयं वैष्णव थे, इसलिए वे अपनी परचियों में वैष्णव छवि को बरकरार रखते हैं। अनंतदास द्वारा रचित धनाजी की परचरी की गद्य टीका प्रथम चौपाई के प्रारंभ में अनंतदास कहते हैं- गुरुजी की आज्ञा प्राप्त कर मैं भगवान के दास भक्त धना की कथा सुना रहा हूं। यह वर्णन मैं परमात्मा की असीम कृपा के बल पर सुना रहा हूं। मैं इस कार्य में यथाशक्य अपना पूर्ण प्रयास करूंगा। भक्त धना धन्य-धन्य हैं, जिन्होंने बाल अवस्था में ही प्रभु को रिझाने तथा गुण संकीर्तन का कार्य प्रारंभ कर दिया था। एक ब्राह्मण अपने यजमानों के घर जाया करता था, एक दिन वह खेरापुर आ गया। खेरापुर में धना के पिता का बड़ा और समृद्ध परिवार था। ब्राह्मण उनके घर आया तो उसकी सुंदर आवभगत की गई। वह वहां चार दिनों तक रुका, उसे वहां बड़ा सुख प्रतीत हुआ। ब्राह्मण ने बड़ी भाव भक्ति के साथ धना के घर कथा-सत्संग की, साथ ही अपनी नित्य प्रति की पूजा-पाठ को भी सुंदर ढंग से संपन्न किया। धना हमेशा अपनी गाय चराने जाता था, गौ चारण करते उसमें भक्ति के अंकुर उगने लगे। उस धना ने जब ब्राह्मण को मनायोग से पूजा करते देखा तो उससे कहा कि वह भी भगवान की सेवा करना चाहता है। ब्राह्मण ने कहा- धना, तुम अभी बालक हो, भगवान की सेवा बड़ी कठिन होती है, तुम से यह सब कैसे होगा ? ब्राह्मण देवता ने अनेक प्रकार से समझाने का यत्न किया, किंतु धना जब सेवा करने के हठ पर उतर आया तो उसका मन रखने के लिए ब्राह्मण ने एक शालग्राम का पत्थर धना को दे दिया तथा उसे सेवा करने की रीति समझाते हुए कहा-बड़े प्रेम अनुराग से भगवान की पूजा करना,
परमात्मा को भांति-भांति की सेवा से रिझाने का कार्य करना। शालग्राम की ओर इशारा करते हुए कहा कि यही भगवान हैं. सदैव इनमें लीन रहना। पूजा करते समय प्रतिदिन इस बात का खयाल रखना कि प्रभु को प्रसाद कराने से पहले प्रसाद प्राप्त मत करना। सेवा-पूजा की सब बातें समझाकर विप्र दसरे गांव चला गया। भगवान की शालग्राम प्रतिमा प्राप्त कर धना के मन अपार आनंद की लहर छा गई। अब धना उस शालग्राम को अपने साथ ही रखते। जंगल गाय चराने जाते वक्त अपनी छाक (भोजन) में लाई हई सामग्री शालग्राम के आगे रख देता, ब्राह्मण की भांति 'लीजिए महाराज' कहता। उस पंडित की ही तरह आंखें मूंद कर भगवान का ध्यान लगाता, हाथ जोड़ता। थोड़ी देर बाद आंखें खोलकर देखा तो भोजन सामग्री तो ज्यों की त्यों पड़ी थी। धना के मन में पछतावा होने लगा, उसने सोचा, ब्राह्मण से भगवान को ले तो लिया है, पर ब्राह्मण के कहे अनुसार वह भली प्रकार से सेवा नहीं कर पा रहा है, तभी तो भगवान ने प्रसाद ग्रहण नहीं किया। पता नहीं यह भगवान भोजन प्रसादी को किस रीति से प्राप्त करता है, मुझे तो वह रीति भी नहीं आती। मैंने इसे ब्राह्मण से प्राप्त कर बड़ा अपराध कर लिया है, इसे शायद ब्राह्मण की याद आ रही है। धना ने दो दिनों तक बड़ा प्रयास किया कि यह ठाकुर किसी प्रकार से भोजन प्राप्त कर ले, पर जब भगवान ने प्रसाद नहीं लिया तो उसने स्वयं भी भोजन नहीं करने की ठानी। ब्राह्मण ने कहा था- भगवान को प्रसाद कराए पहले भोजन मत प्राप्त करना। ब्राह्मण की बात का तो पालन करना ही था। तीसरे दिन धना ने पुनः भगवान को भोग लगाया, कई उद्यम किए, पंडित की भांति गमछे से पर्दा भी लगाया, पर सारे प्रयत्न विफल गए, देखा तो भगवान ने फिर भी भोजन नहीं पाया। बालक धना ने सोचा, ऐसे भूखे रहते तो यह मर ही जाएगा, मैं ब्राह्मण को क्या मुंह दिखाऊंगा, इसीलिए तो वह भगवान को मुझे सौंप नहीं रहा था। अगर यह मर गया तो मैं भी मर जाऊंगा। आखिर धना ने तय किया कि जब तक यह भोजन नहीं करेगा, तब तक वह भी नहीं करेगा। मन और वचन से कहा- तुम मरोगे तो मैं भी साथ मरूंगा। बालक के इस हठ को भगवान अदेखा कैसे कर सकते थे। वे प्रकट हुए और आधा भाता (छाक) बड़ी रुचि से प्राप्त कर लिया। धना के मन में आनंद का पारावार न रहा, उसने भगवान द्वारा छोड़ी महाप्रसादी को सिर पर लगाया और फिर बड़ी रुचि से प्राप्त किया। अब यह रोजाना का क्रम हो गया। आधा प्रसाद भगवान करते और आधा धना। धना को गायें चराते देखकर भगवान ने प्रस्ताव दिया कि धना देखो, तुम्हें घरवाले यह भाता इसलिए देते हैं न कि तुम दिन भर गायें चराते हो, पर तुम्हारा आधा भाता मैं खा लेता हूं, तब तुम्हारा आधा कार्य मुझे करना चाहिए? धना को यह बात युक्तिसंगत लगी। कितने ही दिन इस प्रकार व्यतीत हो गए। दो प्रीत करने वाले सखा की भांति धना और राम (भगवान) हिल मिल कर रहने लगे। कुछ दिनों उपरांत वह ब्राह्मण पुनः धना के घर आया और धना से शालग्राम रूपी भगवान की पूजा के संबंध में पूछा कि क्या तुम बिना त्रुटि के भगवान की पूजा करते हो और यथासमय प्रसाद चढाते हो ? तब धना ने सारा वृत्तांत ब्राह्मण को कह सुनाया। उसने कहा- भगवान ने तीन-चार दिनों तक तो प्रसाद ग्रहण नहीं किया, पर जब मुझे भूखा देखा तो वे पसीज गए और अब मेरे भाते में से आधा प्रसाद वे कर लेते हैं तथा आधा मेरे लिए छोड़ देते हैं। आधा प्रसाद लेते हैं, इसलिए वे आधे दिन मेरी गायें भी चराते हैं। ब्राह्मण को बहुत देर तक कुछ समझ नहीं आया तो उसने कहा कि आज वह भी उसके साथ खेत चलेगा और भगवान को प्रसाद प्राप्त करते तथा गायें चराते देखेगा। धना की भक्ति रीति देखकर ब्राह्मण को अत्यधिक प्रसन्नता हुई। धना से ब्राह्मण को ज्ञान हुआ कि भगवान को कैसे पाया जाता है? अपने घर आकर उसने तन्मयता से भक्ति की और हरि के दर्शन प्राप्त किए। एक दिन भगवान ने प्रकट होकर धना से कहा कि हे धना! तुम साक्षी भाव से भक्ति करो, मेरी बात मानकर तुम काशी की ओर प्रयाण करो। वहां जाकर रामानंदजी को अपना गुरु बनाओ, उनके दर्शन से तुम्हें बड़ा आनंद प्राप्त होगा। धना ने भगवान की आज्ञा का पालन किया और रामानंद से दीक्षा प्राप्त की। विधिवत दीक्षा से उन्हें बड़ा आंनद प्राप्त हुआ, उनके दुख और द्वंद्व जाते रहे। रामानंद से दीक्षा प्राप्त करने पर उन्हें परम सौभाग्यशाली होने का अनुभव हुआ। कुछ दिन गुरु रामानंदजी के पास रुककर उनसे आज्ञा प्राप्त कर धना अपने गांव खेरीपुर लौट आए। दीक्षा प्रदान करने के दौरान रामानंद ने धना को गृहस्थी जानकर घर पर ही पूर्ववत भगवद् भजन करने की आज्ञा प्रदान की। उन्होंने धना से कहा कि, भगवान, गुरु और साधु में एक ही भाव रखना चाहिए, यही भक्ति की रीति है, इनके प्रति अन्य भाव न रखें। गृहस्थ में रहकर साधु सेवा करो और भूखे प्राणियों की अन्न से सेवा करो। धना ने अपने गुरु की उपरोक्त सीख को शिरोधार्य कर लिया। धना के घर में उनकी धर्मपत्नी भी धना की भांति ही उदार तथा पति की आज्ञा में चलने वाली सुशील नारी थी। उसकी भी भगवद् भाव में निष्ठा थी, अन्यान्य देव पूजा में उसकी कोई निष्ठा नहीं थी। सांसारिक कार्यों में उसका उदासी भाव था। वह किसी समता पुरुष से कम नहीं थी, घट-घट में आत्मराम का दर्शन करने वाली नारी थी। गृहस्थी में रहते हुए भी उसकी घर में आसक्ति नहीं थी, राह में फैली जल संपदा के प्रति राहगीर की कैसी प्रीति ? वैसे ही वह संसार के सुखों को समझती थी। जिस घर में ऐसी सुभार्या हो, उसमें किस बात की कमी । धना के घर का सारा द्रव्य परमात्मा के निमित्त ही था। गुरुकृपा से धना के सब सुख हो गए, वह घर में रहकर परमात्मा के ध्यान में मगन रहने लगा। परचीकार अंनतदास कहते हैं कि मैं आपको इस परची के माध्यम से भगवद् दास धना की गाथा सुना रहा हूं, इसे दत्तचित्त होकर प्रेमपूर्वक सुनें। मैं भी यह कथा भगवद् आज्ञा से ही आपको कह रहा हूं। अनंतदास कहते हैं- धनाजी महाराज धैर्य की प्रतिमूर्ति थे। अन्य किन्हीं वस्तुओं की बजाय उनकी प्रीति एकमात्र परमात्मा में ही थी। हर समय वे राम-राम की रटन लगाए रहते। असार बातों में उनका तनिक भी मन नहीं था। अपने मुख से वे कभी भी मिथ्या कथन नहीं करते। वह संपूर्ण रूप से अर्थात तन-मन-धन से सेवा को तत्पर रहते। भक्तवत्सल गोविंद के गुणगान में ही डूबा हुआ रहने लगा। एक दिन वह अपने खेत की ओर जा रहा था तभी रास्ते में भगवान ने दर्शन दिए। भगवान साधु रूप में थे। उन्होंने धना से कहा-सेवा में तुम्हारी बराबरी कोई नहीं कर सकता, तुमने बहुत संतों की सेवा की है। आज इस साधु को भी दूध, शक्कर, आटा, घृत देकर मनुष्य जन्म को सफल बनाओ। सेवा करने में तुम अग्रणी रहे हो, तुम्हारे द्वारे पर जो भी संत आए हैं, तुमने प्रीतिपूर्वक सब की यथायोग्य सेवा की है। धना कहने लगा-स्वामी मैं आपको पहचान गया, आप मेरे अंतर्यामी हैं। इस समय मैं खेत जाने के निमित्त रास्ते में हूं। वर्षा हो चुकी, इसलिए हल जोतने का कार्य करना है और मेरे पास आपने जो-जो सामग्री मांगी है, उसकी बजाय केवल बीज रूप में अन्न है। आप कृपा कर मेरे घर-द्वार को पवित्र कीजिए, वहां आपको अवश्य ही इच्छित भोजन प्राप्त होगा। सदैव ही संतसेवा को उद्यत रहने वाली मेरी घरनारी आपकी भली प्रकार सेवा करेगी। धना की इस बात पर वह वैरागी कहने लगा कि मैंने तो इस सत्य का पता लगाया है कि धना कभी भी साधुओं को किसी चीज के लिए मना नहीं करता है। तुम अपने सत्य पर अडिग नहीं हो। साधुओं की सेवा करने वाले होकर एक साधु को ना दे रहे हो ? तुम्हारे पास यह अन्न की जो पोटली है, वह दे दो, हम इससे भोजन प्राप्त कर लेंगे। धना को यह बात ठीक लगी, उसने आगा-पीछा सोचे बिना, बीज रूपी अन्न की वह पोटली पूरी प्रसन्नता के साथ साधु को सौंप दी। साधु के साथ अन्य साधुओं की टोली थी। प्रभु भक्त साधुजन गेहूं की पोटली लेकर रवाना हो गए और इधर धना खाली हाथ अपने खेत पहुंचा। परचीकार अनंतदास कहते हैं कि सेवा का भाव रखने वाला भक्त बडा ही श्रेष होता है. वह अपना सब कुछ दान कर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। धना को बीजविहीन देखकर उसके खेत का हाली उदास हो गया। उसने धना से कहा कि अब तुम गांव जाकर दूसरा बीज लाओ ताकि हल चलाएं। धना ने समझाया कि तुम तो बिना बीज के ही हल चलाओ, तुम्हारे हिस्से का अन्न तुम्हें प्राप्त होगा। इस बार हमारे पडौसी के जितना अन्न उपजे, उस हिसाब से तू अपने अन्न की भरपाई कर लेना। अब अन्न लेने गांव नहीं जाएंगे। तब हाली और धना एक-एक बैल से हल चलाने लगे। सायंकाल तक बिना बीज के पूरा खेत जोत डाला। सायंकाल को हाली अपने घर आया और धना की पूरी रामकहानी अपनी घरवाली को सुना डाली। उसने बताया कि हमारे मालिक धना ने अपना सारा बीज साधु-भक्तों को दे दिया और मेरे समेत उसने पूरे दिन खेत में बिना बीज के हल चलाया। गेहूं-चना तो थे ही नहीं, तब क्या डालते ! अपने पति से सारा हाल जानकर हाली की धर्मपत्नी क्रोधित हो गई। क्रोधवश वह गालियां बकने लगी। पति को कहने लगी-तू तो एकदम बावला है, अब तुम और तुम्हारा परिवार वर्ष भर क्या खाएगा, अपना गुजारा कैसे करेगा ? वह तो (धना) मोडा है (स्वामी / वैरागी) है, मांगकर गुजारा कर लेगा। हाली की पत्नी से ऐसी जली-कटी बातें जब धनाजी की धर्मपत्नी हरिदासी (अर्थात परमात्मा में मन लगाए रखने वाली) ने सुना तो वह उसे विश्वास दिलाने लगी- वह भक्त नारी बोली-हालण बाई, तुम मन में दृढ़ विश्वास रखो, तुम्हारे हिस्से का अन्न कहीं नहीं जाएगा। अगर तुझे मेरी बात पर विश्वास नहीं है, तो दो बैलों में से एक को बेचकर तुम्हें उसके मोल का अन्न दिलवा दूं। धनाजी ने एक गंभीर व्यक्ति की भांति समझाते हुए कहा कि व्यक्ति को क्रोधवश कभी भी कड़वी वाणी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। क्रोध, व्यक्ति के सोचने-समझने की बौद्धिक क्षमता का हरण कर लेता है। दस दिनों तक इस प्रसंग (बिना बीज हल चलाने) को गुप्त ही रखो। सारे संसार के भरण-पोषण का जिम्मा ठाकुरजी का होता है, उसकी लीला अपरंपार है, उसके किए हुए को देखो, बाकी सारा हिसाब-किताब बाद में करना। पांच दिनों के पश्चात एक दिन हाली खेत में गया तो उसके आश्चर्य का कोई आर-पार नहीं रहा, पूरे खेत में अनाज उग आया था, जबकि हल चलाते समय बीज तो डाला ही नहीं गया था। हाली के मन में आनंद छा गया। वह समझ गया कि यह कृपा भगवान ने अपने भक्त पर की है। हाली इस चमत्कार को मन में छुपाकर नहीं रख सका। उसने यह बात खेरीपुर गांव की चौपाल में हथाई कर रहे सब लोगों को बड़े आनंदित होकर बताई। उसने धनाजी की बड़ाई करते हुए कहा कि मेरे स्वामी की गति, मति और रति के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। परमात्मा के प्रति इनको दृढ़ विश्वास है। एक उच्च कोटि के भक्त जैसे ये ज्ञानी, ध्यानी और धैर्य की प्रतिमूर्ति हैं। परचीकार अनंतदास कहते हैं कि धना के मन में धैर्य का वास था और परमात्मा के प्रति गहन विश्वास था, तभी प्रभु ने उनकी आशा को फलित किया। चौपाल में हथाई कर रहे, उपस्थित जनों ने कहा कि हे हाली, तुम्हारे स्वामी धना की परमात्मा के प्रति ऐसी दृढ़ धारणा कैसे बनी ? तब हाली ने कहा- मेरी बात को विस्तार से सुनो-एक दिन प्रभात के समय मैं धनाजी के खेत में पहुंचा। मैं इस भक्त की उन समस्त बातों को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं, जो मेरी आंखों के सामने घटित हुईं। हम दोनों धना के खेत में हल चला रहे थे, किंतु हमने बीज भरकर रखा जाने वाला बीजिया ही नहीं बांध रखा था, इसलिए हमें मुट्ठी में अन्न लेकर बीजणी में डालने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। संपूर्ण दिन हमने बीज डाले विना सूखा हल ही चलाया। बीज के रूप में गेहूं अथवा चने का एक दाना भी नहीं डाला। लेकिन कैसा आश्चर्य, अब आज मैंने जाकर देखा तो उसी खेत में खूब फसल उग आई है। बिना बीज डाले, गेहूं-चने सुंदर ढंग से उग आए हैं। हाली की इस बात को जिसने भी सुना उसे बहुत अधिक मात्रा में आश्चर्य हुआ। भगवान की लीला को कोई नहीं जान सकता। अब हाली और उसकी धर्मपत्नी को धना के सामर्थ्य का बड़ा भय उत्पन्न हुआ। उन्होंने धना एवं उनकी धर्मपत्नी को जो अंट-संट बातें कुछ दिन पहले कह दी थी, उसका प्रायश्चित होने लगा। वे दोनों जाकर धना के पैरों में गिर पड़े। गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे- हमारे से बहुत बड़ी भूल हुई है, आप तो अंतर्यामी की भांति दयालु हैं, हमारी भूल की क्षमा प्रदान करें। तब धनाजी ने कहा- आपकी कोई त्रुटि अथवा भूल नहीं है। आप और मेरे भीतर एक ही परमात्मा तत्त्व रूप से विराजित हैं। तुम पति-पत्नी दोनों को एक निवेदन करना चाहता हूं, उसका जीवन में निर्वाह करो। जीवन में सेवा के व्रत को ग्रहण करो, सेवा हेतु कभी भी मन में संकोच न लाओ। भगवान के भक्त वैरागीजनों की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहो, हरिभक्तों के लिए सबकुछ लुटा कर जीवन सफल कर लो। तुम्हारे योगक्षेम की चिंता ठाकुरजी की है। धना के मुख से संतसेवा की महिमा सुनकर हाली दंपती का संशय भाग गया और वे दोनों साधुसंत की सेवा में लग गए। धना का हाली भी धना की ही जाति का अर्थात जाट था। हाली फिर खेत में आया और कृषि कार्य में लग गया। खेत में फसल को देखकर उसे बडी प्रसन्नता हई। पूरा खेत चारों कोनों तक भरपूर फसल से भरा हुआ था। धना के खेत में अन्य पडौसियों से दूगुना अन्न पैदा हुआ। सदकर्म हमेशा फलित होता है, वह कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। भगवान को सदकर्म ही प्रिय हैं। परचीकार अनंतदास कहते हैं कि धना की भक्ति सत्य पर टिकी हुई थी। उसका परमात्मा के पति निश्चय दृढ़ था और भक्तों के प्रति उसका सेवाभाव खरा था। जब इतनी बातें किसी के व्यक्तित्व में हो तो हरि उसका खेत क्यों नहीं निपजाए। उसके बाद एक आश्चर्य फिर हुआ। धना के खेत की चौफेर मेड़ (सींव) पर बहुत-सी तुंबडी की बेलें उग आई। सूख जाने पर ये तंबिया साधू-संतों के जल रखने के काम आती हैं। खेत की सुरक्षा के लिए जो बाड़ बनी हुई थी उस पर वे तुंबियों की बेलें छा गई। सुकाल का समय था, उन बेलों के बड़े-बड़े और सुंदर तुंबे लगे। धना भगत ने यह सोचकर कि भगवान ने साधु-संतों के काम में आने के लिए इतने सुंदर तुबे दिए हैं, इसलिए उन तुंबों को एकत्र कर लिया। संयोग से एक दिन उच्च कोटि के संतों की एक मंडली वहां आई। धना की निश्छल सेवा-भक्ति के कारण अक्सर ही संतों की मंडली वहां आया करती थी। संतों की इस मंडली को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ तथा अपने भाग्य की सराहना करने लगा-मेरे धन्य भाग हैं, स्वामी आप पधारे। दंडवत प्रणाम कर, संतों के पैरों को धोकर चरणामृत ग्रहण किया और कहा-हे संतजन, आपने मुझ पर अहेतुक कृपा कर दर्शन प्रदान किए हैं। सब संतों को उचित आसन देकर बैठाया गया, उसके पश्चात धना की पत्नी हरिदासी आई। उसने सब संतों के समक्ष बैठकर प्रणत भाव से बारी-बारी से प्रणाम किया और कहा कि आज हमारे सारे कार्य पूर्ण हुए अर्थात जन्म लेना सफल हुआ। थके हारे महात्माओं के चरण ऊष्ण जल से धोए। चरणों को धोकर उस जल का चरणामृत रूप आचमन किया। संतों ने जब पति-पत्नी के संतों के प्रति ऐसे उच्च भाव देखे तो उन्हें लगा कि यह सेवक दंपती बड़े विवेकी हैं। जितना सेवाभावी धना है, वैसी ही आज्ञाकारिणी उसकी धर्मपत्नी है। भगवद् विश्वास में आकंठ डूबी हुई। धनाजी अब साधुओं से भोजन तैयार करने की आज्ञा प्राप्त करते हैं। साधु कहते हैं, हां बिना विलंब किए रसोई तैयार करो। साधु कहते हैं, आज्ञा तो भगवान करते हैं। तुम्हारे घर में जो भी रसोई बनी हो, वह ले आओ। साधुओं के भोजन करने की जगह पर गोबर का चौका देकर पवित्र किया गया। जल के ताजा पात्र भरे गए, तब भक्त धना भोजन प्रसादी की सामग्री लेकर आया। आटा, घृत, मिठाई, खीर बनवाने के लिए चावल और दूध लेकर आया और कई प्रकार की तरकारी भी लाया। घर में गायें थीं, इसलिए दूध-दही की कोई कमी नहीं थी। अनंतदास परचीकार कहते हैं, साधु सेवा में जिसने अपना तन-मन-धन सर्वस्व लगा रखा हो ऐसे भक्त शिरोमणि को भगवद्याप्ति क्यों न हो। अनंतदास ऐसे भक्त की गाथा गाता है। संतों ने बड़े प्रेम से भोजन प्रसादी प्राप्त की तथा बाद में भगवङ्कथा सुनाने लगे। संतों के दर्शनार्थ नगर के नर और नारी आने लगे। प्रेमपूर्वक कथा-कीर्तन कर सत्संग की गई। सर्वत्र आनंद छा गया। तत्पश्चात धना ने संतों से निवेदन किया कि हमारे खेत में ये सुंदर तुंबे हुए हैं, आप लोग भेंट स्वरूप एक-एक तुंबे को ले जाइए। धना ने उन तुंबों को मंगवाया। इतने सुंदर तुंबे सभी साधुओं को मनभावन लगे। तुंबे हाथ में लेकर साधुओं ने कहा कि तुंबे तो हलके हुआ करते हैं, पर ये इतने भारी कैसे हैं। करौती मंगवा कर तुंबों का मुंह किया गया तो देखा, तुंबों के भीतर गेहूं भरे हुए थे। रामजी की इस माया को देखकर हर कोई अचंभे से भर गया। अब तो हर तुंबे का मुंह कर उसमें से गेहूं निकाले गए। तुंबों से निकाले गए गेहुंओं की एक बड़ी ढेरी लग गई। गेहूं तो साधुओं ने सारा धना भक्त को दे यिा और तुंबे वे ले गए। जितने कण भक्तों में बांटे गए, उतने मण खेती से प्राप्त किए। जब सब कृत्य परमात्मा के हों तब ऐसी बातों का आश्चर्य क्या ? वह परमात्मा अपने भक्तों के प्रति सदैव दयालु रहता है। उसने धना भक्त के खेत को निपजाया। कबीर के घर बालद लेकर आए। अपने हाथों नामदेव की छान छवाई तथा पीपाजी को द्वारिका के दर्शन करवाए। उदार परमात्मा ने सब संतों के कार्य पूरे किए और न जाने कितने पतितों का उद्धार किया। इस प्रकार इस परची के माध्यम से अनंतदास ने भक्तप्रवर धनाजी महाराज के यश का गायन किया है। वे कहते हैं, रामानंद के शिष्य की भक्तिमय महिमा अवर्णनीय है, वह कही नहीं जा सकती है। अनंतदास द्वारा रचित इस परची से धनाजी के भक्तिमय जीवन प्रसंगों पर सांगोपांग प्रकाश पड़ता है। यह कहा जा सकता है कि यह परची उनके भगवद् भक्त रूप को भली प्रकार उद्घाटित करती है।
अध्याय : चतुर्थ :- भक्त धनाजी की कथा
अध्याय : चतुर्थ - भक्त धनाजी की कथा श्रीमद् भागवत महापुराण में भक्त अम्बरीष के प्रसंग में भगवान कहते हैं कि मैं भक्तों के अधीन हं. स्वतंत्र नहीं हूं, मुझे मेरे भक्तजन अत्यधिक प्रिय हैं। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने शुद्ध प्रेम से श्रेष्ठ पति को वश में कर लेती है, उसी प्रकार मुझ में चित्त लगाने वाले सर्वत्र समदर्शी साधुजन भी अपनी शुद्ध भक्ति से मुझे अपने वश में कर लेते हैं। संत शिरोमणि धनाजी ऐसे ही भगवत्परायण भक्त थे। उन्हें बलि का अवतार बताया जाता है।' धनाजी जाट कुल में उत्पन्न हुए। उनके जन्मवर्ष के संबंध से सभी विद्वान एकमत लगते हैं। मैक्स आर्थर मैकालिफ कहते हैं - Dhanna, generally known as Dhanna Jat, is said to have been born in the year A.D. 1415. 2 स्वामी नारायणदास दादूपंथी का भी ऐसा ही कथन है, वे कहते हैं- "धनाजी का जन्म अनुमानतः वि. सं. 1472 (सन 1415) में राजस्थान के धुआं ग्राम में जाट जाति में हुआ।" धनावंश के विद्वान महंत उनके जन्मवर्ष के संबंध में कथन करते हैं-" श्री धनाजी का जन्म क. व. 4516, वि. सं. 1472, ईस्वी सन 1415, श. सं. 1337 के माह बदी 8 शनिवार वृश्चिक लग्न, पूर्वाषाढा नक्षत्र में जाट जाति में हुआ था।" 4 परशुराम चतुर्वेदी भी धनाजी के जन्म के संबंध में मैकालिफ के कथन को ही सही ठहराते हैं। पर वे धनाजी को रामानंद का समकालीन नहीं मानते। रामानंदी भगवद्दास धनाजी के जन्म वर्ष पर कोई आपत्ति नहीं करते, किंतु धनाजी की जन्मतिथि के संबंध में उनका कथन कुछ अलग है, जो इस श्लोक में इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है- वैशाखमासि बहुले च गिरौ तिथौ च,वारे शनावथ शिवेऽपि च वृश्चिके हि।आप्यां बलिर्बलवदिष्ट विरोधिरोधी,नाम्ना वभूव भुवि भव्यगुणो धनेशः ।। 6
वैशाख मास, कृष्णपक्ष, अष्टमी तिथि, शनिवार, पूर्वाषाढा नक्षत्र सुंदर वृश्चिक लग्न में बलवान इष्ट विरोधियों को निवारण करने वाले श्री बलिजी पृथ्वी पर सुंदर गुणों वाले धनेश श्री धना होकर प्रकट हुए। इस कथन में वे अगस्त्य संहिता का आधार लेते हैं। यह बात अलग है कि अगस्त्य संहिता को कुछ विद्वान प्रामाणिक ग्रंथ नहीं मानते। भगवद्दासजी ने अपने श्लोक में धनाजी के लिए 'धनेश' शब्द प्रयुक्त किया है। रामानंदजी के अधिकांश शिष्यों तथा स्वयं रामानंदजी के जन्मवर्ष को लेकर मतभिन्नता बहुत अधिक रही है, किंतु धनाजी के जन्मवर्ष को लेकर मतैक्य कहा जा सकता है। डॉ. गोविंद त्रिगुणायत कहते हैं कि, "रामानंद के शिष्यों में धना साहब का स्थान भी ऊंचा है। यह जाति के जाट थे। इनका जन्मकाल संवत 1472 के आस-पास निश्चित किया जाता है।"" इसी मत को समर्थन देते हैं, डॉ. विक्रमसिंह राठौड़, 8 डॉ. अनिल जैन तथा डॉ. धर्मपाल मैनी 10 तथा अन्य कई विद्वान भी। रैवासा पीठाधीश्वर अग्रदेवाचार्य की 'अग्र ग्रंथावली' के संपादक गणेशदास भक्तमाली धनाजी की जन्मतिथि वैशाख कृष्णा अष्टमी को मानते हैं। किंतु धनावंश संप्रदाय में लगभग एक शताब्दी से धनाजी की जन्मतिथि माघ कृष्णा अष्टमी को मनाई जाती रही है। वस्तुतः धनावंश के गोवर्धननाथ मंदिर, जोधपुर के महंत बदरीदास गोलिया, अपने गुरु हरिदासजी गोलिया के द्वारा वि. सं. 1990 में लिखी पुस्तक का हवाला देते हैं तथा स्वयं बदरीदासजी ने भी भक्त शिरोमणि धनाजी पर पर्याप्त अनुसंधान किया था। उन्होंने स्वयं धनाजी पर दो पुस्तकों का लेखन किया। दोनों ही पुस्तकों में वे धनाजी की जन्मतिथि माघ वदी अष्टमी का ही उल्लेख करते हैं। रामानंद संप्रदाय की आचार्यपीठ- श्रीमठ, पंच गंगा, वाराणसी ने बदरीदासजी की पुस्तक 'भक्त शिरोमणि धना' का प्रकाशन किया है, इसलिए गोलियाजी द्वारा उल्लेखित तिथि का खास महत्त्व है। इससे पूर्व बदरीदासजी ने बहुत पहले एक अन्य पुस्तक 'भगवद्भक्त श्री धन्नाजी की जीवनी' की रचना की। उसमें आप धनाजी का परिचय प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि धनाजी का जन्म माह बदी अष्टमी, शनिवार को वृश्चिक लग्न पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र की प्रभात वेला में जाट जाति में पिता नगराज माता गंगाबाई (पिता का गोत्र घेतरवाल तथा माता का गोत्र गढवाल) के घर हुआ था। उनके गांव का नाम खेरीपर था जो आजकल धुआ कलां के नाम से जाना जाता है।" धनाजी के माता-पिता के कुछ अन्य नाम भी प्रचलित हैं, किंतु हम यहां अनुसंधान प्रवृत्ति के महंत बदरीदासजी द्वारा उल्लिखित नामों को ही प्रधानता देंगे। धेतरवाल गोत्र (जाति नख) के जाट धनाजी के टाँक क्षेत्र में रहे हैं और कुछ लोगों का मानना रहा है कि धनाजी के पूर्वज चूरू, नागौर अंचल से ही टाँक क्षेत्र में गए थे। मैकालिफ धनाजी का गांव धुआं बताते हुए कहते हैं - Hi lived in the village of Dhuan in Tonk territory. धार्मिक संतों एवं पंथ-संप्रदायों के इतिहास लेखन करने वाले विद्वान ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल कहते हैं कि "मैकालिफ ने अपनी पुस्तक 'द सिख रिलीजन में धनाजी विषयक जानकारी का स्रोत नहीं लिखा है।" 12 जबकि मैकालिफ धनाजी विषयक जानकारी प्राप्त करने का स्रोत बताते हुए लिखते हैं कि उन्हें यह जानकारी देवली (धुआं कलां) तहसील के मजिस्ट्रेट कर्नल ई.आर. पेनरोज ने प्रदान की। 13 धुआं कला के पूर्व नाम खेरीपुर, खीरपुर, खेरागढ़ अलग-अलग विद्वानों ने धनाजी के प्रसंग में लिखे हैं। यह मानना चाहिए कि यह एक ही गांव के नाम हैं। इस संबंध में हमें अधिक कष्ट कल्पना नहीं करनी चाहिए। धना के भक्तिमय प्रसंगों में जिस खेत की चर्चा की जाती है, वह धुआं कलां के निकट आज भी है और धनाजी का मंदिर, उनका पारंपरिक कुआं भी उसी खेत में है। मैकालिफ तो यहां तक वर्णन करते हैं कि उन्हें ब्राह्मण के द्वारा जो शालिग्राम प्राप्त हुआ था, वह भी उनके मंदिर में मौजूद है। धना भगत के इस खेत को धना भगत का खेत या 'धना भगत की पाटी' कहा जाता है। अब खेत के निकट सिख पंथ द्वारा निर्मित धनाजी का गुरुद्वारा भी अवस्थित है। विगत वर्षों में राजस्थान सरकार ने यहां पैनोरमा का निर्माण करवाया है तथा धनावंशी स्वामी समाज ने अपने पंथ प्रवर्तक के मंदिर के निकट एक सुंदर सत्संग भवन का निर्माण कराया है। इस मंदिर, गुरुद्वारे तथा ऐतिहासिक खेत के दर्शन करने के लिए वर्ष में हजारों श्रद्धालु आते रहते हैं। सैकड़ों वर्षों से जन सामान्य में यह मान्यता रही है कि धनाजी के खेत की मिट्टी फसल को नीरोगता प्रदान करती है, इसलिए किसान लोग बड़ी श्रद्धा से धनाजी के खेत की मिट्टी अपने साथ ले जाते हैं और फसल में किसी प्रकार का रोग आने पर इस मिट्टी काफसल पर छिडकाव किया जाता है। धनाजी के इस खेत से संबंधित अनेक चमत्कार ग्रंथों तथा जन सामान्य की किंवदंतियों में प्रचलित रहे हैं। धनाजी का ननिहाल फागी (जयपुर) के निकट चौरू गांव के गढवाल गोत्रीय जाट परिवार में था। चौरू गांव में भी धनाजी के ध्यान, भक्ति तथा गोधन चारण के अनेक प्रसंग प्रचलित रहे हैं। आज भी इस गांव के निकट स्थित नाडी, धूणा को धनाजी से संबंधित बताया जाता है। गांव के उदार तथा धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों ने चौरू में धनाजी के भव्य मंदिर का निर्माण हाल ही में करवाया है। धनाजी के जातीय नख के संबंध में कुछ लोग यह मानते हैं कि वे हरचतवाल थे, जबकि ऐसा सही नहीं है। धनाजी का धर्म अनुप्राणित परिवार धनाजी के पिता नगराजजी तथा मां गंगाबाई में धार्मिक संस्कारों का बाहुल्य था। थे तो वे सद्गृहस्थ, पर मन उनका संत सेवा तथा परमात्म भक्ति में लगता था। पति-पत्नी दोनों स्वभाव से अंतर्मुखी थे, उनकी अंतरात्मा में सदैव भगवद्भाव रहता। उनका घर तीर्थराज के समान था। मैकालिफ सहित अन्यान्य विद्वानों का मानना है कि घर के भक्तिमय वातावरण के कारण ही धना की मति भक्तिमय बन पाई। बाल्यकाल में ही उसकी प्रतिभा को अध्यात्म का आलंबन प्राप्त हो गया। अध्यात्म विद्या के प्रकांड विद्वान हनुमानप्रसादजी पोद्दार का कथन है कि, "छोटी अवस्था में ही इनके हृदय में प्रेमबीज अंकुरित हो उठा था और वह संत सुधा समागम से जीवनी शक्ति भी पा चुका था। धनाजी के पिता खेती का काम करते थे। पढ़े-लिखे न होने पर भी उनका हृदय सरल और श्रद्धासंपन्न था। वे यथाशक्ति संत महात्मा और भक्तों की सेवा करते थे।" कृषि और गोपालन से जो भी उपार्जन होता, उसे वे लोक कल्याण के धार्मिक कार्यों में व्यय किया करते। धनाजी की माता गंगादेवी अपने घर की दीवारों पर गेरू से भगवान के चित्र बनाती तो धनाजी उन्हें बहुत गौर से देखा करते तथा मन हो मन उन चित्रों से बतियाते। पांच वर्ष की बाल अवस्था में वे भगवान के प्रसंगों को सुनकर तन्मय हो जाया करते। उनकी इस मनोवृत्ति से नगराज दंपती को भारी प्रसन्नता होती. वे अपने पत्र में किसी बड़े संत के चिह्न देख रहे थे। रामस्नेही दयालदास धनाजी की बाल भक्ति के संबंध में अपने काव्यमय उद्गार प्रकट करते हुए कहते हैं-बालपणो दिढ प्रीत, सेव भगवद अनुरागी। परसापरस सुप्रीत, दरस परसण बड़भागी ।। 15 संस्कारवश बाल्यकाल में ही भगवद्प्रेम का बीजांकुर धनाजी में हो गया। घर पर आने वाले संत-महात्मा भी सदैव भगवप्रेम के ही प्रसंग कहा करते। नन्हा बालक उन प्रसंगों तथा भजन-वाणियों को बडे भाव तथा गौर से सुना करता। बालकों में अनुकरण की प्रवृत्ति बहुत अधिक हुआ करती है। नन्हीं बालवय का एक प्रसंग बहुत अधिक प्रसिद्ध रहा है। सभी भक्तमालों में इस प्रसंग को अपने-अपने ढंग से विवेचित किया गया है। धनाजी का घर एक सत्संगी का घर था, इसलिए साधु-संत-महात्मा और पंडितजन साधिकार वहां आया-जाया करते थे। त्रिलोचन नामक पंडित को नगराज अपना घरेलु पंडित समझते थे। नैमितिक पूजा पाठ कर गृहस्थी का संचालन करने वाला त्रिलोचन अपने यजमान के घर चार-छह माह से आया करता था। इस बार त्रिलोचन घर आए तो उनके धार्मिक क्रियाकलापों को बालक धना ने बड़े गौर से देखा। त्रिलोचन स्वच्छता का बड़ा ध्यान रखा करते थे। स्वयं ही कुएं से पानी खींचकर उससे नहाते और शालग्राम को नहलाने के लिए पंचपात्र भरकर ले आते। त्रिलोचन ने बड़े प्रेम से अपने पास विग्रह रूप रखे शालग्राम को मलमलकर नहलाया। बाद में चंदन लगाकर, मस्तक पर तुलसी को रखा। षोडशोपचार से पूरी पूजा की। बालक धना के लिए ये सभी क्रियाकलाप बड़े कौतुहलपूर्ण थे। भगवद् पूजा के बाद त्रिलोचन ने घर में से आए हुए भोजन का भी प्रथम भोग ठाकुरजी (शालग्राम) को लगाया और तदुपरांत स्वयं ने प्रसाद प्राप्त किया। बड़े शालीन से शालग्राम धना को बड़े मनभावन लगे। छह-सात वर्षीय धना ने देखा कि भगवान की पूजा करना कोई कठिन काम नहीं है। उसने साहस कर पंडित त्रिलोचन से कहा- बाबा, मुझे भी भगवान की पूजा करनी है, इस पर पंडित ने कुछ अधिक गौर न करते हुए कहा कि हां बेटा, भगवान की पूजा तो सभी को करनी चाहिए। बालक धना ने और अधिक स्पष्टता से पंडित त्रिलोचन के शालग्राम की ओर इशारा करते हुए कहा- मुझे भगवान की यह मूर्ति चाहिए। मैं भी आपकी तरह इसकी पूजा करूंगा। बालक की बात सुनकर पंडित पशोपेश में पड़ गया। यजमान का सुपुत्र है और मूर्ति की मांग की है, पंडत ने कुछ विचार कर अपने झोले से वैसे ही एक दूसरे शालग्राम को निकालकर धना को देते हुए कहा-अगर रोजाना मन से पूजा नहीं करोगे तो ठाकुरजी नाराज हो जाएंगे। बालक ने शीघ्रता से हां भरते हुए कहा- मैं ठाकुरजी को आपसे अधिक सुख से रखूंगा। 'धनै सेविया बाल बुधि' बाल बुद्धि का अनुराग सर्वाधिक निर्मल, निश्छल हुआ करता है। ध्रुव ने भी इसी अबोध अवस्था में परमात्मा को प्राप्त कियाथा। शालग्राम मूर्ति पाकर धना का हृदय पुलकित हो गया। पांडित्य का प्रदर्शन करते पंडित त्रिलोचन ने पूजा की सभी विधियां पंचोपचार, दशोपचार, षोडशोपचार बता डाली।" गुरु गोविंदसिंह तो मानते हैं कि त्रिलोचन की नन्हे धना से मित्रता ही हो गई, इसलिए वह अपने बालमित्र को पूजा की सारी विधियां बताता है। धना पंडित द्वारा की गई पूजा को बड़े मनोयोग से देखा करता था। उसे पंडित की किसी भी बात पर अभरोसा नहीं था। पंडित से ठाकुर को प्राप्त कर धना ने उसे अपनी छाती से लगा लिया। धना को लगा जैसे उसके भीतर आनंद की लहर दौड़ गई है। असीम आनंद से उसकी आंखें मुंद गई। पंडित बालक के इस प्रेम को अनुभव कर रहे थे। बड़े प्रेम से समझा रहे थे, ठाकुर को रोज नहलाना, टीका लगाना, टीका लगाने से ठाकुर बहुत प्रसन्न होते हैं। ठाकुर को तुलसी समर्पित करना, और हां, ठाकुर के भोग लगाने से पहले स्वयं कुछ न खाना। धना सोच रहा था, ये सब बातें कौन कठिन है। अब ठाकुर मिल गए हैं तो सब-कुछ करूंगा। अनुराग दृष्टि डालकर पंडित त्रिलोचन उसी दिन दूसरे गांव चले गए। उस दिन की पूजा तो पंडित कर गए थे, अगले दिन की जिम्मेदारी धना की थी। गांव के निकट ही धना का खेत था, अपने कुछ बड़े बाल सखाओं के साथ सात वर्षीय धना भी गायें चराने अपने खेत चले जाया करते थे। धना ने बड़े चाव से अपनी पांवरी (थैला) में ठाकुरजी को विराजित किया और खेत में चला गया। वहां पहुंचकर बड़े मनायोग से एक थाली में बैठाकर ठाकुरजी को मलमलकर नहलाया। नहलाने के बाद बहुत कोमलता से ठाकुरजी के बदन को पौंछा और उनके टीका लगाया। पंडित की ही भांति धूप खेआ। चूरमें का पींडिया तो मां ने साथ भेजा ही था। अब धने को भी कुछ-कुछ भूख लगने लगी थी। एक पेड़ की जड़ में एक छोटा पत्थर रखकर धना ने ठाकुरजी को उस पर पधरा दिया और वह चूरमें का पूरा पींडिया ही उनके आगे धर दिया। अब वह प्रतीक्षा करने लगा कि ठाकुर भोग लगा ले तो बचा हुआ पींडिया वह भी खा ले। धना थोड़ी-थोड़ी दूर पर टहलकर आए और देखे कि ठाकुरजी भोग लगा रहे हैं क्या ? बहुत इंतजार के पश्चात भी उसे निराशा ही हाथ लगी। ठाकुर ने एक कण का भी भोग नहीं लगाया। धना सोच में पड़ गया, ठाकुर भोग क्यों नहीं लगा रहे, जबकि उसने पंडित की ही भांति ठाकुर को प्रातः जगाया, अपनी ही कुंड के अछूते पानी से नहलाया था। गेरु का टीका लगाकर तुलसीदल भी चढ़ाया था। किसी कार्य मेंत्रुटि नजर नहीं आ रही. फिर भोग नहीं लगा रहे हैं। याद आया, पंडित ने कुछ देर तक अपने अंगोछे का पर्दा किया था। ठाकुरजी अंगोछे के पीछे भोग लगाते हैं, सबके देखते भोग नहीं लेते। अब युक्ति समझ में आ गई। धना ने अपने थैले से अंगोछे को निकाला तथा चूरमा और शालग्राम विग्रह पर डाल दिया। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद धना को विश्वास हो गया कि अब तक तो ठाकुर ने अवश्य ही भोग लगा लिया होगा। छोटे से ठाकुर हैं, थोड़े से पेट भर जाता होगा। बचे हुए प्रसाद का भोग मैं लगाऊंगा। नन्हे बालक ने आतुर भाव से जितनी देर में व्यक्ति भोजन करले, उतनी देर तक प्रतीक्षा की। इस प्रतीक्षा के बाद उसे लगा कि अब तक तो ठाकुरजी ने अवश्य भोग लगा लिया होगा तो उन्होंने धीरे से अपने अंगोछे को शालग्रामजी तथा उनके समक्ष रखे चूरमें पर से हटाया, पर यह देखकर कि अब तक ठाकुरजी ने एक कौर भी ग्रहण नहीं किया है, वह उदास हो गया और सोच में पड़ गया कि ठाकुर प्रसाद क्यों नहीं ग्रहण कर रहे हैं, मुझ से कहां त्रुटि हो रही है? पंडित त्रिलोचन की झोली में शंख भी था और उन्होंने घर पर पूजा के दौरान शंख-ध्वनि की थी। शंख में भरकर जल का अर्घ्य भी दिया था। कल घर से वह शंख भी लाएगा, आज तो भूल हो गई। त्रिलोचन ने ठीक कहा था, भगवान की पूजा ठीक प्रकार से करना। उससे कहीं न कहीं तो भूल हो ही रही है। पंडित ने कहा था, ठाकुरजी को भोग लगाने से पहले प्रसाद मत ग्रहण करना। इसलिए ठाकुर से पहले प्रसाद कैसे प्राप्त करलूं। यह प्रसाद तो अब इनके आगे ही चढ़ा रहेगा। विचारों एवं संकल्प-विकल्प में डूबे रहे धनाजी। भगवान को मनाने के जितने उपाय ध्यान में आ रहे थे, सब किए। खुद को धिक्कारने लगे, ठाकुरजी को भूखा रखा जाता है क्या ? अगले गांव गए हुए पंडितजी, पुनः यहां आएंगे तो उनको क्या जवाब दूंगा ? बेबसी में धनाजी की आंखों में आंसू आ गए। भगवान ने नहीं खाया तो वे कैसे खा सकते थे। वे भूखे-प्यासे शाम को घर लौटे तो मां ने उनका उतरा हुआ चेहरा देखकर चिंता प्रकट की। सिर पर हाथ फेरकर पूछा- बेटा क्या हुआ?धनाजी चुपचाप शून्य में घूरते रहे। मां ने अधिक जोर देकर पूछा तो रो पड़े। रोते-रोते ही बताया कि मां, मैं पूरे दिन ठाकुरजी के भोग लगाने की प्रतीक्षा करता रहा, पर वे तो मेरे से रूठे हुए ही रहे, चूरमें का एक कोर भी नहीं खाया। सायंकाल को मैं उस चूरमें को चींटियों को डाल आया हूं, अब तुम ही बताओ, ठाकुर को भोग लगाए बिना में कैसे ग्रहण कर सकता हूं। चिंता के मारे मेरी भूख-प्यास ही गायब हो चुकी है। सच कहता हूं मां, जब तक ठाकुरजी प्रसाद नहीं ग्रहण करेंगे, मैं भी भोजन नहीं करूंगा। अबोध बालक धना की प्रतिज्ञा सुनकर मां का हृदय व्याकुल-सा हो गया। वह सोचने लगी- इतना छोटा बालक पूरे दिन भूखा कैसे रहा होगा। इस तरह से तो यह बीमार ही पड जाएगा। मां झट से गाय का दूध लेकर आई और बोली- तुम यह दूध पी जाओ, ठाकुर को उलाहना देंगे। बालक ने आंखें तरेरकर कहा- मां मैं यह दूध भी कैसे ग्रहण कर सकता है, यह रहे मेरी झोली में ठाकुर, तुम पहले इन्हें पिला दो, फिर मैं भी पी लूंगा। भगवान में गहन विश्वास तो मां का भी कम नहीं था, पर उन्हें यह स्पष्ट पता था कि शालग्रामजी तो दूध पीने से रहे। भगवान तो भाव के भूखे होते हैं, उन्हें तो सूक्ष्म रूप से भोग लगाया जाता है, वे भौतिक रूप में उपस्थित होकर वस्तुओं को कब ग्रहण करते हैं? मां ने हथेली के मध्य भाग में थोड़ा-सा दूध लेकर उसे अग्नि में छोड़कर कहा-देखो भगवान ने भोग ले लिया। हम भगवान के धूपिये पर ही भोज्य सामग्री भगवान को चढ़ाते हैं। अग्नि भगवान का मुख होती है, उसमें कोई भी वस्तु चढ़ाने पर वह भगवान को स्वमेव प्राप्त हो जाती है। धनाजी ने कहा- मां, भगवान होते हैं न ? मां मना कैसे करती, उसने कहा-हां बेटा, भगवान होते हैं और सब जगह उन्हीं की सत्ता है। धना ने कहा- मां, वही तो... भगवान होते हैं, फिर मेरे से भोग ग्रहण नहीं किया, यही तो सोच की बात है। जरूर वे मेरे से रूठे हुए हैं, पर मैं भी अपने भगवान का भक्त हूं, उन्हें मनाकर ही मानूंगा। मां, मैं भगवान को खिलाकर ही कुछ खाऊंगा। माता-पिता ने अधिक जिद्द की तो धना रोने लगा। प्रातः गायें चराने का समय हुआ तो वह अपने नित्यकर्म कर खेत जाने को तैयार था। मां ने चूरमें एवं रोटी का भाता देते हुए कहा-बेटा, ज्यादा जिद मत करना, भगवान को अर्पण कर भोजन कर लेना, भूखा मत रहना, तुमने कल पूरे दिन कुछ नहीं खाया। धना ने सिर हिलाया और गायों के पीछे-पीछे रवाना हो गया। खेत में पहुंचकर उसने बड़े अनुराग से भगवान को थैले से निकालकर नहलाया, श्रृंगार किया, उन्हें वृक्ष के नीचे कल के स्थान पर ही विराजित किया। थोड़ी देर में भोजन का वक्त हुआ तो धना ने आज पहले शंखध्वनि कर भगवान का आह्वान किया। शंख को धोकर उसमें जल भरा, अर्घ्य देकर फिर आह्वान किया, आज तो आ जाओ ठाकुरजी, आकर भोग लगाओ ! धना ने कल की भांति पंचपात्र में भरकर पानी रखा। चरम का लड्डू एक पात्र में रखकर ठाकुरजी के आगे धर दिया और कहा- ठाकुरजी, अगर आपको अधिक भूख लगी है तो अधिकांश खा जाना, मेरे लिए तो थोडा-सा छोड देना। आज अंगोछा भी ऊपर नहीं डाला। कहा- मेरे अलावा यहां कौन देख रहा है. आपको भोग लगाते, मेरे सामने ही प्रसाद पाओ भगवन। वह हाथ जोड़कर सामने बैठ गया। दो घंटे तक प्रतीक्षा की, भगवान नहीं आए तो स्वतः ही आंखों से आंसू बह चले, कहां हो भगवान ? मां तो कहती है, आप सब जगह रहते हैं। फिर क्यूं नहीं आ रहे ? क्यूं नहीं आ रहे, क्यूं नहीं आ रहे कि रटन लगाते-लगाते धना शिथिल हो गया और वहीं सो गया और सोने से उसकी आंख लग गई। वह मुश्किल में आधी घड़ी सोया होगा कि उसने देखा, कोई बहुत प्यार से उसका सिर गोदी में लिए उसे थपकाकर जगा रहा है-उठो, मेरे भक्त धना, लो मैं तुम्हारा भोग प्राप्त करने आ गया। धना ने आंख खोली तो देखा, गोपाल उन्हें मीठी नजरों से निहार रहे हैं, उनके बदन से निकलती नीली ज्योति से उसकी आंखें चुधियाने लगीं। वह भगवद्रस्पर्श से आनंद के अतिरेक में डूब गया। उठो, मैं तुम्हारा लगाया भोग प्राप्त करता हूं, यह कहकर भगवान चूरमें का प्रसाद लेने लगे और कहा-धना, मैं आज धन्य हो गया, कितनी बड़ाई की बात है कि मेरे तुम्हारे जैसे निर्मल, निष्कामी, निष्कलुश भक्त हैं, तुम्हारे इस चूरमें में जैसा मीठास है, वैसा तो छप्पन भोग में भी कहां होता है ? वे बहुत रुच-रुचकर चूरमें को खा रहे थे। हर्ष से धना की आंखों से आंसू बह रहे थे। भगवान ने धना को अपनी गोदी में बैठाया और उसी चूरमें में से कुछ कौर अपने हाथ से धना को खिलाए। अपने घर के बने चूरमें में आज जो विलक्षण स्वाद था, वैसा तो कभी नहीं लगा। भगवान ने पुचकारकर कहा-धना, अब मैं तुम्हें कष्ट नहीं दूंगा, तुम्हारे पुकारते ही प्रसाद ग्रहण कर लिया करूंगा। धना यही तो चाहता था कि ठाकुरजी के भोग लगाते ही वे आकर उसे ग्रहण कर लेवें। धना विह्वल होकर ठाकुरजी को निहारने लगा। अब वे उसके सिर पर हाथ रखकर बोले- अच्छा मेरे नन्हे भक्त, अब मैं चलता हूं। धना ने हां में सिर हिलाया तो भगवान अंतर्धान हो गए। धना ने शालग्राम को उठाकर अपनी छाती से लगा लिया और बहुत देर तक इसी तरह से संज्ञाशून्य-सा बैठा रहा। वह भगवान के प्रेम से निहाल हो गया। ठाकुरजी तो एकदम मां की तरह प्रेम करते हैं। कितना अपनापन और दुलार था उनकी बातों में, अपने हाथों से मुझे प्रसाद कराया। ऐसी तृप्ति तो कभी नहीं हुई। वह खेत में दूर तक देखने लगा- भगवान कहां गए फिर खुद ही मुस्कुराकर सोचने लगा, भगवान कहीं नहीं जाते, वे तो सभी जगह रहते हैं। घर जाने पर मां ने देखा, आज धना काफी प्रफुल्लित-सा था। मां ने सबसे पहले यही पूछा- बेटा, तुमने प्रसाद कर लिया था न ? धना ने हुलसकर कहा-हां मां, हमेशा भूखा नहीं रहने देते ठाकुरजी, आज हम दोनों ने आधा-आधा प्रसाद कर लिया था। मां को तो इस बात से खुशी हई कि आज उसके लाडले ने भोजन कर लिया, कल भी खामख्वाह भूखा रहा, अभी उसकी आयु उपवास करने की कहां है? मां ने देखा, बच्चा है. कल उसके मस्तिष्क में कुछ बात थी और आज कुछ और तो कोई बात नहीं. किसी भी बहाने से करे पर भोजन कर लिया तब ठीक है। मां ने धना की बातों पर कोई गौर नहीं किया। मां क्यों सोचती कि भगवान साक्षात् उपस्थित होकर प्रसाद लेकर गए हैं, वह तो इसे बच्चों का मनोविनोद समझ रही थी। भक्तमाल की भक्तिरस बोधिनी टीका करने वाले संत प्रियादासजी इस प्रसंग में ठीक ही कहते हैं-छाक नित आवै नीकै भोग को लगावै जोई छोड़ै सोई पावैं, प्रीति रीति कछु न्यारियै ।।" भक्त और भगवान की इस विलक्षण प्रेम-रीति को न जाने कितने भक्त चरित्रों में बखाना गया है। अब धना भगवान को प्रतिदिन भोग लगाए और वे प्रत्यक्ष उपस्थित होकर उसको प्राप्त करते। भगवान अपने भक्तों के संग ऐसी मैत्री करते रहे हैं। पूरे जीवन धना ने भगवान के साथ मैत्री भक्ति के संबंध रखे। प्रियादासजी का कथन है कि एक दिन भगवान ने धनाजी को यह प्रस्ताव दिया कि 'जाकौ कोऊ खाय ताकी टहल बनाय करै।' अर्थात कोई किसी का रोज अन्न खाए और वह उसका कार्य नहीं करे, यह तो युक्तिसंगत बात नहीं है। तुम मुझे बड़े प्रेम से चूरमा खिलाते हो, बदले में मैं तुम्हारी गायें चरा दिया करूंगा। खेती के समय तुम्हारे पिताजी खेत में काम करने के लिए हाली रखते ही हैं, तुम मुझे अपना हाली जानो। धना को यह बात ठीक तो नहीं लगी, पर उसे भगवान का रोज आना, बहुत रुचता था, जितनी देर भगवान उसके पास रहते उसे असीम आनंद की प्राप्ति होती। इसलिए उसने इस बात की हामी भरली। धना देखते, भगवान बड़े प्यार से गौचारण करते, उनके कारण गायें भी उन्माद में रहतीं। वे अब अधिक दूध देने लगीं। मां को बड़ा आश्चर्य होता कि वे आजकल इतना अधिक दूध कैसे देने लगी हैं। धना से कारण पूछा तो उसने कहा- मां आजकल गायों को भगवान जो चराते हैं, दूध तो अधिक होना ही है। मां ने सोचा-सब गायों को भगवान ही तो चराते हैं, उनके बिना इस संसार में है ही क्या? सरल स्वभाव की गंगादेवी बातों को अधिक खोदती नहीं थी। बहुत दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। एक दिन पंडित त्रिलोचन फिर घूमते-घामते खेरीपुर (धुआं कलां) में आ निकले। पंडित ने घर में देखा, वह जो शालग्राम शिला देकर गया था उसके पूजन का कहीं कोई स्थान नियत नहीं किया गया था। उसने धना को लगभग डांटते से कहा- भगवान की मूर्ति देकर गया था, क्या उसकी पूजा नहीं करते हो? धना ने कहा-काहे नहीं करते हैं, महाराज, ये रहे भगवान झोले में, हम रोज इन्हें अपने खेत ले जाते हैं, रोज नहलाते हैं, टीका, तुलसी करते हैं, फिर भोग लगाते हैं हो न ? पंडित ने कहा- यह तो अच्छा है, पर तुम भोग लगाने के बाद ही प्रसाद लेतेबालक धना कहने लगे- हां महाराज, अब तो भोग रोजाना हम दोनों साथ-साथ ही करते हैं। उनके हाथ लगा देने से भोग बहुत रसीला हो जाता है। आधा वे खाते हैं, आधा मैं पाता हूं। पंडित को बालक की बात कुछ समझ में नहीं आई। तब धना ने हुलसकर स्पष्ट किया कि पहले दिन तो ठाकुर ने भोग नहीं प्राप्त किया। मेरी विनती पर ध्यान ही नहीं दिया, पर दूसरे दिन बालक की विनती पर उनको दया आ गई, मैं तो दो दिनों का भूखा-प्यासा सो गया था, उन्हीं ने आकर जगाया और भोग प्राप्त किया। अब वे मुझे जरा भी कष्ट नहीं देते, उलटे गायें चराकर मेरा सहयोग करने लगे हैं। पंडित ने पूछा-धना, तुम किसकी बात कर रहे हो ? हलका-सा झुंझलाकर धना ने कहा- दूजे की बात मैं क्यों करूंगा, मैं तो अपने ठाकुरजी की ही कहूंगा न, आप देकर गए हैं तो मैं इनको भूखा रखूंगा क्या ?धना ने बहुत स्नेह से अपने शालग्राम की ओर देखा- "मेरे सखा हैं, ये ठाकुरजी।" सिर चकरा गया पंडित त्रिलोचन का। कितना पूजापाठ करते हैं, पर ठाकुर पास बैठकर कब भोग लेते हैं। उसने अभरोसे से कहा- ठाकुर तुम्हारी गायें चराते हैं ? "हाओ, रोज ही।" बालक धना ने अल्हड़पन से कहा तो बहुत देर तक पंडित त्रिलोचन की बोलती बंद हो गई। धना ने पंडित को झंझोड़कर कहा- "कल खेत आ जाना, मैं तुम्हें गोपाल से मिला दूंगा, वे बहुत अच्छे हैं।" पंडित के लिए रात्रि निकालना मुश्किल हो गया। वह मुंहअंधेरे ही नहा-धोकर तैयार हो गया। जल्दी-जल्दी में पूजा-पाठ किए और प्रतीक्षा करने लगा कि कब धना खेत की ओर चले तो वह उसके साथ जाए और ठाकुरजी के प्रत्यक्ष दर्शन करे। पंडित की उतावल को भांपकर धना ने कहा कि आप भाते वक्त (पूर्वाह्न) के बाद ही खेत पधारें, ठाकुर तो भोग लगाने के समय ही पधारते हैं। बाद में वे गायें चराते हैं, आप उन्हें गायें चराते हुए देख लेना। पंडित तो ठाकुर के शीघ्र दर्शन करना चाहता था किंतु वह बालक की युक्तिपूर्ण बात को भी कैसे टालते। बालक के बताए समय पर त्रिलोचन खेत में पहुंचे। उन्होंने देखा, बालक धना शांत भाव से एक पेड़ के नीचे बैठे हैं। अकेले हैं, भगवान तो नहीं हैं। शीघ्रता से पास पहुंचकर पूछा-धना, भगवानजी कहां हैं? बालक धना ने खेत के एक कोने में जहां गायें चर रही थीं, उस ओर हाथ का इशारा कर कहा- देख नहीं रहे, नीलमणि एक गाय के शरीर पर हाथ फेर रहे हैं। पंडित त्रिलोचन आंख फाड़-फाड़कर देखने लगा, उसे तो कोई नजर नहीं आ रहा था। उसने शीघ्रता से कहा- धना, तुम्हारी गायें तो स्वतः ही चर रही है, उनके पास तो कोई नहीं है। धना ने देखा, ठाकुर उनकी ओर देखकर ही मुस्कुरा रहे थे। स्पष्ट तो दीख रहे हैं, उनके कानों के कुंडल की चमक से आंखें चुंधिया रही हैं, इस पंडित को क्यों नहीं दीख रहे! उसने फिर कहा- पंडितजी महाराज, कितने साफ-साफ दीख रहे हैं, गोपाल। वे हमें देखकर हंस रहे हैं। पंडित ज्ञानी था, इसलिए अपने दृष्टिदोष को समझ गया। जहां चाह, वहां राह। वास्तविक दर्शन की अभिलाषा ही कब की थी जो भगवान दर्शन देते। सबकुछ समझकर त्रिलोचन ने धना से विनती की- धना, ठाकुर तुम्हारे मित्र हैं, अपने मित्र से कहो, मुझ अधम को भी एक बार दर्शन देवें, मैं तुम्हारा यह ऋण कभी नहीं भूल पाऊंगा। धना ने अपने सखा भगवान से विनती की- भगवान, आप इन्हें भी दर्शन दीजिए, आपका विग्रह तो मुझे इन्होंने ही तो दिया है। भगवान ने हंसकर उत्तर दिया-भक्तमित्र, ये पंडितजी विग्रह को विग्रह ही मानते हैं, उसे भगवान कब मानते हैं, तुम्हारे कहने पर मैं इन्हें एक बार दर्शन देता हूं। भगवद् दर्शन कर पंडित त्रिलोचन की आंखें मुंद गईं। वह बेसुध-सा हो गया। थोड़ी देर बाद भाव विह्वल होकर उसने आंखें खोलीं और धना से कहा-धना, पुनः दर्शन कराओ। धना ने कहा-ठाकुरजी का समय हो गया, वे तो चले गए। भगवद् दर्शन कर पंडित धन्य-धन्य हो गया। वह मुदित मन संकल्पित होकर वहां से चला गया। उसने ठान लिया कि अब शेष जीवन भक्त आराधना में ही बिताना है। प्रसंग आता है कि त्रिलोचन को मुक्ति प्राप्त हई। उस दिन के उपरांत वह भगवद्भाव में डूब गया। उसे भगवदप्राप्ति की रीति मालूम हो गई। बहुत से जिज्ञासुओं ने यह जानने का प्रयत्न किया कि धनाजी के साथ भगवान की यह नित्यलीला कितने दिनों तक चली। इस पर नित्यलीलालीन भाईजी महाराज श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार का कथन है कि "अब धनाजी की बाललीला समाप्त हुई। साथ ही साथ भगवान का धनाजी के साथ बालोचित व्यवहार भी छूट गया।" 20 धनाजी के भीतर बाल्यकाल में ही उत्कट भगवप्रेम जाग्रत हो गया। इस अनन्य भक्ति के कारण वे सर्वोपकारक स्वभाव के हो गए। उनके शेष जीवन में संतोचित उत्कृष्ट कोटि के गुण परिलक्षित होते हैं। वे अकृतद्रोह, करुणावान, अमानी, अकिंचन और अप्रमत्त होते हैं। उच्च कोटि की भगवनिष्ठा के कारण धनाजी श्रेष्ठ भक्त के रूप में विख्यात हुए। धनाजी के भगवद् साक्षात्कार का यह प्रसंग पंचाद्धं शती से आज भी उतना ही लोकप्रिय है और भक्तमाली जन इसे बहुत मधुर शब्दों में, लालित्य के साथ व्याख्यायित करते थकते नहीं हैं। सभी भक्तमालों में भी इस प्रसंग को प्रश्रय मिला है। सखा भक्ति का यह अप्रतिम उदाहरण है। भक्तमाली समुदाय में तो यह भी प्रचलित है कि जो जन धनाजी महाराज के उपरोक्त प्रसंग को नित्य प्रति स्मृत करता है, पढ़ता है तो उसका भी भगवान से साक्षात्कार संभव है। धनाजी की साध प्रीतिधनाजी की भक्ति का एक अंग, उनकी साधु-संतों के प्रति गहन प्रीति का है। वैसे तो साधु-संतों की सेवा का भाव तो उनका पारिवारिक रहा है। उनके परिवार में साधु-संतों के प्रति आदर-सम्मान का भाव सदैव से ही था। बाल्यकाल में भगवद् साक्षात्कार और सान्निध्य के समय भी उन्हें भगवान के द्वारा संत सान्निध्य ग्रहण करने की सीख दी गई थी और बाद में काशी गमन में भी उन्हें संत-सेवा का महत्त्व समझ में आया। वहां कुछ दिन संत सान्निध्य में रहकर वे संत-सेवा के आनंद से भली प्रकार परिचित हो गए। धनाजी में संतोचित आठ गुण सहज ही थे। दूसरों का दुख वे देख नहीं पाते, इसलिए उनमें दया का गुण जन्मजात था। उनमें क्षमा का भाव सदैव ही रहता, इसलिए क्रोध से कोसों दूर थे। वे किसी की भी निंदा नहीं किया करते और न ही दोष दर्शन करते। धनाजी ने अपने अनुयायियों को अभक्ष्य वस्तु कदापि न खाने की सीख दी, वे स्वयं अभक्ष्य वस्तुओं से बेहद दूर रहते । मंगल भाव रखकर सदैव ठाकुरजी से शुभकर्म करवाने की प्रार्थना किया करते। हर किसी का सहयोग करने की खातिर वे कीमती वस्तु का परित्याग करने में जरा भी नहीं झिझकते। उन्हें वैभव जरा भी प्रिय नहीं था। उनके युवाकाल में ही गांव के लोग उन्हें स्वामी, बैरागी कहने लगे थे। संतोष उनके वैराग्य का प्रथम सोपान था। उन्हें किसी भी कार्य के लिए कोई चाह नहीं थी, उसे कर्तव्य समझकर किया करते। कल्याण के संपादक पूज्य भाईजी हनुमानप्रसादजी पोद्दार का कथन है-"भगवान की आज्ञानुसार धनाजी ने काशी जाकर श्री रामानंदजी से भगवन्नाम की दीक्षा ले ली और घर पर रहकर भगवद्भजन और साधु-सेवा करने लगे।" 2' साधु-सेवा के लिए धनाजी अपने कृषिकर्म को पूरा मन लगाकर किया करते। अनेक प्राचीन किंवदंतियों में उनकी कर्मठता के उल्लेख प्राप्त होते हैं। अपने कर्मठ स्वभाव के कारण वे अपने ठाकुरजी से यह कह दिया करते थे कि, 'सांवरा कोनी थोरै सारै।' 22 इस लोकभजन में वे भगवान से परिहास करते हुए कहते हैं कि भले ही आप बड़े वैभवशाली हैं, आपके पास उपभोग की नामी गरामी चीजें हैं, पर काम तो मेरा भी नहीं अटकता है। वस्तुओं में तो मैं भी आपकी बराबरी करता हूं और इनकी प्राप्ति के लिए आपकी सहायता की कोई खास जरूरत नहीं है। एक सद्गृहस्थ के रूप में वे पारंपरिक रूप से अपनी खेती-किसानी का कार्य मनोयोग से किया करते थे। किशोर अवस्था में भगवद्संग प्राप्त होने की घटना से धना की प्रसिद्धि दूर-दूर हो चुकी थी तथा उनके प्रति कितनी ही किंवदंतियां चर्चित हो चुकी थीं। संतों-भक्तों में यह माना जाने लगा था कि अगर किसी का मन भगवद्भजन में नहीं लगता तो उसे धने के हाथ के पवित्र अन्न का भोग करना चाहिए। भक्त के हाथों प्रसाद पाने से भीतर-बाह्य शुद्धि हो जाएगी। उस समय यह कहावत प्रसिद्ध थी कि, 'धने भगत रो रोटियो जगत पसारे हाथ।' भक्त धना खेती के कार्य से लौटने के बाद सत्संग अवश्य किया करते। धनाजी ने धनावंश की स्थापना के समय धनावंशी पंथ ग्रहण करने वालों से भी नित्य सत्संग की बात विशेष रूप से कही। धना के संबंध में कहा जाता है कि, 'धना रे मन विस्वास घणो।' अर्थात धना के मन में परमात्मा के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास था। इस दृढ विश्वास ही के कारण वह ठाकुरजी का अनन्य सेवक था। धना की इस विश्वासरूपी भक्ति को जानकर ही रामानंदजी चमत्कृत हो गए थे। रामानंदजी जब गागरौन गढ़ में पीपाजी के पास आए, तब उन्हें धनाजी के भक्तिमय जीवन की गाथाओं का पता लगा तो वे गद्गद हो गए। 24 धना अध्यात्म मार्ग के शास्त्रीय ज्ञान के प्रति अधिक आकृष्ट नहीं हए। न उन्होंने शास्त्रीय ज्ञान की कभी काट की। निरंतर सत्संग और साधु-सेवा के कारण धना के घर में कई बार खाद्य सामग्री का अभाव हो जाया करता था। ऐसी स्थिति में उसे गांव के साहूकार का मुंह जोहना पड़ता। वर्षाकाल में एक दफा धना के घर अन्न समाप्त हो गया तो वह साहूकार के पास एक मण अनाज लाने के लिए गया। साहूकार ने यह चेतावनी देते हुए अन्न दे दिया कि बरखा होने वाली है, तुम्हें इसी अनाज को खेत में बीज के रूप में भी काम लेना है। चाहे अभी साधुओं को खिला दो अथवा खेत में बीज रूप में बीज देना। साधु सेवा के सामने धना सब हिदायतें भूल जाया करते। जब तक वर्षा नहीं हुई, तब तक सप्ताह भर में धना ने सारे अनाज को साधु-सेवा में खर्च कर डाला। वर्षा होने पर धना अत्यधिक चिंतित हो गया। अब वह कौनसा मुंह लेकर साहूकार के पास जाए। पर धना ने सोचा, दूसरा कोई उपाय नहीं है। उसने पुनः साहूकार से खेत में बीजने के लिए अन्न की मांग की। साहूकार ने यह कहते हुए मना कर दिया कि पहले ही उसने बहुत अन्न उधार ले रखा है। धना ने समझाया कि वह सारा अन्न खेत में निपजने पर ही तो लौटाया जाना संभव होगा। अभी अगर खेत जुतेगा ही नहीं तो अन्न होगा कैसे ? साहूकार ने कुछ देर सोचा और फिर कहा कि मैं अन्न एक शर्त पर ही दे सकता हूं कि तुम इस बीज को लेकर सीधे खेत को जाओ। तुम खेत जोतने के लिए बैलों को यहीं ले आओ। साहूकार की इस शर्त से धना को तनिक भी परेशानी नहीं हुई। उसे तो खेत जोतने जाना ही था। सेठ ने दस सेर अनाज खेत जोतने के लिए दे दिया। धना उसे लेकर रामधुन गाते हुए खेत की ओर रवाना हो गया।धना अभी आधी दूरी भी नहीं पहुंचा था कि रास्ते में उसे अपने गांव की ओर आती हुई नाचती-गाती साधुओं की एक टोली मिली। रामभजन में मगन साधुओं को सामने पाकर धना को अच्छे शगुन का भान हुआ। वैसे भी साधु-संतों के दर्शन से धना का हृदय पुलकित हो जाया करता था। धना ने भजनों में खोये साधुओं को झुककर प्रणाम किया और पूछा- महाराज, आप लोग इतने प्रसन्न भाव से कहां पधार रहे हैं? साधुओं में से एक युवा साधु ने उत्तर दिया-क्या करें भइया ! कई दिनों से हमारा मन भजन में नहीं लग रहा था, तब हमने अपने गुरु महाराज से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि किसी कषाययुक्त व्यक्ति का अन्न पेट में गया है। उसका दूषित प्रभाव दूर करने के लिए किसी कर्मशील भक्त का अन्न ग्रहण करो। राजपूताने में एक अनूठा प्रभुभक्त है धना जाट। वह खेरीपुर में रहता है, तुम अगर उसके हाथ का जरा-सा भी अन्न खा लोगे तो तुम्हारा मन भली प्रकार भजन में लगने लगेगा, इसलिए अब हम धना के गांव की ओर जा रहे हैं। धना ने साधुओं से पुनः पूछा- आप लोग अभी आ कहां से रहे हैं? साधुओं की जमात में से एक साधु ने उत्तर दिया कि हम हरिद्वार से आ रहे हैं। धना ने विस्मित होकर पूछा- ऐसा धना के अन्न में कौनसा प्रभाव है, जिसे प्राप्त करने के लिए आपने इतनी लंबी यात्रा की। साधुओं ने मगन होकर एक लंबी आह भरी और कहा-गुरु महाराज ने कहा है, उसके हाथ का एक दाना भी अंतःकरण को पवित्र करने में पर्याप्त है। मन की सारी वासनाएं समाप्त हो जाती हैं। धना भगवद् साहचर्य प्राप्त भक्त है, उसके तो दर्शन में भी भगवद् दर्शन जैसी साम्यता है। तुम बताओ, धना का घर इस सामने दीख रहे गांव में कहां है, हमें वहां पहुंचने की शीघ्रता है। वह भक्त दीखने में कैसा है? सुना है अभी तो वह युवा ही है। अब धना से रहा नहीं गया। उसने कहा- वह जाट का छोरा धनिया में ही हूं, पर मुझ में बाकी कोई गुण नहीं है, मैं तो भक्ति की रीत ही नहीं जानता। मैं ही धनिया हूं, यह सुनकर साधुओं की टोली धना के चरण स्पर्श को लालायित हो गई। धना पीछे सरकने लगा। पर साधु कहां मानने वाले थे, वे उसके चरणों की धूलि सिर में डालने लगे, कुछ वहां की रेत में लोटने लगे। अब धना बड़ा धर्मसंकट में पड़ गया। खेत जोतने के लिए यही दस सेर अन्न है और इधर भूखे साधुओं की टोली है। धना ने पोटली खोली और एक-एक अंजूरी अन्न सब साधुओं को भेंट करने लगा। उसने झोली का सारा अन्न बांट दिया। साधु आशीष देने लगे-धना, हमने जो अन्न खाया है, वह सहस्र गुना हो जाए। तुम्हारी भक्ति दिन दूनी रात चौगुनी बढती रहे। हमारा अंतःकरण पवित्र किया है, तुम्हारा सदैव पवित्र रहे। जो व्यक्ति तुम्हारा स्मरण मात्र कर लेगा, उसमें भक्ति के भाव उदय हो जाएंगे। इस प्रकार आशीषं देती हुई साधुओं की टोली वापस मुड़ गई। धना सोचने लगा-मेरे कैसे पुण्य हैं, आज प्रातःकाल ही सिद्ध संतों के दर्शन हो गए। मैंने तो हरिद्वार का नाम भर सुन रखा है, इतनी दूर से चलकर आए संतों ने घर बैठे गंगा बहा दी, मुझे मेरे ही गांव में पुण्य दर्शन लाभ दिया। हे ठाकुरजी, मैं आपका यह एहसान कैसे चुकाऊंगा ? मन में अपार प्रसन्नता का भाव लिए हुए धना अपने खेत पहुंच गया। दोनों बैलों को धना ने थोड़ा-सा चरने को छोड़ा। धना का हाली धना के साथ ही गांव से यहां तक आया था। उसने रास्ते में देखा था, बिना सोचे-समझे धना ने बीज साधुओं को खिला दिया था। यह भी नहीं कहा कि अब उसे दूसरा बीज साहूकार नहीं देगा। हाली मन ही मन जल-भुनने लगा। उसने धना से कहा कि बिना बीज के हम अब क्या करेंगे ? धना ने कहा- हल चलाएंगे।हाली को लगा, धना बौरा गया है। उसने कहा- बिना बीज के हल चलाने से जमीन तो उर्वरा होगी, पर ऊगेगा क्या ?धना ने बेफिक्री से कहा- वह ठाकुरजी जाने। हाली को क्या उजर था। वह मन ही मन हंस रहा था और सोच रहा था, यह अपने माता-पिता के डर से बिना बीज के खाली हल चलवाना चाहता है, पर हमारा क्या ? धना और हाली ने मिलकर सायंकाल तक सारा खेत जोत डाला। खेत से घर लौटते समय हाली ने रुंआसा होकर धना से कहा- इस वर्ष तो भूखा ही मरना पड़ेगा। धना धैर्य की प्रतिमूर्ति था। उसने हाली के कंधे पर हाथ रखकर कहा- तुम क्यों चिंता करते हो, तुम्हारा आधा वांटा (भाग) कहीं नहीं जाने वाला - 'पाड़ौसी के निपजै जेतो, तूं थारो भर लीजै तेतो।' 24 धना के कहने से हाली एक बार आश्वस्त तो हो गया, किंतु उसे घर पहुंचकर बार-बार हंसी आ रही थी, अपनी व धना की मूर्खता पर। बिना बीज पूरे दिन हल चलाकर समूचा खेत जोत डाला। हाली की हंसी को चीह्न कर उसकी स्त्री ने बार-बार मुस्कुराने का कारण पूछा तब हाली से कहे बिना नहीं रहा गया। उसने सारा वृत्तांत सुना दिया और कहा-इसलिए हंसी आ रही है कि बिना बीज के खाली हल कोई चलाता है क्या ? पति से सारा प्रसंग सुनकर हालिन गमगीन हो गई और फिर धना की इस हरकत पर क्रोधित होकर अपने ही पति से झगड़ा करने पर उतारू हो गई, तुम क्या अंधे-बहरे हो गए थे ? अब हम सब क्या खाएंगे? वह धना तो वैरागी है, साधुओं का संग करता है, अन्न नहीं होगा तो, मांगकर खा लेगा, पर तुम तो खेतिहर हो, तुम्हें मांगने से कौन देगा? अब उस हालिन को विश्राम कहां? वह तो झगड़ा करने को उतारू होकर धना के घर आ गई। धनाजी की पत्नी धनाजी की ही भांति ऊंचे दर्जे की भक्त महिला थीं। वे भगवान पर दृढ़ भरोसा रखकर सदैव निश्चिंत रहा करती थीं। पतिव्रता, दया, क्षमा, सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति हरिदासी का हरेक के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार रहता था। हालिन को अविश्वास करते देखकर उसने कहा- देख बाई, तुम्हारे हिस्से का अनाज कहीं नहीं जाना है, तुम्हें विश्वास नहीं है तो मेरे दो प्रिय बैलों में से एक बैल अभी बेच दूं और उसकी रकम से तुम्हारे घर अनाज डलवा दूं ? इतने में वहां पर धना भी उपस्थित हो गए। उन्होंने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा कि हमारे हाली को खाली हल चलाने की बात को गुप्त ही रखना चाहिए था। सारे कार्य इस संसार में भगवद्प्रेरणा से घटित होते हैं। हम लोग तो व्यर्थ ही सब प्रकार के हिसाब-किताब लगाते हैं। सारा किया धरा तो भगवान का होता है। भगवान की मर्जी पर निर्भर है, कई बार डाला हुआ बीज भी नहीं उगता और कई दफा अड़क धान से भी बोरे भर जाते हैं। व्यक्ति को अपना कर्तव्य पवित्र भाव से करते रहना चाहिए। राग-द्वेष रहित होकर जो व्यक्ति कार्य करता है, उसके शुभ-मंगल की चिंता श्री ठाकुर को रहती है। धनाजी की वाणी सुनकर हाली पत्नी शांत और निश्चिंत हो गई। उसका मन धना के प्रति श्रद्धा से भर गया। बलि के अवतार धना भक्तिमान पुरुषों में श्रेष्ठ कहे जाते थे। भले ही वे एक कृषक पिता के पुत्र थे, किंतु उनमें भक्ति के संस्कार पूर्वकृत थे। संत, महात्माओं की निरंतर सेवा से उनमें डाह, द्वेष का लवलेश नहीं था। वे जितेन्द्रिय, निष्काम, शांत तथा सर्वहितैषी प्रवृत्ति के थे। उनके मन में हर किसी का भला करने की भावना सदैव रहा करती। ऐसे हरिनाम सुनते ही पुलकित हो जाने वाले भक्त की वाणी सुनकर कोई प्रभावित क्यों न हो जाए ? 'सन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगा।' धनाजी का सारा ही चिंतन परहित के लिए था। वे स्वजाति के लोगों की ईश्वर विमुखता देखकर सोच में पड़ जाया करते थे। उनकी जाति अन्न उत्पन्न कर सब का भरण पोषण करती है। उसके उत्पन्न किए अन्न में जब तक शुद्धता के भाव नहीं होंगे, उस अन्न से पोषण पाने वाले व्यक्ति के विचार शुद्ध कैसे होंगे ? जब धनाजी ने धनावंश पंथ की स्थापना की तो उन्होंने अपने धनावंशी भाइयों को प्रमुख सीख यही दी थी कि भगवसेवा परायण भाव से कृषिकर्म करना है। तुम्हारा अन्न खाकर व्यक्ति में उच्च एवं मानवीय भावों का उदय हो जाए। साधु का उत्पन्न किया अन्न बड़ा कीमती होता है इसलिए कृषिकर्म के समय भगवद्भक्ति को साथ रखें। सच्चा धनावंशी वही है जो गुण एवं शील का स्मरण सदैव रखे। धनाजी महाराज के जीवन में पग-पग पर चमत्कार घटित हो रहे थे, वे चाहते तो एक चामत्कारिक पुरुष के रूप में प्रसिद्ध हो सकते थे, किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनका लक्ष्य चमत्कार पैदा करना नहीं था बल्कि भगवद्कृपा प्राप्त करने का था। परमात्मा की प्राप्ति किसी चमत्कार से संभव नहीं है। बिना प्रभु शरणागति के उसे प्राप्त करना कोई हंसी-खेल नहीं है। जो व्यक्ति ब्रह्मके मार्ग में प्रतिष्ठित नहीं हो सका, उसकी तो गति संभव नहीं है। धनावंश के प्रवर्तक श्री धनाजी महाराज कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने मन, कर्म और वचन को परमात्मा के प्रति समर्पित कर दिया था। उनके कर्म चिन्मय हो चुके थे, क्योंकि वे प्रतिक्षण मनसा, वाचा और कर्मणा परमात्मा को ही भजते थे। जो व्यक्ति माया के प्रपंचों और प्रबंधों में उलझ जाता है वह एकनिष्ठ भक्ति नहीं कर पाता। जो सदाचारी नित्यप्रति मानस में प्रभु की ही लगन लगाए रखता है, वही दिव्य तथा पुण्यशाली है। धनाजी महाराज ऐसे पुण्यशाली लोगों में से एक थे। यह कहा जाता है कि अनेक जन्मों के अभ्यास से आत्मसिद्धि प्राप्त होती है और धनाजी महाराज के बारे में भी यही प्रसिद्ध है कि वे भगवान बलि के अवतार थे। इसलिए उन्हें भगवद्प्राप्ति में कोई अधिक कठिनाई नहीं हुई। कठिनाई तब होती है जब व्यक्ति योग से विचलित हो जाता है। विचलित तथा व्यथित व्यक्ति को भगवद्याप्ति संभव नहीं है। जो अकल्याण के मार्ग पर चलना प्रारंभ करता है उसका तो कल्याण संभव ही नहीं है। धनाजी महाराज के जीवन वृत्त को देखते हैं, तो पाते हैं कि वे किसी पर संशय करते ही नहीं थे। संशयहीन हो जाना कम मुश्किल नहीं है। जब बाल्यकाल में एक संत ने यह कहा कि तुम्हें जो शालग्राम प्रदान कर रहे हैं, यह भगवद्रस्वरूप ही है। धनाजी ने पंडित की इस बात पर जरा भी अभरोसा नहीं किया। कहा भी जाता है कि 'संशयात्मा विनश्यति' संशय से आत्मा का विनाश होता है। धनाजी ने भगवद्माप्ति के मार्ग में संशय को तनिक भी अपने निकट नहीं फटकने दिया। यही कारण है कि उनके सभी सांसारिक कार्य स्वतः ही फलित होते गए। हम भले ही उन कार्यों को किसी चमत्कार की श्रेणी में रखते रहे हैं, पर धनाजी के लिए तुंबों में से निकलने वाले मोती कोई आश्चर्य नहीं था। हां, टोंक के नवाब के लिए अवश्य यह एक अचंभे में डाल देने वाली घटना थी। किंतु, भक्त जानता है कि जो परमेश्वर के अधीन हो जाता है, जिसकी भगवद् शरणागति हो जाती है, वहां सबकुछ चमत्कार ही है। धनाजी महाराज अपने जीवन में केवल एक ही बात को सोचते थे कि मेरे द्वारा कोई ऐसा अपराध न हो जाए जिससे मैं प्रभु की मैत्री से वंचित हो जाऊं। उनका प्रेम भगवान के साथ मैत्री का यानी अटल मित्रता का था। वे भगवान को अपना मित्र जानकर निश्चिंत हो गए थे। उनके सारे कार्य उनके मित्र परमात्मा ही संपादित किया करते थे। स्वयं, भगवान का कथन है कि तुम मेरी मैत्री में निश्चिंत हो जाओ। मेरे प्रति निश्चिंत होजाने वाले को मैं सभी तरह से अलंकृत कर देता हूं। अलंकरण भक्ति का भी होता है और वैभव का भी। हम धनाजी के जीवन पर दृष्टिपात करते हैं तो देखते हैं कि उनका जीवन सर्वथा निश्चिंतता और निर्भयता पर टिका हुआ था। धनाजी का जीवन परमात्मा की आज्ञा और गुरु सन्निधि पर पूर्णतया निर्भर था। गुरु के वचन उनके लिए शिरोधार्य थे। लोह की लकीर थे। गुरु रामानंदजी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, उन्हें यह आदेश प्रदान किया कि तुम्हें अपने जाति वर्ग में भगवद्भक्ति की स्थापना करनी है। बताओ, कल्याणकारी शिष्य इस गुरु आज्ञा को वे कैसे नकार देते ? धनाजी ने तनिक भी संशय नहीं किया गुरु आज्ञा पर और धनावंश जैसे वैष्णव पंथ की स्थापना कर डाली। उन्हें किसी पंथ स्थापना की आवश्यकता नहीं थी। किंतु, गुरु ने कहा- धर्म बचाना है और इसकी वृद्धि भी करनी है। गुरु कह रहे हैं तो कुछ सोचकर और कल्याणप्रद है, इसलिए कह रहे हैं। तब धनावंश की स्थापना से वे कैसे मुकरते ? धनावंश की स्थापना के पीछे उनकी यह मंशा थी कि मेरे सभी अनुयायी भगवद्प्रेरणा से भावित होकर, भक्ति के मार्ग पर चल पड़ेंगे। पंथ की स्थापना से वे सभी जो धार्मिक अवधारणाओं से अनभिज्ञ हैं, धर्म अनुप्राणित आचरणों से संवलित होकर सदाचार के मार्ग पर चलना प्रारंभ कर देंगे। उनकी यह सोच सही निकली। धनावंश में शामिल लोगों ने वैष्णव धर्म व्रत धारण किया। धर्म मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के लिए परमात्म प्राप्ति कठिन नहीं है। विभिन्न प्रकार के सुख और ऐश्वर्य में फंसकर व्यक्ति ईश्वर से विमुख हो जाता है और ईश्वर से विमुखता बड़ी दुखदाई होती है। क्योंकि किसी भी प्राणी के जन्म धारण करने का मूल उद्देश्य तो उच्च स्थिति की प्राप्ति ही तो है। और वह उच्च स्थिति मोक्ष के अलावा दूसरी क्या हो सकती है? धनाजी का बताया हुआ मार्ग, हर धनावंशी के लिए उद्धार का मार्ग है। साधपन का सेवन ही धनावंश का मुख्य उद्देश्य है। जब से खेत में पूरे दिन बिना बीज के हल जोता था, तब से हाली की स्थिति बड़ी विचित्र थी। वह मन ही मन सोच रहा था कि बीज साधुओं को बांटने के पश्चात धना के मन में तो माता-पिता का डर समाया हुआ था, बिना जोते खेत को देखकर वे उलाहना देते, इसलिए धना ने यह प्रपंच किया, पर वह इस प्रपंच में क्यों शामिल हुआ ? धना ने उसको यह भी समझा दिया था कि खाली हल चलाने की बात किसी से कहनी नहीं है, किंतु हैरत में पड़े हाली से रहा नहीं गया और उसने चौपाल में यह बात सब को बता दी कि धना के संग उसने पूरे खेत में बिना बीज के हल चलाया है। उसने व्यंग्य में कहा कि देखें, इस बार बिना बीज की खेती किस तरह निपजती है ? चार-पांच रोज बाद हाली कुतुहलवश खेत को देखने गया तो दंग रह गया। जिस खेत में उन्होंने एक बीज नहीं डाला था, वहां हरी-भरी फसल खड़ी दिखाई दे रही थी। अब हाली से रहा नहीं गया, पहले तो वह स्वयं के घर आया और सबसे पहले हालिन यानी अपनी पत्नी को यह समाचार सुनाया। हालिन समझ गई कि भक्तों के सब कार्य भगवद्प्रेरणा से होते हैं। उसने अपने पति से कहा कि हमें त्वरित चलकर भक्त धना के घर जाना चाहिए और इस प्रसंग में क्षमा मांगनी चाहिए। हमने बेवजह एक भक्त के क्रियाकलापों के संबंध में अविश्वास किया और धैर्यहीनता का परिचय दिया। धना के घर आकर हाली दंपती उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे। धना ने पूछा- आप दोनों हमारे पांवों में क्यों गिर रहे हैं, ऐसा क्या हो गया? उन्होंने कहा-हमें क्षमा करें, हम आपके किसी कृत्य को नहीं जान सकते, आप तो स्वयं अंतर्यामी ही हैं। हम अपने भाग्य की सराहना करते हैं कि हमें आपका संरक्षण मिला है। धना ने हाली को पैरों से उठाते हुए कहा- कुछ बताओ तो सही कि आखिर हुआ क्या है? हाली ने डरते-डरते कहा- स्वामी, जिस खेत को हम ने बिना बीज के जोता था, उसमें अब फसल लहलहा रही है। यह कैसा चमत्कार हो गया। स्वामी, आपकी लीला को कोई जान नहीं सकता। मैं तो अब भी नहीं समझ पा रहा हूं कि यह हुआ कैसे ? धना ने हाली की पीठ पर हाथ धरकर कहना प्रारंभ किया-इस संसार के नियंता ठाकुर स्वयं हैं। वे धरणीधर यूं ही नहीं है। इस संसार को उन्होंने धारण कर रखा है, तभी वे धरणीधर कहलाते हैं। परमात्मा की प्रेरणा से सारा कार्य होने पर सारा आश्रय उन्हीं का रहता है, उनके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। धना ने हाली को घर जाने को कहा और जाते-जाते परिहास किया कि परमात्मा को तुम्हारे बाटे की चिंता हो गई, इसलिए यह सब हुआ है। हाली दंपती प्रणाम कर निकल गए। धनाजी की परची में वर्णन मिलता है कि उस वर्ष धना के खेत में अनाज पड़ौसियों से दुगुणा हुआ। न केवल बिन बाहे अन्न उगने की बात थी। धनाजी के जीवन में जब भी कोई अभाव या मुश्किल उत्पन्न होती तो भगवान उसे किसी न किसी रीति से हल कर दिया करते। प्रकृति भी धनाजी के लिए महरबान हो गई थी। संत धनाजी के सान्निध्य में धुआं क्षेत्र में हवा-पानी का दूषितपन दूर हो गया। अधिकांश अच्छी वर्षा हुआ करती, जिससे सारे गांव में किसान प्रसन्न रहा करते। भक्त के सान्निध्य का लाभ उन्हें भी प्राप्त हो रहा था।धनाजी का काशी गमनधुआं गांव में मान्यता है कि धना भगत में श्रद्धा रखने वाले निकट के बारह गांव हैं, इन्हें प्राचीन समय से धना भगत के बारह गांव कहा जाता है। इन बारह गांवों की सूची इस प्रकार है- (1) धुआं कलां (2) महमूदगंज (3) थली (4) पालगंज (5) छोटा धुआं (6) इन्दोरा (7) हाडोती (8) सांकणा (9) गैरोटी (10) सांकणी (11) गहणिया तथा (12) आगस्या। धना भगत मंदिर के निमित्त किए जाने वाले किसी भी कार्य में इन गांवों के श्रद्धालुओं का सैकड़ों वर्षों से योगदान रहा है। इन गांवों में परंपरा से धना भगत जी की अनेक कथाएं तथा किंवदंतियां प्रचलित रही हैं। महमूदगंज के पंडित केदार शर्मा के अनुसार धनाजी का जन्म तो फागी के निकट चौरू में हुआ, जो कि उनका ननिहाल था लेकिन उनका लालन-पालन यहां धुआं में ही हुआ। उनके अनुसार धनाजी घेतरवाल जाट थे। उनका घर धुआं में गढ़ के निकट था। धना अपने माता-पिता की एकमात्र औलाद थे। चाचा, ताऊ भी नहीं थे, पर गांव की सभी जातियों के लोग धनाजी महाराज में गहन श्रद्धा रखते थे। वे गांव के हर व्यक्ति से प्रेम करते थे। यहां जन में किंवदंती रूप बहुत से प्रसंग प्रचलित हैं। माता-पिता के एकमात्र पुत्र होने पर सोलह वर्ष की अवस्था में ही धना का विवाह निकट के ही किसी गांव में हो गया। परचियों तथा कतिपय अन्य उल्लेख में धनाजी की भार्या का नाम हरिदासी बताया गया है। वह किस गोत्र से थी, इसका उल्लेख नहीं मिल रहा है। धनाजी की धर्मपत्नी के स्वभाव का उल्लेख अनंतदासजी ने अपनी परचई में मुखर होकर किया है-और धनां कै घर में नारी।सो है पति की आग्याकारी ।। 22 महंत बदरीदासजी धनाजी की धर्मपत्नी के चरित्र का वर्णन करते हुए लिखते हैं-"धना की शादी हो गई। पुण्य के प्रभाव से स्त्री भी बड़ी धर्मात्मा मिली, वह पति की पूर्ण आज्ञाकारी थी। पति के बगैर किसी की दी हुई चीज स्वीकार नहीं करती थी। संसार से बड़ी उदास रहा करती थी। पति की तरह प्रभु का ध्यान करती और सब को रामरूप ही समझती थी। 28 (समदृष्टि दृढ ध्यान लगावें, सब घट अंतर राम पिछाणे) कहा जाता है कि भक्ति के क्षेत्र में धना अग्रगण्य अपनी धर्मपत्नी के कारण ही गिने गए। उनके बाल्यकाल के भक्ति संस्कारों को युवा एवं प्रौढ़काल में बनाए रखने में हरिदासी का बड़ा योगदान था। रामानंदजी के शिष्य पीपाजी की धर्मपत्नी सीता सहचरी की ही भांति भक्ति के क्षेत्र में हरिदासी भी कम नहीं गिनी जाती हैं। धनाजी से संबंधित अनेक दिव्य प्रसंगों में हरिदासी के उल्लेख भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। किंवदंतियों में बताया गया कि जब धना ने रामानंदजी को गुरु बनाने के लिए काशी जाने का निश्चय किया तो उनके समक्ष प्राथमिक तौर पर जो संकट उपस्थित हो रहा था, वह राह खर्च जुटाने का था। धनाजी ने यह परेशानी अपनी धर्मपत्नी को बताई तो उसने कहा, आप एक बार अपने मित्र से यह बात कहो। आपके भोग लगाने पर वे स्वयं उपस्थित होकर भोग ले लिया करते थे तो अब मदद क्यों नहीं करेंगे ? धनाजी को पत्नी का सुझाव तो उत्तम लगा, किंतु चूरमें का प्रसाद ग्रहण करने और बदले में गायें चराने की बातें तो पुरानी हो चुकी। बालभक्तों के प्रति तो भगवान वैसे ही अधिक दयालु होते हैं, पर मैं अभी भी अपने ठाकुर को आजमाऊंगा अवश्य। रामानंदजी के पास जाने की प्रेरणा भी तो स्वयं उनकी ही रही है। निश्चय ही वे ही वहां तक पहुंचने का प्रबंध करेंगे। धना के सामने दूसरा संकट उनकी गायें चराने का भी था। काशी तक जाने-आने में कई माह का समय लगता है। पत्नी ने आज पुनः ठाकुर को चढ़ाने के लिए चूरमें का प्रसाद बनाकर दिया। धना शालगराम को साथ लेकर खेत में चला आया। वहीं उसी स्थल पर शालगराम को विराजित कर ठाकुर की प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी ही देर में ठाकुर प्रकट हो गए। उनके हाथ में एक छोटी-सी थैली थी। आते ही धना को अपने गले लगाया और हाथ की थैली दिखाते हुए कहा, बताओ, इसमें क्या है? धना कुछ समझा नहीं, असमंजस में रहा तो भगवान ने उस थैली को अपनी हथेली पर उलट दिया। उसमें चांदी के सात रुपए थे। भगवान ने कहा-धना, तुम इन रुपयों को काशीजी की यात्रा के दौरान आवश्यक मद में खर्च करना, ये कभी समाप्त नहीं होंगे। इस थैली में ये सदा बने रहेंगे। धना रुपए पाकर गद्गद हो गया। अब गुरुदेव तक जाने में कोई दुविधा नहीं होगी, पर थोड़ी ही देर में उसका चेहरा मुरझाने लगा। वह सोच में डूब गया। भगवान ने धना के कंधे का स्पर्श कर कहा- अब उदास क्यों हो रहे हो ?धना ने संकोच से कहा- भगवन्, इतने दिनों तक मेरी गायें कौन चराएगा, खेत की रखवाली कौन करेगा ?- तुम्हारा हाली बनकर यह कार्य तब तक मैं करूंगा, जब तक तुम काशीजी से लौटकर न आ जाओगे। भगवान ने आश्वासन दिया।धना गिड़गिड़ाने लगा-भगवन्, आप कभी मेरी गायें चराते हैं, कभी हाली बनने के लिए तैयार होते हैं, मैं आपका यह एहसान कैसे चुका पाऊंगा ?भगवान ने कहा-धना, तुम सारे संसार में अपनी भक्ति का निर्मल प्रकाश फैलाकर मेरा एहसान चुका सकते हो। मेरा स्वभाव है, मैं अपने भक्तों की मदद करता ही हूं। इसमें अनोखा कुछ नहीं है। अगले ही दिन धना काशीजी की यात्रा के लिए रवाना हो गया। पीछे से भगवान धना की पत्नी के पास एक हाली का रूप धरकर आए और कहा कि में निकट के गांव का रहने वाला है, धनाजी ने मुझे गायें चराने के लिए रखा है. में प्रतिदिन गायें ले जाऊंगा और सायंकाल को आपके घर छोड़कर अपने गांव चला जाया करूंगा। धनाजी की पत्नी और माताजी को इसमें क्या एतराज था। कहते हैं, धनाजी के पिता का देवलोक गमन धना के युवाकाल में ही हो गया था। वे एक भारी और बलिष्ठ शरीर के व्यक्ति थे। कुछ अरसे पूर्व ही उनकी हठात मृत्यु हो गई थी। अब घर का मुखिया पुरुष रूप में धना ही था। धना अपनी माता गंगाबाई से आज्ञा ग्रहण कर काशी यात्रा को रवाना हो गया। धना ने रास्ते के दूसरे तीर्थस्थलों का भी पड़ाव व दर्शन किए। उनके साथ धुआं तथा आस-पास के दूसरे कुछ गांवों के तीर्थयात्री भी थे। जब अपने साथियों के साथ धनाजी प्रयागराज पहुंचे, उस समय स्नान कर वे लोग एक मंदिर प्रांगण की ओर बढ़ रहे थे, उसी समय धना ने आकाश की ओर मुंह कर अपने एक साथी को संबोधित कर कहा-पटेल हमारे गांव पर ओले (गड़े) पड़ने वाले हैं। पटेल जानता था कि धना झूठ नहीं बोलता है, रास्ते में वह धना के अनेक चमत्कारों को देख चुका था। उसे धना की बात सही लगी। पटेल ने कहा-धना, अभी फसल उगती हुई है, अगर गड़े (ओले) पड़ गए तो पूरा गांव बरबाद हो जाएगा। धना, तू चाहे तो उन गड़ों को अपनी पावड़ी (जूती) में समेट सकता है। धना ने उपस्थित जनों को आश्वासन दिया। कहते हैं, धना ने उसी समय ठाकुरजी के समक्ष अरदास लगाई तो गड़े प्रारंभ होकर वहीं रुक गए, केवल गांव की नाडी पर बरस कर रह गए। वापस लौटने पर गांववालों ने पटेल को यह बात बताई। तब पटेल ने सब को बताया कि यह बात तो धना को वहां बैठे ही पता चल गई थी, उसी ने हमें ओलों की बरसात से बचाया है। धना ने उस समय पावड़ी खोलकर यह प्रार्थना की थी कि गड़े केवल पर नाडी पर पड़कर रह जाए और ऐसा ही हुआ। 29 काशी में पहुंचने के बाद एक-दो दिनों में धना ने अपने संग के तीर्थयात्रियों को रवाना कर दिया तथा स्वयं पंच गंगाघाट के श्रीमठ में रुक गए। यही जगद्गुरु रामानंदजी का स्थल था। यहीं से वे पूरे भारत में राष्ट्रीय चेतना जगाने का ऐतिहासिक कार्य कर रहे थे। श्रीमठ में पहुंचकर धनाजी चमत्कृत हो गए। पूज्य रामानंदजी के अनेक बड़े-बड़े संत शिष्य-प्रशिष्य थे। वैष्णवता के संप्रसार का यह महान स्थल था। सुरसुरानंद जैसे शिष्य उनसे तत्त्व ज्ञान से संबंधित प्रश्न कर रहे थे और आध्यात्मिक संत रामानंदजी उनके प्रत्युत्तर बहुत सहज भाव से दे रहे थे। 30 वे देवभाषा के रूप में संस्कृत तथा जनभाषा के रूप में देसी भाषा में अपना प्रबोधन दे रहे थे। धनाजी को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि श्रीमठ में श्रीराम सीता के साथ हनुमत पूजन को भी बड़ा महत्त्व दिया जाता है। हनुमदस्तुति के रूप में रामानंदजी कृत- हनुमान आरती' गाई जाती। " स्वयं उनके जाट समाज में भी हनुमानजी पूज्य देव हैं। धना को यह देखकर और भी आश्चर्य हुआ कि रामानंदजी अपने यहां सभी जातियों, वर्णों, धर्मों को मान्यता दे रहे थे। उनके यहां कोई शास्त्र बंधन नहीं था। श्रीमठ के चरणों पर लोट रही गंगा सबको पवित्र कर देती है। धनाजी श्रीमठ आश्रम में जाते ही स्वामीजी के चरणों में गिर पड़े। स्वामीजी का दर्शन कर उनकी आंखें निहाल हो गईं, वे उन्हें अपने सखा गोपाल जैसे ही प्रतीत हो रहे थे। उन्हें वे किसी भी रूप में ठाकुरजी से कम नहीं लग रहे थे। गुरुजी ने उन्हें उठाकर गले से लगा लिया। धनाजी ने धूजते कंठों से अपना परिचय दिया-महाराज, यह धनिया है, राजपूताना से आया है, अपना कल्याण चाहने के निमित्त। "अरे लाडले, तुम धनिया नहीं धनेष्ठ (श्रेष्ठ धन) हो। भक्ति के क्षेत्र में तुम्हारी कीर्ति अमर रहेगी, तुम्हें एक निर्मल भक्त के रूप में याद किया जाएगा।"धना ने कहा- मुझे अपनी शरण में लीजिए महाराज। मुझ में अल्हड़ जाट बुद्धि है, भक्ति की तनिक भी समझ नहीं है। रामानंदजी ने कहा-ना धना, ऐसी बात नहीं है। भारत भू की कोई जाति उपेक्षणीय नहीं है, सब में भक्ति के सहज संस्कार हैं। तुम्हारी जाति तो स्वभाव से ही सेवा के संस्कारों से ओतप्रोत है। कृषि उद्यम के नाते उसका विरुद अन्नदाता का है। और किसको अन्नदाता कहा गया है? सेवा से सिद्धि बहुत शीघ्र प्राप्त होती है। हर किसी की सेवा करो, सहज ही में परमात्म प्राप्ति हो जाएगी। धना ने कातर वाणी में कहा- पर महाराज, मैं तो कुछ भक्ति विधान जानता ही नहीं, मेरी नैया कैसे पार लगेगी? गुरुदेव ने हंसकर कहा- तुम्हें ब्रह्मवाद और तत्त्व ज्ञान को जान लेने से क्या तात्पर्य है। तत्त्ववादियों की गायें भगवान कब चराते हैं? हजारों वर्षों तक तप कर तपस्वी जिसे हासिल करने की चाहत रखते हैं, वह तो तुम्हें सात वर्ष की अवस्था में ही मिल गया। पर याद रखो धना, जो मिलता है, वह बिछुड़ता भी है। उपास्य को सदैव प्राप्त कर लेना ही आत्मज्ञान है। वैष्णव होने के नाते तुम्हें अगर कोई ऊपरी वृद्धि ही करनी है तो मैंने सुरसुरानंद को यह सब भली प्रकार समझाया है कि वैष्णवों का तत्त्व क्या है, उनका जाप्य मंत्र क्या है, इष्ट स्वरूप को कैसे जाने, वैष्णवों का चिंतन कैसा रहे? ये सब बाह्यांतर की बातें हैं। इनका ज्ञान करना कठिन नहीं है। तुम जैसे भी हो, मुझे शिष्यरूप में स्वीकार हो। धना गुरु महाराज की ऐसी वाणी सुनकर आह्लादित हो गया। वह पुनः चरणों में गिर पड़ा। उसने देखा, उपस्थित बहुत सारे संत उन्हें अनुरागमयी दृष्टि से देख रहे थे। थोड़ी ही देरी में गुरु महाराज ने सब को संबोधित कर कहा-यह मेरा नन्हा शिष्य दिव्यातिदिव्य है। तादात्म्य की प्रतिमूर्ति है। भगवान इसके अनुराग में बंध गए। इसका प्रपत्ति मार्ग विलक्षण है। परमात्म सामीप्यता के कारण यह प्रणम्य है। सभी उपस्थित संत उठकर ठाकुर प्रिय धना को प्रणाम करने लगे। धना संकोच में डूब गए। वे आंख मींचकर भगवान से प्रार्थना कर रहे थे, हे गोपाल, सहाय करो, क्या इसलिए यहां भिजवाया था! ऐसे दिव्य गुरु महाराज और ऐसी ही इनकी दिव्य शिष्य मंडली। कहां मैं परम गंवार। दयालु गुरु महाराज ने कह दिया तो ये प्रणिपात कर रहे हैं, वरना मैं तो कुछ विधान ही ना जानूं। धना संकोच में डूबते ही जा रहे थे किंतु उनका मान करने वाले रुक नहीं रहे थे। क्योंकि वे जानते थे कि जिनकी भक्ति की प्रशंसा स्वयं गुरु महाराज कर रहे हैं, वह सामान्य वैष्णव नहीं हो सकता। गुरु महाराज के सभी शिष्यों में अनंतानंद स्वयं ब्रह्माजी के अवतार, सुरसुरानंद नारद मुनि थे, शंभु के अवतार सुखानंद, नरहरियानंद साक्षात् सनत्कुमार के अवतार, पीपाजी स्वयं मनुजी के अवतार, प्रह्लाद के अवतार कबीरजी, भीष्म के अवतार सेनजी, यम के अवतार रैदासजी, ऐसी विद्वत मूर्तियों के मध्य मैं वाणी का मर्म न जानने वाला ग्रामीण क्या कहूं ! धना ने आंखें मूंद लीं। विख्यात मूर्तियों के साथ बहुत से अविख्यात संत भी उपस्थित थे। सभी ने धनाजी की भक्ति निपुणता को जाना तो वे धनाजी की प्रपति की शोभा करने लगे। तब धनाजी को और कुछ नहीं सूझा, वाणी लूंठित हो गई। वे खड़े हुए और साष्टांग दंडवत मुद्रा में पसर गए तथा हे ठाकुर, हे ठाकुर कहने लगे। तेजस्वी सुरसुरानंद उन्हें कक्ष में ले गए। उन्हें गुरु महाराज के मंतव्य से परिचित कराया। भीतरी कक्ष में रामानंदजी के पास ले गए, वहां उन्होंने धना को प्रतापी, समर्थ मोक्षदायी राममंत्र की दीक्षा प्रदान की। कहा- धना, समष्टि का तारण करने के लिए यह अमोघ मंत्र है। इसे छुपाने की आवश्यकता नहीं है, इस मंत्र को हर किसी में फूंकने का यत्न करो। तुम सद्गृहस्थ हो, तुम्हें संन्यास की दीक्षा नहीं दी जा सकती है। जाओ, वैष्णवता के सूर्य का प्रकाश करो। धना पुनः गुरु महाराज के चरणों में गिर पड़े और निवेदन किया-हे गुरुदेव, आपके गुणों तथा उदारता का वर्णन नहीं कर सकता, मुझ गंवार पर आपने जो अहेतुक कृपा सहज में की है, उससे मुझे अनुभव होता है कि मुझ पर गोपाल की असीम कृपा है। गोपाल ने मुझे आपसे दीक्षित होने के लिए किसलिए भेजा, वह मर्म अब मेरे समझ में आ रहा है। मृदुल स्मित हास करते हुए रामानंदजी ने कहा- तुम जिस मार्ग पर हो, वह अति उत्तम और कल्याणकारी है। सामान्य जन और संतों की सेवा करते रहो, आज से तुम भी वैरागी हो। वैराग्य का संप्रसार करो। कल्याणकारी प्रभु का निरंतर ध्यान रखो, वही योगक्षेम करने वाला है। कलियुग के प्रताप से यह संसार अधर्ममय होता जा रहा है। धर्म-कर्म में प्रीति छूटती जा रही है। गृहस्थ में रहते हुए सद्कर्ममय जीवन देखकर दूसरे जन को तुम्हारे से कृत्य-अकृत्य की प्रेरणा प्राप्त होगी। शुभ मार्ग भूले हुए जन को धर्मपथ पर आरूढ़ व्यक्ति के कर्म से अधिक प्रेरणा मिलती है। स्वामी रामानंद को धना की नैसर्गिक भक्ति भावना ने बहुत अधिक प्रभावित किया था। ऐसे निस्पृह भक्त बहुत कम मिलते हैं। वे संपूर्ण भारत में भक्ति को ही स्थापित करना चाहते थे। स्वयं रामानंदजी ने 'वैष्णव मताब्ज भास्कर' में कहा है कि मोक्ष सम्प्राप्ति में भक्ति से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। मुमुक्षुजन भगवान की शरण में चले जाएं तो उन्हें उद्धार हेतु दूसरे किसी मार्ग का चयन करना आवश्यक नहीं है। " रामानंदजी का मत था कि भगवद् शरणागत को किसी व्यर्थ प्रपंच में नहीं लगाना चाहिए। वह जिस मान्यता के बल पर परमात्मा के साथ तादाकार है, उसके लिए वही मार्ग उत्तम है। 32 रामानंद इस बात के पक्षधर थे कि जब ऋषियों के नाम पर कुल, गोत्र, जाति, समूह बन सकते हैं तो भगवान के भक्तों के नाम पर भक्ति समूह क्यों न बने ? रामानंद के शिष्यों-प्रशिष्यों के नाम पर बने पंथ संप्रदाय उनकी इस भावना को ही कहीं न कहीं पोषित करते हैं। "स्वामी रामानंद के नेतृत्व में वैरागियों ने काशी, मथुरा, चित्रकूट, प्रयाग तथा मिथिला में भक्ति आंदोलन को विशेष धार प्रदान की। उनके द्वादश शिष्यों ने पश्चिमी और उत्तरी भारत में भक्ति का परचम लहरा दिया। इनमें कबीर, रैदास, पीपा, धना, सेन, नरहरियानंद ने भक्ति आंदोलन को व्याप्ति देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया।" 33 पंथों की स्थापना कर भक्तिमार्ग को सुगम बनाने की धारणा रामानंदजी की सदैव रही। उनके देवलोक गमन के पश्चात भक्तिधारा मंद न पड़े इसलिए भी भक्ति पंथ आवश्यक थे। काशी में पंच गंगा घाट स्थित श्रीमठ से भक्ति आंदोलन का प्रवर्तन करने में उनके शिष्य अनंतानंद का भी कम योगदान नहीं रहा है। रामानंदजी अपने इस नव शिष्य धना से बहुत आशान्वित हुए। उन्हें भक्ति का संप्रसार करने का आदेश प्रदान किया। राजनीतिक दृष्टि से यह अपकर्ष युग था। देसी राजाओं का पतन होता जा रहा था तथा विदेशी शक्तियां यहां सुदढ़ होती जा रही थी। इस समय दिल्ली पर सिकंदर लोदी का राज्य था, वह हिंदू धर्मपंथों के प्रति घोर असहिष्णु था। मंदिरों को नष्ट करने और ब्राह्मणों का वध करने में तो वह एक था। 34 वैष्णवता के उत्थान से आध्यात्मिकता और धार्मिक मूल्यों को बचाया जा सकता था। रामानंदजी का मंतव्य यही था, इसलिए उन्होंने उदार वैष्णवता के प्रचार का माध्यम अपनाया। उन्होंने विष्णु के सगुण-साकार तथा ईश्वर के निर्गुण निराकार दोनों रूपों को मान्यता प्रदान की। वे वैष्णव धर्म को येन केन प्रकारेण लोकधर्म बनाना चाहते थे। इसमें पौराणिक के साथ-साथ बहुत सी मान्यताएं वैदिक भी थीं। रामानंदजी चाहते थे कि हर संत के कुछ अनुयायी तैयार हों, अनुयायियों का समूह ही पंथ या संप्रदाय का रूप धारण कर लेता है। वे जानते थे कि ये पंथ ही कुछ काल बाद जाति का रूप धारण कर लेता है। रामानंदजी ने जब भारत भू की यात्रा की तो धर्म को लेकर उनकी दृष्टि संकुचित नहीं रही। "रामानंद ने इस सिद्धांत का दृढ़ता के साथ प्रतिपादन किया कि राम की शुद्ध मन से उपासना करने वाले बिना किसी जाति भेद के एक साथ खा-पी सकते हैं। उन्होंने छोटों को ऊपर उठाया और उनको सामाजिक और धार्मिक एकता दी।" 35 उनके धर्म संस्थापन एवं प्रसार के मंतव्य को अपने प्रवास काल में धनाजी ने भली प्रकार से जानने का यत्न किया। कतिपय दिन काशी में रहकर अनेक संभावनाओं से संयुक्त होकर धना अपने गांव की ओर रवाना हो गए। घर पहुंचने पर धनाजी की धर्मपत्नी अत्यधिक प्रसन्न हुई। धनाजी की धर्मप्राण माताजी की प्रसन्नता का तो कोई पार ही नहीं रहा, उनका पुत्र काशीजी से लौटा है। काशी तो वह स्थान रहा है, जहां पांच दिन रहने पर भी व्यक्ति पढ़ा-लिखा हो जाता है। पुत्र के गले में गुरु महाराज की डाली हुई तुलसी की माला, ललाट पर श्री टीका उनके पुत्र की आभा बढ़ा रहा था। बांह पर शंख चक्र गदा पदम की छाप लगी हुई थी। इससे सौभाग्य की दूसरी कौनसी बात। पत्नी ने कहा- आप बड़े भाग्यशाली हैं, मोक्ष नगरी में जा आए, भगवान शिव अपने चरणों में आने वाले हरेक प्राणी को एक ही वरदान देते हैं और वह है मुक्ति का वरदान। दूसरे गुरु महाराज ने सुगरा कर दिया, भला बताओ नुगरे का भी कोई जीवन होता है ? धना मुस्कुराकर रह गए। धना ने माता को प्रणाम किया। गुरु महाराज के यहां से लाई हुई वैष्णवीय सामग्री माता को भेंट की। सामग्री पाकर उनको स्वयं यह लगा कि वह भी यात्रा कर आई है। जब कुशल मंगल के उपरांत खेत की बात चली तो मां ने बताया कि तुम्हारा रखा हुआ हाली बड़ा स्याना है। अधिक बोलता नहीं, प्रातः काल गायें ले जाता है, खेत को भी रुखाल देता है तथा सायंकाल को गाएं छोड़कर अपने गांव चला जाता है। जिस दिन खेत में गड़े पड़ने वाले थे, उस दिन उसकी चिंता हुई, उसके पास तो भाखला भी नहीं था, गड़ों की चोट लगती, पर भगवान ने गड़े औसरते ही सुनली, केवल तलाई के इर्दगिर्द पड़कर रह गए। पराए आदमी का उलाहना आ जाता। मां की बात से धना को अपने हाली की सुध आई। वह खेत जाने को उतावला हो गया, शीघ्रता से वह अपने गोपाल से मिलना चाहता था। खेत पहुंचा तो देखा गोपाल बहुत मनोयोग से गायों को चरा रहे थे। वह भागकर चरनों में गिरने को हुआ तो गोपाल ने थाम लिया। कहने लगे - धना तुम तो मेरे ही स्वरूप हो, तुमने रामानंदजी को गुरु करके अद्भूत कार्य किया है, अब तुम पूरे वैरागी हो चुके हो। प्रत्युत्तर में धना से कुछ बोल ही नहीं फूट रहे थे, वह भगवान के एहसान के संबंध में कुछ कहना चाहता था, किंतु गोपाल तो मुस्कुराते मुस्कुराते तुरंत अदृश्य हो गए। वह हतप्रभ-सा स्वप्नलोक में विचरता-सा रह गया। श्राद्ध निमंत्रणएक दिन धनाजी तथा उनकी धर्मपत्नी हरिदासी ने परस्पर विचार-विमर्श कर श्राद्ध के दिनों में पितृ श्राद्ध करने तथा इस अवसर पर कुछ संत-साधुजन को भोजन कराने का निश्चय किया। धुआं कलां के निकट एक छोटी पहाड़ी पर कुछ साधु भजन किया करते थे। धना ने वहां पहुंचकर साधुजनों को कल प्रातः उनके निवास पर पधार कर प्रसाद ग्रहण करने का निवेदन किया और यह भी कह दिया कि महाराज और भी कोई साधु मिले तो उन्हें भी साथ ले आइएगा। धना के निमंत्रण पर पहाड़ी वाले साधुगण आ गए और उन्होंने कहा कि हम तो स्वपाकी हैं। आप तो हमें सीधा दे दो, हम अपने हाथ से प्रसाद को पकाएंगे। धनाजी और उनकी धर्मपत्नी हरिदासी को इसमें क्या ऐतराज था, उन्होंने आटा, घी, शक्कर, तरकारी आदि आवश्यक खाद्य सामग्री दे दी। थोडी देर बाद साधुओं की कुछ और मंडली आई तो अपना अहोभाग्य समझते हुए उन्हें भी प्रसाद की सामग्री दे दी, पर धना के यहां आने वाले साधुओं की मंडली का तांता लग गया। घर की खाद्य सामग्री समाप्त होने लगी तो हरिदासी भागकर साहकार के यहां से सामग्री और ले आई. पर उस सामग्री को भी समाप्त होते देर नहीं लगी। साधुजन उस सीधे (भोजन सामग्री) को लेकर गांव में जगह-जगह बैठकर भोजन बनाने लगे। भोजन प्रसादी बनाने वाले साधुओं की इतनी अधिक संख्या हो गई, जिससे गांव में धुएं का चौतरफ धकरोल हो गया। धना ने देखा साधुओं के आने का सिलसिला थम नहीं रहा है तो वह पहाड़ के निकट जाकर छुप गया। अब तो साहुकार ने भी उधार देने से मना कर दिया था। वे समस्त इंतजाम हरिदासी के भरोसे छोड़कर आ गए। उधार लाए सामान को भी समाप्त होते देखकर हरिदासी ने सामग्री के ऊपर तुलसी चढ़ाकर शालग्राम को विराजित कर दिया और कहा- धरणीधर, आपकी माया निराली है, इसे आप ही जानो। यह कहने के बाद सामग्री समाप्त नहीं हुई। हर कोई साधु धना की बड़ाई कर रहा था। "साधुओं ने अपनी-अपनी सामग्री ली और धना के घर के बाहर गांव में जगह-जगह रोटे (बाटे) बनाने के लिए छाणों (कंडों) की धूणी लगाई। इतने साधु आ गए कि पूरे गांव व उसके आस-पास के खेतों में भी जगह-जगह धूणे धुकने लगे। पूरा गांव धुएं में डूब गया। अतः उस दिन से उस गांव का नांव खेरीपुर से धुवां हो गया।" 36 गांव में साधुओं की धूणी का प्रसंग धनाजी के कथानक के संबंध में अन्य अनेक जनश्रुतियों में भी कहा जाता रहा है। सारी जनश्रुतियां इस बात में एकमत हैं कि धनाजी को साधु-सेवा का चाव बाल्यकाल से था और उन्हें ये संस्कार अपने माता-पिता से मिले थे। धनाजी के माता-पिता धनाजीकी युवावस्था में ही हरिशरण हो गए। पहले पिता, फिर मां का भी स्वर्गवास हो गया। साधु निमंत्रण के इस प्रसंग में कहा जाता है कि स्वयं भगवान ने पहाड़ में छुपे हुए धनाजी को ढूंढ़ लिया और कहा कि इस प्रकार साधुओं को निमंत्रित कर सद्गृहस्थ का घर छोड़कर भाग जाना तो अत्यंत लज्जाजनक कार्य होता है, यह तो अच्छा हुआ तुम्हारी भार्या साधुजन हितैषी है, उसने एक भी साधु को भूखा नहीं जाने दिया। उसने सब को तृप्त किया है, पर अब हम सब साधु यहां से अपने-अपने ठौर-ठिकाने जाएंगे, पर बिना चींपी (भेंट) लिए जाएंगे तो तुम्हें प्रसाद करवाने का पूर्ण पुण्य प्राप्त नहीं होगा। अतः चलकर सब साधुओं को कुछ न कुछ भेंट दो। धना सोचने लगा कि साधुओं को कौनसी वस्तु भेंट करे, जो उनके काम भी आए। घर आकर उसने सोचा, साधुओं के लिए जलपात्र के रूप में तबे का बड़ा महत्त्व होता है। गत वर्ष उसके खेत में असंख्य तूबे हुए थे, जिन्हें उन्होंने घर के पिछवाडे में इकट्ठे कर रखे थे। उसने सभी साधुओं को बडे-बडे तुंबे भेंट किए। साधुओं ने देखा कि क्यों न तुंबों की सफाई कर इन्हें जलपात्र के रूप में काम में ले लिया जाए। एक साधु ने तुंबे को चीरा तो वह अन्न से ठसाठस भरा हुआ था। उस साधु के देखादेखी सभी साधुओं ने अपने तुंबों को चीरा तो उनमें भी अन्न भरा हुआ था। साधुओं ने धना के घर में अन्न की ढेरी कर दी और आशीर्वाद देकर, तुंबे लेकर चले गए। धना और उपस्थित जनों ने देखा कि साधु को कराया गया भोजन व्यर्थ नहीं जाता। साधुओं को भोजन कराया था, उससे ज्यादा अन्न तो उन तुंबों से प्राप्त हो गया। धुआं कला क्षेत्र में धनाजी के तुंबों को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं। यह भी कहा जाता है कि धनाजी ने टाँक के नवाब को कुछ तुंबे प्रदान किए, जिनमें से नवाब को बहुमूल्य मोती प्राप्त हुए। उसके बाद नवाब ने धना के खेत का लगान हमेशा के लिए माफ कर दिया। इस क्षेत्र में प्रचलित लोकभजन की पंक्तियों में भी तुंबा का उल्लेख प्राप्त होता है- बनवारी म्हारा लाल थानै सोच भगत का लाग्याधना भगत की खेती निपजाग्यागांव धूवा में आग्यालेय 'र बीज साधां नै बांट्यातुंबा में मोती निपजाग्यासोच भगत का लाग्या धनाजी का बाल्यकाल बड़ा चमत्कार पूर्ण रहा। वे संतों को देखते ही उदार तथा भाव विगलित हो जाया करते थे। अपनी माता की अनुपस्थिति में वे संतों को दूध पिला देते थे, रोटियां खिला देते थे, किंतु ये चीजें कभी कम नहीं पड़तीं। ” उनका अतिथि सत्कार बड़ा गजब का था। धुंआ क्षेत्र में यह किंवदंती भी प्रचलित रही है कि धनाजी ने टाँक के नवाब को जो तुंबे भेंट किए, उनमें बेशकीमती मोती निकले, जिससे उपकृत होकर नवाब ने धुंआ कलां के निकट एक तालाब का निर्माण करवाया, जिसे मोतीसागर नाम दिया गया। यह भी प्रचलन में रहा है कि धर्मपत्नी हरिदासी की प्रेरणा से धनाजी ने अपनी माता की स्मृति में एक छतरी का निर्माण भी कराया। भक्त धनाजी की निष्ठाएंबाल्यकाल से ही धनाजी का जीवन कतिपय निष्ठाओं से ओत-प्रोत है। वे भगवान श्रीकृष्ण की ही भांति बाल्यकाल से गो-चारण में लग जाते हैं। कल्याणमयी गोओं का बाल्यकालीन सान्निध्य बुद्धि को पवित्र कर परमात्मा में लगाता है। भगवान श्रीकृष्ण की ही उम्र में धनाजी भी गायें चराने जंगल में निकल जाते। उनके संपूर्ण जीवन में कृषि एवं गोरक्षा के कर्म, भक्ति में कहीं भी आड़े नहीं आते हैं। धनाजी की गायों को जो आनंद प्राप्त हुआ, वह तो दुर्लभ कोटि का था। स्वयं गोपाल ने उनकी गायों को चराया। धनाजी की गायें चराने के लिए ठाकुरजी लालायित रहते हैं। यह कार्य उन्होंने दो बार किया। पहले सखा बनकर गायें चराईं। दूबारा धनाजी के काशी गमन पर हाली बनकर यह कार्य किया। सदैव संत सेवा में डूबे रहने वाले धनाजी दंपती के लिए उनकी गायें बड़ा सहारा थीं। वे घी-दूध से संतों की सेवा कर पाते। संतों की सेवा के कारण उनके घर में घी दूध-दही आदि के गो-रस भंडार अक्षय रूप से भरे हुए रहते। अनेक बार उनकी भार्या हरिदासी अन्न न रहने पर दूध-दही से संतों की सेवा कर दिया करती, फिर भी इनका भंडार अक्षय रहता। परदुख-कातरता धनाजी में अत्यधिक भरी हुई थी। वे किसी के किंचित दुख को भी देख नहीं पाते थे। उनकी भक्ति भी लोकमंगल पर्यवसायिनी है। बालवय में वे सत्य स्वरूप परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त कर चुके थे। एक ब्रह्मदर्शी को अथक प्रयास के बावजूद जो नहीं प्राप्त होता, उसे तो उन्होंने अपनी एकल निष्ठा के माध्यम से बहुत पहले प्राप्त कर लिया था, फिर भी वे सेवा और भक्ति के मार्ग का परित्याग आजीवन नहीं करते हैं। यहां उनकी परम भागवती निष्ठा कार्य कर रही है। भक्ति में आनुकूल्य भाव को तो वे छह-सात वर्ष की लघु वय में ही जान गए थे। जीवमात्र के प्रति उनकी सदाशयता थी। भक्तमाल के टीकाकार प्रियादास कहते हैं- 'पाथर लै दियो, अति सावधान कियो, छाती मंह लाय जियो सेवै जैसी नेह नीति है।' ऐसी स्वीकारोक्ति और कहां प्राप्त होगी। शालग्राम पत्थर का सेवन वैसे ही करना है जैसे कोई अपने जी का करे। कोई संशय नहीं, पंडित की इस हिदायत को बालक धना ने पूरी की पूरी हृदयंगम कर ली। अब दूजा भाव कौन रखे। यह गोल-गोल शालग्राम ही ठाकुरजी हैं। ठाकुरजी चाहे अश्म के हों अथवा प्राकट्य रूप में, धना में दोनों के प्रति निष्ठा में कोई अंतर नहीं। भगवद् नेह नीति का पालन संपूर्ण जीवन किया। इसीलिए उनके इस नेह पालन के लिए प्रियादास कहते हैं- 'प्रीति रीति कछु न्यारियै।' धनाजी इस करुणा से आप्लावित थे कि उनके स्वजातीय जन भी भगवद् प्रपत्ति को जाने। इसलिए उन्होंने धनावंश की स्थापना की और उनसे नेह नीति के पालन की कामना की। भगवान अपने भक्त धनाजी के संबंध में यह जान गए कि मेरे प्रेम में विह्वल इस साधक के लिए मेरी माया को तैरना 'दुरत्य' नहीं है, क्योंकि इसके भजन में नैरंतर्य है, प्रपत्ति से बढ़कर शरणागति है। अब इसके लिए कुछ भी शेष नहीं है। पर भगवान अपने भक्त से कुछ अलग चाहते थे। इसलिए वे इतने आत्मरत भक्त को भी कुछ अलग आदेश प्रदान करते हैं- 'धना कौ दयाल व्है कै, आज्ञा प्रभु दई ढरौ, करौ गुरु रामानंद, भक्ति मति हरी है।' उपरोक्त आज्ञा में भगवान, रामानंदाचार्य की भी प्रतिष्ठा तथा महत्त्व प्रतिपादित करते हैं। भारत-भू पर आताताइयों के बढ़ते अनाचार के अनंतर रामानंद का प्राकट्य धार्मिक मर्यादाओं के पुनर्स्थापन हेतु संजीवनी की भांति था। कलिकाल के प्राबल्य में रामोपासना ही एकमात्र संतरण की नाव थी और इस नाव के खेवटिया रामानंदजी थे। भक्ति के विराट संप्रसारक रामानंदजी से धनाजी को मिलाना भी भगवदेच्छा थी। रामानंद ही भक्ति में डूबे धना को संप्रदाय का महत्त्व समझा सकते थे। भगवान ही चाहते थे कि धना केवल स्व. कल्याणार्थ भक्ति करके न रह जाय, भक्ति मार्ग विस्तृत होना चाहिए। महाभागवत कोटि के जन इस मार्ग का उत्तरोत्तर विस्तार करते हैं। रामानंदजी से दीक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा के पीछे भगवान का यही मंतव्य था। बाल्यकाल में ही संसार का छद्मावरण भंग कर चुके भक्त को इतनी दूर काशी तक जाने की प्रेरणा देने के पीछे निहित्त उद्देश्य था। रामानंद इस भारत भू पर अपने शिष्यों के माध्यम से धर्म की अवतारणा, पुनर्व्याख्या तथा विस्तार कर रहे थे। उनके अन्य शिष्यों की भांति धना भी उसमें योग कर सकते थे। दिव्य दृष्टि प्राप्त रामानंद जैसे धनाजी का इंतजार ही कर रहे थे। धनाजी के पहुंचते ही उन्हें छाती से लगाय, सिर पर वरदहस्त रख दिया। 'भए शिष्य जाय आप छाती सों लगाय।' ये सब क्रियाकलाप महज संयोग मात्र नहीं थे। रामानंद, धनाजी के लिए भगवान से तनिक भी कम नहीं थे। भक्त धना की कीर्ति से श्री रामानंदजी भली प्रकार सुपरिचित थे। राजपूताना में भक्ति प्रसार के लिए धना जैसे तेजस्वी संतों की जरूरत महसूस करते थे- रामानंदजी। आचार्य के रूप में रामानंदजी की नियामक भूमिका को यहां देखा जा सकता है। स्वयं श्री संप्रदाय में दीक्षित होने के बावजूद उन्होंने शिष्यों के सगुण-निर्गुण भाव पर अधिक ध्यान नहीं दिया। यही नहीं, गृहस्थी और गृहत्यागी का भी उनके यहां कोई विचार या आग्रह नहीं था। भारतीय समाज की सामाजिक संरचना पर उनकी गहन दृष्टि थी। उनकी लड़ाई केवल मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा उपस्थित स्थितियों मात्र से नहीं थी। भारतीय जन के तात्कालिक आंतरिक विक्षोभ तथा आचरण शैथिल्य को भी समझ रहे थे। सत्य की प्रतिष्ठा के लिए उन्हें कबीर, रैदास, सेन, धना, पीपा जैसे शिष्यों की बहुत आवश्यकता थी। रामानंद को पता था कि धना एक वृहत्तर समाज से हैं, जहां अब तक कोई लोकमान्य प्रतिष्ठित संत नहीं हो पाया है और यह बड़ा समाज अनेक विसंगतियों का शिकार होकर अपनी निर्मलता को खो रहा है। कहना न होगा, रामानंद के विस्तारवादी सोच में धना कहीं न कहीं उपयुक्त सिद्ध हो रहे थे। सरल से स्वभाव वाली, कृषि जैसे उत्तम कर्म में लगी जाट जाति को धना सत्य अनुप्राणित आत्मविचार दे सकते हैं। इन सब बातों को सोचकर रामानंदजी ने धना को अनंतानंदजी के साहचर्य में छोड़ दिया। रामानंदजी सतसई में उल्लेख है : धना आयउ हरषजुत कासी राम दुआरि।मिलेउ अनन्तानंद सों स्वामी कहत बिचारि ।। धना को अनंतानंदजी से मिलवाने का तात्पर्य, आधुनिक भाषा में ट्रेनिंग (यानी पांथिक प्रशिक्षण) देना कह सकते हैं। भक्ति प्रसार के साथ-साथ लोक कल्याण के भाव का प्रसार हो, युग प्रवर्तक रामानंदजी का यह भी महत्त उद्देश्य था। गुरु की भावना का धनाजी ने आदर किया और धनावंश की स्थापना की। प्रारंभ में गृहस्थ में रहते समय ही उनकी पहचान एक वैरागी के रूप में हो चुकी थी। उनकी निष्ठा साधपन में थी। गुरु ने उन्हें 'नाम जप' की जो सीख दी, उसका पालन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कहते हैं, धना ने इतना अधिक नाम स्मरण किया और करवाया जिससे उस काल में अनेक किंवदंतियों का निर्माण हो गया। जैसे धना से संबंधित किंवदंती है कि 'नाम लियां हर तारे।' यानी मुक्ति का एकांगी साधन प्रभु स्मरण, नाम जप है। धनावंश की स्थापना के बाद भी उन्होंने हरि कीर्तन पर अधिक जोर दिया। धनावंश में तब से अद्यावधि हरि कीर्तन की एक परंपरा-सी पड़ गई। धनाजी का अपने सद्गुरु के प्रति सदैव निष्ठाभाव रहा। उन्होंने जो-जो कहा, उसे अक्षरशः पूरा किया। गुरुजी ने गृहस्थ में रहकर साधु-सेवा का कहा तो उसमें किसी बात की कमी नहीं आने दी। आभ्यंतरिक शुद्धि के लिए धना का अन्न खाना एक मिथक बन गया। दूर-दूर से साधुजन धना के गांव खेरीपुर की यात्रा करने लगे। धना भक्त की रोटी पाने के लिए जगत हाथ पसारने लगा। धना के अन्न में इतनी पवित्रता के भाव क्यों थे ? कहा जाता है कि खरी कमाई का अन्न पवित्र होता है। धनाजी के संबंध में कथा प्रचलित है कि वे जब अपने खेत में हल चलाते तो निरंतर राम-राम रटते हुए बीज बीजते। फिर खेत की निराई-गुड़ाई राम-राम करते करते और इसी राम-राम के साथ खलिहान निकालते। उनके द्वारा पैदा किए हर अन्न कण में राम नाम की ध्वनि भर जाया करती। खेती के हर कार्य में 'रामभणत' की परंपरा के पीछे यही उद्देश्य रहता है कि उसमें पवित्रता समाविष्ट हो जाए। धनाजी के संपूर्ण चरित्र में एक चीज बहत अधिक स्पष्ट नजर आती है, वह है-उनकी स्वाभाविक भक्ति। कहीं कोई तैयारी नहीं, प्रयास नहीं, स्वाभाविक रूप से हो जाने वाली भक्ति। वह भक्ति उनकी दिनचर्या का एक भाग है। उसके लिए गृहस्थ का त्याग या संन्यास, वैराग्य को अपनाना नहीं है। किसी एकांत को नहीं ढूंढ़ना है। गणेशदास भक्तमाली ने उनकी इस भक्ति को 'स्वाभाविकी भक्ति' नाम प्रदान किया। सप्रयास से इतर जो भक्ति हो जाए, उस मनमौजी की भक्ति को हम साधना भी नहीं कह सकते। धनाजी साधक भी नहीं कहलाना चाहते। वस्तुतः उनके जीवन का ध्येय ही भक्ति है, तब धनाजी का आग्रह अपने नव प्रवृत्तित धनावंशी साधों से भी स्वाभाविकी भक्ति का रहा। यही कारण रहा कि धनावंश में धर्म-अध्यात्म को लेकर आनुष्ठानिक कर्मों का अधिक प्रवेश आज तक भी नहीं हो पाया है। गुरु आज्ञा का पालन करना था, इसलिए धनाजी उत्तर दिशा के जाट बहुल क्षेत्र में पंथ संस्थापन के लिए आए। फिरवांसी में उन्होंने शालग्राम देकर यही कहा कि भूखों को भोजन देवो और ठाकुरजी को अपना सर्वस्व मानो। एकदम अनभिज्ञ और वैरागी कर्मों को लेकर असमंजस से भरे लोगों ने जब जोर देकर कहा कि हम अपनी विलग पहचान कैसे स्थापित कर पाएंगे, तब उन्होंने एक निष्ठावान वैरागी के 21 सूत्र कहे, जिनमें से अधिकांश सूत्रों का परिपालन धनावंशी आज तक करते आए हैं। पंथ में बहुत-सी धार्मिक अन्य प्रवृत्तियां तो बाद में जुड़ती गईं। एक पंथ के अपने विधान और आचार होते हैं, जिनमें बहुत कुछ नया जुड़ता जाता है और बहुत पुराना छूटता रहता है। जिस प्रकार गणेशदास भक्तमाली ने धनाजी की भक्ति को स्वाभाविकी भक्ति का नाम प्रदान किया, उसी प्रकार रामस्नेही संत दयालुजी महाराज (द्याल बाल) ने धनाजी की भक्ति को 'परसापरस' भक्ति का नाम दिया। परस्पर स्पर्श की भक्ति। दूर-दूर की भक्ति नहीं। इतनी नजदीक की भक्ति की भक्त हाथ बढ़ाकर भगवान का स्पर्श करले। भक्ति में ऐसा विरद धनाजी जैसे विरल भक्तों को ही प्राप्त है। यह तो समर्पण से भी आगे की निष्ठा है। भक्ति नामक संज्ञा को धनाजी ने एक नव आयाम प्रदान किया, जिसे हम कोई सुसंगत नाम भी नहीं दे सकते। उनकी परम भागवती निष्ठा को प्रणाम ही किया जा सकता है।
अध्याय: पंचम :- धनावंश की स्थापना
अध्याय : पंचम - धनावंश की स्थापना यह जानना बहुत दिलचस्प है कि धनावंश के पंथ प्रवर्तक भक्त शिरोमणि धनाजी महाराज ने नव पंथ स्थापना के लिए टॉक क्षेत्र के धुआं कलां गांव से चलकर थली प्रदेश की ओर रुख क्यों किया ? अपने वैकुंठ धाम गमन से पूर्व श्री रामानंदजी ने देश में धार्मिक पंथों के माध्यम से धर्म-अध्यात्म की स्थिति कायम करने के लिए अपने शिष्यों तथा प्रशिष्यों को यह आदेश प्रदान किया कि अनेक पंथों की स्थापना के माध्यम से भारतवर्ष में धर्म का व्यापक प्रसार करना है। वे मुस्लिम आक्रांताओं की हिंदू धर्म विरुद्ध कट्टरता से भीतर ही भीतर दुखी थे। भविष्य पुराण में उल्लेख है कि उन्होंने धर्म परिवर्तन कर मुसलमान हो चुके हिंदुओं को अयोध्या में पुनः कंठी-माला प्रदान कर वैष्णव बना दिया था। भारत की धार्मिक स्थितियों का रामानंद ने गहन अध्ययन किया। वे भारतीय जन का और अधिक अहित नहीं देखना चाहते थे, इसलिए अपने सभी शिष्यों को इस प्रकार की आज्ञा दी कि उदारतापूर्वक अपनी जाति-समुदाय अनुयायियों में धर्म एवं भक्ति का प्रसार करो। न केवल वैष्णव संप्रदायों में यह सीख काम करती रही बल्कि वैष्णेतर अन्य संप्रदाय भी सोलहवीं सदी और उसके बाद भी बड़ी मात्रा में अस्तित्व में आए। रामानंद का भक्ति के क्षेत्र में जो उदार दृष्टिकोण था, उससे अनेक सांप्रदायिक पंथों को आगे बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त हुई। ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, जुलाहा, नाई, चमार सभी उनके शिष्य बने। उन्होंने अपने शिष्यों की स्वतंत्र भक्तिधारा को कभी बाधित करने की चेष्टा नहीं की, न ही उन्हें रामावत संप्रदाय में दीक्षित होने के लिए बाध्य किया। "यही कारण था कि रामानंद से प्रेरणा पाकर मध्ययुग में भक्तों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो गया, जो पददलित जातियों को समान रूप से भक्ति का अधिकारी मानता था। ऐसे भक्तों में कबीर, रैदास, सेन, धना और पीपा आदि प्रमुख हैं। रामानंद ने स्त्रियों के लिए भी भक्ति का द्वार खोल दिया था। पद्मावती और सुरसुरी उनकी दो प्रसिद्ध शिष्याएं थीं। कहा जाता है कि खान-पान के संबंध में भी रामानंद का दृष्टिकोण बहुत ही उदार था। वे छुआछूत को नहीं मानते थे। लगता है रामानंद हृदय की विशुद्धता पर अधिक बल देते थे, बाह्याचार पर कम।"' धनाजी जाट जाति से थे। जाटों में उस समय धर्म तथा अध्यात्म की ओर उन्मुखता न के बराबर थी। धनाजी के मन में अपनी जाति की धार्मिक स्थिति को लेकर संकोच था, पर उन्हें गुरु आज्ञा हई कि अपनी जाति समुदाय में धार्मिक संप्रदाय की स्थापना कर उन्हें वैष्णवता का मार्ग दिखलाओ। ऐसी गुरु आज्ञा देने के पीछे भारत भ्रमण कर चके रामानंदजी को भली प्रकार मालूम था कि राजपूताना में जाट एक बड़ी जाति है, किंतु अनेक जातीय नखों में बंटी यह जाति केवल कुछ देवपूजन के अलावा आध्यात्मिक समझ से विरत है। अनेक जनपदों तथा लघु मांझरों में विभक्त जाट समुदाय परस्पर विग्रह तथा अनेक प्रकार की अराजकताओं से ग्रस्त था। बहुलता की ताकत रखने के बावजूद वह अपना संगठित राज्य कायम नहीं कर सकी। तेजा, बिग्गा जैसे वीरों को लोकदेवताओं की मान्यता देने वाली इस जाति में विधिवत वैष्णवता के संस्कार उत्पन्न हो तथा यह बड़ा समुदाय अपनी एक आध्यात्मिक समझ और पहचान कायम करे तथा लोक कल्याण का दृष्टिबोध पैदा हो, इसी उद्देश्य से अनुप्राणित होकर रामानंदजी ने धनाजी को भी जाट समाज में हरिभक्ति का मार्ग प्रशस्त करने की आज्ञा प्रदान की। किसानी तथा पुशपालन में निमग्न इस जाति को भक्ति-वैराग्य की ओर उन्मुख करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। गुरु आज्ञा थी कि अपनी जाति का कल्याण करो, तो धना के मानस में जाट बाहुल्य थली, सवालख प्रदेश ही आया। किशोरवय से संत समागम, सत्संग आदि करने का आपका अभ्यास रहा था। युवाकाल में ही उन्हें अपनी जाति के लोग तथा ग्राम के दूसरे लोग मोडा (स्वामी) कहने लगे थे। वैराग्य से ओतप्रोत धनाजी को मोडा संबोधन से न व्यंग्य लगता और न ही चिड़ होती। स्वयं उनके खेत की हालिन ने क्रोधवश अपने पति से कहा- "ऊ तो मोड्यो, मांग रु लासी।" 2 मतलब वह तो मोडा (वैरागी) है, मांगकर ले आएगा, पर तू क्या खाएगा ? हालिन के इस कथन से जाहिर होता है कि युवाकाल में ही लोग उन्हें वैरागी समझने लगे थे। ऐसे वैरागी धना के समक्ष अपने ही स्वजातीय बंधुओं में भी वैराग्य भाव पैदा कर देने की सात्विक चुनौती थी। उनके गुरु ने तो बहुत बड़ी चुनौती झेलकर दिग्विजयी यात्रा की थी। धर्मोद्धार के भावों से अनुप्राणित होकर धनाजी ने अपने गांव खैरापुर (वर्तमान धुआं कलां) से निष्क्रमण किया। सत्संग करते-कराते वे साधुपुरा आए। यहां उन्होंने परख के भाव से सत्संग कराई, पर पंथ की बात कह नहीं पाए। इस गांव के सभी जनों ने भगवान के एक महान भक्त का दर्शन पाकर स्वयं को धन्य समझा।इस समय वैष्णव साधुता धारण किए लोगों का विशेष सम्मान था। साधूपुरा में जाट जाति का बाहुल्य नहीं था। वे थली के उस क्षेत्र में जाना चाहते थे जहां जाट जाति का बाहुल्य हो तथा राजनीतिक द्वंद्र भी कम हो। उस समय ऐसा क्षेत्र थली प्रदेश ही था। थली जाट जाति का विस्तृत भूभाग था तथा अनेक बड़े जाट नखों की यह धरती थी। उस समय थली प्रदेश के संबंध में एक कथन प्रचलित था- 'थळ गोकळ'। यानी थली प्रदेश की पवित्रता ब्रज के गोकुल समान थी। इसी प्रदेश को 'सोन थळी' भी कहा जाता था। अर्थात स्वर्ण प्रदेश। राजस्थान का वर्तमान नागौर, लाडनूं, सुजानगढ़, बीदावाटी का क्षेत्र सोनथली कहा जाता था। थली के निकट का क्षेत्र सवालख कहा जाता था, जिसमें जायल, रोल, मूंडवा, कुचेरा, इनाणा, भाकरोद, भदादा, जनाना आदि क्षेत्र आता था। थली और सवालख दोनों ही जाट बाहुल्य क्षेत्र रहे हैं। कहा जाता है, अकाल या अन्य किन्हीं विषम परिस्थितियों में धनाजी के पूर्वज भी थली से टाँक क्षेत्र में गए थे। धनाजी सत्संग करते-कराते थली क्षेत्र में आए। इस क्षेत्र में उन्होंने कुछ दिन गुजारे। ये ही दिन धनावंश स्थापना की प्रेरणा और आचार बने। वे सबसे पहले लाडनूं क्षेत्र के फिरावांसी गांव में अपने सजातीय लोगों को जीवन के आदर्श आचरण, वैराग्य के सुंदर गुण, भगवद्लीला के आश्रित होने के लाभ, गृहस्थ में रहकर भक्तिमय जीवन जीने तथा अंत में वैकुंठ धाम में भगवान का सायुज्य प्राप्त करने की बात समझाने में सफल हुए। उपस्थित जन उनकी सुंदर एवं कल्याणमयी वाणी सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। संतुष्टजनों ने धनाजी से पूछा कि आज हमारे भीतर आपने जो भगवद् संबंधी भाव उत्पन्न किए हैं, वे स्थाई रूप से कैसे बने ? हमें आपने जो श्रीराम मंत्र का उपदेश प्रदान किया है, वह सदा ही हमारा पाथेय कैसे बने, हमारे सभी पाप भस्म कैसे हों, वह उपाय बताएं ? धना समझ गए कि धरणीधर स्वयं ही उनका मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। उन्होंने कारुणिक होकर कहा कि जो अपने अंगपर तप्त छाप धारण कर लेता है, उसके समस्त पाप स्वतः ही भस्म हो जाते हैं। उन्हें नरकलोक का भय भी नहीं रहता- जो धरणीधर की छाप (तप्त मुद्रा) झेलता है, वह तीन लोक में निर्भय होकर जीवन व्यतीत करता है। उपस्थित जनों ने धनाजी के समक्ष अपनी और जिज्ञासाएं रखते हुए कुछ आचारों के संबंध में जानना चाहा - धना अधिक कुछ शास्त्रीय और तात्विक बातों को बताने की बजाय वैराग्य जीवन की इक्कीस बातें बताने लगे- (1) भगवान धरणीधर की ही सर्वत्र लीला है। वे ही हमारे मीत हैं। (2) अतिथि सेवा में दूजा भाव मत धरो। (3) हर भूखे प्राणी को भोजन देवो, उसकी पोखना करो। (4) किसी जीव को मत मारो। (5) ठाकुरजी का ध्यान ही संध्या-वंदन है, दोनों वक्त संध्या-वंदन करो, यह वैरागी का धर्म है। (6) साच का साफ और हाथ का साथ करो। (7) सवेरे का धूप, ध्यान नहाकर करो तो सायंकाल का हाथ-पैर मुंह धोकर। (8) वैरागी का दर्शन कल्याणकारी है, वैरागी को मान दो। (9) हरिकीर्तन ही पूंजी है, जितनी इकट्ठी कर सको, करो। (10) ठाकुरजी के कल्याणप्रद दर्शन के बाद ही सारे कार्य करो। (11) धर्मात्मा गुरु और भगवान में समान भाव रखो। साध को भगवान कर पूजो। (12) धरणीधर की छाप ही वैरागी बनाती है। छाप, तिलक, कंठीमाला, चोटी ही वैरागी का आभूषण है। (13) भगवान का ही नशा करें, अन्य नशा न करें। (14) चोरी-जारी का गुनाह, बड़ा पाप। (15) मोटा न्याय भगवान की थळी अर्थात भगवान के मंदिर की चौखट से बड़ा कोई न्याय स्थल नहीं है। (16) पीपल में विष्णु का वासा अर्थात पीपल लगाएं तथा पीपल का पूजन करें। (17) हलोतिये चीड़ी-कीड़ी का भाग अर्थात फसल में चिड़ियों एवं चींटियों का भाग होता है। (18) अमावस-पून्यू थेऊ, अमावस्या पूर्णिमा को थेऊ रखना चाहिए। (19) ग्यारस का व्रत राखणा अर्थात एकादशी का व्रत रखें। (20 ) संतोषी है सो ई स्यामी यानी वैरागी को हमेशा संतोष रखना चाहिए। (21) वैरागी के शोक नाहीं अर्थात वैष्णव को किसी के देवलोक गमन पर शोक नहीं रखना चाहिए। ध्यान रखें कि वह प्राणी भगवद्धरणों में निवास करने गया है। धनाजी की यह इक्कीस सीख सभी उपस्थित जनों को आत्मोत्थान करने वाली लगीं। उपस्थित लोग धनाजी के अनुयायी बन गए। उन्हें धनाजी की जीवनचर्या भी उत्तम प्रतीत हई। उन्हें लगा कि इस वैरागीपन में बडा सुख है, इन्हीं दिनों में उनका आगमन शोभासर, तंवरा, भीडासरी, खारिया आदि गांवों में भी हुआ। जिन स्वजातीय लोगों को उनके वचनों में विश्वास हुआ, वे उनके अनुयायी बन गए। धनाजी के वचन मानकर उन्हीं के नाम को पंथ का नाम दे दिया। अनुयायियों का यह पंथ धनावंश बन गया। घर में एक व्यक्ति को निहंग भी रखने लगे। कंठी धारण किए देखकर तत्कालीन जागीरदारों, राजाओं ने भी बतौर वैरागी सहयोग और सम्मान प्रदान किया। ठाकुरजी के मंदिरों की स्थापना भी होने लगी। यथासंभव मंदिर का पुजारी निहंग रहा करता, किंतु रहता वह परिवार में ही था तथा परिवार ने कृषि कर्म का भी परित्याग नहीं किया। धनावंश के प्रारंभिक गांवों में साधुपुरो, तरणाऊ, कसूंबी, धोलिया तथा सारड़ी भी है। देखादेखी धनावंश का विस्तार होने लगा। राजाओं की ओर से धनावंशी वैरागी को विभिन्न प्रकार के कर तथा बेगार में भी छूट थी। धनावंशी वैरागी के प्रति राजाओं के मन में यह भावना थी कि वे हमारे पुण्य का वर्धन करते हैं। राजाओं की बहियों में अनेक जगह इस आशय के लेख प्राप्त होते हैं। संवत 1532 में श्री धनाजी महाराज द्वारा की गई यह यात्रा पंथ स्थापन के निमित्त थी और वे अपने ध्येय में भली प्रकार सफल हुए। गुरुजी को दिया वचन पूर्ण हुआ। निश्चय ही गुरुजी का सूक्ष्म अभौकित वपु प्रसन्न हुआ होगा। एक सहज भक्त के रूप में धनाजी की ख्याति तो चौफेर पहले से ही थी। जाट समुदाय में उनकी भक्ति सुवास धीरे-धीरे प्रसरित होने लगी। न केवल राजस्थान बल्कि दूर-दूर के क्षेत्रों में धनाजी की निर्मल, भक्त छवि प्रसिद्धि पा चुकी थी। भक्तों में एक धारणा बन चुकी थी कि धना के हाथ से चौथाई रोटी का टुकड़ा खा लेने भर से पूर्वकृत विकर्म नष्ट हो जात हैं। 5 भगवद् निष्ठा में आकंठ डूबे धनाजी को अपनी प्रसिद्धि से कोई मोह नहीं था। रामानंदजी ने धनाजी को सीख में यह कहा था- सहजै सहजैं सब गुण जाइला।भगवंत भगत ए थिर थाइला ।। मुक्ति भइला जाप जपीला।यों सेवग स्वामी संगि रहीला ।। अमृत सुधा निधि अंत न पाइला।पीवत प्राण न कदै अघाइला ।। रामानंद मिली संगि रहला।जब लगि रस तव लगि पीवेला ।। धनाजी महाराज किसी शास्त्रीयता के फेर में नहीं पड़े। उन्होंने गुरु आज्ञानुसार सहज भक्ति का ही प्रसार किया। अपने अनुयायियों को गृहस्थ में रहते हुए, भगवद्दास होकर साधपन अंगीकार करने का उपदेश प्रदान किया। कृषि कर्म करते हुए इन श्रद्धासिक्त नव वैरागियों के सम्मुख यह भक्ति मार्ग कोई कठिन नहीं था, बल्कि राहतकारी और सम्मानजनक था। भगवान का दास होकर रहना है, बाकी तो 21 धारणाएं कोई कठिन नहीं थी। भावनाशील लोगों (जाटों) ने साधपन की अंगीकृति में अधिक विलंब नहीं किया। जिस परिवार का मन मांगा और उन्हें इस नव पंथ वरण में सरलता महसूस हुई, उसने धनावंशी साध होने में कोई विलंब नहीं किया। उस समय जन संकुलता अधिक नहीं थी, फिर एक गांव में एक-दो परिवारों ने ही साधपन अंगीकृत किया, किंतु राज्य की ओर से, समाज की ओर से भी यही मान्यता थी कि साध तो गांव में मंदिरों के अनुकूल होने चाहिए। एक-दो मंदिर होने पर उन्हें शासन की ओर से पेटिया, लगान माफी, डोली भूमि जैसी सुविधाएं दी जा सकती थीं। जातीय बहुलता के बावजूद प्रत्येक गांव में एक-दो परिवार इस बात के लिए सहमत हो गए कि वे पूर्ण रूप से खेती एवं पशुपालन जैसे पारंपरिक कार्यों को यथावत रखते हुए साधपन भी रखेंगे और ठाकुरजी का पूजन करेंगे। यह परिवर्तन तत्कालीन शासक वर्ग को अनुचित नहीं लगा, इसलिए उन्होंने कोई दखल इसमें नहीं किया। धनावंश का प्रवर्तन मोहिलवाटी में हुआ, जहां मोहिल नख के चौहान राजपूतों का राज्य था। मोहिलों की सदाशयता तथा धर्मप्रियता सदैव से रही है। तत्कालीन समय में मोहिल चौहानों का राज्य पूर्व में नेछवा, उत्तर में रिणी, पश्चिम में रासीसर तथा दक्षिण में ओडींट गांव तक था। बताया जाता है कि उस समय मोहिलों के 1440 गांव थे।' छापर और द्रोणपुर गांव मोहिलों की राजधानी थे। बाद में मोहिलों को विजित कर जोधपुर के तत्कालीन शासक राव जोधा के पुत्र राव बीदा इस भूमि पर काबिज हो गए। बीदा के आधिपत्य के उपरांत मोहिलवाटी, बीदावाटी कहलाने लगी। अजब संयोग है कि संवत 1532 में मोहिलवाटी क्षेत्र में धनावंश की स्थापना हई और इसी वर्ष फागुन मास में यानी धनावंश की स्थापना के कुछ माह बाद राव बीदा ने द्रोणपुर पर अपना आधिपत्य कायम किया। इस संबंध में कहा जाता है- पनरै सौ बत्तीस में, फागण मास उजाळ।बीदै दाब्यो द्रोणपुर, ग्यारस बार गुरुवार ।। हालांकि बीदा द्वारा मोहिलवाटी को जीतने के संवत के संबंध में इतिहासकार एकमत नहीं है। कुछ इतिहासकार संवत 1541 में राव बीदा का राज्य स्थापित होना मानते हैं। वस्तुतः मोहिलों ने हार के बाद भी अपने राज्य को पुनः प्राप्त करने के प्रयास छोड़े नहीं। इतिहासकार मुहणोत नैणसी के अनुसार इस धरती पर लगभग 900 वर्षों तक मोहिलों का राज्य रहा। मोहिलवाटी में लाडनूं सबसे प्राचीन शहर था। चांपा सामौर की वंशावली के अनुसार चौहानवंश बागड़ प्रदेश से इस क्षेत्र में आया और दररेवा के चाहिल, सीकर के जोड़ तथा निर्वाण और छापरवाटी के मोहिल चौहानों के रूप में यह जाति विभक्त हो गई। कर्नल टॉड के अनुसार मोहिल तत्कालीन राजपूताना के 36 प्रमुख राजकुलों में से एक थे। उस समय मोहिलों के संबंध में यह कहा जाता था कि- मोहिल मोटा राजवी, ठकुराई ठावे।छापर ताल चरंतियां, भटनेर ने भावे ।। मोहिलों ने बागड़ियों, जोहियों तथा जाटों से भी एक बड़ा भूभाग छीना। उस समय मोहिल एक बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति थी। मेवाड़ के शासक राणा कुंभा ने भी मोहिलों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए और राव जोधा ने भी अपनी पुत्री का विवाह मोहिल अजीत के साथ किया और बाद में मोहिलवाटी को प्राप्त करने की नीयत से उसका छलपूर्वक वध किया। यहां हमारा उद्देश्य मोहिलवंश के इतिहास को प्रस्तुत करना नहीं है, वरन तत्कालीन राज्य सत्ता के आलोक में यह बताना है कि इस क्षेत्र में धनावंश का प्रचार-प्रसार तथा संगठन बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के हुआ और बाद में यह आगे से आगे विस्तार पाता गया। हर जगह सत्तापक्ष चाहे राजा हो या जागीरदार उनकी अनुग्रहपूर्वक भावना धनावंश के साथ रही। धीरे-धीरे एक-एक गांवों में धनावंशी परिवारों की वृद्धि होती गई तो समाज ने धार्मिक पंथ के दृष्टिकोण से एक-एक कर महंतद्वारों की स्थापना भी की। परिवारों में जो एक व्यक्ति निहंग रखने की परंपरा थी, धीरे-धीरे वह परंपरा ध्वस्त होकर केवल महंतों के निहंग रहने तक महदूद हो गई। पैंतीस धनावंशीय गांवों के गुरु पक्षीय धार्मिक संस्कारों को संपन्न कराने के लिए एक-एक महंत मंडल बनाया गया। एक मंडल महंत की अपने क्षेत्र के धनावंशी समुदाय पर गहरी पकड़ थी तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य को तुलसी की कंठी पहनाकर महंत उसे वैष्णवी दीक्षा प्रदान करने तथा सुगरा बनाने का कार्य करते। महंत गुरु के रूप में प्रत्येक शिष्य को एक गोपनीय तारक मंत्र प्रदान करता। महंतजी से कंठी लेने का चाव सात-आठ वर्ष के बालक में ही पैदा कर दिया जाता। पारंपरिक तप्त छाप लेने के लिए युवा अपने घरवालों को बिना बताए द्वारिका अथवा अयोध्या को चले जाते। बाहु पर जन्मभर दिखने वाली तप्त छाप उसके पक्का वैष्णव होने का प्रमाण हुआ करती थी। तप्त छाप, कंठी, तिलक आदि का विस्तृत विवरण आगे प्रस्तुत करेंगे। धनाजी ने अपने अनुयायियों को परमोपासक के रूप में सीतारामजी, राधाकृष्णजी, नृसिंहजी, चतुर्भुज आदि किसी भी वैष्णव स्वरूप पर अपनी श्रद्धा टिकाने का आदेश दिया। धनाजी की भक्ति सखा भक्ति थी। उनका मानना था कि परमात्मा से मैत्री भाव स्थापित कर उन्हें शीघ्र प्रसन्न किया जा सकता है। भक्ति के आदर्श उच्चतम होने चाहिए तथा भगवद् स्मरण से आत्म परिष्कार किया जा सकता है। धनावंश पंथ संस्थापन के थोड़े ही काल पश्चात धनाजी इस लोक का परित्याग कर गए। कालांतर में सभी संप्रदायों में अन्य धार्मिक मत, दर्शन और मान्यता के प्रभाव पड़ते ही हैं, धनावंश में भी अनेक तरह के परिवर्तन एवं शैथिल्य के भाव देखे गए हैं। लाडनूं क्षेत्र में धनाजी की आवभगतधुआं कलां क्षेत्र से चलकर श्री धनाजी महाराज जब लाडनूं क्षेत्र में आए तो उन्हें स्वप्रेरणा हुई कि धार्मिक उन्नयन के लिए यह क्षेत्र उपयुक्त है, इसलिए अपने स्वजातीय जनों को साधपन के गुणों से अवगत कराया जा सकता है। इस क्षेत्र के अधिपति मोहिलों की यशगाथा उन्होंने सुन रखी थी। "मोहिलों की धार्मिक आस्था बढ़ी-चढ़ी थी, अतः उन्होंने अपने हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर अपने शासित भूभाग में बनवाए।"' 1440 गांवों के अधिपति होने के बावजूद मोहिलों को अभिमान छू तक नहीं गया था। वे जब फिरवांसी गांव में आए तो उन्होंने साधपन धारण करने के मंतव्य से कतिपय जाट परिवारों को अवगत कराया तो उन्हें धनाजी की बातें कल्याणकारी प्रतीत हई। इससे धनाजी का भी उत्साहवर्धन हुआ। अपनी जाति के कुछ परिवारों की धार्मिक संस्कार धारण करने की मंशा से उन्होंने निकट के अन्य गांवों में भी जाने का निश्चय किया। हिंदी-राजस्थानी के प्रख्यात साहित्यकार तथा लाडनूं क्षेत्र के सुदीर्घकालीन इतिहास विवेचक श्री भंवरसिंह सामौर का कथन है-" उस युग के महान ईश्वर उपासक धना भक्त ने नीतिवान एवं उदार मोहिल शासकों से प्रभावित होकर अपने जीवन का उत्तरार्द्ध मोहिलवाटी में व्यतीत करने का निश्चय किया। धना भक्त टोंक क्षेत्र के अपने पुश्तैनी गांव से रवाना होकर मोहिलवाटी के फिरवांसी गांव से तंवरा नामक गांव में पहुंचे।" 8 इतिहासकार सामौरजी की यह बात सत्य है। धनावंश की स्थापना का प्रारंभिक कार्य फिरवांसी में शुरू हुआ, किंतु किसी एक गांव के दो-चार परिवारों से संप्रदाय स्थापना की नींव तो लग गईं, पर उसे विस्तार भी दिया जाना था। पूर्व काल में संत लोग वैसे भी अनेक गांवों में पहुंचा करते थे, इसलिए धनाजी फिरवांसी से तंवरा गांव में पहुंचे। तंवरा में उनका अभूतपूर्व स्वागत हुआ। उस समय तंवरा गांव चारण जैतसी सामौर के पट्टे में था। अभूतपूर्व भक्त के रूप में धनाजी की ख्याति उस समय कम नहीं थी। कुतुहलवश भी लोग उन्हें देखने के लिए आते कि कैसे भक्त हैं, जिन्होंने बिना बीज खेती निपजाई और ठाकुरजी को सदेह अपने सामने बैठाकर भोजन करवाया। ऐसे भक्त के दर्शनों की खातिर कोई क्यों न लालायित होता। सामौर जैतसी उस समय कसूंबी के पट्टेदार थे। उन्होंने कसूंबी में अपनी कोटड़ी स्थापित कर वहां माताजी का मंदिर करवाया तथा चार सौ वर्ष लगभग पहले संतन बोहरा नामक महाजन ने जो ठाकुरजी का शिखरबंध मंदिर करवाया था, उसकी मरम्मत करवाई। जैतसी उच्च कोटि का कवि तथा अत्यधिक धार्मिक विचारों का व्यक्ति था। जैतसी सामौर के प्रति अनेक दोहे प्रचलित हैं, जिनमें करूंबी का भी वर्णन है। उनके प्रति कहा गया एक दोहा प्रस्तुत है- खरो कवेसर खंड में, (ज्यांरी) होड न किण हूं होय। चकवै आखै चारणां, जैत करूंबी जोय ।। भंवरसिंह सामौर के कथानुसार- "जैतसी सामौर को धना भक्त के पहुंचने की सूचना मिली तो वे उनके स्वागत के लिए तंवरा ग्राम में आए। वहां धना भक्त के दर्शन कर अभिवादन के रूप में यह दोहा कहा- आज जैतसी ऊजळो, धारण चरण धनेस।पांण जोड़ आखै प्रगट, अलख पुरख आदेस ।। धना भक्त ने जैतसी सामौर को आशीर्वाद दिया। जैतसी ने धना भक्त को तंवरा गांव भेंट करने का प्रस्ताव दिया तो धना भक्त ने हंसते हुए कहा-अपने से दूर क्यों रखना चाहते हैं?" चौहानवंशीय मोहिल राजाओं का प्रारंभ से सामौर चारणों के साथ अटूट साथ रहा। मोहिलवाटी के इतिहास ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि मोहिल चौहान ने अपने साथ सहयोग करने वाले रांण सामौर को उस समय का सबसे बड़ा पुरस्कार क्रोड़ पसाव प्रदान करते हुए अपने शासन के पांच गांव प्रदान किए थे। उन पांच गांवों में करूंबी का एक बास, रंगीली, लैड़ी, हरमगरी तथा तंवरा गांव था। रांण सामौर मोहिल राजवंश का पोलपात बारहठ था। सामौरों को विरुद प्राप्त था- 'तेजल दादा जैतसी, सत साचा सामौर'। कहते हैं कि जैतसी सामौर के वचन से तत्कालीन मोहिल शासक अपने वैवाहिक संबंध स्थापित करते। मोहिलों ने सामौर चारणों को 1500 बीघा भूमि कसूंबी के पश्चिमी भाग में प्रदान की। 10 आज जसवंतगढ़ भी उसी भूमि पर बसा हुआ है। मोहिलों की दातारी पर बहुत उल्लेख प्राप्त होते हैं। मोहिल राणा मेघा के बाद में वैसरसल छापर की गद्दी पर बैठा। उसकी दानवृत्ति की प्रशंसा करते हुए चांपा सामौर ने दोहा कहा है- मोहिल दाता मोहरी, जस गाहक गुण जाण।सुकवि पालण वैरसल, मेघावत महराण ।। सामोर जैतसी भक्तप्रवर धनाजी का आशय समझ गए। उन्होंने धनाजी को कसूंबी पधारने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। श्री भंवरसिंह सामौर का इस संबंध में कथन है कि "जैतसी सामौर अपना अहो भाग्य मानकर उन्हें सहर्ष कसूंबी ले आए। कसूंबी में सामौर बावड़ी के निकट स्थित ठाकुरजी मंदिर परिसर धना भक्त पधारे तो यह स्थान उन्हें पसंद आ गया। वहीं उन्होंने अपना आसन लगा लिया। वहीं उनके निवास की स्थाई व्यवस्था की गई। इस अवसर पर जैतसी सामौर ने फिर एक दोहा उनकी सेवा में प्रस्तुत किया-आज कसूंबी ऊजळी, धिन धिन गुरां धनेस।ओ पगफेरो आपरो, रहसी याद हमेस।।" धनाजी को सम्मानपूर्वक धनेष्ठ, धनेश कहने की उस समय सम्मान की परंपरा थी। रामानंदजी ने धनेष्ठ का संबोधन किया। जबकि 'रामानंद दिग्विजय' में 'भव्यगुणो धनेशः' कहा गया। 12 धनाजी महाराज का करूंबी प्रवासकाल अनेक प्रकार से महत्त्वपूर्ण माना जाता है। फिरवांसी, तंवरा से प्रारंभ हई धनावंशी संप्रदाय स्थापना यात्रा कसंबी में आकर परिपक्व हुई। धनाजी को भी यहां आकर प्रसन्नता प्राप्त हुई, क्योंकि कसूंबी का वातावरण बहुत सुंदर तथा यह धार्मिक प्रभाववाला गांव था। कहते हैं, इस बड़े गांव के पहले सात बास थे। वर्तमान में इसके चार बास प्रमुख हैं, जिनके नाम क्रमशः अलीपुर, जाखला, उपाधड़ा तथा नीलियां हैं। धनाजी जहां ठहरे, वह मंदिर अलीपुर में था। कसूंबी के इस मंदिर का निर्माण विक्रम की तेरहवीं शताब्दी के प्रथम दशकों में साहूकार संतन बोहरा ने करवाया था। प्रस्तर खंड से बना यह मंदिर बहुत सुंदर था। आज भी इसके उपेक्षित पड़े प्रस्तर खंड इसकी भव्यता की कहानी कहते हैं। पूरी तरह टूट चुका या तोड़े जा चुके इस मंदिर के कलात्मक स्तंभ, कलात्मक फलक इधर-उधर बिखरे पड़े हैं तथा यह भूमि लोगों के अधिकार में आ चुकी है। इसी भग्नावशेष मंदिर के निकट वह बावड़ी आज भी मौजूद है। कसूंबी के धार्मिक वातावरण का ही असर है कि यहां ठाकुरजी के छह मंदिर हैं। एक प्राचीन हनुमत मंदिर परिसर में अनेक संतों की समाधियां तथा उन पर गड़े चरणचिह्न इस बात का द्योतक है कि यहाँ वैष्णवी साधु-संतों का प्राचीन समय (तीन-चार शताब्दियों) में वर्चस्व रहा। जब हम संतन बोहरा द्वारा निर्मित शिखरबंद मंदिर तथा बावड़ी का उल्लेख कर रहे हैं तो हमें उनके संबंध में थोड़ा और जान लेना समीचीन होगा। राणा मोहिल (12वीं शताब्दी) मोहिल को बागड़ियों से छापर-द्रोणपुर का राज्य प्राप्त करने में संतन नाम के एक बोहरा (साहूकार) से बड़ी मदद प्राप्त हुई। संतन ने अपनी अपार संपदा प्रदान कर मोहिल चौहान को सोलह हजार सैनिकों की फौज खड़ी करने में अपना योगदान प्रदान किया। इस फौज की मदद से राणा मोहिल को छापर-द्रोणपुर का राज्य मनोवांछित ढंग से प्राप्त हो गया। राणा मोहिल ने संतन से उधार ली हुई रकम का चुकारा किया तथा उसे करूंबी सहित पांच गांवों की जागीर भी प्रदान की। कहते हैं संतन ने करूंबी गांव का बहुत विकास किया। संतन ने करूंबी गांव में एक बावड़ी तथा उसके निकट ठाकुरजी के मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर में प्रयुक्त अलंकृत पत्थरों को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में उसने यह कितना भव्य मंदिर बनवाया होगा। संतन के चार सौ वर्ष बाद इसी मंदिर का जीर्णोद्धार जैतसी सामौर ने करवाया था। यह मंदिर संवत 1250 के आस-पास बना था। प्राचीन समय में यहां तेरहवीं शताब्दी के कतिपय शिलालेख भी विद्वानों ने पढ़े थे। मोहिल और संतन वोहरा की पारस्परिकता का वर्णन मुहंता नैणसी ने भी किया है। कसूंबी और धनाजी महाराज के नाते को व्याख्यायित करने के कुछ और ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं। प्रख्यात इतिहासकार श्री गोविंद अग्रवाल द्वारा रचित चूरू मंडल के शोधपूर्ण इतिहास में जैतसी सामौर द्वारा धनाजी को दी गई इस ऐतिहासिक जगह का वर्णन धना जाट के खेत के रूप में किया गया है। उन्होंने लिखा है कि, "कसूंबी गांव अब लाडणूं तहसील के अंतर्गत है। नैणसी के अनुसार चौहान मोहिल ने यह गांव संतन वोहरा को दिया था। संतन ने यहां एक बावड़ी और एक शिखरबंध मंदिर का निर्माण कराया था। बावड़ी अभी मौजूद है, जिसे गांववाले पी-बावड़ी कहते हैं। बावड़ी के निकट ही शिखरबंध मंदिर था, जिसके अवशेष दिखलाई पड़ते हैं। नजदीक ही जबरा, धन्ना आदि जाटों के खेत हैं, जिनमें शिला निर्मित चार दीर्घाकार घाने पड़े हैं।" 13 इतना ही नहीं, ठाकुरजी के इस मंदिर के संबंध में गोविंद अग्रवाल आगे लिखते हैं- "इसकी दक्षिणी दिशा में एक अन्य बावड़ी है, जिसको 'डेढ बावड़ी' कहते हैं। (वर्तमान में यह बावड़ी धनावंशी स्वामी के खेत मध्य है।) दोनों के बीच लाल पत्थर का एक कीर्ति स्तंभ खड़ा है, जिस पर धनुर्धारी राम-लक्ष्मण व सीता दिखाई पड़ते हैं, लेख के अक्षर सर्वथा घिस गए हैं। इसके नजदीक ही एक अन्य कीर्ति स्तंभ है, लेकिन उस पर लेख नहीं है... धना जाट के खेत में लाल पत्थर की एक और देवली है।" 14 उपरोक्त विवरण को पुष्ट करते हुए सामौर साहब का आलेख है- "धना भक्त ने कसूंबी से ही अपने अभियान की शुरुआत की। तत्कालीन जनमानस को उन्होंने उद्बोधित किया। धर्म परिवर्तन (मुस्लिम शासकों द्वारा) के उस कठिन दौर में मनुष्य के आत्मगौरव को डिगने से बचाया। यह समाज को उनकी अपूर्व देन है। उन्होंने अपने अनुयायियों को 'धनावंशी स्वामी' के रूप में एक नई पहचान देकर एक पंथ के रूप में विस्तार दिया। धना भक्त को ही यह श्रेय है कि उन्होंने ही सर्वप्रथम 'धनावंशी स्वामी पंथ' की स्थापना की। फिर तो राजस्थान में उनके अनुकरण पर सैंतीस पंथों की स्थापना हई पर अग्रणी धनावंशी ही रहे। धनावंश स्वामी पंथ में निहंग संन्यासी व गृहस्थ स्वामियों को समान महत्त्व मिला। जैतसी सामौर के वंशजों ने आगे चलकर बोबासर, लोढसर व बड़ाबर आदि गांव बसाए तो उन गांवों में उन्होंने जो मंदिर बनाए उनमें पुजारी की नियुक्ति भी कसंबी वाले मंदिर के महंत ही करते थे। 15 लाडनू के इतिहास में उल्लेख आया है कि "जाटों में हुए प्रसिद्ध भक्त धना के अनुयायी धनावंशी साध (स्वामी) कहलाते हैं। परसोजी से परसवंशी साधों का संप्रदाय चला। ये जाति के बढई (खाती) थे। ये सभी पंथ प्रवर्तक संत इस प्रदेश के ग्रामीण परिवेश की उपज हैं। ये इतिहास की उस विषम बेला में हए जो मध्यकाल के म से जानी जाती है। इन संतों ने जनमानस को उद्बोधित किया और धर्म परिवर्तन के उस कठिन दौर में आम आदमी के आत्मगौरव को डिगने से बचाया। इनकी इतिहास और संस्कृति को अमूल्य देन है।" 16 नाम से धर्म और अध्यात्म में रुचि रखने वाले जाट परिवारों ने धनाजी महाराज के प्रति अपनी आस्था प्रकट की। न केवल फिरवांसी, तंवरा और कसूंबी के कुछ जाट परिवारों ने धनावंशी होना स्वीकार किया, बल्कि शोभासर, खारिया, भीड्यासरी, धोलिया, सारड़ी, लैड़ी से भी कुछ परिवार धनाजी से गुरुमंत्र प्राप्त करने आए। बाद में तो अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी, जिन्हें साधपन अपनाना कल्याणकारी लगा, उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार किया। इस प्रकार धनावंश पंथ का विस्तार होने लगा। धनावंश पंथ अंगीकार करने वाले साधों को तत्कालीन राजपूत शासकों ने सम्मान प्रदान किया। बड़ी संख्या में ठाकुरजी के मंदिर बनने लगे तथा पुजारी परिवार को शासकों ने खेती की भूमि भी डोळी के रूप में देनी प्रारंभ की। शासकों द्वारा अनेक करों तथा बेगार में छूट प्रदान की गई। महंतद्वारों की स्थापना होने लगी। कसूंबी, खारिया दोनों महंतद्वारे एक ही काल में बने। फिरवांसी गांव के कालेरा जाति के जाट बेहद दयालु, साधजन हितैषी तथा धार्मिक भावना रखने वाले थे, उन्हें धनाजी की एक-एक बात में प्रीति होने लगी। गांव में यह समृद्ध जाति थी, इसलिए पूरे गांव में इसका दबदबा भी था। फिरवांसी का तत्कालीन ब्यौरा विस्तारपूर्वक प्रस्तुत है। धनावंश का जन्मस्थल - फिरवांसीफिरवांसी गांव भले ही नागौर जिले की लाडनूं तहसील में स्थित है, किंतु वह सीकर एवं नागौर जिले की संधि का गांव है। गांव का अधिकांश हिस्सा नागौर जिले में तथा कुछ भाग सीकर जिले में है। धनावंश की स्थापना के पीछे धनाजी को गुरु आज्ञा थी। वे उसके पालनार्थ ही उत्तर दिशा को निकल गए। घूमते-घूमते फिरवांसी में वे कालेरा नख के एक जाट परिवार में पहुंचे तो उन्हें इस परिवार में धार्मिक संस्कार दिखाई दिए तथा यह एक बड़ा परिवार था, जिसके संबंध में कहा जाता है कि खेती के समय घर के इतने लोग खेत में सामूहिक कार्य करते थे जिनकी भोजन प्रसादी बैलगाड़ी पर लादकर ले जानी पड़ती। धनाजी यहां रुके तो उन्होंने देखा कि कालेरा परिवार की सुरुचि भगवद्धर्चा में है। संवत 1532 को रामनवमी के शुभ दिन धनाजी ने ईश्वर अनुग्रह की बातें बताईं तो इस परिवार को अच्छी लगीं। सद्गृहस्थ रहते हुए साधपन अपनाने का आग्रह भी इस परिवार ने सहज स्वीकार किया। धनाजी महाराज अपने साथ कुछ शालग्राम विग्रह लेकर आए थे। उन्होंने कतिपय आचरण की बातें-नियम आदि बताने के बाद एक पीले रंग का शालग्राम इस परिवार को पूजा करने के लिए सौंपा और कहा कि जो शालग्राम को पूजता है, उस वैरागी के लिए ईश्वर की प्राप्ति कठिन नहीं है। कालेरा परिवार इस बात से परिचित था कि धनाजी महाराज ने तो बाल्यकाल में शालग्राम की पूजा कर भगवान को अनेक दिनों तक साक्षात चूरमें का प्रसाद कराया था। एक-दो रोज में ही कालेरा परिवार धनाजी का पक्का अनुयायी हो गया और उन्होंने कहा कि आज से हम आपके इस धनावंश की मर्यादाओं का पूरा पालन करेंगे और अपने निकट रिश्तेदारों को भी परमात्म प्राप्ति के इस मार्ग में लाएंगे। दो-तीन दिन बाद धनाजी ने जब निकट के गांव तंवरा की ओर प्रस्थान किया तो कालेरा परिवार तंवरा तक उनके साथ आया तथा वहां के खिलेरी गोत्रीय जाट परिवार को धनाजी महाराज के व्यक्तित्व से परिचित कराया तथा उनके पंथीय मंतव्य से अवगत कराया। तंवरा में भी कुछ परिवारों ने साधपन लिया, अर्थात गृहस्थ में रहते हुए तथा खेती करते हुए वैराग्य अपना लिया। तंवरा के जागीरदार चारणों ने भी धनाजी का स्वागत किया। बाद में धनाजी तंवरा से करूंबी गांव चले गए। कसूंबी में रहते हुए उन्होंने निकट पड़ौस के अनेक गांवों के जाटों को धनावंश पंथ की महत्ता बताते हुए, इसमें शामिल कर वैरागी बनाया।धनाजी का निवास एक प्राचीन ठाकुरजी के मंदिर में था। उस मंदिर के निकट में प्राचीन बावड़ी थी, जिसका जल वे अपने ठाकुर के चढ़ाते। धनाजी के सानिध्य में अन्य अनेक विरक्त साधू भी रहा करते। मंदिर के निकट ही जैतसी सामौर ने उन्हें एक खेत प्रदान किया था, जो धनाजी के खेत (धना जाट का खेत) के रूप में प्रसिद्ध हुआ। 17 धनाजी का महाप्रयाणधनाजी महाराज कसूंबी गांव में लगभग सवा वर्ष रहे। संवत 1533 की आषाढ़ सुदी अष्टमी को उन्होंने अपने पास रहने वाले एक-दो वैरागियों को कहा कि कल वे इस संसार से प्रयाण कर अपने खाविंद धरणीधर के पास जाएंगे। उन्होंने अपने गुरु के बताए कार्य को कर डाला है। ठाकुरजी में श्रद्धा रखने वाले जाट इस पंथ को समृद्ध करते रहेंगे और धर्म की ज्योत को जगाए रखेंगे। आषाढ़ सुदी नवमी को वे ब्रह्ममुहूर्त में उठे। बावड़ी से पानी लाकर स्नान व नित्यकर्म किया। साथ रहने वाले वैरागियों को कहा कि वे महानिर्वाण यात्रा पर जा रहे हैं, कोई भी उनके पीछे नहीं आए। साध धर्म का पालन करते रहो। ब्रह्ममुहूर्त में वे करूंबी से उत्तर दिशा की ओर निकल गए और देखते-देखते अदृश्य हो गए। दिन उगने के बाद जब गांव के लोग मंदिर आए और स्वामीजी के संबंध में पूछा कि वे क्यों नहीं नजर आ रहे। तब वैरागियों ने कहा कि वे महानिर्वाण यात्रा पर जाने की बात कहकर आज प्रातः उत्तर दिशा में निकल गए हैं। गांव के लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने सोचा अभी तो धनावंश शैशवावस्था में है, अभी इसे और आगे ले जाने की आवश्यकता थी। उनके पदचिह्नों को देखते हुए लोग उन्हें ढूंढ़ने निकले लेकिन बहुत दूर उनके जाने के कोई चिह्न नहीं मिले। आषाढ़ सुदी नवमी के दिन पाताल के अधिष्ठाता बलि के अवतार कहे जाने वाले धनाजी महाराज परमात्मा में ही समा गए। ठाकुरजी की लौ ठाकुरजी में मिल गई। जाट समाज और धनावंशधनाजी महाराज अपनी भक्ति में इतने निमग्न रहे कि उन्हें गुरुजी द्वारा निर्देशिन पंथ संस्थापन को बहुत वर्षों तक समय ही नहीं मिला, किंतु अपने देवलोक गमन में पूर्व जब रामानंदजी ने पुनः धनाजी को यह याद दिलाया कि उन्हें अपने जातीय समुदाय में धर्म प्रभावना का प्रसार करने के लिए प्रयास करना चाहिए। अंततः वह समय संवत 1532 को आया और वे उत्तर दिशा के थली प्रदेश में पंथ संस्थापन की दृष्टि से आ गए। यह निर्विवाद है कि धनाजी महाराज जाट जाति से थे। धनाजी के काल में यह कृषक जाति उत्तरी पश्चिमी राजस्थान में जन बहुल रूप में थी। सैकड़ों गोत (जातीय नख) में बंटी हुई जाट जाति बड़ी संख्या में होने के बावजूद घोर पारस्परिक फूट के कारण अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित नहीं कर पा रही थी। उस काल की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक स्थितियों को जानना चाहिए। तत्कालीन राजपूताने का यह क्षेत्र रेतीला था, तनिक भी सींचित न होने के कारण हर एक-दो वर्ष बाद अकालों का सामना करना पड़ता था, सारा जीवन पशुपालन और खेती पर टिका हुआ था। शासक के रूप में राजपूत राजा थे, उनके कहे युद्ध भी लड़ना पड़ता था और अनेक प्रकार के कर भी चुकाने पड़ रहे थे। जीवन अत्यधिक विषम था। अनेक मान्यताओं और अंधविश्वासों से ग्रसित था यह युग। स्वभाव में सच्चाई के अलावा भोलापन और अखड़ता भी थी। इस क्षेत्र की तत्कालीन परिस्थितियों का वर्णन अनेक प्रकार से किया गया है। कबीर के एक पद में भी इसका वर्णन है। 18 तत्कालीन समय के राजपूताने का कोई एकल नाम नहीं था। यह भौगोलिक नामों से ही अधिक पहचाना जा रहा था, जैसे सवालख, थली, बागड़, मगरा, माड, मेदपाट, जांगळ आदि। थली के ही एक भाग को मोहिलवाटी और बाद में बीदावाटी के नाम से पहचाना गया। जांगलू क्षेत्र में पहले सांखला (परमार) राजपूतों का राज्य रहा, बाद में राठौड़ों का आधिपत्य हो गया। सांभर, अजमेर का क्षेत्र सपादलख (सवालख) कहलाता था, यहां चौहान राजपूतों का अधिकार था। नागौर पट्टी भी सवालख क्षेत्र के अंतर्गत थी। बीदावत राठौड़ों के आगमन से पूर्व छापर, द्रोणपुर, चरलू का क्षेत्र मोहिल चौहानों के अधिकार में होने के कारण मोहिलवाटी कहलाता था। इतिहासकार नैणसी के कथनानुसार मोहिलों ने यहां लगभग नौ सौ वर्षों तक राज्य किया। संवत 1532 में उनसे राठौडों ने यह प्रदेश छीन लिया। 19 पूगल क्षेत्र में भाटी राजपतों का राज्य था, उनका राज्य जैसलमेर तक फैला हुआ था। जैसलमेर क्षेत्र को माड धरा कहा जाता था। इस काल में भटनेर पर भाटी, चायल, जोहिया जाति के मुसलमानों का राज्य था। बाद में राव बीका ने इसे अपने अधिकार में लिया। दयालदास की ख्यात में राव बीका के आने से पूर्व के थली और बागड़ क्षेत्र में जाट जाति के मजबूत परगनों का वर्णन मिलता है। 360 गांवों पर गोदारा नख के जाटों का भोमियाचारा, शेखसर, लाधड़िया प्रमुख ठिकाना, मुखिया पांडू गोदारा पुत्र हिंदू का। 360 गांव कसवों के, कंवरपाल मुखिया तथा सीधमुख ठिकाना, 360 गांव बैणीवालों के, रासलाणा ठिकाना तथा रायसल मुखिया, पूनिया गोत के भी 360 गांव, कान्हा मुखिया, बड़ी लूंदी ठिकाना, सिहाग गोत के 140 गांव, सूई ठिकाना और चोखा मुखिया, सोहूवों के 84 गांव, धाणसिया ठिकाना और अमरा मुखिया। इसी समय खीची, खरला, वागोड़ा, सांखला, जोहिया, चौहानों का भी कई गांवों पर भोमियाचारा था। सारे गांव तीन हजार से अधिक थे जिन पर राव बीका का आधिपत्य हुआ। 20 ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार थली, बागड़ तथा सवालख क्षेत्र के अधिकांश गांव इन जाटों ने ही बसाए। जाट जाति पर सर्वाधिक शोधपूर्ण कार्य करने वाले विद्वान डॉ. पेमाराम ने जाट जाति की परिभाषा इस प्रकार की है- "जाट शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा में जट्ट शब्द से हुई है। 'ज' का अर्थ है विजेता। उत्पादनकर्ता तथा अट्ट का अर्थ है, घुमंतुपन अर्थात जलीय क्षेत्रों में घूमकर अन्न उत्पादक समुदाय को जट्ट कहा गया है। बाद में विभिन्न भाषाओं में इसका प्रयोग आरंभ हुआ। अतः इस शब्द का विभिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न अर्थ होना स्वाभाविक है। संस्कृत में जट्ट, प्राकृत में जाथर। जाट अरबी में जुत, फारसी भाषा में चयनापा और तारीख ए मासूमी में जाट, चीनी में युती, यूरोप में जेती या जटिया, रोम में गाथ या गात, लेटिन भाषा में गेटी तथा हिंदी में जाट नाम से प्रसिद्ध है। 2" डॉ. कालिकारंजन काननूनगो का मानना है कि जाट शुद्ध रूप से आर्य हैं। 22 जाटों का इतिहास लिखने वाले ठाकुर देशराज का भी मंतव्य उपरोक्त प्रकार का रहा है और यह तथ्य वे जाटों की शारीरिक बनावट, रूप-रंग के आधार पर दे रहे हैं। विभिन्न जाट इतिहासों में इस जाति की उत्पत्ति, निवास स्थान के संबंध में विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है, किंतु यहां हमारा मंतव्य इस जाति के विस्तार वर्णन में जाने का नहीं है। चूंकि सभी धनावंशी स्वामी संत-भक्त धनाजी के अनुयायी जाट जाति से बने, इसलिए इस जाति का सांदर्भिक वर्णन हम यहां कर रहे हैं। राजस्थान की विभित्र जातियों का इतिहास लिखने वाले श्री बजरंगलाल लोहिया के अनुसार, "राजस्थान में जाति की दृष्टि से सबसे अधिक संख्या जाटों की थी। राजपूतों से भी इनकी संख्या अधिक रही है।" 23 बड़ी जाति होने के बावजूद, इस जाति ने उस काल में अपने संख्या बल पर अधिक ध्यान नहीं दिया और न ही प्रशासनिक महत्त्वाकांक्षा रखकर साम्राज्य की कामना रखी। अपने खेती और पशुपालन के पेशे से पूर्णतया संतुष्ट रहने वाली इस जाति का खेतिहर वर्ग के साथ सहयोग और भ्रातृत्व का भाव रहा। अधिक महत्त्वाकांक्षी न होने के कारण यह राज्याश्रित ही रही। विश्नोई संप्रदाय का इतिहास रचने वाले विद्वान डॉ. हीरालाल माहेश्वरी इस संबंध में अपने विचार इस प्रकार से प्रकट करते हैं, "विष्णोई अधिकांशतः जाट जाति से बने हैं। विष्णोई रचनाओं से जहां समूचे समाज की विभिन्न दशाओं का पता चलता है, वहां जाटों से संबंधित कतिपय विशिष्ट बातों का भी पता चलता है। वे शीघ्र ही उत्तेजित हो जाने वाले, लड़ाकू, झूठे, मूर्ख और अज्ञानी थे। वे न पवित्रता रखते, न स्नान करते, न 'जीकारा' देकर बोलते और सुभाषण तो करते ही नहीं थे। हो, हो करके जोर से बोलते थे। वे बुरी-बुरी आदतों के शिकार थे।" 24 जाटों के संबंध में रिपोर्ट मरदुमशुमारी राज मारवाड़ सन 1891 में भी इसकी प्राचीन उत्पत्ति के अनेक लेख दिए गए हैं। उसमें इसे 'मोकळ मुंडी' जाति कहा है, जिसका तात्पर्य होता है, जो आए सो मुंह से बोलना। 25 इस पुस्तक में मारवाड़ के जाटों से संबंधित कुछ दिलचस्प सामग्री को भी प्रस्तुत किया है जो काफी रोचक है। जाटों से संबंधित सैकड़ों लोककथाएं तथा सैकडों ही कहावतें प्रचलित हैं। जैसे जाट के संबंध में कहा गया है कि 'जंगल जाट न छेड़िए, हाटां बीच किराड़।' जायल और खिंयाला के जाटों की उदारता की कथा भी कही जाती है। सामाजिक तौर पर पंद्रहवीं-सालेहवीं शताब्दी में थली एवं मारवाड़ के जाटों में निराशा, जड़ता, संस्कारहीनता का वातावरण था। आचार-विचार में शैथिल्य पनपने लगा। जाटों में ऐसी अराजक स्थिति ने ही श्री धनाजी, श्री जांभोजी तथा श्री जसनाथजी को उनमें धार्मिक संस्कार उत्पन्न करने को प्रेरित किया। इस साम्यता की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि तीनों ही संप्रदाय प्रवर्तकों ने प्रवृत्तिमूलक संप्रदायों की स्थापना की। आचरण से पिछडे अपने जाट अनुयायियों को धनाजी 21 नियम ग्रहण करने की बाध्यता रखते हैं। उसके बाद जांभोजी अपने अनुयायियों के लिए 29 आचरणों का विधान करते हैं जबकि उनके बाद इस संख्या से आगे बढ़कर जसनाथजी 36 नियमों की आखड़ी रखते हैं। ये तीनों ही संत उस समय के अपने जाट अनुयायियों को धार्मिक नियमों में बांधकर अपने संप्रदायों को दीर्घजीवी बनाना चाहते थे। इस समय इस क्षेत्र (जाट बाहुल्य क्षेत्र) की धार्मिक स्थिति बड़ी जटिल थी। धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला अधिक था। विद्वान साहित्यकार सूर्यशंकरजी पारीक कहते हैं- " भैरव, भोमिया आदि नाना कल्पित देवताओं की मद्य-मांस, जीव बलि देकर पूजा-अर्चना करना उस समय धर्म मान लिया गया था। तांत्रिक, वाममार्गी तथा जमातधारी पाखंडी साधुओं के संसर्ग दोष से मरुधरवासी सर्वथा ही धर्महीन हो चुके थे। जांभोजी की वाणी तथा उस काल के अन्य संतों की रचनाओं से यह सहज ही जाना जा सकता है कि उस समय किस प्रकार धर्म के नाम पर अधर्म का वर्णन होता था।" 26 थली, मारवाड़, माड, मगरा क्षेत्र में धार्मिक प्रभाव पैदा करना रामदेवजी तंवर ने प्रारंभ किया था। उन्होंने चौबीस प्रमाण दिए थे, किंतु वे जाट जाति को प्रभावित नहीं कर पाए, केवल अत्यंज जातियों को ही अपने निर्गुण मार्ग में बहुत थोड़े रूप में आकर्षित कर पाए। जांभोजी द्वारा विश्नोई संप्रदाय की स्थापना के ठीक सौ वर्ष पूर्व यानी संवत 1442 में वे महाप्रयाण कर गए, जबकि धनाजी द्वारा धनावंश की स्थापना के 110 वर्ष पूर्व वे दिवंगत हो गए। जांभोजी से दस वर्ष पूर्व धनावंश की स्थापना के बावजूद धनावंश की वृद्धि तेजी से नहीं हुई, इसका कारण शायद यह रहा कि पंथ स्थापना के थोड़े ही अर्से बाद धनाजी महाप्रयाण कर गए। धनावंश का अधिक विस्तार बाद में ही हुआ। धनाजी कम संख्या में जाटों को धनावंश की ओर आकर्षित कर पाए लेकिन जांभोजी इस क्षेत्र में बहुत आगे रहे। जसनाथजी तो धनाजी से बहुत कम संख्या में जसनाथी बना पाए। जांभोजी के चमत्कारी एवं सामाजिक जीवन के कारण भी उनसे जुड़ने वाले अनुयायियों की संख्या अधिक रही। उन्होंने 'थापण' एवं 'गायणा' की नियुक्ति करके भी अपने पंथ को मजबूती प्रदान की. जबकि धनाजी ऐसा कोई उपक्रम नहीं कर पाए। उन्होंने केवल घर में गृहस्थ पालन करते हुए वैराग्य भाव रखने पर जोर दिया। यह वह काल था जब राजपूत राजा अपने अस्तित्व की लडाई लड़ रहे थे। केंद्र में मुस्लिम राज्य स्थापित हो जाने के कारण राजपूताने के राजाओं के समक्ष अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो गया था। धनाजी ने जिस क्षेत्र के जाटों को वैराग्य पालन की ओर उन्मुख किया, उस क्षेत्र के मोहिल (चौहान) राजपूतों के चार सौ वर्षों के सुदीर्घकालीन राज्य को अब जोधपुर के राठौड़ों से चुनौती मिलने लगी। राव जोधा ने अपने ही दामाद राणा अजीत मोहिल की हत्या करवा कर छापर-द्रोणपुर का राज्य अपने पुत्र राव बीदा को दिलवा दिया। इसी काल में राव जोधा के ही दूसरे पुत्र वीका ने भी जांगलू को प्राप्त कर संवत 1545 में बीकानेर राज्य की स्थापना कर डाली। इस समय धनाजी तो नहीं थे पर उनके द्वारा संस्थापित धनावंशी स्वामियों को संरक्षण देने में उन्होंने कोई कोताही नहीं की। राव बीदा ने भी जाटों से धनावंशी हो चुके जाटों के इस निजी निर्णय में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। वैसे बीका ने अपने विस्तारवादी रवैये के कारण अपने क्षेत्र के सभी खांप के जाटों को बिना युद्ध किए, केवल समझौतों के बल पर अपने अधीन कर लिया था। हालांकि बीकानेर राज्य में जाटों को भोमियाचारा, चौधरी का सम्मान तथा ढोल गवाड़ी अधिकार प्रदान किया गया। बीकानेर के पूर्व महाराजा करणीसिंह का कथन है, "बीकानेर के आस-पास बहुत-सा इलाका जाटों के अधिकार में था। केंद्रीय सत्ता (दिल्ली की सत्ता) ने उनकी ओर कभी ध्यान नहीं दिया, अतः वे पूर्ण स्वतंत्रता का उपयोग करते थे। जाटों की यहां कई जातियां थीं और प्रत्येक का अपना प्रदेश था, पर वे बहुधा आपस में लड़ते रहते थे। "27 लंबे काल तक स्वतंत्रता का उपयोग करने के कारण तत्कालीन समय में जाट अपनी मर्जी के मालिक हो चले थे, इसलिए उनमें थोड़ा अराजक भाव उत्पन्न होना स्वाभाविक था। कुनबा बड़ा था, किंतु धार्मिक आध्यात्मिक भावों से दूर थे। यहां हमारा उद्देश्य जांभोजी, जसनाथजी और धनाजी के कार्यों में तुलना प्रस्तुत करने का नहीं है, किंतु जहां जांभोजी को अपने अनुयायियों को उपदेश देने के लिए 51 वर्ष की लंबी अवधि प्राप्त हुई, वहीं धनाजी को केवल कुछ माह का समय। जांभोजी अपने पदों में इस क्षेत्र की जाट जाति के प्रति बहुत तरह के कथन करते हैं। वे सबसे पहले तो गुरु पहचानने की ताकीद करते हैं। वे कहते हैं कि जो अपने गुरु को नहीं पहचानता, वह 'थूळ' व्यक्ति होता है। थूळ व्यक्ति विश्वसनीय नहीं होता, उसकी संगत से बचना चाहिए। अपने मन से चलने वाले को उन्होंने 'मनमुखी' कहा हैं। वे कहते हैं- मनमुखी की तुलना पानी में पड़े हुए पत्थर से की जा सकती है। पानी में रहते हुए भी वह भीतर से सूखा ही रहता है। मनमुखी मन का हठी होता है, बदलने के लिए आसानी से तैयार नहीं होता। जांभोजी ने जाटों के लिए कहा कि- "लोहे हूंता कंचन घड़िया, घड़िया ठांम सुठाऊं। जाटा हूंता पात करीलूं यह कृष्ण चरित प्रवाणा। अर्थात जो लोहे की तरह कठोर थे, उन्हें सोना बनाकर आभूषण की प्रतिष्ठा दी। कहा गया है-" जांभोजी के सारगर्भित उपदेश के प्रभाव से जाटों ने शिष्टाचार सीखा और लघुता द्योतक संबोधन 'तूं' के स्थान पर वे आदरसूचक 'जी' बोलने लगे। कितने ही मनुष्यों ने उनके प्रभाव में आकर क्रोध, कहर, कुबाण आदि दुष्कृतियों का परित्याग किया। तात्पर्य यह है कि एक ही क्षेत्र में चालीस-पचास वर्षों के काल में जाट समुदाय को तीन श्रेष्ठ संत मिले। समाज में अकारण द्वैषी भी होते हैं- ऐसे ही द्वैषी जनों ने यह कहावत बनाई होगी- 'जाट बिगाड्या तीन-धनो-जांभो जसनाथ।' कहने का भाव यह रहा होगा कि उपरोक्त तीनों संतों ने जाट समुदाय में से ही तीन अलग संप्रदाय बना दिए और तीनों ही संप्रदायों का बाद में जाट समाज से रोटी-बेटी का कोई नाता नहीं रहा। तीनों जाट संप्रदायों में धनावंश का संबंध सीधा वैष्णवता से रहा। धनावंश की स्थापना के समय राजस्थान के इस जाट बहुल क्षेत्र में हिंदू धर्म के अंतर्गत नाथ पंथ का प्रभाव था। विश्नोई संप्रदाय में नाथ पंथ के प्रभाव के संबंध में हीरालाल माहेश्वरी का कथन है- "राजस्थान में नाथों की प्रतिद्वंद्विता में विश्णोई संप्रदाय विशेष रूप से फैल रहा था।" 30 नाथपंथ में 12 पंथों का उल्लेख रहा है। राजस्थानी भाषा के तत्कालीन साहित्य में नाथपंथी हस्तलिखित साहित्य प्रचुर मात्रा में मिलता है। नाथपंथ में गोरखनाथ, जलंधरनाथ, गोपीचंद, भरथरी, हांडी भडंग आदि चर्चित नाम रहे हैं। स्वयं जांभोजी तथा जसनाथजी पर नाथपंथ का प्रभाव रहा। जबकि धनाजी पर ऐसा कोई प्रभाव नहीं रहा। तत्कालीन समय में धर्म के नाम पर बाह्याचार और पाखंड का बहुत अधिक बोलबाला था। धनाजी ने धार्मिक पाखंड तथा हरिभक्ति विमुख समाज के एक वर्ग को धर्म का असली मर्म समझाते हुए वैराग्य धारण कर भक्तिपथ पर आगे बढ़ने की बात कही। उन्होंने भक्ति के मार्ग में किसी प्रवंचना तथा प्रपंच को अपने जीवन में पास ही नहीं फटकने दिया और यही बात अपने अनुयायियों से कही। जिन आचरणों का पालन वे स्वयं करते थे. उन्हीं आचरणों के पालन की बात अपने अनुयायियों से की। उस काल में जाट वर्ग को धर्म तथा अध्यात्म की बात सिखाना खासा चुनौतीपूर्ण कार्य था, किंत उनकी वाणी का ही प्रभाव था. उन्होंने जिन स्वजातीय बंधुओं को अपना मंतव्य समझाया, वे सभी उनसे बहुत अधिक प्रभावित हए। उन्होंने प्रीतिपूर्वक धनाजी का शिष्यत्व स्वीकार किया और अपने दूसरे रिश्तेदारों को भी धनाजी की शिक्षाओं से अवगत कराया तो वे भी धनावंश में श्रद्धा रखने लगे। जो जाट साधपन (वैरागी) धारण कर धनावंशी बन गए, उन्होंने अपनी बहुत-सी पूर्व परंपराओं का परित्याग कर दिया, जैसे- मृत्यु होने पर जाट जाति मुर्दे को लिटाकर ले जाते हैं, और मृत्युपरांत बारह दिनों तक शोक रखते हैं, जबकि धनावंश ने मृत्युपरांत वैरागी जनों के आचरणों को प्रश्रय प्रदान किया और साधुओं की भांति दिवंगत प्राणी की बैकुंठी निकालनी तथा सत्रहवीं का नियम रखा। जाटों में बेवा स्त्री के लिए नाता व्यवस्था रही है, पर धनावंश ने इसे अपने समुदाय में नहीं रखा। पहरान धनावंशी और जाट का एक ही जैसा रहा। खेती एवं पशुधन पालन भी एक जैसा ही रहा है। जाटों में अनेक यश के कथानक रहे हैं। जैसे जायल-खिंयाला के जाटों द्वारा दातारगीपूर्वक माहेरा भरने की बात पर उस जाति के धनावंशी भी अपने पूर्वजों का यश समझकर आज भी हर्षित होते हैं। 31 धनावंशी स्वामियों में आज भी अपनी पूर्व जाति की कर्मठता, सच्चाई आनुवांशिक रूप से मौजूद है। शारीरिक बनावट तथा पहनावे में भी वह साम्यता भली प्रकार दिखाई देती है। इसमें कोई शक नहीं है कि प्रत्येक धनावंशी ने जाट जाति का परित्याग करके ही धनावंशी संप्रदाय को अंगीकार किया था। धनावंश प्राचीन उल्लेखों मेंशोध-अनुसंधान के कार्यों में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। एक-एक तथ्य की पड़ताल बहुत गहन छानबीन के साथ करनी चाहिए। धनावंश एक संपूर्ण वैष्णव संप्रदाय है। अनेक प्राचीन उल्लेखों में धनावंश से धनाजी का संबंध प्रतिपादित होता है। सन् 1891 में मारवाड़ के तत्कालीन शासक ने अपने राज्य की जनगणना, विस्तृत ब्यौरों के साथ करवाई। इस जनगणना के आंकडे बहत ही महत्त्वपूर्ण हैं। इस रिपोर्ट को 'रिपोर्ट मरद्मशुमारी राज मारवाड़- 1891 ई.' नाम दिया गया तथा इसमें जनसंख्या के साथ ही राजस्थान की जातियों का इतिहास तथा रीति-रिवाजों को भी प्रस्तुत किया गया। राजस्थान की जातियों के इतिहास अध्ययन में यह एक प्रामाणिक प्राचीन ग्रंथ है। इस ग्रंथ के पृष्ठ संख्या 303 पर 'धनावंसी साध' नाम से धनावंशी स्वामियों का ब्यौरा है, जो इस प्रकार है- "रामानंदजी के चेलों में १ धन्त्रा जाट भी थे, ये बड़े भगत हुए और इन्होंने अपनी जात के बहुत से जाटों को चेला किया और साधों का धरम सिखाया, ये सब धन्नावंशी कहलाए। इनमें कई खांपों के जाट हैं, इनका आचार व्योहार रामावत साधों के माफिक है, मारवाड़ और बीकानेर में बहुत हैं, भेस रामानंदी साधो का सा है तिलक भी रामानुज संप्रदाय का लगाते हैं।" 32 इस प्रामाणिक और प्रकाशित तथ्य के बाद धनाजी और धनावंश के अंतर्संबंधों पर किसी भी तरह के शक-शुबहे की कोई गुंजायश नहीं रह जाती। स्पष्ट है कि रामानंदजी के आदेश पर धनाजी महाराज ने अपनी ही जाति के लोगों को धनावंश संप्रदाय में समाहित कर साधपन यानी वैराग्य मार्ग में आरूढ़ किया था। इसी प्रकार पद्मश्री श्री सीताराम लाळ्स के 11 खंडीय 'राजस्थांनी सबदकोस' के चतुर्थ खंड में पृष्ठ 2528 पर 'धनावंसी' शब्द की व्याख्या में उल्लेख है-" (धनो वंशिन) रामानंदजी के शिष्यों में धन्ना जाट भी था। इसी के द्वारा दीक्षित साध धन्नावंसी कहलाए।" न केवल भारत बल्कि समूचे विश्व में इसे एक श्रेष्ठ और प्रामाणिक शब्दकोश माना जाता है। इस उल्लेख के उपरांत कोई संशय नहीं रह जाता कि धनावंश का प्रवर्तन किसने किया। धनावंश के प्रवर्तक भक्त शिरोमणि धनाजी महाराज हैं। कुछ धनावंशियों को आज भी भूलवश जाट समझते रहे हैं, चूंकि धनावंशी समस्त एकमात्र जाट जाति से इस संप्रदाय में आए, इसलिए जाटों एवं धनावंशियों के जातिगत नख (उपजाति) सारण, गोदारा, बिजारणिया, कड़वा आदि लगभग सवा दो सौ की संख्या में एक ही जैसे हैं। जाट जाति को छोड़कर धनावंशी बने, इसलिए नख तो वही रहेंगे। जाट जाति पर अनेक ग्रंथ लिखने वाले डॉ. पेमाराम ने एक ग्रंथ में भ्रमपूर्ण बात लिखी -"हालांकि धन्ना ने अपना कोई पंथ नहीं चलाया, फिर भी उनके बहुत सारे जाट अनुयायी बने।" डॉ. साहब को नहीं पता कि धनाजी के जो अनुयायी बने उनके पंथ का नाम ही तो धनावंश है। मैंने डॉ. पेमारामजी से इस बारे में बात की तो उन्होंने इस त्रुटि को स्वीकार किया। असावधानी एवं शोध के अभाव में लिखी एक पंक्ति भी भ्रम उत्पन्न कर सकती है। इसी तरह 'भक्ति के धनीः धन्त्रा' नामक एक लेख में डॉ अनिल जैन ने भी भूल की। उन्होंने लिखा- "राजस्थान में धन्नावंशी जाट भी रहते हैं।" 35 मैंने उनसे निवेदन किया कि राजस्थान में धन्नावंशी जाट कहां रहते हैं? कृपया बताएं। मैंने उन्हें बताया कि धनावंशी जाट नहीं, स्वामी / वैरागी / वैष्णव कहलाते हैं। बेशक उनके उप गोत्र जाटों वाले ही हैं। उसका कारण उपरोक्त है। यही त्रुटि विद्वान ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल ने की है। वे अपनी पुस्तक 'संत सप्तक' में धनाजी के अध्याय में लिखते हैं-" आज भी धन्नावंशी जाट रामानंद संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। उनकी मान्यता है कि धन्ना भगवान सीताराम का उपासक, रामनंद स्वामी का शिष्य तथा गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी 'स्वामी' कहलाता था। इसी कारण अब भी अनेक जाट अपने नाम के साथ 'स्वामी' शब्द का प्रयोग करते हैं।" 3" इन उपरोक्त पंक्तियों में धनावंशी स्वामियों को जाट भी बता दिया और स्वामी भी। सिंहल साहब बहुत बड़े विद्वान हैं, मैंने उनसे निवेदन किया कि इस ग्रंथ के आगामी संस्करण में भूल सुधार किया जाए, क्योंकि हम धनावंशी, धनाजी के अनुयायी बनने के उपरांत एक स्वतंत्र संप्रदाय और जाति के रूप में धनावंशी वैष्णव / स्वामी / साध हैं। विगत पांच सौ वर्षों में धनावंशी स्वामियों की पहचान जाट जाति के रूप में कभी नहीं रही है। राजा-महाराजाओं के अभिलेखों में भी धनावंशी साध के लेखे प्राप्त होते हैं न कि धनावंशी जाट के। धनावंशी के लिए जाट शब्द प्रयुक्त करना वैसे ही त्रुटिपरक है जैसे किसी ओसवाल को राजपूत कहना। धनावंश भक्तप्रवर धनाजी महाराज का सदैव ऋणी रहेगा। उन्होंने अपने अनुयायियों को धर्म, अध्यात्म, भक्ति, वैराग्य का मार्ग प्रदान किया। राजा-महाराजाओं की बहियों तथा बहीभाटों की बहियों में धनावंश पंथ अंगीकार करने के अनेक लेखे प्राप्त होते हैं। बीकानेर राज्य की संवत 1824 की कागदों की बही में एक उल्लेख प्राप्त होता है, जो इस प्रकार है-"सांमी ध्यानदास पेमदास किसोरदास रामदास जात रा सहारण हुता, राजवी घीरतसिंह सिवसिंघोत घड़सीयोत भाडेरां रा हुता सु सांमी हुवा नू बरस घणा हुया नै घड़सीयोत वासो छोडै नीं सू हमै दरबार सू छोडावण री दरखासत पेस करी है।" 37 यह लेखा इस बात का प्रमाण प्रदान करता है कि सांमी ध्यानदास आदि पहले जाट (सहारण) थे, अब वे काफी वर्षों से स्वामी हैं। वे भाडेरां (लुनकरणसर तहसील का गांव) के निवासी हैं, जिनका विवाद राजवी घीरतसिंह के साथ चल रहा था। इस लेखा से इस बात पर भी प्रकाश पडता है कि जाटों से धनावंशी स्वामी बनने की प्रक्रिया लगभग अढ़ाई शताब्दी तक चलती रही। श्रीडूंगरगढ़ तहसील के गुसांईसर बड़ा गांव के भूकर (धनावंशी) लगभग दो सौ चालीस वर्ष पूर्व निकट के मणकरासर गांव के भूकर (नख के) जाट थे। मणकरासर के भूकर जाट तथा गुसांईसर के भूकर धनावंशी भली प्रकार इस बात की ताईद करते हैं। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं। बीकानेर राज्य की विभिन्न बहियों में धनावंशी स्वामियों तथा महंतों से संबंधित अनेक लेखे प्राप्त होते हैं। धनावंशी स्वामियों को राज्य की ओर से अनेक करों व बेगार से मुक्त कर तथा डोळी भूमि प्रदान कर उनका स्वागत किया जाता। बही छाप रै कागदां री संवत 1893-94 में 16 गांवों के वैरागियों के अलग-अलग नाम देकर उन्हें दरबार की ओर से भाछ नामक कर छोडा गया। 38 राज्य की ओर से धनावंशी स्वामियों के मंदिरों में पेटिया प्रबंध करने तथा उन्हें डोळी भूमि दिए जाने के अनेक उल्लेख बहियों में प्राप्त होते हैं। कागदों री बही संवत 1911 में उल्लेख है-" गांव भोलासर में श्री ठाकुरजी रो मींदर छै तेरी सेवा सांमी रूपदास करै छै सु इयै मींदर लॉरै डोळी रै छै तेरो पालो-घास अँ बाढसी, ठाकुरजी रै मींदर में गायां छै तीकी चरासी, दूजो इयै डोळी री खीयार करण पावै नहीं, आसोज बद-2।" 39 धनावंशी स्वामियों के प्रति राज्य की अनुग्रहपूर्ण दृष्टि रहती थी। गांव के किसी जागीरद्वार द्वारा बेअदबी करने पर धनावंशी गांव छोड़ दिया करते थे, पर दरबार (राजा) को जब इस बात का पता चलता तो वे आदेश जारी कर उन्हें सम्मानपूर्वक वापस बुलवाते। बही कागद रै तलबां री संवत संवत 1896-99 में उल्लिखित इस आदेश में लिखा है- "गांव धीरासर रो वैरागी रूपदास कानड़दास गांव कंवलासर वसतो हो तीको नै हाडै खेतसी कंवलासर में पकड़वाया हुता ताहरी बेराजी हुव 'र सरसै जाय बैठा छै सु हमें जमाखातरी राख पूठा गांव धीरासर कंवलासर थे राजी हुवो जठै आय वसजो। था सूं बेहिसाबी खेचल कई बात री न हुसी। हुकम है। संवत १८९९ माह बद-५।" अन्य अनेक आदेशों में भी धनावंशी स्वामियों के लिए 'कई बात री खेचल न हुसी' शब्द को काम में लिया गया है जिसका तात्पर्य है कि इन्हें किसी बात के लिए परेशान न किया जाए। राज्य की ओर से धनावंशी स्वामियों को धुंआ भाछ, ढोल गवाडी जैसे अनेक कर माफ थे. वहीं स्थानीय जागीरदार को उनसे बेगार न लेने का हुक्म था, वहीं धनावंशी मंदिरों में पूजा के लिए पेटिया (रोजाना आटा, शक्कर, बी) दिए जाने का प्रबंध राज्य की ओर से किया जाता था। बही तलबा री संवत 1896 में दर्ज है- "वैरागी साळगदास नै सदामद महीने १ रू. १२) आमालात कुरा व पेटीया रा पावै है तेरा मास १२ रा दीराया छै स खजानची लालचंद देदीज्यो । अकराख रा पावो ते गढ़ रा जमा खरच कर लेजो।" 41 इसी प्रकार डंगर बालाजी मंदिर के पेटिया प्रबंध के संबंध में छाप का कागज इस प्रकार है-" श्री सांमीजी पोकरदासजी चेलो गोरधनदासजी गांव गोपालपुरा से ठाकरां हमीरसिंहजी रा जै रुगनाथजी आपने हमारा ठीकाना से बनाकर पाहाड़ ऊपर श्री हनुमानजी रो मिंदर दियोड़ो है जकै रे धूप दीयै वास्ते श्री दरबार सूं मास १ रा २) अखरे रुपिया दोय बारै मास रा २४) चालू कर दीया है सो सुजानगढ़ हाकमा से मिलता रैसी और हमार पुरवजा रो बनाकर मंदिर आपने दान दियोड़ो है जी रो आप ही इंतजाम करोगा संवत १९३५ मिति पोह सुदी १३।" 42 यों तो धनावंशी वैरागियों को बेगार की छूट थी, किंतु राज्य में कई दफा ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो जाया करती, तब धनावंशी महंतों से भी बेगार ली जानी आवश्यक हो जाती, इसे बेगार न कह सहायता भी कह सकते हैं। बीकानेर महाराजा रतनसिंह के समय, अजमेर में अंग्रेज अफसर की सेवा में ऊंट भेजने की आवश्यकता पड़ी। महंतों के ऊंट अच्छे पले हुए हुआ करते थे। संवत 1896 में इस आशय का पत्र महंतों को भेजा गया-" श्री दीवान बचनातु गांव गारबदेसर रा महंत बदरीदास, गांव बुकणसर रै मंडल रा महंत हरीदास, गांव कड़वासर रै मंडळ रा महंत गांनदास (ज्ञानदास) साहवा रै मंडल रा महंत गोपालदास वा देस रा वैरागियों समसुता जोग्य तिथि अजमेर अंगरेज नै ऊंठ मेलणा छै ते रा ऊंठ १२ अखरे बारै थां सारां ई वैरागी सालगै हसतु ठाहरीया है सु बैण दिन १५ रो कीवो है सु सालगो आवै छै सु फंटवाड़ कर ऊंठ ताकीद सु मेलो सु काम करजो ढील कीवी तो ओळमो खासो-द. मोहता सालमसिंघ, लीलाधर संवत १८९६ मीती आसाढ सुद ७ दूजी।" अनेक ग्रंथों में धनाजी और उनके द्वारा स्थापित पंथ का अनुमोदन किया गया है। नानूराम संस्कर्ता उच्च कोटि के साहित्यकार हुए, उन्होंने अपने वृहद ग्रंथ 'खेडे रपट' में स्पष्टतः लिखा कि "जाट धन्ना भगवान के परम भक्त हुए, जिनके नाम पर धनावंशी वैरागियों का मत प्रचलित हआ।" 44 उन्होंने तो धनावंश में समाहित अनेक जातीय नखों का भी उल्लेख किया है। धनावंश में एक महंत श्री गणेशदासजी लगभग एक शताब्दी पहले हुए। वे बड़े अग्रगामी सोच वाले कर्मनिष्ठ महंत थे। उन्होंने संवत 2007 में लाडनूं के निकट मंगलपुरा में वैरागी विद्यालय की स्थापना कर उस काल में अविश्वसनीय और महान कार्य किया। यह वैरागी विद्यालय अनेक वर्षों तक चलता रहा, पर दैवयोग से महंतजी का स्वर्गवास उसी वर्ष हो जाने से विद्यालय की प्रगति को थोड़ा विराम लगा। जोधपुर के बारठ कवि नवलदान ने उनकी प्रशस्ति में दोहे, सवैया तथा भजन प्रस्तुत किया, जो वैरागी विद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट में प्रकाशित हुए। उनकी प्रशस्ति का प्रथम दोहा इस प्रकार है : धना भक्त के वंश को, उज्ज्वल कीनो आप।शुभ कारज कीना सदा, जप हिरदे हरि जाप ।। 45 उपरोक्त दोहे में स्पष्टतः धनावंश को धना भक्त का वंश बताया गया है। एक सदी पूर्व तक धनावंश के प्रवर्तक धनाजी महाराज के प्रति अन्यान्य समाज में भी श्रद्धा का भाव था। धनावंश को लेकर अन्य अनाप प्रमाण भी उपलब्ध हैं। कतिपय धनावंशीय महंतद्वारों के शिलालेख एवं ताम्रपत्र गारबदेसर मंडलसंत केशवदास संवत 1697 वैसाख सुदी 7 को गारबदेसर गांव में आए। वे कहां से आए और कौन थे, विस्तृत ब्यौरा प्राप्त नहीं है, पर उन्होंने सीतारामजी के पूजन का स्थान वर्तमान गारबदेसर सीतारामजी मंदिर की जगह किया। यहां मंदिर का निर्माण महंत प्रमाणदास ने किया। मंदिर निर्माण का शिलालेख इस प्रकार है- श्री रामाय नमः संमत १८०३ वरषे मिति असाढ वदी १२ श्री राम जी रो मिंदर रुघनाथ जी को सांमीजी श्री संतदास जी मिंदर करवायो। अधकारी हर भगत केसुदास सेवग कल्याणदास, कान्हो शिवराम कारीगर गारबदेसर के महंतों में संवत 1850 में हरिदासजी महाराज बहुत प्रभावशाली महंत थे। बीकानेर के राजा सूरतसिंहजी ने उन्हें बहुत भूमि प्रदान की। हरिदासजी तपस्वी संत थे, उनके अनेक चमत्कार इस क्षेत्र में प्रचलित हैं। सूरतसिंहजी ने इन्हें सं. 1852 में ताम्रपत्र भेंट किया। गारबदेसर पैंतीसी के गांव(1) गारबदेसर (2) कालू (3) गुसांईसर बड़ा (4) जेतासर (5) श्रीडूंगरगढ़ (6) बिग्गा (7) हेमासर (8) देराजसर (9) गुसांईसर निमड़िया (10) नौरंगदेसर (11) डांडूसर (12) खारी (13) कुजटी (14) सहजरासर (15) लोढेरा (16) आडसर छोटा (17) डेलवां (18) लाछड़सर (19) आडसर पुरोहितान (20) उदरासर (21) लाधड़िया (22) कंवलासर (23) सोमासर (24) पनपालिया (25) रंगाईसर (26) सोनपालसर (27) कीकासर (28) अमरसर (29) मालकसर (30) हालासर (31) भानीपुरा (32) भोजासर छोटा (33) भोजासर बड़ा (34) अमरपुरा (35) करणीसर (36) मनाफरसर (37) खोडाला (38) शेखसर (39) नारसरा (40) हरदेसर जायल महंत द्वाराजायल महंत द्वारा राजसी महंतद्वारा था। यहां नृसिंह भगवान का मंदिर है। मंदिर बहुत सुंदर अलंकृत पत्थरों से बना हुआ है। मंदिर निर्माण का शिलालेख इस प्रकार है- ।। सुभ ।।संमत १८५७ मिति आसाढ मासे शुक्ल पक्षे तिथि दुतीया भौम वासरे दिने ठाकुरजी श्री नृसिंहजी को मिंद हुवौ आज्ञा पालक महंतजी श्री बदरीदासजीजोधपुर मंदिर का ताम्रपत्र।। श्री परमेश्वरजी सत्पत्रै ।। ।। श्री जी साहब जी श्री सही ।। स्वस्ति श्री राज राजेश्वर महाराजाधिराज माहाराजा श्री विजैसिंघजी महाराज कुंवार श्री फतेसिंघ जी वचनात तथा सैहर जोधपुर में नागौरी दरवाजे ठाकुरजी श्री सीतारांमजी विराजै तठै श्री ठाकुर द्वारा तालकै धरती वीघा २०१ दोय सौ ओक गढ जोधपुर रो गांव सुरपुरियो सालवा कैन तठै हवेली रो तिण में चढाई है। १५१ वीघा वरसालु ५० वीघा उनाळवै री एक तिण रो जाव, २०१ अखरे वीघा २०१ संवत १९१९ रा प्रथम असाढ सुद २ मुकाम पाय तखत गढ जोधपुर दोतीणा का ताम्रपत्रमहाराज श्री प्रेम स्यंघजी वचनातु सांमी धीरजदासजी नै धरती बीघा ७०१) अंके सात सै एक पुनरथी दीनी। जी में थानै वसासे दोहते वाग सी वावो खेत दीयो वीघा पांच सौ। दोतीणा के धनावंशी ठाकुरदासजी का रुतबा किसी बड़े जागीरदार से कम नहीं था। उनके संबंध में एक दोहा प्रसिद्ध है- दोतीणो गढ़ द्वारका, ठावो ठाकुरदास।आयां नै आदर मिलै, पावै राबड़ी छाछ ।। कसूंबी महंत द्वारा कसूंबी के महंत जीवणदास को ५०१ बीघा भूमि ठाकुर अजबसिंह बीदावत के सांसण पट्टे में दी। द. मुहता अनोपसिंह- संवत १८५४। यह धनावंशी स्वामियों के प्रारंभिक महंतद्वारे में से एक है। यहां नृसिंह भगवान का मंदिर है। खारिया की गद्दी यहीं से जाकर अलग बनी। वहां भी नृसिंह भगवान का मंदिर है।
अध्याय: षष्ठ:- धनावंश और पंच संस्कार
अध्याय : षष्ठ - धनावंश और पंच संस्कार वैष्णव धर्म अत्यधिक प्राचीन है। वैष्णव ग्रंथों में प्राप्त होता है कि सर्व प्रथम भगवान नारायण ने ब्रह्माजी और शंकर भगवान को पंच संस्कारों से युक्त वैष्णवी दीक्षा प्रदान की। वैष्णवता के अपने संस्कार तथा नियम हैं। हरेक संपदाय के अपने कुछ नियम-लक्षण हुआ करते हैं। पुराणों में वैष्णव संस्कारों के संबंध में वर्णन हैं- ये कण्ठ लग्न तुलसी नलिनाक्ष माला ये बाहूमूल परि चिह्नित शंख चक्राः ।ये वा ललाट फलके लसद् ऊर्ध्वपुण्ड्रास्ते, वैष्णवाः भुवनमाशु पवित्र यन्ति ।। वैष्णवी दीक्षा प्राप्त व्यक्ति भगवद् प्राप्ति कराने में पूर्ण सक्षम होता है, पर वह अध्यात्मवेत्ता होना चाहिए। जो अध्यात्मवेत्ता नहीं है, वह अपने धर्म का शुद्ध फल नहीं भोग सकता। वैष्णव जन को ललाट पर टीका के रूप में ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाना चाहिए। कंठ में तुलसी की माला धारण करे। भगवद् आराधना पंच संस्कार युक्त होकर करने का विधान है। निम्न हैं पंच संस्कार :(1) तप्त छाप : तप्त छाप को तप्त मुद्रा भी कहा जाता है। ये छाप पांच प्रकार की होती हैं। इन्हें भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है। धनुष, बाण, नाम, चन्द्रिका तथा मुद्रिका नाम की ये छाप, बांयी भुजा पर धनुष, दाहिनी भुजा पर बाण, वक्षस्थल (छाती) पर श्री सीतारामजी का नाम तथा मुद्रिका तथा ललाट पर चन्द्रिका। ये पांचों मुद्रिकाएं शब्द, रूप, रस, स्पर्श, गंध नामक पांच तन्मात्राओं से साधक की रक्षा करती है। रामानंदजी से दीक्षित होने के बाद धनाजी महाराज ने स्वयं पंच संस्कारों का आजीवन निर्वहन किया। प्राचीन समय से धनावंश में तप्त मुद्रा लेने का धार्मिक चलन रहा है। समझदार होने पर धार्मिक युवा भागकर द्वारिका चले जाया करते थे और तप्त मुद्रा लिया करते थे। मुद्राएं तप्त एवं शीतल दोनों प्रकार की होती हैं। धनावंश में कथन प्रचलित है- 'जो धरणीधर की झेलेलो, बो तीन लोक में खेलेलो।' इसका तात्पर्य ही यही है कि तप्त छाप लेने वाला निर्भय हो जाता है। पद्म पुराण में शंक, चक्र की मुद्रा लेने का भी उल्लेख है। जो वैष्णव तप्त मुद्रा धारण करता है उसकी इक्कीस पीढ़ियां मुक्त हो जाती हैं। (2) तिलक : उपासना के अनेक अंगों में पुण्ड को भी आवश्यक माना गया है। पुण्ड्र तिलक का ही नामांतर है। ललाट मध्ये तिलकमूर्ध्वरूपं समाहितः । यः कुर्यान्मन्त्रसंयुक्तमूर्ध्वपुण्ड्रमिति स्मृतम् ।। ऊर्ध्वपुण्ड्र वैष्णवों की पहचान है। ऊर्ध्वपुण्ड्रों के आकार की संख्या बीस है तथा चंदन, केसर, कुमकुम, कस्तूरी आदि सुगंधित द्रव्यों से तथा श्याम, पीत, श्वेत, रक्तवर्णी मृतिका से भी ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाया जाता है। धनावंशी वैरागी गोपीचंदन से ऊर्ध्वपुण्ड्र करते हैं तथा यह परंपरा प्राचीन है। शरीर पर वैष्णव 12 स्थलों पर तिलक करते हैं, यथा- (1) ललाट (2) उदर (3) वक्षःस्थल (4) कण्ठ (5) दक्षिण पार्श्व पर (6) दक्षिण हस्त पर (7) दक्षिण स्कंध पर (8) वाम पार्श्व पर (9) वाम हस्त पर (10) वाम स्कंध पर (11) कटि पर (12) कान पर। ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक को भगवान का चरणचिह्न समझ कर हम अपने ललाट पर धारण करते हैं। राम भक्ति करने वाले चित्रकूट की रामरज तथा श्रीकृष्ण भक्त गोपीचंदन का तिलक धारण करते हैं। (3) नामकरण : वैष्णव का नाम 'दासान्त' होना चाहिए। कोई वैष्णवी दीक्षा ग्रहण करता है तो उसे गुरुजी नव नाम प्रदान करते हैं। गृहस्थ के लिए नव नाम तो आवश्यक नहीं है किंतु बालक के नामकरण में दासान्त संज्ञा अवश्य हो। (4) माला अथवा कंठी तुलसी की माला का वैष्णवों में बड़ा ही महत्त्व है। जो व्यक्ति अपने गले में तुलसी की कंठी बांधता है, वह भगवान से अनन्यता स्थापित करता है। गुरु भी जब शिष्य बनाता है तो सबसे पहले उसके गले में तुलसी मनकों की कंठी बांधता है। इसके अलावा 108 मनकों की तुलसी माला भगवन्न नाम स्मरण के लिए वैष्णवों के पास रहती है। (5) मंत्र धारण : मंत्र में बड़ी भारी शक्ति रहती है। गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र में भगवान के समान ही श्रद्धा रहनी चाहिए। शिष्य के लिए वह मंत्र तारक है। सांप्रदायिक मंत्र का निरंतर जाप रहना चाहिए। उपरोक्त पांच वैष्णव संस्कार से संपन्न वैष्णव भगवान का अति प्रिय होता है। पंच संस्कार धारित वैष्णव की साधना अधिक फलवती होती है। ऊर्ध्वपण्ड के प्रकार: ऊध्वपुण्ड्र तिलक अनेक प्रकार के प्रचलित रहे हैं। रामानुज संप्रदाय में अंग्रेजी के आकार मध्य रक्तवर्णी तिलक रहता है. जबकि रामानंद संप्रदाय में रामानंदजी का तिलक में सिंहासन सहित श्वेत ऊर्ध्वपूण्ड तथा मध्य में पत्राकार पतला लाल तिलक। गलता गददी में तिलक में सिंहासन नहीं था, रैवासा गददी के तिलक में बाकी तो गलता गद्दी की भांति है, पर तिलक के दोनों ओर पीत चंद्रिका होती है। इस प्रकार अनेक तिलक प्रचलित हुए, पर धनावंशी ऊर्ध्वपुण्ड्र में बिना सिंहासन 'वी' आकार का तिलक तथा मध्य में भी गोपीचंदन अथवा रामरज का तिलक रहता है। आचार्य निष्ठा : सद्गुरु पंच संस्कारों की महत्ता व्याख्यायित करते हैं। इसलिए पंथ में आचार्य गुरु का अत्यधिक महत्त्व है। जो सामान्य पंथी, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की साधना से रहित हैं, जिनके हृदय में भक्ति भाव जाग्रत नहीं है, ऐसे जन को आचार्य बोध प्रदान करते हैं। आचार्य के प्रति पंथ संप्रदाय में गहन निष्ठा रहनी चाहिए। संप्रदाय का अर्थ होता है- गुरुचरणों में श्रद्धा, गुरुभाइयों में परस्पर प्रीति, गुरुआज्ञा का प्राणपन से पालन और पंथ के प्रति गहन समर्पण का भाव। चरणचिह्न का ध्यान : नाभादासजी ने वैष्णव जन को सदैव रामजी के चरणचिह्नों का ध्यान लगाने का निर्देश भक्तमाल में किया है- अंकुस, अम्बर, कुलिस, कमल, जव धुजा धेनुपद ।संख, चक्र, स्वस्तिक, जंबूफल, कलस, सुधाहृद ।। अर्धचन्द्र, षटकोन, मीन, बिंदु, ऊरधरेखा। अष्टकोन, त्रयकोन, इन्दु धनु, पुरष विशेषा ।।सीतापति पद नित बसत एते मंगलदायका ।चरन चिह्न रघुबीर के संतन सदा सहायका ।। 6 ।। भगवान राम के चरणों में उपरोक्त बाईस चिह्न विराजते हैं, जो साधक के ध्यान हेतु अति उत्तम हैं। धनावंश में कंठीमाला, चरणामृत, तुलसी ग्रहण, प्रदक्षिणा, एकादशी व्रत, जन्माष्टमी, रामनवमी, राधाष्टमी का विशेष महत्त्व है। धनावंश के तीर्थस्थल : धुआं कलां - धनाजी महाराज का मुख्य स्थल, जहां उन्होंने भगवद् साक्षात्कार किया तथा संत सेवा की। चौरु-धनाजी महाराज का जन्मस्थल एवं ननिहाल। काशी में श्रीमठ- श्री धनाजी महाराज का दीक्षा स्थल। प्रयागराज - धनाजी महाराज का तीर्थस्थल। अयोध्या - भगवान श्रीराम का प्राकट्य स्थल। मथुरा, वृंदावन, गोकुल आदि भगवान श्रीकृष्ण के लीला स्थल। द्वारिका- तात छाप के लिए पूज्य स्थल गया- मुक्तिस्थल। गंगासागर, चित्रकूट, प्रभास क्षेत्र पुष्कर, कोलायत, नाथद्वारा, गलता आदि तीर्थ भी वैष्णवों के श्रद्धा जापित करने के स्थान हैं। पठनीय ग्रंथ : धनावंशी वैष्णव जन के लिए सदैव पठनीय ग्रंथों में श्रीमद्भगवद गीता, भागवत पुराण, नारद पुराण, विष्णु पुराण, पद्म पुराण, स्कंद पुराण, श्रीरामचरित मानस, रामार्चन पद्धति, रामपटल, भक्तमाल, धनावंशीय संहिता, विष्णु सहस्रनाम, रामरक्षा स्तोत्र आदि हैं।नित्य भगवद् पूजन : प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान के मंदिर में जाकर सर्वप्रथम दंडवत प्रणाम करें तदुपरांत तीन ताली बजाकर मंदिर के किवाड़ खोलें। मंदिर की साफ-सफाई करें, पूर्व दिन के माल्य, गंध, तुलसी आदि को हटावें, पूजा के पात्रों को धो-मांजकर शुद्ध करें। फिर दीपक प्रकाशित करें। घंटानाद कर भगवान को जगावें। बाएं भाग में जलकलश भरकर रखें। पूजा की सामग्री को तैयार करें। श्लोक, पद बोलकर भगवान को जगावें। पंच पात्र में जल भरें- कलश में तुलसी-दल छोड़ें। भगवान के चरणों में तुलसी-दल छोड़ें, फिर पुष्प चढ़ाएं, भगवान का आह्वान करें। आह्वान मंत्र पढ़ें। आचमनी से जल लेकर भगवान के हस्त कमल को धोएं। फिर हस्त-मुख आदि का प्रक्षालन कर शुद्ध धुने वस्त्र से पौंछें। फिर मुख-पांव को धोएं। दंत धावन कराएं, फिर ताम्बूल भेंट करें। अंग स्नान कराएं, भगवान के उबटन मलें, फिर कलश के पानी से स्नान कराएं। भगवान को अर्घ्य दें- आभूषण पहनाएं। भगवान को उत्तरीय, ऊर्ध्वपुण्ड्र, वस्त्र, चंदन, तुलसी, नैवैद्य समर्पित करें। मंत्रों के साथ सेवा करें। नैवैद्य समर्पण के बाद, जलपान निवेदन, पुनः शुद्ध जल से भगवान के हाथ मुंह धुलवाएं, पुष्पांजलि तथा दक्षिणा देकर स्तुतिपाठ करें। प्रदक्षिणा करें - भगवान के नाम का स्मरण करते रहें। धनावंशीय आचार एवं परंपराएं श्रेष्ठ व्यक्तियों (बौद्धिक जनों) द्वारा अनुमोदित एवं बहुजनों द्वारा मान्य नियमों को आचार अथवा आचरण कहते हैं। हमारे धर्मग्रंथों खासकर स्मृतिग्रंथों यथा मन् स्मृति, याज्ञवल्यक स्मृति में इनका यथेष्ट उल्लेख है। आचारों का पालन करना आवश्यक है। आचार से ही अपने कर्तव्य का बोध होता है। आचारों की तीन श्रेणियां मानी गई हैं, जो इस प्रकार हैं-1. देशाचार2. जात्याचार (जाति के आचार-विचार)3. कुलाचार (अपने कुल के आचार-विचार) । हमारे धर्मग्रंथों में उपरोक्त प्रकार के आचारों का पालन करना आवश्यक बताया गया है। जो समुदाय अपने धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आचारों का पालन नहीं करता या विपरीत पालन करता है तो उसका नाश अवश्यंभावी है। संप्रदाय के आचार्य आचरणों का पालन करते हैं, इसीलिए आचार्य कहलाते हैं। अपने अनुयायियों को भी वे आचरणगत व्यवहार करने की प्रेरणा देते हैं। धनाजी महाराज ने जाट जाति के अनेक नखों के अनुयायियों को जब धनावंशी समुदाय में शामिल होने का आग्रह किया तो पूर्व जाति के अनेक आचारों के परित्याग का आग्रह रखा। आचार में अनेक क्रियाएं भी समाहित होती हैं। धनावंशी स्वामी का खान-पान शुद्ध रहता है। उसे मांस-मछली अंडा तथा वैष्णव आचारों से हीन व्यक्ति के हाथ का भोजन निषेध है तथा किसी भी प्रकार का नशा चाय, कॉफी, बीड़ी, सिगरेट, भांग, गांजा, तम्बाखू, गुटखा, दारू, शीतलपेय की आचरणगत मनाही है। धनावंशी स्त्री-पुरुष का पहनावा शोभनीय रहना चाहिए। खासकर स्त्रियों का पहनावा वैष्णवता को लज्जित करने वाला न हो। धनावंशी स्त्री पुरुषों का अभिवादन सुंदर तथा बोली व्यवहार कटखना न होकर शुद्ध, शुभ तथा महनीय होना चाहिए। प्रतिदिन नित्यकर्म से निवृत्त होकर ठाकरद्वारे जाकर ठाकुरजी के दर्शन करने चाहिए। ठाकुरद्वारा दूर हो तो घर के मंदिर में ही भगवद् आराधना, संध्यावंदन आदि का नियम रहना चाहिए। सायंकालीन सत्संग भजन हो। धनावंशी स्वामी के आराध्य देव केवल ठाकुरजी हैं, चूंकि श्री संप्रदाय के प्रणेता हनुमानजी हैं, इसलिए वे भी पूजनीय हैं। भैरव, पित्तर जैसी परिकल्पना धनावंश में नहीं है। कीर्तन धनावंश की मूल पूंजी है। हर धनावंशी के गले में तुलसी के मनकों की कंठी रहनी चाहिए। तिलक (ऊर्ध्वपुण्ड्र) और चोटी का भी विधान है।धनावंशी को जनेऊ भी धारण करनी चाहिए। धनाजी महाराज स्वयं जनेऊ रखते थे तथा उन्होंने धनावंशी से जनेऊ का आग्रह भी रखा। धनावंशी घर में शालग्राम, शंख, पंच पात्र, रामचरितमानस तथा गीतादि अन्य शास्त्र भी आवश्यक धार्मिक चीजें हैं। धनावंशी का पुरुष नाम दासांत होना चाहिए। धनावंशी विवाहों में स्त्री-पुरुष नाच (नृत्य) फूहड़ गान, डीजे आदि नहीं होने चाहिए। विवाह तथा अनान्य आयोजनों में भोजन सात्विक रहे, इस बात का ध्यान रखा जाता है। धनावंश में विधुर स्त्री या पुरुष के लिए नाता नहीं होता। बालविवाह भी निषेध है। मृत्युपरांत धनावंशी को वैकुंठी के माध्यम से शमशान गृह तक पहुंचाया जाता है और उसको गोपीचंदन आदि के टीके किसी साधु की भांति ही लगाए जाते हैं। दाह संस्कार के बाद तप्त भात किया जाता है, जिसमें चावल का भोजन होता है और शोक निवारणार्थ होता है क्योंकि यह माना जाता है कि एक साधु भगवान के श्रीचरणों में चला गया। मृत्युपरांत 17 दिनों तक कीर्तन भजन रामचरित मानस के पाठ आदि चलते हैं तथा गंगाप्रसादी की प्रथम रात्रि मेळ के दिन मंदिर से आसन सहित शालग्रामजी को लाया जाकर उन्हें प्रसाद चढ़ाया जाता है। झालर शंख-नगारों के साथ आरती की जाती है। इसी दिन महंत का आगमन होता है। सत्रहवीं के दिन महंत कंठी बांधते हैं। पूर्व में महंत ही पैंतीसी के गांवों में सत्रहवीं में आने की चिट्ठी अपने हाथ से लिखा करते थे। धनावंशियों के यहां गरुड़ पुराण नहीं पढ़ी जाती। धनावंशी भले ही गृहस्थी हो, उसे साधु का विरद प्राप्त होता है, इसलिए उसके प्रत्येक आचार-व्यवहार, स्वभाव में विनम्रता और साधुता के लक्षण रहने चाहिए। धनावंशी महंत मंडलजन्मकाल से वैराग्य संपन्न महापुरुष विरल होते हैं. पर महंत जन्मकाल से वैरागी होते हैं। भारतीय जीवन में चार आश्रमों की महत्ता रही है। प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम, उसके पश्चात गृहस्थाश्रम और उसके बाद वानप्रस्थाश्रम और आखिर में संन्यासाश्रम। यह विधान प्रत्येक व्यक्ति के लिए रहा है, किंतु जो मठों. मंडलों के निहंग महंत होते हैं. उनके संन्यास की सरुआत ब्रह्मचर्याश्रम के दौरान ही हो जाती है। ये जन्मकाल से वैरागी होते हैं। महंत का संबंध किसी न किसी संप्रदाय विशेष से रहता है। उक्त संप्रदाय के समस्त धार्मिक संस्कार को वह विधि तथा परंपरा के अनमेल से संपन्न कराता है। उक्त संप्रदाय पर उसका धार्मिक नियंत्रण रहता है। महंत की कोटि कटीचक्र संन्यासी की रहती है। वह अधिष्ठाता के रूप में मठ, मंदिर, मंडल में रहकर वैराग्य जीवन व्यतीत करता है। काम, क्रोध, मद, लोभ आदि से रहित होकर वह संप्रदाय में धार्मिक गतिविधियों की अभिवृद्धि करता है। नैमित्तिक समस्त आचरणों का निर्वाह नियमबद्ध होकर करता है। उक्त महंत के निर्वाह मात्र संसाधनों का बंदोबस्त करना उक्त संप्रदाय के अनुयायियों का कर्तव्य रहता है। महंतद्वारों को महंत गद्दी, मंडल, द्वारा आदि से संबोधन किया जाता है। महंतद्वारे ज्ञान के आगार होते हैं। जिस संप्रदाय का महंतद्वारा होता है, वहां उस द्वारे में पारंपरिक रूप से उक्त संप्रदाय की धार्मिक-आध्यात्मिक परंपराओं से संबंधित अभिलेख सुरक्षित रहते हैं। संप्रदाय के इतिवृत्त तथा अपनी महंत गुरु परंपरा की समस्त जानकारियां संकलित रखते हैं। संप्रदाय से संबंधित ग्रंथों का संग्रह रहता है। संप्रदाय से संबंध रखने वाले ग्रंथों का पारायण किया जाता है। भक्त शिरोमणि धनाजी महाराज ने जब धनावंश पंथ की संस्थापना की तो पंथ की आवश्यकता समझकर समाज ने महंतद्वारे स्थापित किए। यह सोच रखा गया कि संप्रदाय की धार्मिक शिक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए महंतीय व्यवस्था से संप्रदाय के साधुओं को आधार प्राप्त होगा। धनावंशी वैरागी संप्रदाय के नियमों का निर्वहन होता रहेगा तथा महंत के रूप में सामान्य धनावंशी को गुरु की प्राप्ति होगी। महंतों की जागरूकता से समाज के आदर्श नियम बने रहेंगे। प्रारंभ में खारिया, कसूंबी, गारबदेसर जैसे थोड़े से महंत मंडल स्थापित हुए, किंतु धनाजी महाराज के हरिशरण होने के बाद महंत मंडलों की वृद्धि होती गई। ज्यों-ज्यों धनावंश की वृद्धि हुई, उसी के अनुरूप एक-एक पैंतीसी पर एक-एक गुरुद्वारा स्थापित होता गया। वे पैंतीस गांव जिनमें धनावंशी स्वामियों का वास था, एक मंडल के अधीन, वे गांव पैंतीसी कहलाते थे। उन पैंतीस गांवों के समुच्चय को ही मंडल की संज्ञा दी गई। धनावंशी स्वामी के गोलोक गमन को साधुओं के देहावसान की भांति ही प्रतिष्ट्रा दी गई है। वह एक सामान्य व्यक्ति की मृत्यु न होकर एक वैरागी के हरिशरण होने की प्रभु इच्छा को माना गया। और मृत्युपरांत सत्रहवीं तक के सारे आचारों में वैरागी संत और गृहस्थी धनावंशी में कोई अंतर नहीं रखा गया। धनावंशियों में प्राणी की मृत्युपरांत अग्नि संस्कार के बाद 'तप्त भात' की परंपरा रही है। यह शोक निवारण की परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति ठाकुरजी के अंश में लीन हो गया है। वह सायुज्य मुक्ति प्राप्त कर गया है, इसलिए उसके लिए शोक न किया जाए। सत्रह दिनों तक कीर्तन, सत्संग, रामायण पाठ आदि धार्मिक प्रसंगों में क्षेत्रीय महंत का निर्देश रहा करता तथा सत्रहवें दिन गंगा प्रसादी के मेले तथा पूर्व संध्या के मेल हेतु गृहस्थी वैरागी के नातेदारों को चिट्ठी देने की परंपरा (शोक संदेश भेजने) रही है, चिट्ठी देने का, लिखने का जिम्मा महंत का रहा है। इस प्रक्रिया को महंतजी द्वारा चिट्ठी फाड़ना कहा जाता था। समाज में परस्पर आत्मिक भाव बना रहे, इसलिए पैंतीसी में चिट्ठी देने की परंपरा भी रही है, किंतु धीरे-धीरे यह व्यवस्था शिथिल पड़कर लगभग समाप्त जैसी हो गई है। मृत प्राणी के घर पर महंतजी को आमंत्रित किया जाता, तब वे अपने पूरे लवाजमें (शिष्यों आदि) के साथ आया करते। महंतजी के स्वागत में गवाड़ से लेकर घर तक रास्ते में लोवड़ी बिछाई जाती तथा उनके चरण का अंगूठा पखारा जाता और उस जल को चरणामृत के रूप में घर के सदस्य पान करते। मृतक धनावंशी के घर सत्रहवीं के भोजन को महंत के हाथ से परूसने की परंपरा थी। खिचड़ा-लापसी में महंत अपनी चुलू से घी परोसते। बांकिया ध्वनि के बाद भोजन प्रारंभ होता। यह एक गुरु का सम्मान था। महंत के गुरुद्वारे पूजनीय होते हैं। उनमें बालकों के जात-झडूले उतरते रहे हैं तथा विवाह शादी के उपरांत लोग गठजोड़े की जात लगाते हैं। यह इस पदवी के प्रति सम्मान की परंपरा रही है। महंत के समक्ष शिष्यगण को खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। महंतों की राजाओं तथा जागीरदारों के समय में बड़ी भारी प्रतिष्ठा तथा मान्यता हुआ करती थी। राजा लोग अपने-अपने क्षेत्र के महंतों को राज्याश्रय के रूप में बड़ी-बड़ी जमीनें डोली रूप में प्रदान करते तथा मंदिरों के लिए पेटिया व्यवस्था कायम किया करते। अनेक धनावंशी महंतों का तत्कालीन समय में धार्मिक रुतबा था। गारबदेसर के महंत हरिदासजी का बीकानेर के राजा सूरतसिंहजी अत्यधिक सम्मान करते थे। वे टीकमदास के शिष्य को बीकानेर के महाराजा सुरतसिंहजी ने एक हजार बीघा जमीन महंत के अनुग्रह के लिए लालायित रहते थे। कड़वासर के तत्कालीन महंत मोहनदास, तथा दूसरी अनेक सुविधाएं प्रदान कीं। भादरा के महंत कानड़दास को उच्च कोटि का पेटिया प्रदान किया गया। बीकानेर महाराजा रतनसिंह ने बकणसर के तत्कालीन महंत हरिदास शिष्य दयाराम प्रशिष्य बदरीप्रसाद को भाछ, नेतो आदि करों में छूट तथा भूमि प्रदान की। गारबदेसर के महंत को अस्थल के पीछे 300 बीघा तथा 750 बीघा भूमि कालू में प्रदान की गई। महंतों को भूमि, पेटिया तथा करों में छूट के ऐसे अनेक ब्यौरे राजाओं के समय के बड़ी संख्या में प्राप्त होते हैं। जायल के महंत का बड़ा भारी रुतबा था। कसूंबी के महंत की धोक खाने के बाद ही वहां के जागीरदार सामौर (चारण) शुभ कार्य करते। चूरू के महंत की भी ऐसी ही प्रतिष्ठा थी। निम्बी जोधा के महंत को होली-दीवाली के राम-राम के दिन गढ़ के भीतर सम्मानपूर्वक ऊंचा आसन देकर बैठाया जाता। जोधपुर के तीनों धनावंशी महंतद्वारों का अत्यधिक मान-सम्मान था। खारिया महंत का बीदावत ठिकानेदारों ने सदैव सम्मान किया। गारबदेसर महंत के संबंध में लिखा है, "महाराजा सूरतसिंह ने संवत 1852 में महंत को तीन सौ, नौ सौ तथा सात सौ पचास बीघा अर्थात 2025 बीघा जमीन प्रदान की।... श्री हरिदास महंत तकड़बंध एवं राजवी की भांति जमीन जायदाद वाले थे।" धनावंशी महंत की गरिमा सदैव ही समाज में बनी रही। जोधपुर के मोतीबाई मंदिर के महंत श्री गणेशदासजी ने अपने सप्रयासों से लाडनूं के मंगलपुरा क्षेत्र में श्री वैरागी विद्यालय की स्थापना 24 अप्रैल, 1950 में की। इसमें गुरुकुल आवासीय पद्धति से वैरागी विद्यार्थियों को निशुल्क शिक्षा प्रदान की गई। जोधपुर के महंत बदरीदासजी गोलिया भी नामी संत हुए, जिन्होंने धनाजी महाराज पर दो पुस्तकों का लेखन किया। नोहर के महंत बालदासजी, भादरा के महंत जानकीदासजी, मूंडवा के महंत सीतारामदासजी, जोधपुर के महंत बदरीनारायणजी, गोपालपुरा के महंत हनुमानदासजी, निम्बोल के महंत द्वारकादासजी ने भी श्री वैरागी विद्यालय की स्थापना में सहयोग किया। किसी समय नागौर क्षेत्र के नौ महंत मंडलों में परस्पर बहुत सामंजस्य रहा करता था। नौ मंडलों की चिट्ठी फाड़ना भी बड़े गौरव का विषय था। सभी ऐतिहासिक एवं प्राचीन तथ्य धनावंशी मंडल महंतों की महत्ता प्रतिपादित करते हैं। धनावंश की धार्मिक-आध्यात्मिक सुदृढ़ता के प्रतीक कहे जाने वाले महंतद्वारे विगत अनेक दशाब्दियों से शैथिल्य के शिकार हो चुके हैं। इस व्यवस्था को पुनः सुदृढ़ आधार प्रदान करने की आवश्यकता है। महंत साधना कर स्वयं का आत्मोत्थान तो करता ही है, समाज को भी इसके लिए प्रेरित करने का दायित्व भी उनका रहता है। महंतों को गद्दीनशीन करने का कार्य पंथ का रहता है। आवश्यकता पड़ने पर समाज नव महंतों तथा परिव्राजक को दीक्षा दिलवा सकता है। महंतों की वंश परंपरा न होकर शिष्य परंपरा होती है। योग्यता देखकर शिष्य बनाया जाता है। महंत के पद पर विराजित व्यक्ति को अपनी सभी योग्यताओं से संपन्न होना चाहिए। समाज के अनेक विवादास्पद मुद्दों का निपटारा महंतद्वारों में महंतों के द्वारा किए जाते थे, क्योंकि महंतों की न्यायप्रियता उल्लेखनीय हुआ करती थी। महंत के बड़प्पन का अंकुश रहने से ही समाज में स्वच्छंदता से समाज विरोधी कार्य करने से कोई भी व्यक्ति डरा करता था। महंत न केवल प्रतिभावान अपितु समाज पर पकड़ रखने वाला व्यक्ति होना चाहिए। महंत समाज का आईना होते हैं। वे समाज को गढ़ने का दायित्व रखते हैं। कसूंबी और खारिया गद्दी दोनों ही सबसे प्राचीन महंत गद्दियां हैं। दोनों का परस्पर संबंध भी है। दोनों ही गद्दियों के मंदिर नृसिंह भगवान के हैं। खारिया गद्दी के महंत नारायणदास प्रभावी महंत थे। खारिया मंदिर के दर्शन करने के लिए बीदावत राठौड़ आया करते थे। धनावंश में परिव्राजक महंत की अवधारणाकिसी भी समाज में जब पूर्व प्रचलित धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपराएं अवसान को प्राप्त होने लगे तो निश्चित तौर पर यह जानना चाहिए कि जीवन की चिरंतनता पर विचार करने वाले बौद्धिक जन का अभाव हुआ है। उस समाज के लोगों को इस अप्रिय स्थिति पर चिंतन-मनन करना चाहिए। अग्रगण्य एवं बौद्धिक जन के अभाव से उस समाज के आदर्शवादी मूल्य क्षीण होकर मर जाते हैं। किसी भी समाज की सुंदर छवि उसके नैतिक, आध्यात्मिक और सौंदर्यपरक प्रतिमानों से बनती है। भक्तिकाल में अनेक संप्रदायों का जन्म हुआ। इसी दौरान भक्त धनाजी के प्रयासों से धनावंश अस्तित्व में आया। किसी भी संप्रदाय का अभ्युदय काल पूर्णतया आदर्शवादी होता है। वैराग्य, भगवद्भावना, ईश आराधना की भावना से प्रेरित इस समुदाय के सैकडों मंदिर निर्मित हए। समाज को धर्म की चिंतनधारा से जोडे रखने के लिए 35 के लगभग महंतद्वारे भी बने। महंत उसी को बनाया गया, जो सामान्य जन से आध्यात्मिका के लिहाज से काफी उच्चतर स्थिति में था। उसकी जीवनदृष्टि भौतिक मूल्यों से परे आध्यात्मिक मूल्यों से संवलित थी। धर्म की विचारधारा को संपोषित करने तथा उनके संप्रसार के लिए कटिबद्ध थी। वहीं महंत नाम का वह व्यक्ति सदाचारों के निर्वहन में एक आदर्श स्थिति को धारित करने वाला होता था। पंथ प्रवर्तक ने जिस धार्मिक राह का संचालन किया है, उसका भली प्रकार अनुसरण करने वाला हो, यह भी महंत के लिए आवश्यक कर्म था। वैसे तो कोई भी मनुष्य नैतिक रूप से स्वतंत्र होता है, वह चाहे तो पूर्व परंपराओं का अनुसरण करे, वह चाहे तो उन परंपराओं में किसी नव्य राह का सूत्रपात करे, और चाहे तो सब प्रकार के शैथिल्य का शिकार हो जाए। पर इन तीनों स्थितियों में एक पंथ के लिए आदर्श स्थिति कौनसी है-इस पर विचार किया जाना आवश्यक है। पंथ की दृष्टि से घातक स्थिति शैथिल्य को प्राप्त हो जाना है। ऐसा करके तो वह स्वयं एक पतनकारी स्थिति में पहुंच गया और उसने अपने पंथ की आध्यात्मिक उन्नति को भारी आघात पहुंचाया। एक महंत, किसी मठाधीश सत्ता का नाम नहीं है। न ही वह किसी अकर्मण्यता का प्रतीक है। वह तो सृजनशील मनीषा का वाहक है। उसका पद दोहरे प्रतिमानों पर टिका हुआ है, एक ओर वह स्वयं का आत्मिक उद्धार करता है, दूसरी ओर अपने पांधिक स्वजनों के आध्यात्मिक उद्धार के लिए प्रतिबद्ध है। काल और समय के प्रवाह में उसे अपनी भूमिका का निर्वहन सम्यक प्रकारेण करना है, यह सीख उसके भीतर से उपजनी चाहिए। संप्रदाय चाहे कोई सा हो, जब तक उसकी आत्मिक संरचना को नहीं जाना जाएगा-महंत के लिए कोई करणीय कार्य ही नहीं रह जाएगा। इतिहास में जाएं, जब 'श्री संप्रदाय' एकांगी और केवल पद पूजन तक सीमित हो गया तो रामानंदजी को यह स्थिति जड़वत, निष्क्रिय और अप्रिय लगी। उन्होंने इसका प्रतिकार अपने गुरु राघवाचार्यजी के समक्ष रखा। कुछ वाद-विवाद-संवाद के बाद रामानंद को नव पंथ रामावत संप्रदाय की स्थापना करनी पड़ी और उनकी उदारता यह रही कि अपने सभी शिष्यों को उन्होंने केवल रामावत संप्रदाय से बंधने की बात न कहकर अपने-अपने हिसाब से नए पंथ स्थापित करने की सलाह व स्वतंत्रता प्रदान की। परिणाम यह हुआ कि विभिन्न जातियों को धर्मोन्मुख करने का महती कार्य, अस्तित्व में आए अनेक संप्रदायों के माध्यम से सुगम हुआ। धनावंश भी रामानंदजी की अपने शिष्य धनाजी को दी हई उस सीख का परिणाम है। धनाजी के लिए यह सुगमता थी कि धनावंश में समाहित करने के लिए उन्हें अपनी से इतर किसी दूसरी जाति का मुंह नहीं जोहना पड़ा। धनाजी जाट जाति से थे और राजपूताना में उस वक्त यह सबसे ज्यादा जन बाहुल्य वाली जाति थी। धनाजी ने अपनी जाति के जाटों को वैराग्य का वरण कराकर प्रभु भक्ति की ओर उन्मुख होने का आग्रह किया। जिन जाट परिवारों को उनका यह आग्रह उचित प्रतीत हुआ, वे उनके अनुयायी बनकर धनावंशी कहलाए। चूंकि धनावंश एक नव संप्रदाय था। धार्मिक संप्रदाय में मंदिर, महंत, अनुयायी, भक्ति पद्धति-ये अनिवार्य संज्ञाएं हुआ करती हैं। किसी भी संप्रदाय की परंपराओं का विस्तार शनै-शनै होता रहता है। धनावंश पंथ के अभ्युदय काल के अन्यान्य संप्रदायों का विस्तार निस्संदेह धनावंश से अधिक हुआ है। किसी भी संप्रदाय की उन्नति तथा विस्तार में जितनी सक्रियता और योगदान महंतों का, आचार्यों का हुआ करता है, उससे कम भागिता और सौजन्य अनुयायीगण का भी नहीं होता। कारण अज्ञात है, पर छह-सात दशकों से धनावंश की सांप्रदायिक गतिविधियों में गतिरोध आया है, इससे इसकी आध्यात्मिक उन्नति भी प्रभावित हुए बिना नहीं रही है। एक परंपरा थी निहंग महंतों की। पर शिथिलाचार ने लगभग महंतों को निहंग नहीं रहने दिया। धर्म अध्यात्म की ठौर जब से धन-संपत्ति के स्वामित्व द्वारा लेना शुरू हुआ, महंतीय व्यवस्था छिन्न-भिन्न होने में देर नहीं लगी। पारिवारिक जंजालों एवं जिम्मेदारियों में उलझा महंत लोकमानस को धर्मोपदेश करे भी तो वह अधिक प्रभाव नहीं रख पाता। सामान्य जन के मूल्यांकन का परिमाप नैतिक एवं आचरण के मूल्यों पर रहता है। "पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे।" त्यागी, वैरागी, तपस्वी, सेवाभावी, सत्कर्तव्यनिष्ठ महंत जैसी बात कह सकता है, वैसी बात एक सद्गृहस्थ महंत कह भी तो नहीं पाता। स्वार्थपरता, अर्थलिप्सा, कीर्तिलिप्सा ने धनावंश की महंतीय व्यवस्था को चौपट कर दिया। रही-सही कसर तब पूरी हो गई, जब महंतीय प्रणाली को कुटुंबीय नातों से जोड़ दिया गया। कोई निहंग महंत रह भी गया तो उसने अपने परिवार के ही किसी अबोध बालक को महंत की गद्दी के लिए शिष्यत्व देना अधिक समीचीन जाना। दृष्टि महंत गद्दी की संपदा पर रही। अपढ़-अबोध बालक को महंत के लिए अपेक्षित ज्ञान सरणि में से गुजारने को कतई महत्त्व नहीं दिया गया। केवल महंत का ठप्पा लगाने को ही प्रमुखता दी गई। फलस्वरूप एक साथ एक उन्नत महंत परंपरा अस्ताचल में जाने को बाध्य हो गई। इसके लिए संपूर्ण धनावंशी समुदाय भी कम दोषी नहीं है। यह व्यवस्था भंग होती गई, पर किसी ने इस पर अपनी असहमति जाहिर नहीं की। न ही कोई इस बिगडती व्यवस्था का सुधार करने के लिए आगे आया। समाज में चिंतनशील व्यक्तियों के अभाव की ओर भी यह स्थिति अंगुली उठाती है। समाज में किसी ने भी हस्तक्षेप की अपनी भूमिका को नहीं जाना। एक-एक महंतद्वारों के बंद होते दरवाजों को निशब्द देखते रहे। जहां कहीं किसी गद्दी पर कोई एकाध महंत बैठा भी है तो वह अपनी परंपराओं और इतिहास से नितांत अनभिज्ञ है। किंकर्तव्यविमूढ, कर्तव्यशुन्य तथा इस अस्वस्थ व्यवस्था के मददेनजर अब समाज के सामने किस तरह का विकल्प बचता है, यह नितांत चिंतनीय एवं प्राथमिक मुद्दा है। इस महंतीय व्यवस्था को स्वस्थ कैसे किया जा सकता है ? महंत और मंदिर नहीं तो धनावंश को संप्रदाय नहीं कहा जा सकता। कतिपय अवहेलना बरतने वाले अज्ञानी किस्म के लोगों के लिए यह कोई अत्यावश्यक नहीं है कि संप्रदाय रहे कि न रहे, जाति रहे कि न रहे, स्वस्थ आध्यात्मिक मूल्य रहे या न रहे। अपने परिवार के पांच-चार जनों की शुभता से आगे उनका सोच ही नहीं रहता। इसलिए वे सदैव निष्प्रयत्न बने रहना सुखकारी समझते हैं। संसार सुरम्य-सुंदर एवं रत्नों से भरा है, किंतु 'मूढैः पाषाणखण्डेषु, रत्न संज्ञा विधीयते।' कोई पत्थरों को ही रत्न समझे तो क्या किया जा सकता है। पर स्थिति जब ऐसी अवनति को प्राप्त होने लगे तो चंद जागरूक चेतनाशील लोगों की भूमिका अहम हो जाती है। समाज के संत, साधक, ज्ञानीजन तीनों से लाभ प्राप्त होता है। ज्ञानीजन अपने सद्वचनों से किसी भी संप्रदाय को पुनर्प्रतिष्ठा दिलवा सकता है। इस आलेख के प्रारंभ में इंगित किया गया था कि संप्रदाय की उन्नति में महंतजन के अलावा उक्त संप्रदाय के एक आचार्य की भूमिका भी महती रहती है। अनेक संप्रदायों में आचार्य परंपरा को हम जीवंत रूप में देख रहे हैं। आचार्य स्नेहानुग्रह के साथ पंथ को चारित्रिक जागृति के साथ आगे बढ़ाते हैं। अनैतिकताओं, विषमताओं से परे रहने तथा अपने संप्रदाय की शिक्षाओं को ग्रहण करने का आग्रह करते हैं। आचार्य संप्रदाय को बहुत उच्च अवस्था तक ले जाने का सामर्थ्य रखते हैं, पर अफसोस, धनावंश ने इस व्यवस्था की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। जिस पंथ में आचार्य होते हैं, वे निस्वार्थ भाव से अपने समाज में सद्विचार और अध्यात्म की थाती को अक्षुण्ण रखने का महती कार्य करते हैं। उनकी प्रेरणा से आडंबर, दुर्व्यसन, अंधविश्वासों से मुक्त समाज बनता है। सबसे बडी बात-आचार्य ज्ञानवर्द्धक साहित्य की रचना कर समाज को सौंपते हैं। उनकी अनुभव वाणी आगे संप्रदाय की परंपरा को जीवित रखने में युक्तिकर होती है।इसे स्पष्टतया समझना आवश्यक है कि जब तक धनावंशी संप्रदाय में लक्ष्यानुरूप कार्य प्रारंभ नहीं होंगे, इसका परंपरागत आध्यात्मिक स्वरूप विकृत होता जाएगा। एक सर्वहितकारी संप्रदाय के परिणाम उपस्थिति नहीं हो पाएंगे। भ्रमवश हमारे संप्रदाय का जितना उजाड़ हुआ है-उसकी भरपाई के लिए तीनों उपक्रमों को पुनः प्राणवान बनाना आवश्यक है। सुविज्ञ महंत बनाए जाएं, भ्रमणशील परिव्राजकों को दीक्षाएं हो, और संभव हो तो धनावंशाचार्य का पद भी हो तथा उपरोक्त सभी पदों के लिए श्रेष्ठ व्यक्तियों का चयन हो और वे सभी उदात्त मानवीय गुणों से अभिमंडित हों। निष्ठावान समाजसेवी के रूप में, गृहस्थ से उपराम, वानप्रस्थी सज्जन, परिव्राजक दीक्षा के सर्वथा उपयुक्त हो सकते हैं। समाज के धार्मिक-आध्यात्मिक शैथिल्य तथा अनेक विभ्रमों को ध्वस्त करने में इनकी महती भूमिका हो सकती है। जानंति केचिन्न च कर्तुमीशाः कर्तुं क्षमा ये न च ते विदंति।जानंति तत्त्वं प्रभवंति कर्तुं ते केअपि लोके विरला भवंति ।। कहा गया है कि कतिपय जानते हैं, पर करने में सक्षम नहीं हैं। कुछ करने में समर्थ हैं, पर जानते नहीं, पर ऐसे व्यक्ति थोड़े होते हैं, जो जानते भी हैं और करने में भी समर्थ होते हैं। सूझबूझ से भरे समाज चेताओं को हमें परिव्राजक दीक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। हमारा जुड़ाव इस आध्यात्मिक संप्रदाय से है तो हमें आध्यात्मिकता के स्तर पर भी बात करनी चाहिए। अध्यात्म का प्रथम सोपान जिज्ञासा से प्रारंभ होता है। जिज्ञासु अपनी ज्ञान पिपासा को शांत करने के लिए संतजनों का संग करता है। शास्त्रों का अध्ययन करता है। स्वयं के अवलोक से उसका आत्मोत्थान प्रारंभ होता है। स्वयं के भीतर उठने वाले प्रश्नों से उसका साक्षात् होता है। उत्तर भी भीतर से पाता है। संसार का मिथ्यात्व समझ में आता है और वैराग्य की यात्रा प्रारंभ होती है। वैराग्य से आत्मानंद प्रकट होता है। वैराग्य कोई जातिगत संज्ञा नहीं है। कोई व्यक्ति लिपटा तो है सांसारिक गुणों से और अपने जाति नाम 'वैरागी' से प्रमुदित होता है, यह तो स्वयं को छलने जैसी बात है। इसलिए आध्यात्मिक स्वभाव के जनों को धनावंश की वास्तविक पहचान, जो कि एक वैराग्य परंपरा से अनुस्यूत है, से अधिकाधिक जनों को परिचित कराने की आवश्यकता है। महंत और आचार्य, स्वयं की चाहना भर से नहीं बन सकते, उसमें समाज जनों की स्वीकृति आवश्यक है किंतु परिव्राजक दीक्षा के लिए किसी की स्वीकारोक्ति की जरूरत नहीं पड़ती। स्वयं की प्रेरणा से धर्म प्रचार का कार्य करने से कौन रोकता है। परिव्राजक बहुत पहले से होते आए हैं। परिव्राजक स्वयं साधक रूप में होता है और जन कल्याण की उदार भावना से भावित होकर समाज में सदगुणों, ईश्वरान्राग का प्रसार करने का कार्य स्वेच्छा से करता है। अपने समाज की ऐतिहासिकता और उच्च परंपराओं से भी वाकिफ कराने का काम भी उसका है। परिव्राजक सेवा-धर्म से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। समाज को उदात्त जीवनचर्या की शिक्षा देना उनका परम कर्तव्य है। तुलसीदासजी ने सही कहा है- 'सब तें सेवक धरम कठोरा।' समाज की सेवा का यह कार्य कठिन तो है, किंतु इसका लक्ष्य बड़ा महान है। ज्ञानी, धैर्यवान, परम संतोषी, मानापमान रहित व्यक्ति ही कुशलता से परिव्राजक धर्म का पालन कर सकता है। वस्तुतः तो परिव्राजक दीक्षा-सेवाव्रत का संकल्प है। संयमपूर्ण इसका निर्वहन परमोच्च स्थितिदायक है। धनावंश में इसका महत्त्व इसलिए अधिक है क्योंकि यहां अनेक विभ्रम समाज को संशय में डालते रहे हैं। पैंतीस महंत थे तो कम से कम बीस-पचीस परिव्राजक तो होने ही चाहिए। धनावंशीय सम्प्रदाय - दृष्टिकोण1. धर्म - वैरागी। 2. सम्प्रदाय - धनावंश। 3. सम्प्रदाय मान्यता - वैष्णवी। 4. जाति - धनावंशी स्वामी, साध, वैरागी। 5. सम्प्रदाय भाव - सत्व गुण, निर्वेद (वैराग्य) । 6. सम्प्रदाय गुरु - धना भगत जी। 7. आदि संबंध - सनकादिक ऋषि। 8. उपासना - ठाकुरजी (विष्णु अवतार-श्रीराम एवं श्रीकृष्ण) । 9. संबोधन, अभिवादन - जय ठाकुर जी की। 10. गोत्र - अच्युत । 11. जाति नख - विभिन्न। 12. धर्म परम्परा - अनादि काल से, आदि वैराग। 13. मण्डल - विभिन्न महन्त मंडल। 14. गुण - 26 (छब्बीस)। 15. तिलक - ऊर्ध्वपुण्ड्र । 16. वेशभूषा - श्वेत वस्त्र । 17. त्याज्य - व्यसन मुक्ति, व्यर्थ चिंतन । 18. भोजन - सात्विक । 19. स्नान - नित्य-प्रातः । 20. स्वाध्याय ग्रंथ - श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, भक्तमाल, विष्णु सहस्रनाम, रामरक्षा स्तोत्र, भागवत पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराणादि । 21. भगवप्रसाद - पंचामृत, तुलसी-पत्र, शालग्राम चरणामृत। 22. भक्ति - साकार सगुण वैष्णवावतार । 23. मुख्य दिवस - रामनवमी, जन्माष्टमी, श्री धनाजी जयंती। 24. सद्गृहस्थ उपासना - प्रत्येक घर में शालग्राम पूजा। 25. प्रभु स्मरण - प्रातः-सायं, संध्यावंदन आवश्यक, यों दिन-भर प्रभु पूजें। 26. जुड़ाव - नैमितिक सत्संग से जुड़ाव। 27. सत्कार - स्वजातीय जन एवं सभी अतिथियों का। 28. तत्परता - समाज हित के कार्यों में।29. व्रतोपवास - एकादशी, पूर्णिमा, अनंत चतुर्दशी सहित विभिन्न पर्व। 30. मुक्ति कामना - सामीप्य, सारुप्य, सायुज्य, सालोक्य। 31. मंत्र - रामाय नमः, कृष्णाय नमः ॐ नमो भगवदे वासुदेवाय नमः । 32. धारणीय - तिलक (ऊर्ध्वपुण्ड्र) तुलसी काष्ठ की कंठमाला, शिखा (चोटी रखना), गो-खुर। 33. भक्तिस्वरूप - नवधा। 34. दीक्षा - मण्डलीय महन्त द्वारा। 35. निषेद - सूतक । 36. पूजन - द्वियाम, धूप-दीप, निराजन, नैवैद्य सहित। 37. भोग - शालग्राम को बाल भोग। 38. प्रणाम - भूमिष्ठ होकर, दण्डवत । 39. भजन - नित्य प्रभु भजन। 40. आंतरिक लक्षण - निरभिमानी, शील, संतोष, सद्वक्ता, मिष्ठभाषी, सज्ञानी, सद्व्यवहार। 41. कुलाभिमान - सदैव धनावंशी के साथ न्यात व्यवहार की दृढ़प्रतिज्ञा। 42. स्मरण - श्रीराम, श्रीकृष्ण नामोच्चार। 43. स्वकांक्षी - ऊर्ध्व गति। 44. आरती - पंचारति। 45. भोजन नियम -भोजन पूर्व पंच ग्रास टालना, अल्प आहारी। 46. प्राण त्याग प्रयास - दसवें द्वार (ब्रह्मरन्ध्र) से। 47. पंचतत्त्व विसर्जन स्थल - मुक्तिधाम। 48. अंतिम पार्थिव यात्रा - काष्ठ वैकुंठी में। 49. अंतिम संस्कार - अग्नि संस्कार। 50. तप्त भात - शोक विछिन्नता। अग्नि संस्कार के तुरंत बाद चावल का भोजन कर शोक का परित्याग । यह मानना कि एक जीव का परमात्मा में विलय हो गया। 51. स्वर्गोपरांत दिवस - 17 दिवस (सतरही) । 52. सतरह दिवस - 17 दिनों में निरंतर रामचरितमानस एवं हरिनाम संकीर्तन। धनावंशी गरुड़ पुराण का पाठ नहीं करते। उपरोक बावन चीजें, धनावंश सम्प्रदाय को एक शिष्ट एवं अलग पहचान वाला सम्प्रदाय सिद्ध करती है। विशिष्टाद्वैत सिद्धांत के अनुसार जीव का ठाकुरजी के साथ संबंध वैष्णव साधना पद्धति में जीव का परमात्मा के साथ संबंध है। ये सोलह संबंध इस प्रकार हैं- 1. गुरु- गुरु का बडा महत्त्व है। परमात्मा जीव के गुरु हैं और गुरु में भी परमात्म भाव देखना चाहिए। 2. माता - जीव को परमात्मा मातृरूप में पालते तथा रक्षा करते हैं। 3. पिता - जीव का पोषण परमात्मा पिता की भांति करते हैं। 4. रक्षक परमात्मा ही सदैव जीव की रक्षा करते हैं। 5. शेषी- जीव शेष अर्थात अंश हैं और भगवान शेषी (अंशी) हैं। 6. भर्ता - जीव के पोषण परमात्मा ही करते हैं, वे दैव उसके भर्ता हैं। 7. स्वामी - जीवात्मा भार्या है और भगवान उसके स्वामी। जीव भगवान का दास है। 8. आधार जीवात्मा के असली आधार परमात्मा ही हैं। जीवात्मा आधेय रूप में हैं और परमात्मा उसके आधार। 9. भोक्ता - जीवात्मा भोग्य है और परमात्मा उसके भोक्ता। इसका उलटा भी संभव है, जीव भी परमात्मा का भोक्ता हो सकता है। 10. शरीरी प्राण परमात्मा का शरीर है। परमात्मा उसके शरीरी हैं। 11. मित्र - इस जीव का कल्याण चाहने वाले, इसके सच्चे मित्र परमात्मा ही हैं। 12. बांधव - जीव के नित्य बंधु हैं परमात्मा, त्वमेव बंधु। 13. धन जीव का सबसे बड़ा धन ठाकुरजी ही हैं। 14. राजा जीवात्मा प्रजा है और उसके राजा परमात्मा हैं। राजा के अनुशासन का पालन प्रजा को सदैव करना चाहिए। 15. देव - परमात्मा देव हैं और यह जीव उनका उपासक। 16. सेव्य - जीवात्मा ही सेवक है और उसके सेव्य हैं परमात्मा, जिनकी उसे सेवा करनी है। जीव के कल्याण के लिए इन सोलह संबंधों का निर्वाह आवश्यक है।श्री धनाजी की गुरु परंपराश्री रामानंदजी के रामार्चन पद्धति में अपनी गुरु परंपरा इस प्रकार दर्शायी है- (1) श्री रामचन्द्रजी (2) श्री सीताजी (3) श्री विष्वक्सेनजी (4) श्री शठकोपजी (5) श्री नाथ मुनिजी (6) श्री पुण्डरीकांक्ष जी (7) श्री राममिश्रजी (8) श्री यामुनाचार्यजी (9) श्री महापूर्णाचार्यजी (10) श्री रामानुजाचार्यजी (11) श्री कुरुकेशजी (12) श्री माधवाचार्यजी (13) श्री वोपदेवाचार्यजी (14) श्री देवाधिपजी (15) श्री पुरुषोत्तमजी (16) श्री गंगाधरजी (17) श्री रामेश्वरजी (18) श्री द्वारानंदजी (19) श्री देवानंदजी (20) श्री श्रियानंदजी (21) श्री हरियानंदजी (22) श्री राघवानंदजी (23) श्री रामानंदजी और रामानंदजी के शिष्य (24) श्री धनाजी महाराज
श्री संप्रदाय परंपरालक्ष्मीनाथ समारम्भा नाथ यामुनमध्यमाम्।अस्मदाचार्यपर्यन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम् ।। मुक्त्यधिकारिण येते सम्प्रदायप्रवर्तकाः । येषां मन्त्रोपदेशेन प्राप्तं भागवतं पदम् ।। श्रीमन्नारायणः साक्षाज्जीव लोकानुकम्पया। गुह्याद गुह्यतमं मन्त्रं तारकै तिमिरापहम् ।। देव्यानुबोधितः श्रीमान्विष्णुः सर्वजनेश्वरः । आह्वयामास सा देवी तारकं पुण्यवर्धनम् ।। कृतकृत्या तदा लक्ष्मीप्राप्तमष्टाक्षर द्वयम् । ददौ प्रीत्या तदा देवी विष्वक्सेनं स्वपार्व्वदम् ।।विष्वक्सेनोत्तमं मन्त्रं लब्धवान्वैष्णवोत्तमम् । शठकोपेति विख्यातो मुनिवर्यः सदात्मवान् ।। कोपदेव समाराध्य द्वापरादौ परांकुशः । व्यंकटादौ द्राविडेषु प्राप्तं मन्त्रार्थगुह्यकम् ।। परांगशेन च प्रोक्तं श्रीनाथमुनये तथा। पुंडरीकाक्षेण प्रोक्तः राममिश्रमहामतिः ।। यामुनमुनिनाप्रोक्तः दासनाम परांकुशः । चत्वारस्तस्य विख्याताः शिष्याः परांकुशस्य च ।।श्रुतिदेवश्रुतप्राज्ञः श्रुतधामा श्रुतोदधिः ।त्रिदण्डिनः शिष्या युक्तो रामानुजश्व पंचमः ।।रामानुज समराध्य कुरुकेशो महामतिः ।पञ्च संस्कार सम्पन्नो महाभागवतोत्तमः ।।आह्वयामास परमं तारकं तिमिरापहम् ।गोविंदाचार्येण सम्प्रोक्तः भद्राचार्य पराशरः ।।निगमान्तेन योगिना प्रोक्तं वै लोकाचार्याय।माधवाचार्येण प्रोक्तं मन्त्रराजरहस्यकम् ।।देवाधिपेन शैलेशं रम्यजामातरं मुनिम् ।पुरुषोत्तमसम्प्रोक्तं गंगाधराय तेन वै ।।तेन प्रोक्तं सदाचार्यवन्दसंज्ञाविधानतः ।ततो रामेश्वराचार्यः द्वारानन्दश्व तेन वै।।देवानन्दः समाख्यातः कृतः कृपानिधिः खलु ।तेन श्यामानन्दः प्रोक्तः श्रुतानन्दाय धीमते ।।ततः प्रोक्तं चित्यानन्दे पूर्णानन्दोदयानिधिः । श्रियानन्देन सम्प्रोक्तः हर्यानन्द महामतिः ।। तेन प्रोक्तं महामन्त्रं रामानन्द जगद्गुरुम।। सार्धद्वादश शिष्यास्तु रामानन्दगुरोरपि । द्वादशादित्य संकाशाः संसार तिमिरापहाः ।।अनन्तश्वसुरानन्दः सुखानंदः नरहरिः । भवानन्दश्व गालवः सप्तैते नामनन्दना ।कविरश्व रमादासः सैन्यो पीपा धनस्तथा ।पद्मावती तदर्थे च षडेते षट् सप्तनजितं ।। इति श्रीपरम्परा सम्पूर्णा गलता गद्दी की गुरु परंपरागलता गददी की स्थापना श्री कष्णदासजी पयहारी ने की थी। वे रामानंदजी के शिष्य अनंतानंदजी के शिष्य थे। पयहारीजी ने बारह वर्षों तक पुष्कर में तपस्या करने के उपरांत गलता में अपना स्थान बनाया। श्री कृष्णदासजी बड़े चमत्कारी संत थे। उन्होंने गलता में नाथ पंथी तारानाथ योगी के अभिमान को गलित किया। आमेर के महाराजा पृथ्वीसिंह ने इन्हें अपने गुरु का सम्मान प्रदान किया। पयहारीजी के ब्रह्मलीन होने पर उनके दो शिष्य कील्हदासजी और अग्रदासजी में से बड़े शिष्य कील्हदासजी ने गद्दी को संभाला। शिष्य परंपरा इस प्रकार है-(1) श्री कृष्णदास पयहारी (2) श्री कील्हदास (3) श्री कृष्णदास (छोटे) (4) श्री विष्णुदास (5) श्री नारायणदास (6) श्री हरिदेवाचार्य (7) श्री रामप्रपन्नाचार्य (मधुराचार्य) (8) श्री हरियाचार्य (9) श्री श्रियाचार्य (10) श्री जानकीदास (11) श्री रामाचार्य (12) श्री सीतारामचार्य (13) श्री हरिप्रसादाचार्य (14) श्री हरिवल्लभाचार्य (15) श्री हरिशरणाचार्य (16) श्री रामोदाराचार्य (17) श्री अवधेशाचार्य (वर्तमान महंत)धनावंश के नख (उपवंश)(1) अरछतवाल / हरचतवाल (2) अहलावत (3) आंवला (4) इनाणिया(5) ओळा (6) कंकरोडिया (7) कड़वासरा (9) कपूरिया (10) कलवाडी(11) कलवानिया (12) कल्डवालिया (13) कस्वां (14) काकोडिया (15) कालीरावण(16) कालेरा (17) काल्या (18) कासनिया (19) कुलडिया (20) कूकणा(21)खदाव/ खद्दा (22) खरबास (23) खर्रा (24) खिलेरी (25) खेदड(26) खैरवा (27) खोड (28) खोत (29) गढवाल (30) गहलावत (31) गीला (32) गोदारा33) गोयल (34) गोरा (35) गोलिया (36) घड़घस (37) घासल(38) घींटाला( / घंटियाला (39) घोटिया (40) चाहर (41) चितौडिया (42 ) चिग्गा(43)चोयल (44) छाबा (45) छिकारा (46) जांगू / जांघू (47) जांदू (48) जाखड़(49) जाजड़ा (50) जींजवाड़ी (51) ज्याणी (52) झाझड़िया (53) झुरिया(54) झूरड़ (55) टाडा /ताडा (56) टूसिया (57) टोंगला (58) ठीगला(59)ठोठवाल (60) डबास (61) डांगी (62) डागर (63) डिया (64) डीडवानिया / डोडवाड़िया(65) डूकिया (66) डूडी (67) डेलू (68) ढांढा (69) ढाका (70) ढाढस(71) ढिलान (72) ढेवा (73) तरड़ (74) तूंगला (75) तेतरवाल (76) तोमर(77) थाकण (78) थालोड़ (79) थोरी (80) दलाल (81) दहिया (82) दुगेसर(83) दूत (84) दूवा (85) देवंदा (86) धनकड़ (87) धुन(88)धुंवा (89) धेडू/ बेहडू (90) धेतरवाल (91) धौंकर(92) निठारवाल / निथारवाल (93) निरवाल/ नरवाल (94) निवाद(95) नीमद (96) नेतड़ (97) नेहरा (98) नैण(99)पंघाल (100) पड़घड़ (101) पाण्डर / फाण्डर (102) पायल (103) पिलानिया(104) पूनिया (105) पोटलिया (106) पोसंगा (107) फगेड़िया /फगोड़िया(108) फड़ोदा / फरड़ोदा (109) फरसवाल / फलस्वाली(110) फलसिया /फागणिया (111) फाडल (112) फोगाट (113) बंगाली (114) बागड़िया(115)बजाड़ (116) बटेसर / भटेसर (117) बठोठिया (118) बड़ाडिया (119) बडाढरिया(120) बराड़ / बरार(121) बटाला / बरोला (122) बलिहारा (123) बांसीड़ा(124) बाना (125) बालेरा (126) बिजारणिया (127) बिडासरा (128) बिडियासर(129) बुगालिया (130) बुरड़क(131) बुरा (132) बेड़ा(133) बेनीवाल(134) बेरवाल (135) बेरा (136) बोळा(137) भंवरिया (138) भगनिया(139) भदाल्दीया (140) भाकड़ा (141) भाकर(142) भाकल (143) भादू (144) भांभू (145) भावरी (146) भूकर (147) भोबिया(148) भोला (149) मंगावा (150) मंढान (151) मकोड़िया (152) मठोठिया(153) मण्डा (154) मण्डीवाल (155) मदेरणा (156) मलिक (157) महिया(158) मांडिया (159) मातु (160) मान (161) मावलिया (162) मीठारवाल(163) मील (164) मुंडेल (165) मुवाल / मुहाल (166) मूंड (167) मेंचू / मींचू(168) मेहला / महला (169) मोटसरा (170) रलिया (171) राठी (172) राव(173) राहिल / रूहिल (174) रिणवा (175) रूणिया (176) रूंडला(177) रूलाणिया / रूल्याणी (178) रोयल (179) रोहलाणिया (180) लटियाल(181) लूणिया (182) शाहर / सायर (183) शिवराण / स्योराण (184) संगवान(185) सनवाल / सिनवाल (186) सरेवा (187) सरोहा (188) सहरावत / शेरावत(189) सहू (190) सांई (191) सामोता / स्यामोता (192) सारण / सहारण (193) सिंधू(194) सिनसिनवार (195) सिहाग / सियाग (196) सींवर (197) सीमार (198) सुण्डा(199) सूमरा (200) सेवदा (201) स्यामारिया (202) हजूरिया (203) हुड्डा
अध्याय: सप्तम:- भक्त धना के भक्तिपद
अध्याय : सप्तम - भक्त धना के भक्ति पद (1)रे चित ! च्यंतसि दीनदयालहि, हरि बिन और न कोई। जेहि ध्यावे ब्रह्मण्ड खण्ड लो, करता करे सो होई ।। जिन्हि जननी के उदर उदक थे, पिण्ड कीयो दस द्वारा। दियो आधार अगिनि मुख राखे, ऐसा खसम हमारा ।। कूर्मी अण्ड धरे जल अंतरि, खीर पंक तहं नाहीं। पूरन परमानंद पयोधर, चित चिंतित तिहि ठांई ।। पाहन कीट गोपि सबहिन थें, मारग कत हूं नाहीं। कहे धनौ ताका हरि पूरिक, तूं कांई जीव डराहीं ।।(गुरु ग्रंथ साहब में यह पद थोड़े फर्क से है।) (2) आरतीगोपाल तेरा आरता। जो जन तेरी भगति करता, जिनके काज संवारता। दाल सीधा मांगो घीव, हमारा खुशी करो नित जीव। पनही छाजन छीका मांगु, नाज मांगू सत सीका। गऊ भैंस मांगो लहरी, इक ताजनि तुरी चंगेरी। घर की गृही नारि चंगी, अन धना इव मांगी। अवगति बेहद तेरी आरती, हृदय में प्रगट्या न जाई ।।(गुरु ग्रंथ साहब में यह पद थोड़े फर्क से है।)
(3)जे उधरे जिनि राम कहे, तिनके दुख दारन आप कहे। जे उधरे ऊधौ, नारद नांमा, अंबरीक, प्रहलाद सुदांमा ।।उधरे सिब सनकादिक, सनक, सनंदन चरन परापति। दास धनां हरि के गुण गावे, गुर परसादि परम पद पावै ।।(ग्रंथांक 496 के अनुसार)
(4)ना जानौं राम कैसा जोगी, अनंत गुफा मधुसूदन भोगी ।।खीर, खांड घ्रित अंमृत भोजन, साधनि न्यूंत जिमाऊं । यह कुटि छांडौ और निवासो, बहुरि न या कुटि आऊं ।।आवत जात बहुत से कीयै इहां ई रह्या न होइ । भगत धना जाट सेवग तेरा, हंस चाल्या कुटि रोई ।।(ग्रंथांक 561 के अनुसार)
(5)हरि हरि नित सुमरि ऊबरिसी हरि हूं, कांई रे जीहां हरि न कहे। वाऊवा मरण सराणै बैठी, वासै खुरे त्रोड़तो वहै ।। निस दिन नाम जपै नारायण, झाले साच पड़े मम झूठि।दोखी अंत आतम न देखै, पान्ही चढहि जरा तौ पूठि ।।प्राणियां नांम सुमिर, पुरषोतम, अंनि विषय परहरे आल। पग सों पग त्रोड़तो न पेखे, क्रम क्रम जाल नाखतो काल ।।प्रिसण मरण हरि समरथ पालिस्यै, मेल्हे मा चित सूध मना।धरि हरि चेत समरि धरणीधर, धरणीधरि ऊबरिसी धना ।।(प्राचीन राजस्थानी गीत)
(6)हरि गुण गाइ रे हरि गुण गाइ, औरे छांडि सबै चत्राई ।। टेक ।। चरण गंग गहि नीर न्हवाऊं, पीतांबर क्यं सोभै तास ।चंदणि किसै करूं हरि लेपण, जाके अंग अनुपम बास ।।अगर चंदन घसि धूप खिड़ाण, कौण बास मनि राम रली।पत्री पहुप किसै बनि आणूं, जाके भार अठारह रोमावली ।।पूजा भगति किसी भूल माणें, जाके सनक सनंदन भगत सुकादि। सेस सहंस मुख नांव अराधै, पवन पूज जाकै ब्रह्यादि ।।जाके नारद निरति नटारंभ संकर, आप अपछरा तोड़ै ताल।अगणित महिमा राम तुम्हारी, मैं गुण का जाणू गोपाल ।।अविगत अगम विषम कठिनाई, कहि कहि कहूंक लीयौ जाड़। कहै धनौ अरथ परमारथ, जिनि पायौ तिनि सहज सुभाइ ।।(ग्रंथांक 496 के अनुसार)
(7)भ्रमत फिरत बहु जनम भुलाने, तनु मनु धनु नहीं धीरे। लाल विखु काम लुबध राता, मनि बिसरे प्रभ हीरे ।। बिखु फल मीठ लगे मन बउरे, चार विचार न जानिआ। गुन ते प्रीति बढी अन भांति, जनम मरन फिरि तनिआ ।। 1।।जुगति जानि नहिं रिदै निवासी, जलत जाल जम फंद परे।बिखु फल संचि भरे मन ऐसे, परम पुरख प्रभ मन बिसरे ।। 2 ।। गिआन प्रवेसु गुरहि धनु दीआ, धिआनु मानु मन एक मए।प्रेम भगति मानी सुखी जानिआ, त्रिपति अघाने मुकति भए ।। 3 ।। जोति समाइ समानी जाकै, अछली प्रभु पहिचानिआ । धंनै धनु पाइआ धरणीधरू, मिलि जन संत समानिआ ।। 4।।(मूलपाठ-गुरुग्रंथ साहब)
(8)गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मनु लीणा। आढ दाम को छीपरो, होइओ लाखीणा ।। रहाउ ।। बुनना तनना तिआगि कै, प्रीति चरन कबीरा। नीचा कुला जोलाहरा, भइओ गुनीय गहीरा ।। 1 ।। रविदास ढुवंता ढोर नीति, तिन्हि तिआगी माइआ।परगटु होआ साध संगी, हरि दरसनु पाइआ ।। 2 ।। सैनु नाई बुतकारीआ, ओहु घरि घरि सुनिआ। हिरदै वसिआ पारब्रह्यु, भगता महि गनिआ ।। 3 ।। इहि विधि सुनि कै जाटरो, उठि भगती लागा। मिले प्रतखि गुसाईआ, धंना बड़भागा ।। 4।।(मूलपाठ- गुरुग्रंथ साहब)
(9)हर हर हर हर हर हर हरे हर सुमिरत जन बहु निस्तरे ।। हरि के नाम कबीर उजागर, जन्म जन्म के काटे कागर।। जन रामदास राम संग राता, गुरु प्रसाद नरक नहिं जाता ।।गोबिंद गोबिंद संग नामदेव मन लीला, आठ दाम को छीपरो होयो लाखीना ।। बुनना तनना तग के प्रीती चरण कबीरा, नीच कुल जोलाहरा भयो गुणी गहीरा ।। सैन नाई बुतकरिया ओ घर घर सुनिया, हिरदे वस्या पारब्रह्म भक्तन में गिनिया ।। रामदास अधमते वाल्मीकि तिन त्यागी माया, परघट होय साध संग हरि दर्शन पाया ।। यह विधि सुन के जाट रो उठ भक्ति लागा, मिले प्रतक्ष गुसाइयां धन्ना बड भागा ।।(राग रत्नाकर, खेमराज श्रीकृष्णदास, पृष्ठ 152)
धनाजी की साखियांधनां कहै हरि धरम बिन, पंडित रहै अजांण । अण बाह्यो ही नीपजै, बूझौ जाइ किसांण ।।1 ।। धनां धन नहीं राचिये, न राचिये संसार। पग बेड़ी गळ रासड़ी, यूं ही गये असार ।।211 धनो कहै ते धिग नरा, धन देख्यां गरबाहि । धंन तरवर का पांनड़ा, लागे अरु उडि जाहि ।। 3 ।। धनौ कहे धन बांटियै, ज्यूं कूवा का नीर। खाटी सापुरिसां तणी, सब काहू का सीर ।। 4 ।1 धनां धनि ते संत जन, जे पेठै परभीड़। संधि कटावै आपनी, रत्ती न आवै पीड़ ।। 5।। धनां धंनि ते मानवी, धरणीधर सूं प्रीति। राति दिवस बिसरै नहीं, रसनां उर मन चीति ।। 6 ।। धरनीधर व्यापक सबै, धरनि ब्यौम पाताल। धनौ कहै धनि साध ते, बिसरे नहीं कहुं काल ।।7।। (हरिनारायणजी पुरोहित संग्रह, ग्रंथांक 67)
धनाजी महाराज के पदों की अब तक व्यापक खोज नहीं की गई। यह भी लगता है कि वीतरागी संत होने के कारण उन्होंने कोई सुरक्षा की अधिक चिंता भी नहीं की। अब तक उनका कोई इकजाई ग्रंथ देखने में नहीं आया है। उनके पदों में परिपक्व अभिव्यक्ति देखकर यह अवश्य निश्चित होता है कि उनके पद थोड़ी संख्या में नहीं थे। गुरुग्रंथ साहब में उनके निरगुण भक्ति भावना को अभिव्यक्त करने वाले चार पदों को ही लिया गया। अब तक धनाजी के पद प्राप्ति के स्रोत ग्रंथ गुरुग्रंथ साहब, दादू शिष्य गोपालदास रचित सर्वांग सरह चिंतामणि, सर्वंगी (रज्जब), हरिनारायणजी पुरोहित के संग्रह के ग्रंथ, गुणगंजनामा, द सिख रिलीजन भाग-6 (मैकालिफ), राग रत्नाकर (पद संग्रह) ने हैं। भक्ति को निर्गुण-सगुण खांचों में बांटने वाले भले ही इन उपलब्ध पदों के आधार पर इन्हें निर्गुण भक्त मानले, पर वे कोई निर्गुण भक्त नहीं थे। उन्हीं की प्रेरणा से धनावंश जैसे सगुण पंथ की स्थापना हुई और धनावंश पंथ के एक हजार से अधिक ठाकुरजी के मंदिर तथा विभिन्न भक्तमालों तथा परची में उल्लिखित उनका जीवन श्री ठाकुरजी के साकार स्वरूप से प्रीति रखता है। वस्तुतः धना का भाव वैराग्य का है। सांसारिक मोह माया से विरत हुए बिना भगवद्भक्ति आसान नहीं है। धना त्याग को बहुत महत्त्व प्रदान करते हैं। प्रो. अनिल जैन भी धनाजी के पदों के अन्वेषक रहे हैं। वे उनके पदों के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि, "धना आत्मशुद्धि हेतु मन को स्थिर करने पर बल देते हैं। उनकी दृष्टि में चंदन, पूजा, पत्र, पुष्प आदि उपयोगी नहीं है। वे ईश्वर को बाह्याडंबर के बिना - 'जिनि पायो तिनि सहज सुभाई' प्राप्त करना चाहते हैं।" जैन साहब उन्हें अपने आलेख की अगली पंक्तियों में पूर्णतया निर्गुणवादी कवि साबित नहीं कर पाते हैं, तब वे पुनः कहते हैं कि, "धना के पदों से ऐसा आभास मिलता है कि अपने संत जीवन के पूर्ववर्ती दौर में वह सगुणोपासक थे, किंतु परवर्ती दौर में उनका रुझान निर्गुण भक्ति की ओर हुआ। यह भी संभव है कि भक्ति आंदोलन की विभिन्न धाराओं के बीच विचारधारात्मक द्वंद्व के मध्यनजर उनके बीच संतुलन स्थापित करने का यह एक समन्वयवादी प्रयास हो, यह एक अनुमान भर है, किंतु उसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।" 2 धना वस्तुतः एक भक्त के लिए जो आवश्यक तत्त्व हैं, उन्हें अपनाने पर बल देते हैं। उनका उत्तरवर्ती जीवन निर्गुणी नहीं अत्यधिक सगुणी हो जाता है। वे धनावंशी पंथ धारणा ग्रहण करने वालों को जो इक्कीस सूत्र प्रदान करते हैं, वे सभी सगुण भक्ति की स्थापना करते हैं। भक्ति से सर्वथा दूर हो चुकी जाति को वे सगुण बोध से ही एक वैरागी पंथ की ओर आकर्षित कर सकते थे। हां, यह अवश्य कहा जा सकता है कि वे अपने से पूर्व हुए तथा समकालीन भक्तों से बहुत अधिक प्रभावित थे। नामदेव, कबीर, रैदास, सैन आदि की भक्तिमय बातें उन्हें लुभाती थीं। भक्ति साहित्य पर उच्च कोटि का शोधपूर्ण कार्य करने वाले विद्वान ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल अपने ग्रंथ 'संत सप्तक' में कुछ बातों पर विशेष बल देते नजर आते हैं कि धना, कबीर, रैदास, सेन का समकालीन होते हुए भी उनसे आयु में छोटे थे B इसलिए उन्होंने इनसे प्रेरणा प्राप्त कर भगवद्भक्ति की। दूसरे वे अनेक प्रमाणों द्वारा यह सिद्ध करते हैं कि धनाजी रामानंद के शिष्य थे। वे धना को रामानंद के अंतिम काल के शिष्य मानते हैं। एक बात उनके शोध में थोड़ी खामी प्रकट करती है, जो इस प्रकार है- "आज भी धनावंशी जाट रामानंद संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। उनकी मान्यता है कि धना भगवान सीताराम का उपासक, रामानंद स्वामी का शिष्य तथा गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी स्वामी कहलाता था। इसी कारण अब भी अनेक जाट अपने नाम के साथ स्वामी शब्द का प्रयोग करते हैं।" एक जगह ओर वे अपने 'संत धना जाट' नामक विस्तृत आलेख में लिखते हैं, "धनावंशी जाट भी स्वामी रामानंद को ही धना का गुरु मानते हैं।" श्री ब्रजेन्द्रसिंहल जी की इस धारणा के दुरुस्तीकरण में यह निवेदन किया जा सकता है कि संवत 1532 में धनाजी से दीक्षित होने के बाद एक भी धनावंशी स्वामी को जाट कहना उपयुक्त नहीं है। बेशक उनकी पूर्व जाति जाट थी, पर विगत पांच सौ वर्षों से धनावंशी एक नितांत वैष्णवी आचारों से युक्त वैरागी पंथ है। जैसे राजपूत कुल से परिवर्तित ओसवाल जाति को अब राजपूत नहीं कहा जा सकता, वैसे ही धनावंशी स्वामी के लिए जाट शब्द क्यूं प्रयोग में लिया जाए। दूसरी बात धनावंशी स्वामी कभी भी रामानंद संप्रदाय से जुड़े हुए नहीं रहे। धनावंश की ही भांति रामानंदियों का रामावत संप्रदाय अपने आप में स्वतंत्र है। वैष्णव वैरागियों के लगभग पच्चीस पंथ अस्तित्व में हैं और सभी अपनी स्वतंत्र पहचान रखते हैं। धनाजी के थोड़े से पद एवं थोड़ी सी साखियों के बल पर उनकी समग्र भक्ति पहचान की उद्घोषणा करना समीचीन नहीं है। धनाजी के पदों-साखियों में व्यक्त उनकी आध्यात्मिक धारणा इस प्रकार है-धना के प्रथम पद में सांसारिक असारता और विरक्ति के भाव अभिव्यक्त हुए हैं। वहीं वे ईश्वर के प्रति गहरी श्रद्धा, समर्पण और अनुचिंतन पर बल देते हुए कहते हैं कि हे मेरे चित्त, तूं उस दीनदयाल का चिंतन कर, क्योंकि इस जीवात्मा का कोई सहायक है तो एकमात्र हरि ही है। खंड-ब्रह्मांड में एक वही ध्यान करने योग्य है, क्योंकि वह दीनदयाल ही कर्ता रूप में इसका नियंत्रण किए हुए हैं- वही नियंता है। वह परमात्मा ही जीवों का निर्माता है, माता के गर्भ में जो जीव जल की बूंद के रूप में स्थित स्थापित होता है, उसे परमात्मा दसों द्वारवाला शरीर रूप प्रदान करता है, जठराग्नि की दाह से उसकी सुरक्षा करता है। वह ऐसा पिता है। क्रौंच पक्षी अपने अंडे समुद्र के किनारे देती है, जहां न जल होता है और न ही कीचड़। पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही धात्री रूप धर उनकी रक्षा करते हैं। क्रौंच उन अंडों के पास तो नहीं जाती, पर उनका स्मरण वह निरंतर करती है। उस चिंतन के प्रभाववश उनमें पकाव आता है और क्रौंच शावकों का जन्म होता है। कठोर पत्थरों के भीतर जीव होते हैं, जिन तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं होता, प्रभु उन तक भी भोजन सामग्री पहुंचाते हैं। उनकी समस्त व्यवस्था करते हैं। भक्त धना कह रहे हैं-फिर हे जीव, तू किस बात की फिक्र कर रहा है, हरि सबकुछ आपूरित करते हैं। धना प्रारंभ से ही इसी भाव पर टिके हुए थे। सुदृढ़ विश्वास से ही उनके जीवन में सारे कार्य हुए, लोग भले ही उन्हें चमत्कार समझते रहें, पर धना को तो अपने गोपाल पर अटूट विश्वास था। धनाजी का दूसरा पद आरती है। भगवान के निराजन की परंपरा प्राचीन रही है। लगभग सभी प्रमुख संतों ने आरतियों की रचना की है। 'गोपाल तेरा आरता' नाम से धनाजी की भी आरती है। धनाजी महाराज आर्तभाव से गोपाल यानी ठाकुरजी से कहते हैं कि हे गोपाल, जो भी भक्त आर्तभाव से आपको भजता है, आप उसके समस्त कार्यों को अवश्य सिद्ध करते हैं। धनाजी की भक्ति, सखा भाव की रही है। वे अपने ठाकुर से किसी भी प्रकार का दुराव नहीं रखते हैं, इसलिए निस्संकोच दैनंदिनी आवश्यकताओं को पूरा करने वाली सांसारिक चीजों को मांगते हैं। वे कहते हैं- संत सेवा के लिए दाल, सीधा, घी देते रहें, इससे हमारे मन को बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होती है। हमारी आवश्यकताएं कितनी सी तो हैं, पैरों में कांटे न गडे, इसलिए पनहियां हो, सिर पर झोंपड़ा हो, मेहनत से कमाया हुआ सच्चा अनाज हो। किसान हूं इसलिए घर में ताजी-मोटी गाय-भैंस तो होनी ही चाहिए। सब की सेवा करने वाली गृहिणी सदैव भली-चंगी और स्वस्थ रहे। हे प्रभु, आपकी गति को कोई नहीं जानता। आप अपनी कृपा प्रदान कर जब हृदय में प्रकट हो जाते हैं, तो फिर कहीं नहीं जाते। अगले पद में धनाजी महाराज कहते हैं कि इस संसार में जिस किसी का भी उद्धार हुआ है, वह भगवद्रस्मरण से ही संभव हुआ है। जो निरंतर भगवान (राम) का नाम स्मरण करता है, उसके दारुण, दुख भी जाते रहते हैं। कौन नहीं जानता कि भगवान का स्मरण कर उद्धव, नारद, अम्बरीक, प्रह्लाद, सुदामा जैसे भक्त तर गए। और तो और, महादेव शिव भी भगवान ही का सदैव ध्यान करते हैं। ब्रह्मा के मानस पुत्र सनकादिक ने भी नाम स्मरण के माध्यम से ही परमात्मा की प्राप्ति की। इन भक्तों के अनुसरण में ठाकुरजी का दास यह धना भी परमात्मा हरि का गुणगान करता है। गुरु की कृपावश अवश्य ही परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति होगी। एक अन्य पद में ईश्वर की रहस्यमयता को विश्लेषित करते हुए धनाजी महाराज कहते हैं कि वह योगीराज किसी अनंत गुफा में विराजित रहता है। मुझे उसे प्राप्त करने में सेवा का मार्ग ही उचित एवं श्रेष्ठ प्रतीत होता है। परमात्मा का भजन करने वाले योगी-संन्यासियों को खीर, खांड, घ्रित के साथ उत्तम भोजन कराकर यह सेवा का अवसर नहीं चूकना चाहिए। अपने गृह में सदैव साधु-संतों को न्यौतना चाहिए। धनाजी कहते हैं कि यह शरीर और इस गृहवास का तो एक दिन निश्चित ही त्याग करना होगा। हमारा पुनः यहां आना नहीं होगा। इस संसार में आना-जाना तो बहुत बार हो चुका। इस नश्वर से क्या आस लगा रखी है। हे प्रभु, यह धना जाट तो तुझ में अनुरक्ति रखता है। बाकी तो इस संसार में प्राण चले जाते हैं और पीछे घर में रोना-धोना रहता है। पांचवें पद में धनाजी आत्म तत्त्व को ही समझाते हुए इस बात पर बल देते हैं कि एक नाम स्मरण के अलावा उबरने का कोई रास्ता नहीं है, इसलिए मेरी जिह्वा, तू क्यों न हरि का स्मरण करे ? तू अभी तक गाफिल क्यों बैठा है, मौत तो तेरे एकदम समीप यानी सिरहाने बैठी है, उसे भूलकर क्यों आगे बढ़ रहा है? अपने व्यर्थ अहंकार का त्याग कर रात-दिवस नारायण का नाम जपना प्रारंभ क्यों नहीं करता। झूठ (असार एवं नश्वर संसार) का सहारा कब तक पकड़े रहेगा? क्यों नहीं सच को पकड़ लेता है? थोड़ा-सा पलट कर अपने दोषों पर दृष्टिपात क्यों नहीं करता है। वे फिर कहते हैं, हे प्राणी! उस पुरुषोत्तम का नाम स्मरण कर, दूसरे विषयों को अपने मन से दूर हटा। अरे, एक-एक पैर पर काल के मारे हुए लोग तुम्हें नजर क्यों नहीं आ रहे हैं? अपने दोषों का परिहार कर तथा चित्त में सच्चाई का वरण कर, चेत कर और इस जगत के नियंता धरणीधर का ध्यान कर। हे धना, तुम्हें उबारने का कार्य केवल धरणीधर ही करेंगे। धनाजी भगवद्स्मरण पर अत्यधिक जोर देते हैं। उनके छठे पद के भी लगभग यही भाव हैं। वे कहते हैं, हे प्राणी! हरि के गुणानुवाद में लग। तू सब प्रकार की चतुराई छोड़कर एकमात्र इसी कार्य में लग जाओ। वह परमात्मा न गंगाजल से बार-बार स्नान कराने से रीझता है और न ही पीतांबर ओढाने से शोभायमान होता है। यानी ठाकुरजी की प्रतिमा का केवल श्रृंगार कर देना भर पर्याप्त नहीं है। हम जिन ठाकुरजी के विग्रह के चंदन लेपन करते हैं, वह ठाकुर तो अनुपम सुवासित है। हम जिन्हें अगर चंदन का धूप खेते हैं. उनके लिए यह ध्यान करना आवश्यक है कि वह किस सुगंध से राजी होता है ? हम जिन्हें नाना प्रकार से पत्र और पुष्प चढ़ाते हैं, उसके रखे इस संसार की अठारह लाख प्रकार की वनस्पतियां उस जगत नियंता की रोमावलियां हैं। वह किस प्रकार की सेवा-पूजा और भक्ति से प्रसन्न होता है ? इस पर धनाजी कहते हैं कि जैसी भक्ति सनकादिकों ने और शुकदेव मुनि ने की है, वैसी ही करने का अभीष्ट रहना चाहिए अर्थात उनके जैसे वीतरागी बनो। वह सृष्टि नियंता किस नृत्य से राजी हो सकता है, जिसके आगे नारद और शिव नृत्य करते हैं और अप्सराएं सुगान करती हैं। हे गोपाल, तुम्हारी महिमा का गान संभव नहीं है। मैं तो तुम्हारे गुणों को गाना ही नहीं जानता। जिसकी गति को जाना नहीं जा सके, जिसको जान लेना सुगम नहीं है। कोई उसके गुणों को गाकर भी कितना सा गा लेगा ? भक्त धनाजी कहते हैं कि परमार्थ से बड़ा कोई सत्कार्य नहीं है और उस परमात्मा को सहज भाव से ही अर्थात पाखंड रहित होकर ही प्राप्त किया जा सकता है। सातवें पद का भाव इस प्रकार है- हे प्राणी, तुम इस संसार में न जाने कितने जन्मों से भ्रमित होकर फिर रहे हो। अभी तक तुम्हारे तन-मन में धैर्य का आविर्भाव नहीं हुआ है। लालच के वशीभूत होकर विषयों में इस कदर खो चुके हो कि परमात्मा रूपी हीरे को ही बिसरा दिया है। विषय रूपी फल बड़े मीठे प्रतीत होते हैं, क्योंकि भीतर में चेतना का अभाव है। वस्तुओं एवं व्यक्तियों में ऐसी आसक्ति बढ़ा ली कि निरंतर जन्म-मरण के फेरे में पड़े हुए हो। भीतर निवास करने वाले परमेश्वर को पाने की युक्ति नहीं जानी। ब्रह्मपरायण नहीं हुए। परमात्मा के आश्रय हुए बिना, विषयों की ज्वाला में जलते और यम के फंदे में फसते रहोगे। विषयासक्ति जब मन में भर जाती है तो परम प्रभु स्वतः ही विसर जाते हैं। मोह ज्वाला में भस्म हो रहे को गुरुजी ने ज्ञानरूपी धन प्रदान किया, उस ज्ञान के फलस्वरूप अब ध्यान और मन एक हो गया है अर्थात मन की चंचलता समाप्त होकर वह एकात्म भाव में स्थित हो गया है। महापुरुषों का संग दुर्लभ है, उनसे ही प्रेम और भक्ति का मर्म जाना। जो मन अब तक अतृप्त था वह संत संगति से तृप्त हुआ। सत्य स्वरूप, नित्य सिद्ध से साक्षात्कार हुआ। सत्य ही चैतन्य स्वरूप है और वहीं आनंद रूप है। उससे साक्षात्कार का तात्पर्य चैतन्य का चैतन्य में विलय हुआ यानी ज्योति में ज्योति समा गई। सच्चिदानंद परब्रह्म से पहचान हुई। धनाजी कहते हैं कि संतकृपा से इस धना ने धरणीधर रूपी धन प्राप्त किया ओर सदा के लिए धन्य हो गया। धनाजी के इस आठवें पद के संबंध में यह संशय किया जाता है कि यह धनाजी द्वारा रचित नहीं है, जबकि गुरुग्रंथ में शामिल इस पद की व्याख्या इस प्रकार है- निरंतर गोविंद का गुणगान करने वाला नामदेव जाति का छींपा था लेकिन परमात्म प्रेम के कारण वह बहुमूल्य हो गया अर्थात भगवद्भक्ति करने वाला मूल्यवान हो जाता है। इसी प्रकार धागों को तानने और बुनने वाला जुलाहा कबीर ईश्वर प्रेम के कारण बेहद गुणवान भक्तों में परिगणित किया गया। मृत पशुओं को ढोने वाली चमार जाति के रविदास ने माया का परित्याग कर, साधुओं का संग किया और फलस्वरूप परमात्मा से साक्षात्कार किया। घर-घर जाकर लोगों की सुंवार करने वाले सेन नाई के लिए स्वयं परमात्मा ने उसका कार्य किया, किंतु उसके हृदय में प्रभु का सच्चा वास होने के कारण उसकी गिनती उच्च कोटि के भक्तों में हुई। उपरोक्त सभी श्रेष्ठ भक्तों के चरित्र सुनकर जाट जाति में उत्पन्न धना भक्ति अधीन हो गया और भाग्यशाली धना को भगवान साक्षात प्राप्त हुए। 'राग रत्नाकर' में प्राप्त नौवां पद उपरोक्त पद से काफी समानता रखता है, पर गुरुग्रंथ साहब का पद पंजाबी भाषा का प्रभाव लिए हुए है, जबकि यह पद पंजाबी प्रभाव से मुक्त है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह पद धनाजी द्वारा रचित है तथा अपनी मूल भाषा में है। धनाजी की साखियांयहां हम धनाजी की सात साखियां दे रहे हैं। साखिया उस काल में लगभग सभी भक्तों ने रची थी, किंतु सभी भक्त कवियों की साखियां 'अंगों' में तथा पर्याप्त संख्या में प्राप्त होती हैं, जबकि धनाजी रचित साखियों की संख्या बहुत कम है। धनाजी ने इतनी कम संख्या में साखियां रची होगी, इसमें संशय होता है। धनाजी के अनुयायियों का यह कर्तव्य बनता था कि वे उनके भक्ति साहित्य की संरक्षा करते, पर कहीं न कहीं पंथ की घोर अवहेलना रही। धनाजी की प्रस्तुत साखियां नीतिपरक तात्विक ज्ञान लिए हुए हैं। अपनी प्रथम साखी में धनाजी कहते हैं कि भले ही कोई पंडित आनुष्ठानिक कार्यों में कितना ही दक्ष हो जाए, धर्म की वह कितनी ही व्याख्याएं करे, किंतु जब तक आत्यंतिक हरि भाव मन में नहीं है, तब तक उसका ज्ञान शुष्क ही है। हरि भक्ति का प्रभाव हो तो बिना बाहे ही अन्न निपज सकता है। यह किसी परमात्मा पर गहरी निष्ठा रखने वाले किसी किसान से पूछो। स्वयं धना के खेत में बिन बाहे ही अन्न पैदा हुआ था। संभवतः उनका इशारा इसी ओर है। अपनी दसरी साखी में धनाजी कहते हैं कि व्यक्ति को धन माया के प्रति अधिक उन्माद नहीं रखना चाहिए तथा न ही मरण धर्मा संसार में अत्यधिक आसक्ति ही रखनी उत्तम है। धन और मोह ठीक वैसे ही हैं जैसे पैरों में बेडी और गले में रम्मी का फंदा। धन और मोह दोनों ही काम नहीं आता, प्रत्युत कर्मबंधन ही हुआ। इसलिए असार बातों को समझना आवश्यक है। तीसरी साखी में धनाजी कहते हैं कि वे नर धिक्कार के अधिकारी हैं, जो संयोगवश तथा किसी दूसरे के सहयोग से आए धन को लेकर अभिमान करते हैं। धन की गति तो किसी पेड़ के पत्तों की नांई है। पेड़ के पत्ते लगते हैं और एक दिन झड़कर न जाने कहां उड़ जाते हैं। ऐसे ही धन अधिक टिकता नहीं। चौथी साखी भी धन के वास्तविक महत्त्व को व्याख्यायित करने वाली है। यहां धनाजी कहते हैं कि जैसे हम कुएं का पानी अधिक दिन संचित नहीं कर बांट देते हैं, वैसे ही धन को सद्कर्म में खर्च कर देना चाहिए। व्यर्थ संग्रह किया धन कलह को उत्पन्न करता है। सापुरुष यानी उत्तम व्यक्ति अपने कठोर परिश्रम से उत्पन्न धन में सभी का भाग (सीर) मानते हैं। पांचवीं साखी में धनाजी उस व्यक्ति को धनवान बताते हैं जो दूसरों के दुख को दूर करने का यत्न करे। एक संत ही ऐसे होते हैं जो दूसरों के दुख को अपना दुख समझते हैं। संत संसार में रचे-बसे प्राणी को उसकी निस्सारता से परिचित कराते हैं तथा स्वयं की चित्तजड़ ग्रंथी काटने का कार्य करते हैं। ऐसा करने में उन्हें तनिक भी दुख नहीं होता। धनाजी अपनी अगली साखी में कहते हैं कि वास्तविक अर्थों में वही लोग धनाढ्य हैं जिनकी प्रीति परम पिता परमेश्वर अर्थात धरणीधर में है। ऐसे प्रभु भक्त आठ पहर चौबीस घड़ी परमात्मा का भजन करते हैं, एक क्षण के लिए भी उन्हें विस्मृत नहीं करते। उनके अवयव अर्थात जीभ, हृदय, मन और चिंतन प्रभु में लगे रहते हैं। सातवीं साखी में धनाजी कहते हैं- वे परम दयालु, संसार के नियंता धरणीधर आकाश, पाताल और धरती सब जगह व्यापक हैं। ऐसे घट-घटवासी परमात्मा को हमेशा अपने स्मरण में बसाए रखने वाले साधुजन वास्तविक धनी हैं। ऐसे संत परमात्मा का कभी विस्मरण नहीं होने देते। उपरोक्त अधिकांश साखियां एक ही 'अंग' की साखियां है जो धन, द्रव्य, वैभव की क्षणिकता को प्रतिपादित करती हैं। निश्चय ही भक्तप्रवर धना ने अन्य अनेक आध्यात्मिक विषयों पर भी साखियों की रचना की होगी। भले ही अब तक धनाजी के भक्तिमय पदों की अधिक खोज नहीं हो पाई है, पर उनके उपलब्ध पद उनकी आध्यात्मिक अभिव्यक्ति की परिपक्वता को प्रकट करते हैं। डॉ. दिनेश चन्द्र शुक्ल का मत है कि, "एक दृष्टिकोण से राजस्थान के धार्मिक जीवन को नया मोड़ देने में प्रथम योगदान धना का ही है।" वे उनके आध्यात्मिक दर्शन के संबंध में कहते हैं कि, "वे ईश्वर को अगम अगोचर, अनिर्वचनीय, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वकर्ता मानते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि उस अपरंपार महिमा वाले 'राम' को तो वही जान सकता है, जिसका सहज सरल स्वभाव है।" धनाजी के वैराग्य भाव पर उनका कथन है कि, "धना आत्मोद्धार हेतु भक्ति साधना के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग करने के पक्ष में नहीं थे।" लेखक को इस बात का ध्यान नहीं है कि अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्होंने गृह त्याग कर दिया था और वे मोहिलवाटी के गांवों में आ गए थे, किंतु उन्होंने यह गृहत्याग गुरु आज्ञा से किया था। संत साहित्य के अध्येता ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल का मत रहा है कि, "प्रायः सभी विद्वानों ने संत धना के बारे में कोई गंभीर छानबीन नहीं की है। बस, पूर्व लेखक का परवर्ती लेखक ने अंधानुकरण किया है।"" लेखक का यह मत सही प्रतीत हो रहा है। रामानंद स्वामी के अन्य भक्त शिष्यों पर जितना अनुसंधानपरक कार्य हुआ, उतना धनाजी पर नहीं हुआ। धनाजी के पदों पर अपनी राय देते हुए वे लिखते हैं कि धना के केवल एक पद के आधार पर उन्हें निर्गुणवादी धारा का कवि ठहराना ठीक नहीं है, उनके शेष पदों में निर्गुण-सगुण दोनों धाराओं के दर्शन होते हैं। वस्तुतः धनाजी अपने पूर्ववर्ती भक्तों में नामदेव से काफी प्रभावित नजर आते हैं, वे उनका उल्लेख भी करते हैं। नामदेव कहते भी थे, "सब गोविंद है, सब गोविंद है।" धनाजी उनकी इन पंक्तियों का एक पद में उल्लेख भी करते हैं। नामदेव के एक पद की पंक्तियां दृष्टव्य हैं- कहत नामदेव हरि की रचना देखहुं रिदै बिचारी। घट घट अन्तरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ।। *नामदेव का सर्वात्म गोविंद, धना को भी प्रिय है। वैसे भी हर संत की अपनी मौलिक दृष्टि रहनी चाहिए। धनाजी ने भी परमात्मा के विषय में अपने मौलिक दृष्टिकोण को प्रश्रय दिया। इस संबंध में उनके गुरु रामानंदजी का कोई आग्रह नहीं रहा। "वस्तुतः रामानंद समन्वयी चेतना के महानायक थे। उनके शिष्यों ने संपूर्ण भारत में समतामूलक समाज की संरचना में योगदान किया।संत धनाजी की भक्ति ही उनका वास्तविक परिचय है। संत और भक्त अनीतिपरायण मनुष्य की कुबुद्धि को सुबुद्धि में परिवर्तित करने का कार्य करते हैं और धनाजी ने अपने संपूर्ण जीवन में यही किया। ऐसे महापुरुष ने धनावंश का प्रणयन कर वैराग्य पंथ को नव संदेश प्रदान किया। संत पुरुष का काम ही जीव का मंगल करना होता है।
अध्याय: अष्टम: -उपसंहार परिशष्ट
अध्याय : अष्टम उपसंहारधनावंश के पंथ प्रवर्तक श्री धनाजी महाराज राजस्थान में भक्ति चेतना के अनूठे पर्याय थे। अपने विलक्षण व्यक्तित्व के बल पर उन्होंने मध्ययुगीन आध्यात्मिक क्रांतिचेता श्री रामानंदाचार्य को अत्यधिक प्रभावित किया। अपने गुरु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण का आधार बना धनावंश संप्रदाय। अगर धनाजी रामानंदजी का शिष्यत्व ग्रहण करने न जाते तो धनावंश संप्रदाय कभी अस्तित्व में नहीं आता। उन्होंने ही धनाजी को संप्रदाय संस्थापन के लिए प्रेरित किया और आज लगभग साढ़े पांच सौ वर्षों से यह संप्रदाय अपने स्वरूप में विद्यमान है। धनावंश संप्रदाय को इसकी स्थापना काल से ही राजाओं-जागीरदारों से मान-प्रतिष्ठा तथा सम्मान अनेक रूपों में प्राप्त हुआ। ठाकुरजी प्रित्यार्थ धनावंशी स्वामियों को बेगार प्रथा से मुक्त रखा गया। जिस जाट जाति से नव संप्रदाय के रूप में धनावंश का जन्म हुआ, उसे अपनी पूर्व जाति से भी भरपूर सम्मान तथा प्रशंसा और उच्चता प्राप्त हुई। हां, यह कहा जा सकता है कि जिस धनावंश का जन्म धार्मिक आध्यात्मिक चेतना को नव उत्कर्ष देने के लिए हुआ था, वह काल के प्रवाह में अपना प्राचीन वैभव खोता जा रहा है। भारतीय समुदाय में न जाने कितने संप्रदाय हैं और न जाने कितनी उनकी परंपराएं हैं। कितनी परंपराएं अपने पुरा वैभव और मर्यादाओं को अक्षुण्ण रखे हुए हैं, यह शोध खोज का विषय है, किंतु हमें अन्य समुदायों पर दृष्टिपात करने की बजाय, अपने समाज संप्रदाय पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। संप्रदायों को अपने नियमों, संहिताओं का पालन करना होता है। स्वानुशासनपूर्वक उनका पालन होता है, कोई बाध्यता नहीं होती। फिर भी विवेकी समुदाय अपनी पंथीय गरिमा और मर्यादाओं को गिरने नहीं देते। समय-समय पर उसे और अधिक उच्चता प्रदान करने का काम किया जाता है। सांगठनिक आधार खड़े किए जाते हैं। अपने धर्म-संप्रदाय की सुरक्षा-संरक्षा के निमित्त लोग तन-मन-धन से योगदान करने में जरा भी हिचकते नहीं हैं। हम गौर से देखें तो पता चलेगा कि आजकल जातीय तथा सांप्रदायिक सम्मेलनों में पहले की बनिस्बत उपस्थिति बढ़ने लगी है। सब जानते हैं कि अपना समाज हमेशा अपनों को अपनत्व और संरक्षा देने का कार्य करता है, किंतु धनावंश के साथ उलटा हो रहा है। यहां विगत वर्षों में समाज के मध्य शैथिल्य अधिक प्रसरित हुआ है। धार्मिकता के मामले में तो और अधिक। स्थिति सामाजिक उत्थान की भी संतुष्टिदायक नहीं कही जा सकती। जो समाज धार्मिक रूप से उन्नति करता है, उसकी सर्वतोन्मुखी उन्नति भगवान करते हैं। पूर्व काल में धनावंशी साधों की ईश्वरीय अनुरक्ति देखकर ही उन्हें शासकीय समर्थन प्राप्त हुआ। हमें अब धनाजी महाराज की साक्षी में समाज को नवीन उत्थान प्रदान करने के लिए सभी प्रकार के प्रयास करने हैं। हमारे महंतों ने अपनी धार्मिक सिद्धियों तथा आचरण के कारण ही तत्कालीन राजा-महाराजाओं को प्रभावित किया था। अब यह वर्ग अनेक विसंगतियों का शिकार होकर अपने अस्तित्व को खोने खोने में है। इस परंपरा को समाज के बौद्धिक जनों को पुनर्व्याख्यायित करना होगा। वैषम्य को समझना होगा। परंपराएं और संस्कार खंडित होते रहते हैं। युगीन नव परिवेश में नए ढंग से उनका परीक्षण किया जाता है। टूट-फूट होने पर हम मकान की भी तो मरम्मत कराते ही हैं। उसके संपूर्ण गिर जाने की प्रतीक्षा थोड़ी ही करते हैं। वही समाज धार्मिक-आध्यात्मिक सामाजिक-सांस्कृतिक उत्थान कर सकता है जहां के विद्वतजन तथा आचार्य अपने समुदाय के साथ नैरंतर्य में संवाद कायम रखते हैं। प्रबोधन का कार्य कभी भी धीमा नहीं पड़ना चाहिए। धनावंश वैराग्य की नींव पर खड़ा हुआ संप्रदाय है, वैष्णवता इसका बाना है। इसलिए इसके आंतरिक मूल्य सदैव जीवित रहेंगे, तभी यह संप्रदाय की गरिमा रख पाएगा। धनावंश का यह इतिहास ग्रंथ अपनी सीमाओं में इस पंथ के नैष्ठिक आचरणों को भी बताता चलता है। इतिहास, भविष्य को दिशा प्रदान करने का काम करता है। जाने-अनजाने में संप्रदाय के भीतर जो कुछ ध्वस्त हुआ है, उसकी मरम्मत, पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी किसी अन्य की नहीं है। कोई भी जीवंत समुदाय ठान ले तो असंभव कुछ नहीं होता, आवश्यकता उठ खड़े होने की है। इस उठने में हमारे पंथ प्रवर्तक और संपूर्ण भारतवर्ष के भक्ति परिदृश्य में सुपूजित धनाजी महाराज अपने सूक्ष्मांश से हमारी मदद अवश्य करेंगे। जय ठाकुरजी की।------------xxx-----------परिशिष्ट-1प्रभुनाथ द्विवेदी रचित 'श्रीरामानन्द सतसई' में धनाजी वर्णन राजपूताने टाँक मुँह धुवन गाँउ धनि धाम।परमभागवत जाट एक धन्ना ताको नाम ।।399 ।। प्रभु प्रसन्न इक बार तेहि सनमुख दरसन दीन्ह।किरपा करि उपदेसेऊ अधिकारी तेहि चीन्ह ।।400 ।। धन्ना कासी जाहु तुम्ह सिरिमठ पहुँचहु धाइ ।धरनि अवतरेउ रामजी सिरिमठ रहेउ बसाइ ।।401 ।। सिरिमद्रामानन्द तेहि एहि जनम करि नाउँ।मम बिभूति तेहि तन लसै औरु न दूजो ठाउँ ।।402 11 करम बचन मन जाइ तुम्ह सेवहु सहित सनेह।पुन्य मोच्छ तुम्ह पाइहौ छुटि जइहै भवदेह ।।403 11 निज जोगज सामर्थ्य ते स्वामिबर्ज सबु जान।नित चितवत कब आइहै धन्ना जाट सुजान ।।404 11 धन्ना आयउ हरषजुत कासी राम दुआरि।मिलेउ अनन्तानन्द सों स्वामी कहत बिचारि ।।405 ।। धन्ना सरल सुभाउ जन पठयउ सिरी भगवान।शिष्य करउँ संस्कार जुत प्रभु कौ बचन प्रमान ।। 406 ।। दीच्छा देह बनाइ सिष भेजेउँ धुवन बहोरि।भेंटेउ भरि अंकवारि प्रभु उमरी प्रीति न थोरि ।। 407 11परिशिष्ट-2 श्री धनाजी का लोक पदसांवरा म्हे तो कोनी थारै सारै ।। टेर ।। थारै कहीजै राधा रुखमण, कुबजा नार तुम्हारै।थारी बराबरी म्हे करां, ओक जबर जाटणी म्हारै ।। थारै कहीजै म्हैल माळिया, अजब झरोखा थारै।थारी बरोबरी म्हे करां, ओक छांन-झूपड़ी म्हारैरे ।। थारै कहीजै हाथी घोड़ा, घूमै राज दुवारै।थारी बरोबरी म्हे करां, भूरी भैंस छै म्हारै ।। थारै कहीजै तुलछां रो बिड़लो, देव परकमा थारै।थारी बरोबरी म्हे करां, मोटो खेजड़ो म्हारै ।। धनै भगत री भगती पूरबली, जिणरा खेत निपजावै।गिरधर कीं रा कारज सारै, नांव लियां हर तारै ।।परिशिष्ट-3 राग मलारप्रभु के ऊंच नीच नहिं कोई। प्रेम भक्तिकर जो जन ध्यावे, उत्तम कहिये सोई ।। कुलवंता राजा दुर्योधन तिस गृह पग न धास्यो ।जाय विदुर के भाजी अरपी जाति न जन्म विचास्यो ।। ब्राह्मण एक करत नित पूजा ताको भोग न लीना।धन्ने जाट के शोच न कोई होय प्रगट दुध पीना ।। ऊंचे जन्म कर्म के तपसी ना किसे मंदिर धावे।महा कुचील भील दे कर ते ले जूठे फल खावे ।। जाय पड़े सब आगे बैठे ना किसे देत दिखाई।नामदेव को देहरा फेश्यो लीनो कंठ लगाई।। पारब्रह्म पूरण अबिनाशी सब घट की मति जानै।दुनीदास प्रभु भक्तवछल है कपट हेतु नहिं मानै ।। (राग रत्नाकर, पद सं. 518, पृष्ठ-153)परिशिष्ट-4 मीरां कृत नरसीजी रो माहेरोमीरां कृत माहेरा के एक पद में धनाजी महाराज का उल्लेख आया है। पद इस प्रकार है- एजी म्हारां नटवर नागरिया, भगतां रे क्यों नहीं आयो रे।। टेर ।। धना भगत की भगति पुरबली, जिनको खेत निपायो रे।बीज लेर साधां नै बांट्यो, बिना बीज निपजायो रे।। 1।। नामदेव थारो नानो लागै, ज्यांरो छप्पर छायो रे।मार मंडासो छावण लागो, लिछमी बंध खिंचायो रे।। 2।। सैन भगत थारो सुसरो लागै, ज्यांरो कारज साख्यो रे।बगल रछानी नाई बणग्यो, नृप को सीस संवाख्यो रे।।3 ।। फरसो के थारै फूंफो लागै, ज्यांरो पेड़ो पूठ्यो रे।बिना बुलायो आपै आयो, रात्यूं लकड़ कूट्यो रे।।4।। कबीर कांई थारै काको लागै, ज्यां घर बाळद ल्यायो रे।खांड खोपरा गिरी छुहारा, आप लदावन आयो रे ।।5 ।। भीलणी कांई थारी भूआ लागै, जिण रो जूठण खायो रे।ऊंच नीच की संक न मानी, रुच रुच भोग लगायो रे।। 6 ।1 करमा कांई थारी काकी लागै, जिण रो खीचड़ खायो रे।धाबळियै रो पड़दो करती, रुच रुच भोग लगायो रे।। 7।। मीरां के थारी मासी लागै, जिण रो विषड़ो जास्यो रे।राणै विष रा प्याला भेज्या, विष अमृत कर डास्यो रे।। ৪।। बाल भोग को भूखो बाला, खोस खा गयो बोर रे।नानी बाई रो माहेरो भरतां, तन्नै लागै जोर रे।। 9।। जीमण को जिमणारो बाला, फिर फिर सारया काम रे।नानी बाई को माहेरो भरतां, घर सूं लागै दाम रे ।।10।। कहै नरसीलो सुण सांवरिया, आणो है तो आवो रे।ब्याही सगां में भेंडा लागां, यूं कांई लाज गमावो रे।। 11।।(सं. जेठालाल नारायण त्रिवेदी)
