समाज के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ

धन्नावंशी समाज को लेकर कुछ लोगों में कुछ भ्रांतियां हैं और वे अक्सर कई तरह के सवाल भी पूछते हैं। उन्हीं में से कुछ मुख्य सवाल और उनके तथ्यात्मक व सही जवाब इस प्रकार हैं:-

1. रिपोर्ट मरदुमशुमारी मारवाड़ सन 1891
इस पुस्तक के लेखक जोधपुर रियासत के मंत्री राय बहादुर मुंशी हरदयाल सिंह थे
इन्होंने अंग्रेज सरकार के निर्देशानुसार मारवाड़ क्षेत्र की जातियों की जनगणना के निर्देशों की पालना में मारवाड़ की समस्त 466 जातियों की सांस्कृतिक ऐतिहासिक जानकारी के साथ-साथ जनगणना करवाएं इस पुस्तक के पेज संख्या 303 व 304 धनावंशी साध समाज का वर्णन निम्नानुसार किया गया है
 
"रामानंद के चेलों में एक धन्ना जाट थे यह बड़े भगत हुए। इन्होंने अपनी जात के बहुत से जाटों को चेला किया और साधों का धर्म सिखाया, यह सब धन्ना वंशी साद कहलाए। आचार व्यवहार रामावत साधुओं के माफिक है मारवाड़ बीकानेर में बहुत पाए जाते हैं तिलक रामानंदी लगाते हैं इनका रोटी व्यवहार चारों संप्रदाय से हैं लेकिन बेटी का विवाह मां-बाप नाना नानी के 4 गोत्र टालकर अपनी जाति यानी धन्ना वंशी साधो में ही करते हैं। इनमें नाता नहीं होता।"
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रिपोर्ट मरदुमशुमारी राज मारवाड़ 1891 ई." के संबंध में कुछ तथ्य 🙁 "मरदुमशुमारी" शब्द का हिन्दी में अर्थ होता है - "जनगणना" )*"रिपोर्ट मरदुमशुमारी राज मारवाड़ 1891 ई."  मारवाड़ की तात्कालीन "सरकार द्वारा" , आज से "लगभग 130 वर्ष पूर्व" , सन् 1891 में  कराई गई "जनगणना" की "सरकारी रिपोर्ट" है  इस "जनगणना" हेतु मारवाड़ राज्य में अलग से एक "नवीन विभाग स्थापित" किया गया ....... जिसके सुपरिटेंडेंट रायबहादुर मुंशी हरदयाल सिंह तथा डिप्टी सुपरिटेंडेंट मुंशी देवी प्रसाद के साथ ही "सैकड़ों कर्मचारियों की टीम" को ........"लगभग 25,00,000 ( पच्चीस लाख )  लोगों की जनगणना" कर .....इस जनगणना रिपोर्ट को प्रकाशित  करने में  लगभग "तीन वर्ष का समय" लगा............!!उक्त "सरकारी रिपोर्ट" में मारवाड़ राज्य की "सभी 462 जातियों" के पुरुषों एवं महिलाओं की अलग अलग गणना की गई है............इसके साथ ही , प्रत्येक "जाति की उत्पत्ति" कैसे हुई , इसका वर्णन किया गया है.......संबंधित जाति के रहन-सहन , खान-पान , व्यवसाय , संस्कृति एवं रीति-रिवाज का उल्लेख किया गया है ............!!! अतः "तात्कालीन सरकार" के एक "सरकारी विभाग की टीम" द्वारा "462 जातियों के 25,00,000 लोगों की जनगणना" के उपरांत तैयार कर प्रकाशित की गई ,उक्त "सरकारी रिपोर्ट" को पूर्णतया "निष्पक्ष एवं प्रामाणिक नहीं मानने" का कोई भी "तर्कसंगत कारण" दूर दूर तक प्रतीत "नहीं" होता है............
 
2. डॉक्टर भंवर सिंह सामोर, पूर्व प्राचार्य लोहिया कॉलेज चूरू ने अपने आलेख
"सामोर एवं धन्नावंशी"
में लिखा कि उस युग के महान ईश्वर उपासक धन्ना भगत ने नीति वान उदार मोहिल शासकों से प्रभावित होकर अपना उत्तरार्द्ध समय मोहिलवाटी में व्यतीत करने का निश्चय किया। इसलिए अपने पुश्तैनी गांव टोंक(धुंआ कला) से रवाना होकर मोहिल वाटी आए फिर वहां से फिरवांशी पधारे तथा उसके बाद तंवरा गांव पहुंचे। तंवरा गांव उस समय जेतसी समोर के पट्टे में था। यहां आने पर जैतसी सामोर ने उनके स्वागत में एक दोहा कहा,,
"आज जैतसी ऊजलो,धारण चरण धनेश।
पांण जोड़ आखै प्रगट,अलग पुरा आदेश।।
वहां से धनाजी जेतसी के आग्रह पर कसुंबी पधारे क्योंकि कसुंबी भी उसी समय जेतसी सामोर के पट्टे में था। स्वागत में कहा
"आज कसुबी उजली,धिन धिन गुरां धनेश
ओ पगफेरो आपको,रहसी याद हमेस ।
इनके अनुसार धन्ना भगत 1 वर्ष से अधिक समय तक कसुंबी में रुके
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3.  पदम श्री से सम्मानित लेखक श्री सीताराम लालस द्वारा रचित राजस्थानी शब्दकोश खंड 4 के पृष्ट संख्या2528 पर धन्ना वंशी शब्द की व्याख्या इस प्रकार की
है"रामानंद जी के शिष्यों में धन्ना जाट भी था किसी के द्वारा दीक्षित साध धन्नावंशी कहलाए""
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4.  नानूराम संस्कर्ता द्वारा लिखी गई पुस्तक ,खेड़े रपट, के पेज संख्या292 पर वर्णन:
"जाट धन्ना भगवान का एक परम भक्त हुआ जिसके नाम पर धन्ना वंशी वैरागियों का मत प्रचलित हुआ उनके सभी गोत्र जाटों से मिलते हैं।"
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5.  डॉक्टर गोविंद अग्रवाल प्रोफेसर लोहिया कॉलेज चूरू द्वारा रचित "चुरू मंडल का शोध पूर्ण इतिहास"
पुस्तक के पेज संख्या 62-63 पर उल्लेख आया है
कसुंबी गांव में धन्ना जी का खेत है जिसमें लाल पत्थर की एक देवली है इसमें उस बावड़ी और मंदिर का भी उल्लेख है जा धनाजी ने आसन लगाया था
 
6.  डॉ अनिल जैन द्वारा लिखी गई पुस्तक"गुरु मिलिया रामानंद"
इस पुस्तक के पेज नंबर 94_95 पर धन्ना भगत का वर्णन है जिसमें बताया गया है कि धन्ना जी का जन्म 1415 इसमें में हुआ था इन्होंने अंग्रेजी लेखक मेकालिफ की पुस्तक का हवाला देते हुए बताया की देवली से 20 किलोमीटर दूर धुआं कला गांव है जहां पर धन्ना भगत का जन्म हुआ वहां पर वह खेत भी मौजूद है जिसमें मोती निपजे थे। उस खेत को धनाजी की पाटी कहते हैं
इन्होंने त्रुटि वंश धन्ना वंशी स्वामी को धन्ना वंशी जाट कहते हुए लिखा है
"राजस्थान में आज भी धन्ना वंशी जाट रहते हैं जिनका आचार व्यवहार रामावत साधुओं के समान है"
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7.  श्री बृजेंद्र जी सिंघल द्वारा रचित पुस्तक "संत सप्तक"मैं पेज नंबर 90 पर वर्णन किया है
इन्होंने धन्ना जी को रामानंद का शिष्य मानते हुए कबीर रैदास और सैन के समकालीन माना है तथा धन्ना भगत को रामानंद का अंतिम शिष्य मानते हुए इनका जन्म 1455 से 1460 माना है इन्होंने भी गलती से धन्ना वंशी स्वामी को धन्ना वंशी जाट लिखा है
"आज भी धन्ना वंशी जाट रामानंद संप्रदाय से जुड़े हैं"
उन्होंने लिखा
,"धन्ना भगत सीताराम का उपासक रामानंद स्वामी का शिष्य गृहस्थआश्रम में रहते हुए भी स्वामी कहलाया था। इसी कारण अनेक जाट अपने नाम के साथ स्वामी शब्द का प्रयोग करते हैं"'
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8. श्री भंवरलाल जांगिड़ द्वारा लिखी गई पुस्तक"लाडनू एक ऐतिहासिक सर्वेक्षण"
इस पुस्तक के प्रस्तावक डॉक्टर भंवर सिंह समोर पूर्व प्राचार्य लोहिया कॉलेज चूरू है
इन्होंने पेज संख्या 332 पर लिखा
"जाटों में हुए प्रसिद्ध भक्त धन्ना के अनुयाई धन्ना वंशी साद कहलाते हैं"

जैसे सूर्य वंश के प्रदाता सूर्य,चन्द्र वंश के चन्द्रमा, रघु वंश के राजा रघु ,यादव वंश के यदु तथा कौरव वंश के कुरू, इसी प्रकार बीकाजी के द्वारा बीकानेर, जोधाजी के द्वारा जोधपुर, डूंगर सिंह जी के द्वारा श्री डूंगरगढ तथा गोपाल सिंह जी के द्वारा गोपाल पुरा आदि; ये कारण सम्बोधन सभी समाज,वस्तु व स्थान के लिए होते हैं ; परिस्थिति के लिए भी होता है जैसे वैदिक काल है, महाभारत काल है, भक्ती आन्दोलन काल है । कोई भी कार्य कारण से व परिस्थिति के प्रभाव से होता है इसी कारण से उस कार्य में उस कारण व परिस्थिति की पहचान लागू रहती है। धनावंशी सम्बोधन में सिर्फ और सिर्फ धन्नाजी महाराज का नाम ही शत प्रतिशत प्रमाण है । यथा-----
- जिस प्रकार गुरू श्री रामानन्द जी महाराज से रामावत सम्प्रदाय, रंकाजी महाराज से रंकावंशी सम्प्रदाय, पीपा जी महाराज से पीपावंशी, कूबा जी महाराज से कूबावंशी तथा फरषाजी महाराज से फरषवंशी समाज हुआ इसी प्रकार धन्ना जी महाराज से धन्नावंसी समाज हुआ । इनमें कोई छोटा बङा नहीं है क्योंकि इन सबके गुरूवर भगवान के अनन्य भक्त थे ।किसी भी समाज का आदमी किसी गांव में जाकर ठाकुरजी का पुजारी बनना चाहे, उसे गांव के लोग वैरागी ही स्वीकार करते हैं, ऐसा नहीं कहते कि तू धन्नावंसी नहीं है तो हम तुझसे पूजा नहीं करवायेंगे। जगह जगह इन छःहों समाजों के लोग पुजारी पदासीन हैं। दूसरे अगर कोई इन परम्परा गत छंहों समाजों में बङा है तो, मैं तो धन्नावंश को ही बङा मानता हूं क्योंकि, और समाजों में कहीं कम, कहीं ज्यादा गुरू की जाति के अलावा दूसरी जातियों की मिलावट है परन्तु धन्नावंश के गुरू धन्ना जी महाराज और उनके अनुयायी सिर्फ  एक ही जाती से थे जिसका प्रमाण है, हमारे जाति नख। इस प्रमाण का कोई प्रतिउत्त्तर नहीं है।
- राव अपनी बही पढना शुरू करते हैं, तब कुछ अपनी रीति में घूम- घूम कर ब्रह्मा जी में पहुंचते हैं, तथा ब्रह्मा  जी से रामानुज जी तथा उनके बाद रामानन्द जी के पास पहुँचते हैं। बीच में कहीं धन्नावंशी समाज का नाम नहीं आता। रामानन्द जी से पहले का वैराग संन्यास में ही है। यह गृहस्थी वैराग रामानन्द जी का ही प्रसाद है, जो कि रामावत सम्प्रदाय, उन्होंने खुद ने बनाया, तथा पीपाजी, धन्नाजी को भी प्रेरणा दी।तथा अन्य सन्तों ने भी उनसे प्रेरित होकर रंकावंशी फरषवंशी कूबावंशी आदि समाज बनाए।आवश्यकतानुसार ऐसा हुआ। क्योंकि उस समय मुग़लों द्वारा अत्यधिक धार्मिक अत्याचार हो रहे थे ।हिन्दू धर्म को अति क्रूरतापूर्ण तरीके से इस्लाम में परिवर्तित किया जा रहा था ।हिन्दू धर्म को मजबूत बनाने के लिए वैरागी व और भी कई धार्मिक सम्प्रदाय बने ।
- हमारे ही भाई लोग धन्नावंशी समाज को मनगढ़ंत नाम के लोगों से समाज का उद्गम बता देते हैं। जैसे धनेष्ठा,धनुर्वंशी,धनंजय धन्यवंशी आदि जिसका समाज के सम्बन्ध में कोई नामो-निशान तक नहीं है ।कई धनवंतरि का नाम लेते हैं परन्तु धनवंतरि जी से धन्नावंश का वर्णन  श्रीमद् भागवत में व महाभारत में आए बिना कब तक रहता?इसलिए धन्ना जी महाराज प्रत्यक्ष प्रमाणित हैं ।इसलिए मैं मेरे समाज बन्धुवों से यही प्रार्थना करता हूँ कि  मनगढ़ंत व कई नामों के साथ जोड़-जोड़ कर समाज को बदनाम न करें ।
- यह भी एक पक्का ही अनुमानित सबूत है कि किसी भी कुनबे की पीछली पीढियों की गिनती की जाय तो आठ दस या दस बारह पीढियां ही गिनने में मिलती हैं। इससे यह साक्ष्य माना जाता है कि धन्नावंशी समाज अधिक पुराना न हो कर ज्यादा से ज्यादा चार सौ-पांच सौ सालों से अधिक नहीं हो सकता। यह एक वैज्ञानिक रूप का प्रमाण है ।इसी अवधि के समक्ष सभी समाज रंकावंशी, फरषवंशी, कूबावंशी, पीपावंशी आदि हैं इसलिए धन्नावंशी समाज की भी शुरूवात यहीं से ही है। इसे आदि काल से बताया जाना तथा अनर्गल नामों से सम्बोधित करना अपने समाज को बदनाम करना व अपनी बढ़ाई अपने आप करना अभिमानी का काम होता है ।
- बहुत से कुनबे ऐसे भी हैं, अपने समाज में जो कि सिर्फ और सिर्फ डेढ़ सौ-दौ सौ सालों में ही जाटों में से वैराग को स्वीकार किया और धन्नावंसी बने ।जिनकी आठ दस पीढियां ही मुष्किल से हुई हैं ।ऐसे हैं तो बहुत से लेकिन मै एक उदाहरण के तौर पर बताता हूं कि राजगढ तहसील में एक गागङवास नाम का गांव है ।वहां एक बेनीवाल नख का वैरागी बताया गया ।उसके संतान न होने के कारण उसने पूनियां जाट का लङका गोद लिया था ।गागङवास के वर्तमान में सत्त्तर-पचहतर घर वैरागी के रूप में उसी पूनियां जाट की संतानें हैं जोकि राव की बही सबूत दे रही है ।उनके सम्बन्ध सारे समाज में ही है जगह-जगह । 
- यह एक निष्पक्ष प्रमाण है, जोधपुर महाराजा द्वारा मर्दुमशुमारी राज मारवाड़ नाम की एक पुस्तक जिसे हर जाति अपना प्रमाण स्वरूप स्वीकार करती हैं ।यह पुस्तक जोधपुर महाराजा द्वारा 130  वर्षों पहले करवाई गई एक सर्वे की रिपोर्ट है ।जोधपुर रियासत में निवास करने वाली हर जाति का विवरण है उसमें स्पष्ट रूप से धन्नावंश के प्रवर्तक धन्ना जी महाराज का वर्णन हुआ है ।87  साल पहले का श्री हरिदास जी महाराज धन्नावंसी महन्त श्री गोवर्धननाथ मन्दिर जोधपुर द्वारा धन्नावंशी इतिहास लिखित प्रकाशित किया हुआ है जोकि सिर्फ और सिर्फ धन्नावंशी समाज के लिए ही है ।इससे बङा और क्या सबूत चाहिए? 

आज से करीब 600 वर्ष पहले संत धन्ना जी महाराज ने अपने गुरु रामानंद जी के कहने पर लोगो को भक्ति मार्गे अपनाने के लिए प्रेरित किया था तथा उनके कहने पर उनके स्वजातीय लोगो ने खेती के साथ साथ भक्ति का मार्ग अपनाया व एक नया सम्प्रदाय अस्तित्व में आया जिसे हम धन्नावंशी समाज कहते हैं।
लेकिन इसमें कई तरह की भ्रांतियां भी चल रही है कि धन्नावंशी समाज तो सनातन काल से ही है एवम यह धनेष्ठ ऋषि के नाम पर है।
सनातन काल वाले धारणा इसलिए मित्य है कि जितने भी दूसरे 15~20 वैष्णव संप्रदाय है जैसे कि रामावत, रांकावत, निम्बार्क, पिपावंशी आदि, यह सब किसी ने किसी गुरु के लोग अनुयायी बनने से अस्तित्व में आये है और उस समय की कुछ विकट परिस्थितियों के कारण। इन सभी सम्प्रदायों का लिखित इतिहास है एवं सारे तथ्य भी मौजूद हैं। धन्नावंशी समाज का इतिहास भी इनके जैसा ही होगा । ऐसा नही है कि यह सारे सम्प्रदाय तो अभी 15~16 वी सदी में अस्तित्व में आये हैं जबकि एकमात्र धन्नावंशी समाज आदि काल से है। इसलिए हमें इस बात की स्वीकार करना होगा कि धन्नावंशी समाज की भी शुरुवात 15~16 वी सदी में ही हुई थी जो कि संत धनाजी के समय की बात है।
दूसरी बात धनेष्ठा ऋषी की, किसी भी शास्त्र या पुराण में धनेष्ठा नाम के ऋषि का कोई प्रमाण नही मिलता। यदि हम मान भी ले के हम धनेष्ठा ऋषि के संतान हैं तो फिर इतनी सदियो से सिर्फ राजस्थान के कुछ जिलों व पंजाब हरियाणा के जिले जो कि राजस्थान की सीमा के पास है सिर्फ वहीं हमारी मौजूदगी है। यदि हम आदि काल से होते तो आज पूरे भारतवर्ष में फैले होते। इसलिए हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि जंहा जंहा धनाजी ने भ्रमण किया जो कि जाट बाहुल्य क्षेत्र है सिर्फ वंही धनावंशी है एवम धन्नावंशी समाज की उत्पति भी धनाजी के अनुयायी बनने से ही शुरू हुई थी। 

वर्तमान में धनावंशी सम्प्रदाय की जनसंख्या करीब 1~1.25 लाख है। यदि हम 400~500 साल पहले की बात करे तो मुश्किल से 300~400 परिवार ही हुए होंगे जिन्होंने धनावंश अपनाया था। इन्ही 300~400 परिवारों के हम वंशज है जो कि अब 1 ~1.25 लाख के आसपास है। यदि हम आदि काल से होते तो आज हमारी भी जनसंख्या करोडों में होती व हम पूरे भारत वर्ष में फैले हुए होते लेकिन ऐसा नही है।
इसके लिए जब गौत्र वाइज़ जनगणना होगी तो आंकड़े और ज्यादा समझने वाले होंगे।

धनावंश के ज्यादातर जातिय नख जाट जाति से मेल खाते हैं क्योंकि आज से 500 वर्ष पूर्व जब धनाजी महाराज ने अपनी ही जाति के लोगो को अपना अनुयायी बनाया तथा उनको धनावंशी बनाया। हमारे पूर्वजों ने धनावंश तो अपना लिया लेकिन अपनी जातीय गौत्र नही छोड़ी। लेकिन रामानंदी सम्प्रदाय की बात करे तो उनके गौत्र किसी गुरु या गुरुद्वारे के नाम पर है। ऐसा इसलिए कि रामानंद जी ने बिना जातीय भेदभाव के सभी को अपना अनुयायी बनाया । स्वामी रामानंद ने भक्ति करने वालों के लिए नारा दिया "जात-पात पूछे ना कोई-हरि को भजै सो हरि का होई" ।
इस प्रकार रामानंदियों में सभी जातियों के लोग आये हुए हैं तथा उन्होंने जिस गुरुद्वारे से दीक्षा ली उसी गुरुद्वारे के नाम पर उनके गौत्र है।
लेकिन हमारे जातीय नख हमारी पहचान है । 

आज इतने बड़े सम्प्रदाय के बावजूद एक भी इसकी  केन्द्रीय संस्था नही है जो पूरे समाज को दिशा दे सके व राष्ट्रीय स्तर पर अपने समाज का प्रतिनिधित्व कर सके। आज से 40~50 साल पहले तक क्षेत्रीय स्तर पर महंत मंडल हुआ करते थे लेकिन धीरे-धीरे उनके निष्क्रिय होने के बाद अब केंद्रीय संस्था का होना नितांत आवश्यक है। केंद्रीय संस्था के साथ ही सबसे पहला सवाल यह आता है कि हमारा इतिहास क्या है, हम कौन है, हमारी उत्पत्ति कँहा से है। बाकी जितने भी वैष्णव संप्रदाय है उनका अपना इतिहास है लेकिन हमारे समाज के इतिहास के बारे में  छान-बीन करने की कोई भी सकारात्मक पहल नही हुई है।
जिस समाज का इतिहास नही हो उसका भविष्य भी अंधकारमय होता है। यदि हम हरियाणा-पंजाब के धन्नावंशियो की बात करे तो उनमें से काफी लोग आजकल सर्वे स्वामी समाज मे रिश्ते करने लग गए हैं एवम धन्नावंशी समाज के बारे में जानकारी के अभाव में ही यह सब हो रहा है। यदि मैं यह कहुँ तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नही होगी कि बिना धन्नावंशी समाज के इतिहास के आनेवाले कुछ वर्षों में यह सर्व स्वामी समाज या ब्राह्मण समाज मे कंही लुप्त हो जाएगा व धीरे-धीरे धन्नावंशी समाज का नाम ही नही रहेगा। क्या हम चाहेगे की हमारे इतने अच्छे और इतने पुराने सम्प्रदाय की यह स्थिति हो?

गलता गद्दी की गुरु परंपरा

गलता गद्दी की स्थापना श्री कृष्णदासजी पयहारी ने की थी। वे रामानंदजी के शिष्य अनंतानंदजी के शिष्य थे। पयहारीजी ने बारह वर्षों तक पुष्कर में तपस्या करने के उपरांत गलता में अपना स्थान बनाया।

श्री कृष्णदासजी बड़े चमत्कारी संत थे। उन्होंने गलता में नाथ पंथी तारानाथ योगी के अभिमान को गलित किया। आमेर के महाराजा पृथ्वीसिंह ने इन्हें अपने गुरु का सम्मान प्रदान किया। पयहारीजी के ब्रह्मलीन होने पर उनके दो शिष्य कील्हदासजी और अग्रदासजी में से बड़े शिष्य कील्हदासजी ने गद्दी को संभाला। शिष्य परंपरा इस प्रकार है

(1) श्री कृष्णदास पयहारी

(2) श्री कील्हदास

(3) श्री कृष्णदास (छोटे)

(4) श्री विष्णुदास

(5) श्री नारायणदास

(6) श्री हरिदेवाचार्य

(7) श्री रामप्रपन्नाचार्य (मधुराचार्य)

(8) श्री हरियाचार्य

(9) श्री श्रियाचार्य

(10) श्री जानकीदास

(11) श्री रामाचार्य



(12) श्री सीतारामचार्य

(13) श्री हरिप्रसादाचार्य

(14) श्री हरिवल्लभाचार्य

(15) श्री हरिशरणाचार्य

(16) श्री रामोदाराचार्य

(17) श्री अवधेशाचार्य (वर्तमान महंत)



गलता गद्दी का इतिहास कुछ इस तरह है-
1 - रामानंद जी के 12 शिष्य हुए, उनमें एक धनाजी थे ।
2 - रामानंद जी के प्रथम शिष्य थे -अनन्तानंदजी यानि धनाजी के गुरू भाई ।
3- अनन्तानंदजी के एक शिष्य हुए कृष्ण दास जी पयहारी उन्होंने 16 वीं शताब्दी मे गलता आश्रम की स्थापना की, ये धनाजी के बाद हुए ।
4- कृष्ण दास जी पयहारी के दो शिष्य हुए 1-कील्ह दास जी दूसरे अग्र दास जी, कील्ह दास जी गलता पीठ के आचार्य हुए, यह रामावतों की एक बड़ी पीठ है ।
5-अग्र दास जी ने गलता से अलग हो कर रैवासा में नई पीठ की स्थापना की । उनका जन्म संवत 1553 में हुआ, उन्होंने दीक्षा संवत 1572 ग्रहण कर रामानंद सम्प्रदाय में एक नई परम्परा के अनुसार --रसिक सम्प्रदाय --की स्थापना की ।
तो, धन्नावंशी समाज का गलता और रैवासा से कोई सम्बन्ध नहीं है । चूँकि हम अपना कोई स्थान बना नहीं पाए हैं, इसलिए पुष्कर, गलता, रैवासा और भी न जाने कहां-कहां जाकर संतुष्टि प्राप्त करते हैं । 

गोपालपुरा का इतिहास यह है कि राव बीका के छोटे भाई बीदा 1538 में बीदासर आए। उनके पड़पोते ने गोपालपुरा बसाया। 1730 में बनी गोपालपुर गद्दी को जब कोई ग्यारह सौ वर्ष पहले की बताता है तो हंसी के अलावा क्या आए।

वर्तमान महंतजी के गुरु जी ने 40 वर्ष पहले गोपालपुरा महंत द्वारे का जीर्णोधार करवाया।  उन्होंने मंदिर की स्थापना का एक संक्षिप्त शिलालेख संवत 953  का लगा दिया। उन्होंने इस बात पर तनिक भी विचार नहीं किया कि जब गोपालपुरा गांव को बसे हुए ही पौने चार सौ वर्ष हुए हैं तो इतनी पुरानी संवत का नया शिलालेख लगाने का क्या औचित्य है? वस्तुत: न डूंगर बालाजी का मंदिर पुराना है और न ही यह पुराना है। दोनों साथ-साथ के ही मंदिर हैं। बीदावत गोपाल सिंह जी ने डूंगर पहाड़ी पर अपना किला बनाना चाहा था। उन्होंने पहाड़ी के ऊपरी भाग को समतल करवाया तभी उन्हें बहुत तरह के अपशकुन हुए। कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। किसी विद्वान सज्जन ने उन्हें सलाह दी कि इस पहाड़ी पर आपको किला नहीं बनाना चाहिए। आपको किला भी बनाना चाहिए और गांव भी बसाना चाहिए पर पहाड़ी की तलहटी में। उनको यह बात उचित लगी। तब उन्होंने समतल कराई गई जगह पर बालाजी का एक मंदिर स्थापित कर दिया। वही मंदिर डूंगर बालाजी मंदिर है। इस बीच गोपाल सिंह की मृत्यु हो गई तो उनके पुत्र ने पिता की स्मृति में गोपालपुरा गांव बसाया और अपना किला भी बनवाया जो आज भी मौजूद है। और उसके बाद ही ठाकुर जी का मंदिर बना। 

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