झाड़ेली गाँव (Jhareli Village)
नागौर जिले के जायल तहसील में स्थित एक ऐतिहासिक गाँव
गाँव परिचय
झाड़ेली गाँव नागौर जिले के जायल तहसील में नागौर-लाडनूं रोड NH-58 पर नागौर से 35 km पूर्व में स्थित है। यहाँ धन्नावंशी स्वामियों के 33 घर हैं।
संपर्क सूत्र
CONTACT DETAILSनौकरीपेशा (Occupation)
अधिकांश लोग खेती से जुड़े हुए हैं। यहां के धन्नावंशी खेती बाड़ी के लिए काफी जाने जाते थे। कुल करीब 800 बिगा भूमि है।
सरकारी नौकरी
- भंवरलाल पुत्र श्री गणेश दासजी बुगालिया – जलदाय विभाग, पीलीबंगा
- रामनिवास पुत्र श्री गुकुल दास जी तेतरवाल – लेक्चरर, Govt School झाड़ेली
- दिनेश पुत्र श्री कानदास जी तेतरवाल – स्टेशन मास्टर, मुम्बई (भारतीय रेल)
- दिनेश पुत्र श्री भंवरलाल बुगालिया – Nursing Officer, AIIMS जोधपुर
प्राइवेट क्षेत्र
- प्रेम दास पुत्र स्व. श्री देवदासजी भांभू – Sr. Engineer, Samsung Engineering, नोएडा
- ओम प्रकाश पुत्र श्री भींवदास जी भाम्भू – BPO (US based), दिल्ली
- राम पुत्र भंवरलाल भाम्भू – इंजीनियर
- श्याम पुत्र भंवरलाल भाम्भू – इंजीनियर
- श्याम पुत्र भंवरलाल भाम्भू – इंजीनियर
जनसंख्या
28 लोग
98 लोग
52 लोग
मंदिर
यहां ठाकुर जी का काफी पुराना मंदिर है जिसका साल 2020 पूरे में गाँव के सहयोग से बहुत ही भव्य मन्दिर का निर्माण हुआ। पुराने मंदिर का निर्माण ठा. रणजीत सिंह जी ने सम्वत 1920 माघ सुदी पंचमी (सन 1863) के दिन नीव भरकर शुरू करवाया था। मंदिर के एक वर्ष उपरांत सम्वत 1921 (सन 1864) में झाड़ेली गढ़ का निर्माण शुरू हुवा था। नए मंदिर के निर्माण की नीव सम्वत 2075 चैत्र बद्दी दूज (3 मार्च 2018) में ठा. हेमसिंह जी, ठा जुगलसिंह व समस्त गांववासियो की उपस्थिति में हुई।
इतिहास
झाड़ेली गाँव की माटी और रिश्तों की कहानी
यह कहानी है झाड़ेली गाँव की, जहाँ की उपजाऊ मिट्टी और ठंडी हवाओं में आज भी अपनों का इतिहास सांस लेता है। बहुत समय पहले, इस गाँव की धरती पर सबसे पहले कदम रखने वाला एक तेतरवाल परिवार था। इस परिवार की नींव दो भाइयों ने रखी थी— गिरधारीदासजी और सांवल दासजी। दोनों भाइयों का जीवन सरल था, लेकिन आगे चलकर इनके परिवारों ने गाँव को एक नया रूप दे दिया।
बेटियों का लाड और खेतों की पुकार
गिरधारीदासजी के आँगन में बेटों की किलकारी तो नहीं गूंजी, लेकिन उनके घर को सात पुत्रियों की रौनक मिली। समय बीतता गया, बेटियाँ ब्याह कर अपने-अपने ससुराल चली गईं। अब गिरधारीदासजी बुढ़ापे की दहलीज़ पर थे और घर में हाथ बंटाने वाला कोई पुरुष नहीं था। दूसरी तरफ, झाड़ेली की ज़मीन बहुत उपजाऊ थी, जहाँ अच्छी खेती की असीम संभावनाएँ थीं।अपने बूढ़े पिता की देख-रेख और खेती-बाड़ी को सहेजने के लिए, सात में से पाँच बहनें अपने पतियों के साथ वापस अपने पीहर, यानी झाड़ेली गाँव आकर ही बस गईं। इस तरह बेटियों के ससुराल वाले इस गाँव का हिस्सा बनने लगे।
भांभू परिवार का आगमन: सुख-दुख का साथ
इन बहनों में से एक थीं श्रीमती पेमीदेवी, जिनका विवाह सुनारी के श्री हरिदासजी भांभू के साथ हुआ था। पेमीदेवी अपने पति के साथ झाड़ेली आ गईं। सालों बाद, आज गाँव में जो श्री भिन्वदासजी और स्व. देवदासजी के भरे-पूरे परिवार हैं, वे इसी जोड़े की संतानें हैं।रिश्तों की यह डोर तब और मजबूत हुई जब पेमीदेवी की बहन श्रीमती मोहनी देवी के पति श्री मूलदासजी भांभू का अचानक देहांत हो गया। अकेलेपन के उस दौर में मोहनी देवी भी अपनी बहन के पास झाड़ेली चली आईं। मोहनी देवी की केवल दो बेटियाँ थीं, कोई बेटा नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी बहन के बेटे भींवदासजी को ही अपना पुत्र मान लिया और उन्हें अपना पूरा मातृत्व दे दिया।इसी दौरान, एक और बहन श्रीमती धनिदेवी पर दुखों का पहाड़ टूटा। विवाह के कुछ ही साल बाद उनके पति श्री बद्रीदासजी भांभू का स्वर्गवास हो गया। बेसहारा हुईं धनिदेवी भी वापस अपने पिता के घर झाड़ेली लौट आईं और यहीं की होकर रह गईं। इस तरह सुनारी का भांभू परिवार झाड़ेली की मिट्टी में रच-बस गया।
बुगालिया परिवार का नया सवेराकहानी का एक और सुंदर अध्याय तब शुरू हुआ जब बाकी दो बहनें— श्रीमती धापी देवी (पत्नी श्री खूमदासजी बुगालिया) और श्रीमती हीरा देवी (पत्नी श्री धुंकलदासजी बुगालिया) भी सारंगसर छोड़कर झाड़ेली आकर रहने लगीं।इनके साथ ही, खूमदासजी के भाई श्री माधोदासजी को भी झाड़ेली की आबोहवा ऐसी रास आई कि वे भी यहीं आकर बस गए। समय का चक्र चलता रहा और आज झाड़ेली गाँव में जितने भी बुगालिया परिवार फल-फूल रहे हैं, वे इन्हीं तीन भाइयों और उनके परिवारों (खूमदासजी, धुंकलदासजी और माधोदासजी) के वंशज हैं।
तेतरवाल परिवार की नई राहें और आस्था की जोत
जहाँ एक तरफ गाँव में नए परिवार बस रहे थे, वहीं दूसरी तरफ सांवल दासजी का परिवार एक नई राह चुन रहा था। सांवल दासजी के बेटे नारायणदासजी हुए, और उनके पुत्र श्री लालदास तेतरवाल ने एक दिन झाड़ेली गाँव छोड़ दिया और जाकर जसवंतगढ़ में अपना नया आशियाना बसा लिया।लेकिन झाड़ेली गाँव कभी भी तेतरवाल नाम से सूना नहीं हुआ। बरसों पहले, गाँव सिंथल (नापासर, बीकानेर) से श्री नानूरामजी तेतरवाल इस गाँव में आकर बसे थे। आज झाड़ेली गाँव में जो भी तेतरवाल परिवार आबाद हैं, वे सब उन्हीं नानूरामजी के वंशज हैं। इसी परिवार की तीसरी पीढ़ी, यानी नानूरामजी के पौत्र श्री गोकुलदासजी तेतरवाल, आज भी गाँव के मंदिर में सुबह-शाम श्रद्धा की जोत जलाते हैं और ईश्वर की पूजा-अर्चना करते हैं।यह कहानी सिर्फ़ एक गाँव की नहीं है, बल्कि इस बात की गवाह है कि कैसे बेटियों के प्रेम, भाइयों के साथ और बदलते वक्त ने मिलकर झाड़ेली गाँव को एक खूबसूरत गुलदस्ता बना दिया।
गाँव की झलकियां
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