ग्राम कसूंबी
ऐतिहासिक धरोहर
गाँव परिचय
कसूंबी गाँव राजस्थान के चूरू जिले में स्थित एक अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध स्थल है। सुजानगढ़ से ठीक 6 किलोमीटर दक्षिण में स्थित यह गाँव आज भी सदियों पुराने वैभव और आध्यात्मिक चेतना की कहानियों को समेटे हुए है।
इतिहास
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मोहिल साम्राज्य
आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व जब सुजानगढ़, रतनगढ़, श्रीडूंगरगढ़ और बीदासर जैसे शहर अस्तित्व में नहीं आए थे, तब छापर, चाड़वास, द्रोणपुर, लाडनूं और कसूंबी इस समूचे क्षेत्र के सबसे बड़े और प्रमुख केंद्र थे।
मोहिल राजपूतों की राजधानी: यह क्षेत्र चौहानवंशीय मोहिल राजपूतों के आधिपत्य में था, जिनका शासन लगभग 1440 गाँवों पर फैला हुआ था। कसूंबी को मोहिलों की राजधानी के रूप में भी देखा जा सकता है।
भौगोलिक बनावट: सुजानगढ़ और कसूंबी के मध्य एक सुंदर प्राकृतिक ताल (तालाब) फैला हुआ है। इस ताल के दक्षिण-पूर्वी कोने पर कसूंबी और दक्षिण-पश्चिमी कोने पर जसवंतगढ़ (जो सुजानगढ़ के काफी बाद में बसा) स्थित है।
नामकरण का इतिहास: 'कसूमल' रंग और पत्थर के घाणे
कसूंबी गाँव का नाम यहाँ की एक विशेष कला और प्राकृतिक वनस्पति के कारण पड़ा:
कसूमल रंग: प्राचीन काल में राजपूत योद्धा युद्ध में जाने से पूर्व कसूमल (केसरिया) रंग के साफे पहना करते थे। इस ताल के निकट 'कसूमल' नाम की विशेष घास और रोहिड़ा के फूलों के प्राकृतिक मिश्रण से यह भव्य रंग तैयार किया जाता था।
छींपा जाति का योगदान: यहाँ छींपा जाति के लोग बड़ी संख्या में वस्त्रों को कसूमल रंग में रंगने का कार्य करते थे।
ऐतिहासिक घाणे: वस्त्रों को रंगने और कसूंबा घोटने के लिए यहाँ पत्थर के विशाल पात्र, जिन्हें 'घाणे' कहा जाता है, उपयोग में लिए जाते थे। ताल के पास आज भी लगभग 4×4 फीट लंबाई-चौड़ाई के चार प्राचीन जोधपुरी पत्थर से बने घाणे मौजूद हैं (पूर्व में इनकी संख्या 10 से अधिक थी)।
आध्यात्मिक केंद्र: भक्त शिरोमणि धन्नाजी महाराज की तपोभूमि
कसूंबी गाँव धनावंशी स्वामी समाज के पंथ प्रवर्तक और परम सिद्ध संत भक्त शिरोमणि धन्नाजी महाराज की उत्तर जीवन काल की प्रमुख कर्मस्थली और विश्राम स्थली रहा है।
धनाजी का आगमन (संवत 1532): टौंक के धुआं कलां क्षेत्र से चलकर परम भक्त धन्नाजी महाराज ने संवत 1532 में कसूंबी के ताल पर स्थित प्राचीन राधाकृष्ण मंदिर में विश्राम लिया था।
अंतिम विश्राम और समाधियाँ: लोक-मान्यता के अनुसार, धन्नाजी महाराज का पूर्ण (अंतिम) विश्राम भी इसी पावन धरा पर हुआ। यहाँ एक टीले में संतों की लगभग 20 प्राचीन समाधियाँ दबी हुई हैं (जिनमें से 3-4 वर्तमान में दृश्यमान हैं)। इन समाधियों पर उत्कीर्ण पावन चरण-चिह्न (चरण पादुका) यहाँ सदियों तक रहे सुंदर धार्मिक वातावरण और साधु मंडली की उपस्थिति की पुष्टि करते हैं।
धना का खेत (ऐतिहासिक साक्ष्य): प्रख्यात इतिहासकार गोविंद अग्रवाल ने अपनी सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति 'चूरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास' में भी प्रामाणिक रूप से स्वीकार किया है कि कसूंबी गाँव में 'धना का खेत' स्थित था।
प्राचीन बावड़ियाँ और लुप्त होती धरोहर
जलापूर्ति का साधन: प्राचीन काल में कसूंबी की दो विशाल बावड़ियाँ पूरे क्षेत्र के लिए जलापूर्ति का मुख्य स्रोत थीं। साधु-संत स्वयं इन बावड़ियों से पवित्र जल निकालकर प्रभु सेवा में उपयोग करते थे।
उपेक्षा की कहानी: इन बावड़ियों के मध्य कभी विशाल पत्थरों से निर्मित भव्य राधाकृष्ण मंदिर हुआ करता था, जिसके खंभों पर सुंदर बैल-बूटे और मूर्तियां अंकित थीं। जीर्णोद्धार के अभाव में नासमझी के कारण इस मंदिर के विशाल पत्थरों और स्तम्भों को अन्य निर्माण कार्यों में उपयोग कर लिया गया, जिसके अवशेष आज भी यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं। प्राचीन काल के कई ऐतिहासिक शिलालेख भी संरक्षण न मिलने के कारण काल के गाल में समा गए।
कसूंबी गाँव मात्र एक गाँव नहीं, बल्कि राजस्थान के गौरवशाली इतिहास, हस्तशिल्प (रंगाई कला) और धनावंशी समाज की महान आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। इस अनमोल ऐतिहासिक धरोहर को सहेजना और इसका संरक्षण करना हम सभी का परम कर्तव्य है।
जनसंख्या
5 लोग
24 लोग
240 लोग
4 लोग
80 लोग
266 लोग
66 लोग
39 लोग
28 लोग
31 लोग
72 लोग
107 लोग
